<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-6853758773001535028</id><updated>2012-02-16T19:38:50.019Z</updated><category term='अनामदास'/><category term='इंडिया'/><category term='ब्लाग'/><category term='अनामदास का चिट्ठा'/><category term='वर्षा'/><category term='bihar'/><category term='एलबम'/><category term='हिंदु'/><category term='बारिश'/><category term='hindi'/><category term='हिंदूत्व'/><category term='ब्लौग'/><category term='culture'/><category term='अनामदास का हिंदी चिट्ठा'/><category term='मौसम'/><category term='हिंदी'/><category term='बियाह'/><category term='india'/><category term='blog'/><category term='शब्द'/><category term='अनामदास का ब्लाग'/><category term='war'/><category term='भाषा'/><category term='बाबा रामदेव'/><category term='कविता'/><category term='धर्म'/><category term='नैतिकता'/><category term='संस्कृति'/><category term='ब्लॉगर'/><category term='blogger'/><category term='भारत'/><category term='चिट्ठा'/><category term='हिन्दी'/><category term='बरसात'/><category term='religion'/><category term='आम'/><category term='अँगरेज़ी'/><category term='चिट्ठाकारिता'/><category term='anamdas ka chitta'/><category term='विदेश नीति'/><category term='hindi blog'/><category term='हिंदू'/><category term='बिहार'/><category term='ब्लॉग'/><category term='anamdas'/><title type='text'>अनामदास का चिट्ठा</title><subtitle type='html'>ब्लॉग की दिलचस्प दुनिया का रस लेने का इरादा है. ब्लॉग को उल्टा करके देखिए ग्लोब न सही...गलॉब् तो बनता ही है यानी तक़रीबन पूरे ग्लोब के लोग इससे जुड़े हैं. छोटे-छोटे ब्लॉग लिखना चाहता हूँ ताकि आप लोग पढ़ लें, इतना ही काफ़ी होगा.</subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://anamdasblog.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6853758773001535028/posts/default?max-results=100'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://anamdasblog.blogspot.com/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><author><name>अनामदास</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06852915599562928728</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_fR7cWVj99s0/SKvHGScbUlI/AAAAAAAAAIY/dP4fvrpVCXk/S220/images.jpg'/></author><generator version='7.00' uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>80</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>100</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6853758773001535028.post-5731785533741174884</id><published>2011-06-06T01:48:00.006+01:00</published><updated>2011-06-06T12:15:50.367+01:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='बाबा रामदेव'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अनामदास का हिंदी चिट्ठा'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अनामदास का ब्लाग'/><title type='text'>बाबा ही बोल सकते हैं, सीईओ नहीं</title><content type='html'>बाबा से एलर्जी या सच्चे लोकतंत्र का आग्रह, आपके भीतर कौन सी भावना अधिक बलवती है? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अनेक बुद्धिजीवी बाबा को दुत्कारने को अपना पहला कर्तव्य मान बैठे हैं, बाबा के पास बहुत सारे सवालों के जवाब नहीं है लेकिन भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ ऐसी मुहिम चलाने कोई और आगे क्यों नहीं आया, इस सवाल का जवाब भी उन्हें ख़ुद से पूछना चाहिए.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारत की जनता हमेशा से संतों, भिक्षुओं, सूफ़ियों, दरवेशों की सुनती रही है. उनकी सहज बुद्धि कहती है, उसकी बात सुनो जो अपने नफ़ा-नुक़सान के फेर में नहीं है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऋषियों की बात बहुत पुरानी है. बुद्ध, शंकराचार्य, गांधी ही नहीं, बिनोबा, जयप्रकाश तक, अलग-अलग दौर में भारत की जनता ऐसे ही लोगों की सुनती रही है जो नेता नहीं, बल्कि संत दिखते हों.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;या फिर पीढ़ी-दर-पीढ़ी जिनका राज चल रहा हो, शायद यहाँ भी यही सोच है कि व्यक्ति संयोगवश एक ख़ास ख़ानदान में पैदा हुआ है, अपने फ़ायदे के लिए (नीचे से ऊपर आने की कोशिश में) कुछ नहीं कह-कर रहा है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अनेक बार धोखा खाने के बावजूद ज्यादातर मौक़ों पर सामूहिक-बुद्धिमत्ता (कलेक्टिव विज़डम) कारगर रही है, बाबा रामदेव के मामले में होगी या नहीं, कोई नहीं कह सकता.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बाबा मुझे शुरू से ही पसंद नहीं हैं, बाबा के ख़िलाफ़ ढेरों सवाल उठाए जा सकते हैं, किसके ख़िलाफ़ नहीं उठाए जा सकते, उठाने भी चाहिए, लोकतंत्र का यही तकाज़ा है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;महात्मा गांधी के नाम से जुड़ी सत्ताधारी पार्टी ने उन्हीं की तरह बिन-सिला कपड़ा पहनने वाले आदमी को रातोंरात जिस तरह अगवा किया उससे घबराहट, डर, सत्ता का मद, बेवकूफ़ी, अपरिपक्वता आदि-आदि का ही सबूत मिलता है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारत जैसे विविधता वाले देश में योग गुरू होने की वजह से बाबा रामदेव सरीखे लोग हमेशा शंका की नज़र से देखे जाएँगे. उनसे आरक्षण, पर्यावरण, भूमंडलीकरण, सांप्रदायिकता जैसे पेचीदा राजनीतिक मुद्दों पर विवादों से परे अकादमिक नज़रिया रखने की आशा करना भी फ़ालतू है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विवादों से बचकर राजनीति करने की नटविद्या वे शायद आगे चलकर सीखें, या न भी सीख पाएँ, लेकिन इस समय वे जो कह रहे हैं उसमें ऐसा क्या है जो भारत का लगभग हर आदमी नहीं सुनना चाहता, वैसे भारत में अपवाद भी लाखों में होते हैं (जनसंख्या के अनुपात में).&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फ़िलहाल मामला भ्रष्टाचार का है, कांग्रेस का प्रबल विश्वास है कि नौ प्रतिशत विकास दर की नाव जिस नदी में तैर रही है उसे कोई सूखने नहीं देना चाहता इसलिए बाबा रामदेव की बात पर लोग ज्यादा कान नहीं देंगे. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उन्हें ये भी साफ़ दिख रहा है कि भ्रष्टाचार को मुद्दा बनाने की सदाक़त और बूता मुख्यधारा की किसी पार्टी में नहीं है, अगर बोलने के लिए लब आज़ाद होते तो घोटालों की फ़़ेहरिस्त से लैस विपक्ष मिमियाने से आगे ज़रूर कुछ करता.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इससे पहले जब भ्रष्टाचार राष्ट्रीय मुद्दा बना तो वीपी सिंह के नेतृत्व में ("राजा नहीं, फकीर है" का नारा याद करिए), जिन पर आजीवन भ्रष्टाचार का कोई आरोप नहीं लगा, लोगों को उनसे बाक़ी जो भी शिकायतें रही हों.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यही वजह है कि अन्ना हज़ारे, बाबा रामदेव जैसे लोग आगे आए हैं जो राजनीति के मौजूदा खाँचे में फिट नहीं होते,  ग्लोबाइज़्ड दुनिया में खुद आर्थिक शक्ति बनने और इंडिया को बनाने की रेस में नहीं हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बाबा रामदेव, अन्ना हज़ारे, मेधा पाटकर, अरुंधति रॉय, विनायक सेन, इरोम शर्मिला और हज़ारों गुमनाम-बेनाम-कमनाम लोग जो कह रहे हैं, उसमें अंतर हो सकता है, लेकिन एक बात समान है कि वे मौजूदा सत्ता, व्यवस्था, कार्यप्रणाली, संस्कृति, आचरण, नियम-क़ानून और संवेदनाओं पर सवाल उठा रहे हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उनसे आप सहमत भी हो सकते हैं, असहमत भी, मगर अर्मत्य सेन से उधार लेकर कहूँ तो एक 'आर्ग्युमेंटेटिव इंडियन' होने के नाते आप कैसे उन्हें पुलिसिया डंडे से चुप कराए जाने को सहन कर सकते हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बहुत ध्यान से सुनना चाहिए उनको जो आपके भले की बात कर रहे हों क्योंकि वही आपका बहुत बड़ा नुक़सान कर सकते हैं, बहुत ध्यान सुनना चाहिए उनको जिनकी बात रास नहीं आ रही हो क्योंकि वहीं कोई फ़ायदा छिपा हो सकता है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बोलना और सुनना दोनों चाहिए कि उसके बिना लोकतंत्र नहीं चलता.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6853758773001535028-5731785533741174884?l=anamdasblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://anamdasblog.blogspot.com/feeds/5731785533741174884/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6853758773001535028&amp;postID=5731785533741174884&amp;isPopup=true' title='5 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6853758773001535028/posts/default/5731785533741174884'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6853758773001535028/posts/default/5731785533741174884'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://anamdasblog.blogspot.com/2011/06/blog-post.html' title='बाबा ही बोल सकते हैं, सीईओ नहीं'/><author><name>अनामदास</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06852915599562928728</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_fR7cWVj99s0/SKvHGScbUlI/AAAAAAAAAIY/dP4fvrpVCXk/S220/images.jpg'/></author><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6853758773001535028.post-1210528960400725290</id><published>2011-02-28T23:15:00.002Z</published><updated>2011-03-01T00:41:12.738Z</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अनामदास का हिंदी चिट्ठा'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='एलबम'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='anamdas'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='anamdas ka chitta'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='hindi blog'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='बिहार'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='बियाह'/><title type='text'>बियाह बिहार में</title><content type='html'>&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;एलबम पार्ट वन&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फोटो 1-- घर जगमग, हेलोजेन के लाइट, गाँछ पर लड़ी, चेहरों पर खुशी, साज सिंगार, जाड़ा में शिफॉन के साड़ी पर कत्थई कार्डिगन, लीला बुआ, अल्पना दीदी और चंपाकली छमक छल्लो&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फोटो 2-- जिनगी के अरमान पूरा होए के खुशी से दमकत चेहरा, नारंगी साड़ी पियर सेनूर (मे बी अदर वे राउंड), भर-भर आँख काजर, केहुनी तक लहठी, गुलाबी टोकरी में चुनरी से ढाँकल पूजा के सामान, डेराइल दुल्हिन के पीछे खड़ा इस्माट भउजी&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फोटो 3-- बुढ़िया नानी, टूटल चस्मा, दाँत में फाँक, मचकल मचिया, केयरिंग भतीज-पतोह, पिलेट में अकेला उदास लड्डू&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फोटो 4-- लाल पियर पंडाल, दवाई वाला टुन्नू, नौकरी खोजे वाला लल्लन, गोपेसरा एन्ने काहे झांक रहा है...टोकरी ले जा रहा फगुनी, टेंट हाउस वाला जइसा बोला था, सोभ रहा है, डंडी न मारिस है...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फोटो 5-- तीन आदमी, ई कोट वाला, दिल्ली से आए हैं, फुलेसर जी के दमाद आईसीआईसीआई बैंक दिल्ली में हैं, दुसरका बुल्लु कमीज वाला आईएस का तय्यारी में है और कोना में नीलेश भइया हैं सीसीटीवी में हैं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फोटो 6-- राज दरबार टाइप का बनाया है, फूल कलकत्ता से लाया है, का जाने झूठ बोल रहा होगा लेकिन एकदम सेंट आ रहा था, दुल्हा-दुल्हिन का कुर्सी है, एके दिन का बात है लेकिन सबका अपना अरमान होता है, है कि नहीं?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फोटो 7-- खाना लग गया है, तरबूज्जा के सारस बनाया है अलबत्त, पिलेट काँच का नहीं है, "जगदंबा बाबू के बेटवा के बियाह में तो दस-बीस गो तो धोनही में टूट गया था, मेलामाइन है, टूटता नहीं है, टेंटहाउस वाला चालू है, एजी धक्का मत दीजिए, ढेर भुखाइल हैं तो आप ही जाइए पहिले...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फ़ोटो 8-- बरदी वाला बेटर लगइले हैं, अरे, इ तो रेकसा वाला फेकुआ के बेटा है,  पिलेटवा लेके कहवाँ बइठे जी, बड़ा शहर में सब काम खड़े खड़े होता है का? , जब से इनका बेटवा बंबई गया है तब से रंग ढंग बदल गया है &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फोटो 9-- एगो कट्टल बाल वाली है, तीन आदमी कनखी से देख रहा है, उसकी सहेली मुँह तोपके हँस रही है, दूर में दिल्ली जाने की तैयारी कर रहा लड़का है जो कनखी से नहीं, सीधे देख रहा है, वह इस फोटो में नहीं है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फोटो 10-- रात के शामियाना में काला चश्मा, लोकल रजनीकांत, पीला धारीवाली पैंट और नीला कोट, अंदर से झाँकती बैंगनी टी-शर्ट, हम किसी से कम नहीं वाली अदा, दबंग हिट होने के बाद आया नया कॉन्फिडेंस, दो-तीन लोकल फ़ैन भी&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फोटो 11-- आटा चक्की वाला का बेटवा बीडियो कैमरा लेके आया था, रिकार्डिंग के लिए तो टुन्नुवा को कान्ट्रेक्ट देल्ले था पहिले से, अरे कैमरे देखाने लाया था, अरे नहीं, मुन्ना का दोस्त है इसलिए, पइसा बहुत है लेकिन देखाता नहीं है जादा....&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फोटो 12-- मरकरी के नीचे बइठे थे, चेहरा साफ़ नहीं लउक रहा है, ढेर लाइट हो गया, दया मास्टर जी, कन्हाई चच्चा, शिवबचन जी और के जाने कउन है...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फोटो 13-- कोई बोला नहीं, रोसड़ा वाले फुफ्फा बियाहो के दिन बिना दाढ़ी बइनले घूम रहे हैं, जनमासा में तो फिरी का नउआ बइठल था ऐँ, इन्हीं को एतना ठंडा लग रहा था और कौन सकरात के बाद मफलर बाँध के घूमता है... दरोगा जी ओने का देख रहे हैं??&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फोटो 14-- लाल टोपी वाला लइका शायद कंचनवा का है, पता नहीं कौन गोदी में लेले है, रील बरबाद करते हैं, केकर केकर फोटो खींच लिया है....&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फोटो 15-- ले, दुल्हिन के फोटो के पता नहीं, खाना का डोंगा में कैमरा गोत के फोटो खींचा है, ई का है जी??, नवरतन कोरमा, ऐं? सलाद नहीं सैलेड कह रहा था कोई बरियाती...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फोटो 16-- पाँच आदमी खड़े हैं, एक तन के, एक भौंचक, एक उदास, एक सजग, एक उदासीन....&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फोटो 17---पाँचों उँगली में अँगुठी पहिने बिधायकी के उम्मीदवार जी, चारों तरफ़ सूरजमुखी की तरह मुँह उठाए लोग, एक चश्मे पर चमका फ्लैश, "लगन के टाइम बहुत शादी अटेंड करनी पड़ती है" वाला भाव, गुलाबजामुन का दोना लिए कोई, "आप आए, हम धन्य हुए" वाली मुद्रा में...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फोटो 18-- गपुआ को देखिए जरा, जर रहा है, बियाह नहीं न हुआ अबहीं ले, हाँ, हर जगहे मनहूस मुँह बनाके खड़ा हो जाता है, ई पीला धारी वाला दुर्गा चचा के बेटा है, ई साल आईआईटी में नहीं हुआ, लेकिन डोनेशन वाला में सौथ इंडिया जाने वाला है...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फोटो 19-- भोला चाचा, रिटायर हो गए हैं लेकिन अफसरी रुआब अबइहों ले है, गंभीर आदमी हैं, पीछे तिनकौड़ी साहू, बड़ा बाबू, बुच्चन जी और उनके साढू जो लल्लन जी के मउसेरा भाई भी हैं...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फोटो 20-- शिवगंगा बैंड, माथे पर लैट उठाए औरतें, गुलाब से सजी गाड़ी, गले में गेंदे का हार पहने बराती, तनकर चलते मउसा जी, लाइट में हाइलाइट होता बीबीजे कोचिंग सेंटर का विज्ञापन&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फोटो 21-- अरे, पाँच-छौ गो नाती-पोता के साथ आए थे फुलेसर महराज, नहीं सुधरेंगे, एकवायन रूपया असूल करने के चक्कर में होंगे, देखिए कुरसिए के नीचे कचरा बिग रहा है, कोई दोसरा के भी तो हो सकता है ऊ कचरा...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फोटो 22-- अपनी पम्मी कितनी सुंदर दिख रही है, अगर यही फोटो भेज दिया जाए तो तुरंत बियाह ठीक हो जाएगा, लल्लनवा पाकेट में हाथ रखके खड़ा है, लगता है बहुत पइसा है पाकिट में....&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फोटो 23-- वही हम कहें, जैमाल वाला फोटो कहाँ गया, ई रहा, लैट कम है, चेहरा पर नहीं हैॉ, ठीक-ठीक है, नेचुरल है, दिख तो रहा है....&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फोटो 24-- क्लोज अप, एक दम्मे रवीना टंडन टाइप, दुर. आपको कोई और नहीं मिला था...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कच्ची और विदाई वाला दूसरा एलबम में है, दुल्हा तो ई एलबम में हइये नई है...&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6853758773001535028-1210528960400725290?l=anamdasblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://anamdasblog.blogspot.com/feeds/1210528960400725290/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6853758773001535028&amp;postID=1210528960400725290&amp;isPopup=true' title='14 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6853758773001535028/posts/default/1210528960400725290'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6853758773001535028/posts/default/1210528960400725290'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://anamdasblog.blogspot.com/2011/02/blog-post.html' title='बियाह बिहार में'/><author><name>अनामदास</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06852915599562928728</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_fR7cWVj99s0/SKvHGScbUlI/AAAAAAAAAIY/dP4fvrpVCXk/S220/images.jpg'/></author><thr:total>14</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6853758773001535028.post-5326402049960851225</id><published>2010-01-17T22:04:00.002Z</published><updated>2010-01-17T22:09:09.965Z</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अनामदास का हिंदी चिट्ठा'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='ब्लॉगर'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='hindi'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='anamdas ka chitta'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='ब्लाग'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अनामदास का ब्लाग'/><title type='text'>पॉलिश जैसी स्याह क़िस्मत</title><content type='html'>नई दिल्ली रेलवे स्टेशन के चौदह नंबर प्लेटफार्म पर सैकड़ों जूतों को स्कैन करता बारह साल का एक लड़का मेरे सामने रुका, "पॉलिश, साहब?"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरे चेहरे और जूतों की रंगत को अनुभवी आँखों से एक-एक बार देखने के बाद उसने सवाल पूछा था, उसका अंदाज़ा सही था. मेरे जूतों को पॉलिश की ज़रूरत थी.  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जूते की पालिश और शरीर की मालिश कुछ ऐसे काम हैं जो मेरे भीतर असमंजस पैदा करते हैं. हाथरिक्शे की सवारी, घरेलू नौकर की सेवाएँ वग़ैरह मेरे लिए जितनी सुविधा हैं, उतनी ही दुविधा भी. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वैसे सुविधा और दुविधा की इस लड़ाई में, सुविधा हमेशा जीतती रही है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक तरफ़ पूंजीवादी-सामंतवादी शोषण, तो दूसरी ओर रोज़गार का अवसर. पॉलिश कराना सामंतवादी तौर-तरीक़ों को चलाए रखना है या पॉलिश न कराना एक ग़रीब मज़दूर का बहिष्कार?  मेरे लिए यह बहुत कठिन सवाल है जिसका पक्का जवाब मेरे पास नहीं है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने उसका नाम नहीं पूछा लेकिन कल्लू, बिल्लू, पप्पू जैसा कुछ रहा होगा. प्रियांश, अरुणाभ, श्रेयस जैसा तो नहीं ही रहा होगा, ऐसे नाम उन बच्चों के होते हैं जिनकी देखभाल करने वाले माँ-बाप होते हैं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"पॉलिश, साहब?" उसके दोबारा पूछने पर मैंने हामी भर दी. सधे हुए हाथों से उसने दो मिनट में जूतों को चमका दिया. पीठ पर भारी बैग था इसलिए मैंने उससे फीते बाँधने को कहा. पहली बार उसने अनसुना कर दिया, जब मैंने दोबारा कहा तो बुरा-सा मुँह बनाकर फीतों से जूझने लगा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उसने बहुत जुगत लगाकर फीतों को किसी तरह एक दूसरे में फँसा दिया, ठीक उसी तरह जैसे मेरा पाँच साल का बेटा करता है. वक़्त ने उसे जूते चमकाना सिखा दिया है मगर उसे जूते के फीते बाँधना सिखाने वाले पता नहीं कहाँ हैं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शायद उसे 'उँगलियों का हुनर' सिखाने वाला कोई उस्ताद नहीं मिला वरना वह जूते घिसने के जगह उसी स्टेशन पर जेब तराश रहा होता, वह स्कूल नहीं जाता यानी किसी नेक एनजीओ के दायरे से भी बाहर है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब मैं अपने बेटे को जूते को फीते बाँधना सिखाऊँगा तो उस लड़के का मटमैला चेहरा आँखों के सामने आएगा.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6853758773001535028-5326402049960851225?l=anamdasblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://anamdasblog.blogspot.com/feeds/5326402049960851225/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6853758773001535028&amp;postID=5326402049960851225&amp;isPopup=true' title='17 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6853758773001535028/posts/default/5326402049960851225'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6853758773001535028/posts/default/5326402049960851225'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://anamdasblog.blogspot.com/2010/01/blog-post.html' title='पॉलिश जैसी स्याह क़िस्मत'/><author><name>अनामदास</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06852915599562928728</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_fR7cWVj99s0/SKvHGScbUlI/AAAAAAAAAIY/dP4fvrpVCXk/S220/images.jpg'/></author><thr:total>17</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6853758773001535028.post-1862414085401473747</id><published>2009-07-23T00:20:00.002+01:00</published><updated>2009-07-23T00:23:42.994+01:00</updated><title type='text'>आर्यभट मस्ट बी प्राउड</title><content type='html'>काल का पहिया 1510 साल में पूरा घूम गया. बिहार में जहाँ तरेगना है, वहाँ तारों को तरेगन कहते हैं. मिसाल- 'अइसा झापड़ मारेंगे कि दिन में तरेगन लउकने लगेगा'.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शून्य देने वाले वाले गणितज्ञ, दार्शनिक और खगोलशास्त्री आर्यभट ने जब तारों की गति को समझने के लिए इस डीह पर वेधशाला बनाई होगी तो लोगों ने तरेगना नाम रख दिया होगा, ऐसा मेरा अनुमान है.  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आर्यभटिय और आर्यसिद्धांत की रचना करके 550 ईस्वी में आर्यभट दुनिया से चले गए और तरेगना की क़िस्मत के डूबे हुए तारे को दो दिन के लिेए उगने में पंद्रह सदियाँ लगीं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कितनी जादुई बात है कि ग्रहण सबसे ज्यादा देर तक वहाँ रहा जहाँ से आर्यभट आसमान को देखते थे, मानो चांद-सूरज चाहते हों कि आर्यभट को पूरा अवसर मिले अध्ययन का.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;तरेगना एक, ईस्वी 499&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धोती बांधे, कंधे पर गमछा धरे आर्यभट जब कुसुमपुर से पैदल या बैलगाड़ी में बैठकर यहाँ पहुँचे होंगे तो लोगों की चिंता यही रही होगी इस साल पानी ठीक से बरसेगा या नहीं, पेड़ फलों से लदेंगे या नहीं. लोगों ने बीसेक साल के ब्राह्मण से अपना भविष्य जानना चाहा होगा, आर्यभट ने शायद यही कहा होगा, 'मैं ज्योतिषी नहीं, खगोल का अध्येता हूँ.' &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गणित के बीजसूत्रों और आसमान फैले हुए तारों के रहस्य ढूँढने के लिए आर्यभट के साथी थे उसकी अपनी वर्णमाला के अक्षर, जिन्हें हम आज x+Y=? के रुप में पहचानते हैं, वे लिखते होंगे, क+ख=?.  भोजपत्र, ताम्रपत्र और खड़िए से न जाने क्या-क्या लिखा-मिटाया होगा. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;किसी ग्रहण से पहले जब लोग पुराणों के किस्से लेकर विप्रवर के पास पहुँचे होंगे तो आर्यभट ने मिट्टी की गेंदों को गोल घुमाकर समझाया होगा, 'सूरज और धरती के परिभ्रमण पथ के बीच चंद्रमा के आ जाने से उसकी छाया पड़ती है...'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गर्भवती महिलाओं पर इसका क्या असर होगा, क्या तुलसी का पत्ता डाल देने से खाना अशुद्ध होने से बच जाएगा, ग्रहण के बाद क्या-क्या दान करना चाहिए....इस तरह के सवालों का जवाब में आर्यभट ने बड़ी विनम्रता से संभवत यही कहा होगा कि 'यह मेरा विषय नहीं है'.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;तरेगना दो, ईस्वी 2009&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ओबी वैन, कैमरामैन, पत्रकार, एस्ट्रोनॉट्स, सिक्यूरिटी के साथ मिनिस्टर, फाइल लिए कलेक्टर, टूरिस्ट और चिरंतन सवालों की खदबदाहट मन में लिए जनता. अब सबको सब कुछ पता है. कोई अध्येता नहीं है, हर कोई जानकार है, आख़िर 1500 साल बीत चुके हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भोजपत्र, ताम्रपत्र का ज़माना नहीं है, सेटेलाइट लिंक के ज़रिए लाइव ब्राडकास्ट हो रहा है, मिट्टी की गेंद घुमाकर समझाने की ज़रूरत नहीं है, टीवी चैनलों के पास अल्ट्रा मॉर्डन ग्राफ़िक सॉफ्टवेयर्स हैं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गर्भवती महिलाओं पर क्या असर होगा, किस राशि के लोगों के लिए ग्रहण कितना अशुभ होगा, किस-किस मंत्र का जाप करना चाहिए ये सब वेदों-पुराणों के हवाले से लाइव बताया जा रहा है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आर्यभट से कितना आगे निकल आए हैं हम, हमें अब सब पता है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आर्यभट ने तो सिर्फ़ बीजगणित और खगोल को एक दूसरे से जोड़ा था, हमने वेद, विज्ञान, मिथक, इतिहास, पुरातत्व, धर्म, दर्शन, ज्योतिष, अर्थशास्त्र सबको मथनी से घोंट दिया है और बनाया है अपना 'कल्चर' जिसके रहस्यों को आपने समझ ही लिया होगा अपने फ़ेवरिट चैनल की मदद से.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6853758773001535028-1862414085401473747?l=anamdasblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://anamdasblog.blogspot.com/feeds/1862414085401473747/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6853758773001535028&amp;postID=1862414085401473747&amp;isPopup=true' title='18 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6853758773001535028/posts/default/1862414085401473747'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6853758773001535028/posts/default/1862414085401473747'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://anamdasblog.blogspot.com/2009/07/blog-post.html' title='आर्यभट मस्ट बी प्राउड'/><author><name>अनामदास</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06852915599562928728</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_fR7cWVj99s0/SKvHGScbUlI/AAAAAAAAAIY/dP4fvrpVCXk/S220/images.jpg'/></author><thr:total>18</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6853758773001535028.post-7049045166737622464</id><published>2009-02-02T01:04:00.002Z</published><updated>2009-02-02T01:08:00.208Z</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='blogger'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='blog'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='hindi'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='ब्लॉग'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='anamdas ka chitta'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='चिट्ठा'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='हिंदी'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='ब्लाग'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अनामदास'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='हिन्दी'/><title type='text'>माँ सारदेSS कहाँ तू बीना बजा रही हैSS</title><content type='html'>हम बच्चों की पुकार माँ सारदे क्यों सुनतीं, लक्ष्मी ने हमारी प्रार्थना को पहले ही अनसुना जो कर दिया था. बाल विकास इस्कूल के बच्चे रोज़ाना माँ सारदे से पूछते थे कि वो कहाँ बीना बजा रही हैं. नीली कमीज़, खाकी हाफ़पैंट और बहती नाक बाले बच्चों को दून स्कूल, वेलहैम, शेरवुड और स्प्रिंगफ़ील्ड का पता ही नहीं था, जहाँ वे वीणा बजाती हैं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;माँ सारदे बीना बजाने में व्यस्त रहीं, उनकी कृपा जिन लोगों पर हुई उन्होंने प्राइमरी स्कूल में फ्रेंच, सितार, स्विमिंग और घुड़सवारी भी सीखी. हम ककहरा, तीन तिया नौ, भारत की राजधानी नई दिल्ली है...पढ़कर समझने लगे कि माँ सारदे की हम पर भी कृपा है. हमने सरसती पूजा को सबसे बड़ी पूजा समझा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जाड़े की गुनगुनी धूप में चौथी से लेकर दसवीं क्लास तक हर साल गन्ना चूसते हुए या छीमियाँ खाते हुए प्लान बनाते--'इस बार सरसती पूजा जमके करना है.' तभी शंकालु आवाज़ आती, 'अबे, चंदा उठाना शुरू करो', कोई कहता, 'अभी से माँगोगे तो भगा देंगे लोग', दूसरा कहता, 'कोई बार-बार थोड़े न देगा, पहले ले लो तो अच्छा रहेगा...'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'सरस्वती पूजा समिति' नाम की खाकी ज़िल्द वाली हरी-नारंगी रसीद-बुक लेकर हमारी टोली निकल पड़ती चंदा उगाहने. हम इक्यावन, इक्कीस, ग्यारह से चलकर दो रुपए पर आ जाते थे. कई दुकानदार चवन्नी निकालते और उसकी भी रसीद माँगते थे. जंगीलाल चौधरी कोयले वाले ने जो बात सन सत्तर के दशक के अंत में कही थी उसका मर्म अब समझ में आता है--'अभी तो ले रहे हो, जब देना पड़ेगा न, तब फटेगा बेटा...'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गहरी चिंताओं और आशंकाओं का दौर होता, मूर्ति के लिए पैसे पूरे पड़ेंगे या नहीं, घर से माँगने के सहमे-सहमे से मंसूबे बनते, रात को नींद में बड़बड़ाते-- 'पाँच रुपए से कम चंदा नहीं लेंगे...'. कुम्हार टोली के चक्कर लगते, अफ़वाहें उड़तीं कि इस बार रामपाल सिर्फ़ बड़ी-बड़ी मूर्तियाँ बना रहा है हज़ार रुपए वाली, दो सौ वाली नहीं...दिल धक से रह जाता, कोई मनहूस सुझाव देता, 'अरे, पूजे न करना है, कलेंडर लगा देंगे.' &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कलेंडर वाली नौबत कभी नहीं आई, कुछ न कुछ जुगाड़ हो ही गया, सरसती माता ने पार लगा दिया. रिक्शे पर बिठाकर, मुँह ढँककर, 'बोलो-बोलो सरसती माता की जय'...कहते हुए किसी दोस्त के बरामदे पर उनकी सवारी उतर जाती. टोकरियाँ उल्टी रखकर उनके ऊपर बोरियाँ बिछाकर सिल्वर पेंट करके पहाड़ बन जाते, चाचियों-मौसियों-बुआओं की साड़ियों से कुछ न कुछ सजावट हो जाती.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शू स्ट्रिंग बजट, टीम वर्क, मोटिवेशन, प्लानिंग, क्रिएटिव थिंकिंग...जैसे जितने मैनेजमेंट के मुहावरे हैं उनका सबका व्यावहारिक रूप था दस साल के लड़कों की सरसती पूजा. आटे को उबालकर बनाई गई लेई से सुतली के ऊपर कैंची से काटर चिपकाए गए रंगीन तिकोने झंडों के बीच रखी हंसवाहिनी-वीणावादिनी की छोटी-सी मूर्ति. कैसी अनुपम उपलब्धि, हमारी पूजा, हमारी मूर्ति...ठीक वैसी ही अनुभूति, जिसे आजकल कहा जाता है--'यस वी डिड इट'.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पूरे एक साल में एक बार मौक़ा मिलता था मिलजुल कर कुछ करने का, धर्म के नाम पर. क्रिकेट टीम बनाने और सरसती पूजा-दुर्गा पूजा-रामलीला करने को छोड़कर कोई ऐसा काम दिखाई नहीं देता जो निम्न मध्यवर्गीय सवर्ण उत्तर भारतीय हिंदू किशोर के लिए उपलब्ध हो जिसमें सामूहिकता और सामुदायिकता का आभास हो.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आटे के चूरन में लिपटे गोल-गोल कटे गाजर, एक अमरूद के आठ फाँक और इलायची दाना की परसादी. घर में बहुत कहा-सुनी के बाद दोस्तों के साथ पुजास्थल पर देर रात तक रहने की अनुमति. रात को भूतों की कहानियाँ और माता सरसती की किरपा से परिच्छा में अच्छे नंबर लाने के सपने. कैसे जादू भरे दिन और रातें...अचानक कोई कहता, 'अरे भसान (विसर्जन) के लिए रेकसा भाड़ा कहाँ से आएगा?'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रिक्शा भाड़ा भी आ जाता, जैसे मूर्ति आई थी, सरसती मइया किरपा से सब हो जाता था. रिक्शे पर माँ शारदा को लेकर गंदले तालाब की ओर चलते बच्चों की टोली सबसे आगे होती क्योंकि जल्दी घर लौटने का दबाव होता. माता सरसती की कृपा से पूरी तरह वंचित बड़े भाइयों की अबीर उड़ाती टोली, बैंजो-ताशा की सरगम पर थिरकती मंडली, माता सरस्वती की कृपा से दो दिन के आनंद का रसपान करते कॉलेज-विमुख छात्रों का दल 'जब छाए मेरा जादू कोई बच न पाए' और 'हरि ओम हरि' की धुन पर पूरे शहर के चक्कर लगाता.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगले दिन सब कुछ बड़ा सूना-सूना लगता.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6853758773001535028-7049045166737622464?l=anamdasblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://anamdasblog.blogspot.com/feeds/7049045166737622464/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6853758773001535028&amp;postID=7049045166737622464&amp;isPopup=true' title='16 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6853758773001535028/posts/default/7049045166737622464'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6853758773001535028/posts/default/7049045166737622464'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://anamdasblog.blogspot.com/2009/02/ss-ss.html' title='माँ सारदेSS कहाँ तू बीना बजा रही हैSS'/><author><name>अनामदास</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06852915599562928728</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_fR7cWVj99s0/SKvHGScbUlI/AAAAAAAAAIY/dP4fvrpVCXk/S220/images.jpg'/></author><thr:total>16</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6853758773001535028.post-3870653146736615727</id><published>2009-01-12T23:53:00.003Z</published><updated>2009-01-12T23:58:05.272Z</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अनामदास का चिट्ठा'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='ब्लॉग'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='हिंदी'/><title type='text'>आमिर-उल-बॉलीवुड</title><content type='html'>समाज, संस्कृति, सरोकार, समझदारी...जैसे जितने शब्द हैं उनका विलोम है हमारा समायिक हिंदी सिनेमा.  भडैंती, भेड़चाल और भौंडापन, तीन भकार हैं जो बॉलीवुड पर राज करते हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;डेढ़ महीने के अंतराल पर, अपनी पेशेवर-पारिवारिक ज़िम्मेदारियों के बावजूद बड़ी मुश्किल से कुछ लिखने बैठा हूँ (सुना है, अमिताभ बच्चन रोज़ लिखते हैं). दो साल से ब्लॉग लिख रहा हूँ  लेकिन सिनेमा के बारे में कुछ नहीं लिखा, अगर लिखता भी तो शायद 'बॉलीवुड' के बारे में नहीं, जिसे मैं समझदार नागरिकों की बुद्धिमत्ता के घोर अपमान के तौर पर देखता हूँ, चंद अपवादों को छोड़कर.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'मंदबुद्धि बॉलीवुड' के चक्कर में अपनी नींद ख़राब न करने वाला आदमी रात के बारह बजे ब्लॉग इसलिए लिख रहा है क्योंकि उसने थोड़ी देर पहले गज़नी देखी है. ग़जनी कोई ऐसी फ़िल्म नहीं है जिस पर रात की नींद हराम की जाए, हॉलीवुड इश्टाइल में बनाई गई हर बॉलीवुड फ़िल्म की तरह सारे झोल-झाल (हर पंद्रह मिनट पर याद्दाश्त भूलने की कोई बीमारी नहीं होती) ग़जनी में भी हैं,  लेकिन आमिर ख़ान के बारे में कुछ कहने को 'दिल चाहता है'...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फ़िल्म का संजय सिंघानिया अपना आमिर है जिसके अभिनय में कोई खोट निकालने की गुंजाइश नहीं दिखती, लेकिन फ़िल्म तो मुरुगादॉस की है जिसकी समीक्षा करना मेरा मक़सद नहीं है. वैसे भी असली फ़िल्म तो ओलिवएरा की 'मोमेंटो' है जो 2002 में रिलीज़ हुई थी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बहरहाल, जब हम इंटर से निकले ही थे, इश्क़ फ़रमाने को बेताब थे, तभी आमिर ख़ान कयामत बरपा गए. जवान तो हम पाँच साल पहले सनी देयोल की 'बेताब' देखकर हो गए थे लेकिन क्यूएसक्यूटी (दिल्ली-बॉम्बे वालों का दिया नाम, जिसकी ख़बर हमें छह साल बाद अपने कस्बे से दिल्ली आकर मिली) का सुरूर ही कुछ और था. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आमिर ने एंट्री ही ऐसी की थी कि मेरे जैसे बहुत सारे लोगों को लगा कि उसके पापा ठीक कहते हैं, वह बड़ा नाम करने वाला है. उसने सदाबहार बुढ़ापे में सफ़ेद पतलून-सफ़ेद जूते पहनकर पल-पल में साड़ियाँ बदलतीं जयाप्रदा के साथ नाचते जितेंद्र की 'हिम्मतवाला' टाइप फ़िल्में बनाने वाले सारे 'मद्रासी' प्रोड्यूसरों हिम्मत तोड़ दी थी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ठिगना-चिकना चॉकलेटी जवान मुझे पहली फ़िल्म में पसंद आया था लेकिन आगे चलकर मेरी नज़र में वह तीन ख़ानों की लिस्ट में शामिल हो गया था, उसकी फ़िल्में आती रहीं कुछ देखीं, कई छूट गईं, जितनी देखीं उनमें लाख खामियाँ रही हों, अभियन कहीं उन्नीस नहीं था. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बॉलीवुड के मुझ जैसे कटु आलोचक को कहना पड़ेगा कि आमिर ख़ान की ख़ूबियों को भी इंडस्ट्री के सीमित संदर्भ में ही देखा जाए लेकिन उनका कायल न होना कठिन काम है. बॉलीवुड की बेवकूफ़ियों की वजह से पूर तरह उचाट हो चुका मेरा मन अपनी जगह था लेकिन उम्मीद कहीं बाक़ी रही कि कभी अपना सिनेमा भी चर्चा के लायक़ बन सकेगा. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिसे अँगरेज़ी में आउटग्रो करना कहते हैं, मैं बाइस साल का होते-होते बॉलीवुड की नौटंकी से बाहर सिनेमा ढूँढने लगा. आमिर को मेरे आउटग्रोइंग माइंड ने दोबारा नोटिस किया 'अर्थ 1947' में. इस फ़िल्म में मैंने नोटिस किया कि मैं ही नहीं, अपने दायरे में घिरे आमिर भी बॉलीवुड को आउटग्रो कर रहे हैं. इसके बाद मैंने देखा कि आमिर ने किसी ऐसी फ़िल्म में काम नहीं किया जिसे बॉलीवुड के व्यापक बेहूदगी के विशाल दायरे में डालकर नोटिस लेने से इनकार कर दिया जाए.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'लगान' को छोड़कर ज्यादातर फ़िल्में ऐसी नहीं जिनकी भारत से बाहर कोई चर्चा हुई हो, लेकिन बॉलीवुड के हिसाब से 'दिल चाहता है' और 'मंगल पांडे' काफ़ी ऑरिजनल सिनेमा है. 'तारे ज़मीं पर' भारतीय सिनेमा के इतिहास की इक्का-दुक्का फ़िल्मों में है जो नए विषय को एक्सप्लोर करने के अलावा, एक मिनट के लिए भी व्यावसायिकता के दबाव में नहीं दिखती...अति-भावुकता भारतीय सिनेमा नहीं, भारतीय समाज की समस्या है, उसका क्या करें?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बॉलीवुड में कोई ऐसा व्यक्तित्व (सिर्फ़ अभिनेता नहीं, डायरेक्टर-प्रोड्यूसर भी) नहीं दिखता जिसकी तुलना आमिर ख़ान से की जाए. इसकी एक सबसे सादा वजह है कि बॉलीवुड जैसे भीड़ भरे बाज़ार में कोई अदाकार साल में सिर्फ़ एक बार दुकान लगाता हो, यही बड़ी बात है. 'हटके', 'औरों से अलग', एकदम 'यूनिक', 'टोटली न्यू'...जैसे मुहावरों को बेमानी बना चुके बॉलीवुड में आमिर का करियर ही इन मुहावरों पर टिका रहा है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पाँच-छह साल से (गज़नी सहित) हर फ़िल्म में आमिर ने इसलिए काम किया है कि वो सिर्फ़ बेहतरीन फ़िल्मों से जुड़ना चाहते हैं, वह बेहतरीन कितनी बेहतरीन है, यह बहस की बात हो सकती है, लेकिन आमिर की बेहतर से बेहतरीन की तरफ़ बढ़ने की अदम्य इच्छा पर कोई बहस नहीं की जा सकती, आमिर आदर के पात्र दिखते हैं क्योंकि व्यवासायिकता का लेशमात्र उनके काम पर हावी नहीं दिखता.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुझे नहीं पता कि लोग अमिताभ बच्चन और शाहरुख़ ख़ान को किसलिए याद करेंगे, लेकिन ये पता है कि आमिर ख़ान को बाज़ार के दबाव से परे जाकर कलात्मक संतुष्टि खोजने वाली एक अहम शख्सियत के रूप में याद किया जाएगा जिसने हर बार बॉलीवुड के तय मानकों से आगे जाकर कुछ करने की कोशिश की. वह कभी नंबर वन के ठप्पे के लिए बेताब नहीं हुआ, उसने कभी आने वाली सात पीढ़ियों के दौलत बटोरने की आपाधापी में हिस्सा नहीं लिया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आमिर सचमुच बॉलीवुड के लिए साल दर साल मिसालें क़ायम कर रहे हैं. वे जिस फ़िल्म से जुड़े हों (बतौर अभिनेता, निर्देशक या निर्माता) उससे लोगों को ये उम्मीद ज़रूर होती है कि फ़िल्म में कुछ तो होगा देखने लायक़. आमिर बॉलीवुड में अकेले हैं जो किसी खाँचे में फिट नहीं होते, भेड़चाल वालों के लिए खाँचे तैयार करने के काम में लगे रहते हैं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सही मायनों में लीडर हैं आमिर, आमिर का मतलब वैसे लीडर ही होता है.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6853758773001535028-3870653146736615727?l=anamdasblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://anamdasblog.blogspot.com/feeds/3870653146736615727/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6853758773001535028&amp;postID=3870653146736615727&amp;isPopup=true' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6853758773001535028/posts/default/3870653146736615727'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6853758773001535028/posts/default/3870653146736615727'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://anamdasblog.blogspot.com/2009/01/blog-post.html' title='आमिर-उल-बॉलीवुड'/><author><name>अनामदास</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06852915599562928728</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_fR7cWVj99s0/SKvHGScbUlI/AAAAAAAAAIY/dP4fvrpVCXk/S220/images.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6853758773001535028.post-310191055019071134</id><published>2008-11-16T23:30:00.000Z</published><updated>2008-11-16T23:40:48.388Z</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अनामदास का चिट्ठा'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='ब्लॉग'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='हिंदी'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='ब्लाग'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='हिन्दी'/><title type='text'>सोच-समझ वालों को थोड़ी नादानी दे मौला...</title><content type='html'>समझदार होना सहज है और कठिन भी, जैसी फ़ितरत वैसी समझदारी. मैं समझता हूँ कि समझदार हूँ, आप भी होंगे, किसी से ज्यादा, किसी से कम. समझदारी इसी में है कि नासमझी को भी समझा जाए.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'समझ समझ के जो न समझे वही नासमझ है...' को फ़िल्मी मानकर मामूली न समझिए. अपनी नासमझी को भी समझिए, उसी प्यार से, जैसे समझदार अपनी समझदारी को सहलाते हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;समझ इत्ती सी क्यों होती है कि उसमें फ़ायदे के अलावा किसी चीज़ की जगह नहीं, यह भेद कोई समझदार क्यों नहीं समझा पाता, यह बात मुझ नासमझ की समझ से परे नहीं है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दुनिया को समझने में नाकाम रहने पर ख़ुदकुशी कर लेने वाले गोरख पांडे जो समझा गए हैं वह चकित करता है कि इतना समझते थे तो फिर जान क्यों दी? शायद इसलिए कि समझ लेना और समझदारी पर अमल करना कई बार बिल्कुल विपरीतार्थक हो सकता है, नहीं समझे?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दो साल में पहला मौक़ा है जब मैं किसी और के लिखे शब्द अपने ब्लॉग पर छाप रहा हूँ, ब्लॉग शुरू ही किया था ख़ुद लिखने के लिए, ख़ुद को छापने के लिए मगर समझ, समझदारी, समझाने वाले, समझ का फेर, समझ के झगड़े, नासमझी... के बारे में बहुत सारी बातें लिखीं और मिटाईं, बहुत जूझने के बाद समझ में आया कि लिखने की ज़रूरत थी ही नहीं, यह काम बरसों पहले गोरख पांडे कर गए हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;समझदारों का गीत&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;-------------------------&lt;br /&gt;कविः गोरख पांडे &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हवा का रुख कैसा है, हम समझते हैं&lt;br /&gt;हम उसे पीठ क्यों दे देते हैं, हम समझते हैं&lt;br /&gt;हम समझते हैं ख़ून का मतलब&lt;br /&gt;पैसे की कीमत हम समझते हैं&lt;br /&gt;क्या है पक्ष में विपक्ष में क्या है, हम समझते हैं&lt;br /&gt;हम इतना समझते हैं&lt;br /&gt;कि समझने से डरते हैं और चुप रहते हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चुप्पी का मतलब भी हम समझते हैं&lt;br /&gt;बोलते हैं तो सोच-समझकर बोलते हैं&lt;br /&gt;बोलने की आजादी का&lt;br /&gt;मतलब समझते हैं&lt;br /&gt;टुटपुंजिया नौकरी के लिए&lt;br /&gt;आज़ादी बेचने का मतलब हम समझते हैं&lt;br /&gt;मगर हम क्या कर सकते हैं&lt;br /&gt;अगर बेरोज़गारी अन्याय से&lt;br /&gt;तेज़ दर से बढ़ रही है&lt;br /&gt;हम आज़ादी और बेरोज़गारी दोनों के&lt;br /&gt;ख़तरे समझते हैं&lt;br /&gt;हम ख़तरों से बाल-बाल बच जाते हैं&lt;br /&gt;हम समझते हैं&lt;br /&gt;हम क्यों बच जाते हैं, यह भी हम समझते हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हम ईश्वर से दुखी रहते हैं अगर वह सिर्फ़ कल्पना नहीं है&lt;br /&gt;हम सरकार से दुखी रहते हैं कि वह समझती क्यों नहीं&lt;br /&gt;हम जनता से दुखी रहते हैं क्योंकि वह भेड़ियाधसान होती है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हम सारी दुनिया के दुख से दुखी रहते हैं&lt;br /&gt;हम समझते हैं&lt;br /&gt;मगर हम कितना दुखी रहते हैं यह भी&lt;br /&gt;हम समझते हैं&lt;br /&gt;यहां विरोध ही बाजिब क़दम है&lt;br /&gt;हम समझते हैं&lt;br /&gt;हम क़दम-क़दम पर समझौते करते हैं&lt;br /&gt;हम समझते हैं&lt;br /&gt;हम समझौते के लिए तर्क गढ़ते हैं&lt;br /&gt;हर तर्क गोल-मटोल भाषा में&lt;br /&gt;पेश करते हैं, हम समझते हैं&lt;br /&gt;हम इस गोल-मटोल भाषा का तर्क भी&lt;br /&gt;समझते हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वैसे हम अपने को &lt;br /&gt;किसी से कम नहीं समझते हैं&lt;br /&gt;हर स्याह को सफेद &lt;br /&gt;और सफ़ेद को स्याह कर सकते हैं&lt;br /&gt;हम चाय की प्यालियों में तूफ़ान खड़ा कर सकते हैं&lt;br /&gt;करने को तो हम क्रांति भी कर सकते हैं&lt;br /&gt;अगर सरकार कमज़ोर हो और जनता समझदार&lt;br /&gt;लेकिन हम समझते हैं&lt;br /&gt;कि हम कुछ नहीं कर सकते हैं&lt;br /&gt;हम क्यों कुछ नहीं कर सकते&lt;br /&gt;यह भी हम समझते हैं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;पोस्ट का शीर्षक निदा फ़ाज़ली की अनुमति के बिना उधार लिया गया है, उनसे समझदारी की उम्मीद के साथ.&lt;/strong&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6853758773001535028-310191055019071134?l=anamdasblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://anamdasblog.blogspot.com/feeds/310191055019071134/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6853758773001535028&amp;postID=310191055019071134&amp;isPopup=true' title='12 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6853758773001535028/posts/default/310191055019071134'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6853758773001535028/posts/default/310191055019071134'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://anamdasblog.blogspot.com/2008/11/blog-post_16.html' title='सोच-समझ वालों को थोड़ी नादानी दे मौला...'/><author><name>अनामदास</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06852915599562928728</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_fR7cWVj99s0/SKvHGScbUlI/AAAAAAAAAIY/dP4fvrpVCXk/S220/images.jpg'/></author><thr:total>12</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6853758773001535028.post-3113588693554366425</id><published>2008-11-10T01:13:00.000Z</published><updated>2008-11-10T01:20:24.511Z</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अनामदास का चिट्ठा'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='blog'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='anamdas'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='india'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='ब्लॉग'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='भारत'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='anamdas ka chitta'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='इंडिया'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='हिंदी'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='hindi blog'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='ब्लाग'/><title type='text'>दिल्ली में रात-दिन की ऑडियो डायरी</title><content type='html'>चौकीदार की लाठी की ठक-ठक और सीटी की गूँज. बेमतलब की वफ़ादारी निभाते आवारा कुत्तों का कोरस. चर्र चूँ...ऊपर की मंज़िल पर खुला या बंद हुआ दरवाज़ा. बहुत रात हो गई अब सो जाना चाहिए.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गाड़ी रुकी है मेन गेट पर, कोई कॉल सेंटर वाला आ या जा रहा होगा. पीएसपीओ वाला पंखा घूमता है किर्र-किर्र की आवाज़ के साथ, टॉयलेट में पानी टपकता है...टिप टुप, टिप टुप...फेंगशुई वाले कहते हैं कि पानी टपकना शुभ नहीं होता.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'यार कमाल हो गया, पांडे भी साला ग़ज़ब आदमी है...' रात के डेढ़ बजे भी पांडे जी की चिंता, पता नहीं किसे सता रही है. बोलने वाला चल रहा था इसलिए आवाज़ भी चली गई. 'चटाक', लगता है गुडनाइट ठीक से काम नहीं कर रहा है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उफ़, अक्तूबर में इतनी गर्मी, क्लाइमेट चेंज नहीं तो और क्या है. गरदन पर चमड़ी की सिलवटों में जमा होता पसीना. जेनरेटर की भट-भट-भड़-भड़ के तीस सेंकेड बाद पंखे की किर्र-किर्र सुहाने लगी. पावरबैकअप कितना ज़रूरी है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन'...किस चैनल पर आ रहा होगा ये गाना इस वक़्त, कोई कैसेट घूम रहा होगा या रेडियो बज रहा है. ये गाना कौन, कहाँ, कैसे और क्यों बजा रहा होगा. सोना चाहिए, वर्ना बीता हुआ दिन कोई नहीं लौटाएगा और आने वाला दिन ख़राब हो जाएगा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;सुबह&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शूँशूँशूँशूँशूँशूँ...बगल वाले फ्लैट का कुकर बोला. शर्मा जी के यहाँ शायद या फिर जसबीर सिंह के घर, हद् है, रात को खाना पकाकर फ्रिज में नहीं रख सकते? कुछ और सो लूँ नहीं तो दिन भर ऊँघता रहूँगा. यही तो सोने का टाइम है और लोग हैं कि...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'मम्मी, मिन्नी मेरी बुक नहीं दे रही है,' 'चलो-चलो, बस मिस करनी है क्या', 'मैम को बता देना'...'ओह हो, मम्मी आप भी हद करते हो'...   हमारे स्कूल जाने या न जाने पर कभी इतना हंगामा नहीं हुआ.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'मंगल भवन अमंगल हारीईईईई'...  पता नहीं, लाउडस्पीकर बजाने पर लगी क़ानूनी रोक रात से लेकर सुबह कितने बजे तक है. नाइट ड्यूटी करने वाले तो सिर्फ़ इस बाजे की वजह से नास्तिक हो जाएँगे. ख़ैर, अपार्टमेंट से दूर है मंदिर, लेकिन इतना ज़ोर से बजाने की क्या ज़रूरत है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'ढम्म'. लगता है, अख़बार की लैंडिंग हुई है बालकनी में. थोड़ी देर में देखता हूँ, ज़रा एक और झपकी मार लूँ. ऐसा क्या होगा अख़बारों में, रात को टीवी की ख़बरें और वेबसाइट देखकर सोया हूँ. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'टिंग टू'...'अरे, दूध का बर्तन धुला नहीं है क्या, दूधवाला आया होगा.' 'ढांग, ठन्न, टनननन...' 'भइया, आपको बोला था न कि मंडे से एक्स्ट्रा चाहिए...' 'ठीक है कल से ले आएँगे...' मदर डेयरी है, अमूल ताज़ा है, नानक डेयरी है, सुबह-सुबह तंग करने वालों से दूध लेना पता नहीं क्यों जरूरी है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'घर्र,घर्र,घर्र,तड़,तड़,तड़,घर्र,घर्र,घर्र..घूँsss...', स्कूटर को तिरछा करके स्टार्ट करने वाले भी हैं इस अपार्टमेंट में, चारों तरफ़ तो सिर्फ़ कारें नज़र आती हैं, शायद ट्रैफ़िक जाम से बचने के लिए. मैं तो फसूँगा ही जाम में ख़ैर... &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'डिंग,डां डिंग डू, डैंग  डैंग,' मेरा अपना ही अलार्म है अब तो. साढ़े आठ बज गए, उठना ही पड़ेगा. अलार्म सुनकर किसी और की नींद खुलने के आसार नहीं हैं, सब पहले से उठे हुए हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ये आवाज़ें बहुत याद आ रही हैं, चारों ओर सन्नाटा है. महीने भर की छुट्टी के बाद लंदन आ गया हूँ.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6853758773001535028-3113588693554366425?l=anamdasblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://anamdasblog.blogspot.com/feeds/3113588693554366425/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6853758773001535028&amp;postID=3113588693554366425&amp;isPopup=true' title='10 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6853758773001535028/posts/default/3113588693554366425'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6853758773001535028/posts/default/3113588693554366425'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://anamdasblog.blogspot.com/2008/11/blog-post.html' title='दिल्ली में रात-दिन की ऑडियो डायरी'/><author><name>अनामदास</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06852915599562928728</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_fR7cWVj99s0/SKvHGScbUlI/AAAAAAAAAIY/dP4fvrpVCXk/S220/images.jpg'/></author><thr:total>10</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6853758773001535028.post-1023581585760517047</id><published>2008-09-26T21:56:00.000+01:00</published><updated>2008-09-26T22:04:30.629+01:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अनामदास का चिट्ठा'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='ब्लॉग'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='हिंदी'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='ब्लाग'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='हिन्दी'/><title type='text'>सतरंगे देश को ब्लैक एंड व्हाइट मत बनाइए</title><content type='html'>अनगिनत रंगो-बू का देश, अनेकता में एकता का देश, रंग-बिरंगे फूलों का गुलदस्ता, इंद्रधनुष की छटा बिखेरना वाला भारत अचानक ब्लैक एंड व्हाइट हो गया है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तुलसी, सूर, तानसेन, कबीर, रसखान, खुसरो के देश में सिर्फ़ दो छंद, दो सुर, दो ही बातें...या तो ऐसा या फिर वैसा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शिवरंजनी और मियाँ की मल्हार एक साथ नहीं सुने जा सकते, या तो इसकी बात कर लें या फिर उसकी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;डागर बंधुओं का ध्रुपद, हबीब पेंटर का 'कन्हैया का बालपन' और शंकर-शंभू का 'मन कुंतो मौला'...इन सबके लिए कोई जगह नहीं दिख रही है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारत को भारत बनाए रखने के लिए एक संघर्ष की ज़रूरत दिखने लगी है, भारत का अमरीका, ईरान या इसराइल होना कितना आसान हो गया है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस समय भारत दो ध्रुवों पर बसा दिख रहा है, आर्कटिक और अंटार्टिक की बर्फ़ पर जा पहुँचे लोगों से अनुरोध है कि वे छह ऋतुओं वाले देश में लौट आएँ. हेमंत, शरद, पावस...सबका आनंद लें.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारत के अनूठेपन पर ही तो नाज़ है वरना लाख आईटी और नाइन परसेंट ग्रोथ की बात कर लें, असल में आप भी जानते हैकि ग़रीबी की कोढ़ में भ्रष्टाचार की खाज से ज्यादा अगर कुछ है तो बस पैंतीस करोड़ उपभोक्ता.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह अनूठापन किसी एक रंग, किसी एक रूप, किसी एक रास्ते चलकर नहीं पाया जा सकता, जब सब साथ आते हैं तो पूरी दुनिया उसे मैजिकल इंडिया कहती है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस मैजिकल इंडिया में लाल क़िला है, जैन लाल मंदिर है, चिड़ियों का अस्पताल है, सीसगंज गुरुद्वारा है, घंटेवाला का सोहन हलवा है, क़रीम के कबाब हैं, चंदगीराम का अखाड़ा है, सुलेमान मालिशवाला है, वैद्यजी भी हैं और चाँदसी-यूनानी हक़ीम भी हैं, सबके लिए जगह है, दाँत के चीनी डॉक्टर के लिए भी...   &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दिल्ली, अहमदाबाद में और पहले भी कई शहरों में बम फटे हैं, इन बमों ने कई जानें ली हैं मगर पाँच हज़ार साल पुरानी सभ्यता के परखच्चे उड़ाने की ताक़त इन बमों में नहीं है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;डर लग रहा है. बम इस-उस चौराहे पर फटे थे, उन्हें रेडक्लिफ़ लाइन मत बनाइए.   &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिन लोगों ने बम फोड़ा होगा उन्होंने ऐसी सफलता की कल्पना कभी न की होगी, उन्हें सफल बनाने के लिए आपने तो कुछ नहीं किया है न?&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6853758773001535028-1023581585760517047?l=anamdasblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://anamdasblog.blogspot.com/feeds/1023581585760517047/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6853758773001535028&amp;postID=1023581585760517047&amp;isPopup=true' title='14 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6853758773001535028/posts/default/1023581585760517047'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6853758773001535028/posts/default/1023581585760517047'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://anamdasblog.blogspot.com/2008/09/blog-post_26.html' title='सतरंगे देश को ब्लैक एंड व्हाइट मत बनाइए'/><author><name>अनामदास</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06852915599562928728</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_fR7cWVj99s0/SKvHGScbUlI/AAAAAAAAAIY/dP4fvrpVCXk/S220/images.jpg'/></author><thr:total>14</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6853758773001535028.post-1148224838208151131</id><published>2008-09-15T01:39:00.000+01:00</published><updated>2008-09-15T01:44:21.734+01:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अनामदास का चिट्ठा'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='blogger'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='blog'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='ब्लॉग'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='anamdas ka chitta'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='हिंदी'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='hindi blog'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='ब्लाग'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='हिन्दी'/><title type='text'>गाय खाने वाले हिंदू, सूअर खाने वाले मुसलमान</title><content type='html'>ब्रैंडिंग बी स्कूलों की उपज नहीं है, सबसे पहले आदमी की ही ब्रैंडिंग हुई. वह हिंदू बना, मुसलमान बना, ईसाई बना, यहूदी बना...फिर सब-ब्रांडिंग हुई, शिया-सुन्नी, कैथोलिक-प्रोटेस्टेंट...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धर्म के नियमों का पालन करना ज़रूरी नहीं, पहला धर्म यही कि आदमी जल्द से जल्द किसी न किसी खाँचे में फिट हो जाए ताकि कम सोचने वालों को अधिक असुविधा न हो.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हम सब उस दुकानदार की तरह हैं जो सिर्फ़ ब्रैंड जानता है. वह साबुन माँगने पर साबुन नहीं दे सकता, उसे निरमा, सनलाइट, उजाला या रिन जैसा कुछ सुनना होता है तभी उसका हाथ अपने-आप एक ख़ास शेल्फ़ की तरफ़ जाता है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"आप कौन हैं?"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"मैं आदमी हूँ."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस तरह का संवाद कई सदियों से संभव नहीं है क्योंकि आदमी अपनी ब्रैंडिग 'महापरिनिर्वाण' से काफ़ी पहले कर चुका था. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिसकी ब्रैंडिग होश संभालने के सदियों पहले हो चुकी हो वह भला कैसे समझ सकता है कि इस दुनिया के पाँच अरब लोगों को 12 राशियों में बाँटकर जितनी सही भविष्यवाणी की जा सकती है, उतने ही सटीक तरीके से दूसरे ब्रैंड के लोगों को समझा जा सकता है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गोमांस का ज़ायका कोई हिंदू नहीं बता सकता, क्रिस्पी बेकन की लज्ज़त मुसलमान को क्या पता, सरदारों को विल्स नेवीकट की क्या कद्र...ऐसे जेनरलाइजेशन अक्सर ग़लत साबित होते हैं लेकिन फ़ितरतन हम बाज़ नहीं आते.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लाइब्रेरी, कैटलॉग, सुपरस्टोर...हर जगह चीज़ें इसी तरह रखी होती हैं कि जो आदमी के खाँचेदार दिमाग़ में फौरन अँट जाए.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमारे लिए कितना श्रमसाध्य है खाँचे से बाहर देखना, मैनेजमेंट गुरू की ज़रूरत होती है हमें बताने के लिए--थिंक आउट ऑफ़ बॉक्स.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सबसे आसान है यह मान लेना कि--गाँव में रहने वालों को कुछ पता नहीं होता, सभी सिंधी व्यापारी होते हैं, हरेक बंगाली मछली खाता है, महाराष्ट्र के नीचे रहने वाले सभी मद्रासी हैं...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आदमी के ऊपर पता नहीं कितनी चीज़ें सवार हैं--उसकी  जाति, क्षेत्र, धर्म, हैसियत लेकिन वह बार-बार अपनी ब्रैंडिंग को ग़लत साबित करता रहता है, नई सबब्रैंडिग बनाता रहता है...उसे भी झुठलाता रहता है. कभी सैकड़ों की तादाद में आईएएस बनकर बिहारियों के पिछड़े होने की ब्रैंडिंग को, कभी बंगलौर में सबसे अधिक पब खोलकर दक्षिण भारतीयों के परंपरागत होने की ब्रैंडिंग को.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दिल्ली के कोई जैन साहब घनघोर माँसाहारी बन जाते हैं, सीरिया के कोई अबू हलीम घोर शाकाहारी हैं जो दूध-शहद से भी परहेज़ करते हैं... मगर हज़ारों-लाखों अपवादों के बावजूद एक-दूसरे को खाँचे में डालना ही नियम है, क्योंकि सबसे प्रभावी नियम, सुविधा का नियम होता है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक लाठी से समूची रेवड़ को हाँकना, एक कूची से सबको रंगना, एक सुर में सबको कोसना, एक गाली में पूरी जमात को लपेटना, एक सोच में पूरे देश को समेटना, एक कलंक पूरे मज़हब पर लगाना... आसान होता है, सही नहीं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ख़ास तौर पर तब, जब हर तरफ़ बम फट रहे हों.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6853758773001535028-1148224838208151131?l=anamdasblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://anamdasblog.blogspot.com/feeds/1148224838208151131/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6853758773001535028&amp;postID=1148224838208151131&amp;isPopup=true' title='18 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6853758773001535028/posts/default/1148224838208151131'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6853758773001535028/posts/default/1148224838208151131'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://anamdasblog.blogspot.com/2008/09/blog-post.html' title='गाय खाने वाले हिंदू, सूअर खाने वाले मुसलमान'/><author><name>अनामदास</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06852915599562928728</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_fR7cWVj99s0/SKvHGScbUlI/AAAAAAAAAIY/dP4fvrpVCXk/S220/images.jpg'/></author><thr:total>18</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6853758773001535028.post-470973669769636730</id><published>2008-08-26T23:40:00.000+01:00</published><updated>2008-08-26T23:47:22.246+01:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अनामदास का चिट्ठा'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='ब्लॉग'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='anamdas ka chitta'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='हिंदी'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='hindi blog'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='ब्लाग'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='हिन्दी'/><title type='text'>सावन सुहाना, भादो भद्दा, आख़िर क्यों?</title><content type='html'>सावन चला गया. पूरे महीने 'बरसन लागी सावन बूंदियाँ' से लेकर 'बदरा घिरे घिरे आए सवनवा में' जैसे बीसियों गीत मन में गूंजते रहे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;राखी के अगले दिन से भादो आ गया है, भादो भी बारिश का मौसम है लेकिन ऐसा कोई गीत याद नहीं आ रहा जिसमें भादो हो.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भादो के साथ भेदभाव क्यों? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्या इसलिए कि भादो की बूंदें रिमझिम करके नहीं, भद भद करके बरसती हैं? या इसलिए कि वह सावन जैसा सुहाना नहीं बल्कि भादो जैसा भद्दा सुनाई देता है? या फिर इसलिए कि भादो का तुक कादो से मिलता है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भादो के किसी गीत को याद करने की कोशिश में सिर्फ़ एक देहाती दोहा याद आया, जो गली से गुज़रते हाथी को छेड़ने के लिए हम बचपन में गाते थे- 'आम के लकड़ी कादो में, हथिया पादे भादो में.' &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हाथी अपनी नैसर्गिक शारीरिक क्रिया का निष्-पादन सावन के सुहाने मौसम में रोके रखता था या नहीं, कोई जानकार महावत ही ऐसी गोपनीय बात बता सकता है. सावन में मोर के नाचने, दादुर-पपीहा के गाने के आख्यान तो मिलते हैं, हाथी या किसी दूसरे जंतु के घोर अनरोमांटिक काम करने का कोई उदाहरण नहीं मिलता. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हाथी को भी भादो ही मिला था. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सावन जैसे मौसमों का सवर्ण और भादो दलित है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बारिश के दो महीनों में से एक इतना रूमानी और दूसरा इतना गलीज़ कैसे हो गया? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जेठ-बैसाख की गर्मी से उकताए लोग आषाढ़-सावन तक शायद अघा जाते हैं फिर उन्हें भादो कैसे भाए?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भादो मुझे बहुत पसंद है क्योंकि उसकी बूंदे बड़ी-बड़ी होती हैं, उसकी बारिश बोर नहीं करती, एक पल बरसी, अगले पल छँटी, अक्सर ऐसी जादुई बारिश दिखती है जो सड़क के इस तरफ़ हो रही होती है, दूसरी तरफ़ नहीं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कभी भादो में हमारे आंगन के अमरूद पकते थे, रात भर कुएँ में टपकते थे. किसी ताल की तरह, बारिश की टिप-टिप के बीच सम पर कुएँ में गिरा अमरूद. टिप टिप टिप टिप टुप टुप टुप...गुड़ुप.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सावन की बारिश कई दिनों तक लगातार फिस्स-फिस्स करके बरसती है. न भादो की तरह जल्दी से बंद होने वाली, न आषाढ़ की तरह तुरंत प्यास बुझाने वाली.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मगर मेरी बात कौन मानेगा, मेरा मुक़ाबला भारत के कई सौ साल के अनेक महाकवियों से है. भादो को सावन पर भारी करने का कोई उपाय हो तो बताइए.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6853758773001535028-470973669769636730?l=anamdasblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://anamdasblog.blogspot.com/feeds/470973669769636730/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6853758773001535028&amp;postID=470973669769636730&amp;isPopup=true' title='15 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6853758773001535028/posts/default/470973669769636730'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6853758773001535028/posts/default/470973669769636730'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://anamdasblog.blogspot.com/2008/08/blog-post_26.html' title='सावन सुहाना, भादो भद्दा, आख़िर क्यों?'/><author><name>अनामदास</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06852915599562928728</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_fR7cWVj99s0/SKvHGScbUlI/AAAAAAAAAIY/dP4fvrpVCXk/S220/images.jpg'/></author><thr:total>15</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6853758773001535028.post-6997177984055217282</id><published>2008-08-08T00:10:00.005+01:00</published><updated>2008-08-08T00:51:46.928+01:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अनामदास का चिट्ठा'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='ब्लॉग'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='हिंदी'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='ब्लाग'/><title type='text'>मुड़ी-तुड़ी पर्चियाँ मन के कोनों में दबी हुईं</title><content type='html'>एक डरावना सपना देखा. चारों तरफ़ कचरा है, कचरे के अंबार से घिरा हूँ, कचरे में धंसा जा रहा हूँ, छटपटा रहा हूँ, कचरा लपककर अपने आगोश में लेना चाहता है. किसी एनिमेशन फ़िल्म की तरह.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सपने अक्सर याद नहीं रहते लेकिन कचरे को छोड़कर पूरे दिन कुछ नहीं सूझा, कचरा मेरे लिए वैसे ही बन गया जैसा पीठ पर बोरी लादे किसी बदनसीब बच्चे के लिए होता है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कचरा, कचरा, कचरा, चारों तरफ़ कचरा ही दिखने लगा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दफ़्तर में कीबोर्ड पलटा तो असमंजस में सिर खुजाने से गिरे ढेर सारे बाल, हड़बड़ी में खाए सैंडविच के चूरे और बेख़याली में चाय की प्याली से छिटककर गिरे चीनी के कितने ही दाने निकल आए. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दराज़ खोली तो उसमें सब कुछ था जो सहेजने लायक़ समझकर रखा गया था लेकिन अब कचरा दिख रहा था. मेज़ के नीचे, टेबल पर जमा कागज़ के अंबार में, इनबॉक्स में, ऑडियो, वीडियो और न जाने किन-किन शक्लों में.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;2004 की टैक्सी की रसीद जिसके ड्राइवर के रवैये के बारे में शिकायत करनी थी लेकिन टाइम नहीं मिला, 2001 में ख़रीदे गए मोबाइल फ़ोन का यूज़र मैनुअल, सबसे सस्ते आइपॉड के विज्ञापन पर लाल कलम से गोला बनाकर रखा गया प्रिंट आउट, 2003 का भारतीय दूतावास का गणतंत्र दिवस का निमंत्रण पत्र, दिमाग़ से मिट चुके किसी ताले की पीली पड़ी चाबी, 2002 में वेस्टर्न यूनियन से भारत भेजे गए पाउंड स्टर्लिंग की रसीद....हुँह, तब पाउंड का रेट क्या था, एक सेकेंड का अंतराल, एक गहरी साँस और सब कुछ कूड़े की पेटी में.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वॉलेट में ढेर सारे आलतू-फ़ालतू लोगों के विजटिंग कार्ड, कई एक्सपायर हो चुके क्रेडिट और डेबिट कार्ड, एक फ़ोन नंबर जिस पर किसी का नाम नहीं लिखा है, मन हुआ डायल करके पूछूँ- "आप कौन हैं?" फिर लगा जवाब कुछ ऐसा ही मिलेगा, "अरे भाई साहब कैसे याद किया, नहीं पहचाना? मैं कचरा बोल रहा हूँ." डर गया, इरादा छोड़ दिया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;घर में टोस्टर जल गया, कब का फेंका जा चुका लेकिन उसका डिब्बा पड़ा है, फ्रिज के पीछे अब बड़े हो चुके बच्चे के कितने छोटे-छोटे खिलौने गिरे हुए हैं, अलमारी की फाँक में झाँककर देखा, ब्लेयर के प्रधानमंत्री पद छोड़ने के दिन का डेली टेलीग्राफ़, महीनों से गुम हुई कंधी, कब लुढ़कर गया तांबे का सिक्का, ठोकर खाकर छिपी हुई चप्पल...मैंने घबराकर कोने-अँतरों में देखना बंद कर दिया. बतर्ज़ ग़ालिब- ख़ुदा के वास्ते परदा न काबे से उठा...कहीं याँ भी वही कचरा निकले.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ग़ुस्से में की गई एक फ़िज़ूल हरकत का मलाल, किसी बड़ी ज़रूरत के बिना एक घटिया आदमी से की गई मिन्नत का अफ़सोस, कुछ न कर पाने का दुख, कुछ अनचाहा कर डालने का पछतावा, किसी से मिला छोटा सा छलावा, किसी को दिया एक बड़ा भुलावा, कुछ न कर सकने की खीस, कर सकने के बावजूद न करने की टीस...इन सब बातों की मुड़ी-तुड़ी रसीदें और पर्चियाँ मन के फाँकों-कोनों में दबी हैं. उन्हें किस कूड़ेदान में डाल दूँ.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने अपने आकार और औक़ात से कहीं अधिक कचरा पैदा किया है, मेरा पूरा अस्तित्व मेरे अपने कचरे के सामने बिल्कुल बौना दिखता है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आइ एम मच स्मॉलर देन माइ ओन रबिश.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन कितने लोग हैं जो मुझसे अलग हैं जिनके घर और मन में वही सब है जो सहेजने के लायक़ है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुझे जैसा सपना आया था, आपको क्यों नहीं आता? क्या आपने अपने दफ़्तर, घर और मन के सारे कचरे फेंक दिए हैं? अगर हाँ, तो किस कूड़ेदान में?&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6853758773001535028-6997177984055217282?l=anamdasblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://anamdasblog.blogspot.com/feeds/6997177984055217282/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6853758773001535028&amp;postID=6997177984055217282&amp;isPopup=true' title='16 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6853758773001535028/posts/default/6997177984055217282'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6853758773001535028/posts/default/6997177984055217282'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://anamdasblog.blogspot.com/2008/08/blog-post_1139.html' title='मुड़ी-तुड़ी पर्चियाँ मन के कोनों में दबी हुईं'/><author><name>अनामदास</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06852915599562928728</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_fR7cWVj99s0/SKvHGScbUlI/AAAAAAAAAIY/dP4fvrpVCXk/S220/images.jpg'/></author><thr:total>16</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6853758773001535028.post-8032672872608764574</id><published>2008-07-21T01:16:00.000+01:00</published><updated>2008-07-21T01:21:44.689+01:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='ब्लॉगर'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='बारिश'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='ब्लॉग'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='बरसात'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='हिंदी'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='वर्षा'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='ब्लाग'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अनामदास'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='हिन्दी'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मौसम'/><title type='text'>निम्न मध्यवर्गीय चौमासे का एक अध्याय</title><content type='html'>टिप टिप.. टुप टुप...बारिश के दिन कितने सुहाने होते हैं, तवे  की तरह तपती ज़मीन के लिए. देश में कितनी छतें टपकती हैं इसके पुख़्ता आंकड़े कहीं उपलब्ध होंगे, ऐसा लगता तो नहीं है. इस बीच कोई राष्ट्रीय टपकन निदेशालय बन गया हो और मुझे पता न हो तो माफ़ी चाहता हूँ. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आंकड़ों का जाल और भी उलझ सकता है क्योंकि छतों से पानी टपकता है, और छप्परों से भी, हमारे घर में दोनों थे और दोनों टपकते थे. कहीं-कहीं दोनों नहीं टपकते थे, और कहीं कहीं दोनों में से कोई नहीं था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आया सावन झूम के,  काली घटा छाई प्रेम रुत आई ...मेरा लाखों का सावन जाए...जैसे गाने सुनकर बड़े होने के बावजूद मेरी समझ में कभी नहीं आया कि घुटनों तक कीचड़, लबालब बहती काली नाली में उतराते टमाटर, साइकिल के सड़े टायर, प्लास्टिक की गुड़िया, छतरी का डंडा और टूटी चप्पल को देखकर हमारा मन गिजगिजा-सा होता था, सलोनी नायिका क्या देखकर झूमने लगती थी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अधसूखे कपड़ों की गंध, साइकिल के टायर की रिम पर लगी जंग, दीवार पर जमी हरी काई, आँगन में वर्ल्ड क्लास आइसरिंक जैसी फिसलन, पंक-पयोधि में चप्पल पहनकर चलने से पैंट के निचले-पिछले हिस्से पर बने बूंदी शैली की कलाकृति...पूरे घर में जगह-जगह टपके के नीचे रखे बर्तनों में बजता जलतरंग...यही यादें हैं बरसात के दिनों की.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तपिश से निजात का सुख समझ पाते इससे पहले सीली लकड़ी की सी घुँआती उदासी घेर लेती. सड़क पर गलीज़, घर में उसकी गंध और मन में सबसे मिल-जुलकर बनी गुमसाइन घुटन. छप्पर के सिरे पर टपकता पानी, नेनुआ-झींगी की सरपट बढ़ती लत्तर और अनगिनत गीले छछूंदर, तिलचट्टे, कनगोजर और फतिंगे. लहलहाकर फूली मालती, बरसाती अमरूद, अपनी मर्ज़ी से उगे अखज-बलाय पौधे, भुए, घोंघे और काले-पीले मेढ़क एक ख़ास किच-किच, पिच-पिच वाले मौसम के हिस्से थे. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ये तो अब समझ में आता है कि हमारे घर में जैसी जैव विविधता थी उसे देखकर यूरोपीय जीव वैज्ञानिक पूरी किताब लिख डालते.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नींबू-मसाले वाले भुने भुट्टे टाइप की मेरी यादों पर कीचड़ की एक परत जमी हुई है. लगता नहीं है कीचड़ के साथ आपका उनका रसास्वादन करना चाहेंगे, या कीचड़ हटाने की ज़हमत उठाएँगे इसलिए फ़िलहाल रहने दीजिए. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिनके घरों में पानी न टपकता हो वे अपनी सुहानी यादें छापकर हमें न जलाएँ-लजाएँ तो बड़ी मेहरबानी होगी.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6853758773001535028-8032672872608764574?l=anamdasblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://anamdasblog.blogspot.com/feeds/8032672872608764574/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6853758773001535028&amp;postID=8032672872608764574&amp;isPopup=true' title='6 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6853758773001535028/posts/default/8032672872608764574'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6853758773001535028/posts/default/8032672872608764574'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://anamdasblog.blogspot.com/2008/07/blog-post_21.html' title='निम्न मध्यवर्गीय चौमासे का एक अध्याय'/><author><name>अनामदास</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06852915599562928728</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_fR7cWVj99s0/SKvHGScbUlI/AAAAAAAAAIY/dP4fvrpVCXk/S220/images.jpg'/></author><thr:total>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6853758773001535028.post-3797092418460957933</id><published>2008-07-19T00:11:00.000+01:00</published><updated>2008-07-19T00:16:39.745+01:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अनामदास का चिट्ठा'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='blog'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='शब्द'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='भाषा'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='हिन्दी'/><title type='text'>अर्थ की तलाश व्यर्थ की तलाश</title><content type='html'>अजीब-सा सपना देखा, मैं ज़ोर से बोल रहा था लेकिन अपने ही शब्द सुन नहीं पा रहा था. नींद में मेरे होंठ हिल रहे थे लेकिन कान और दिमाग़ मिलकर कोई अर्थ नहीं, सिर्फ़ बेचैनी रच रहे थे. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह गिने-चुने सपनों में था जो पूरे दिन याद रहा. रिप्ले कर-करके कितने ही अर्थ ढूँढता रहा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शब्दों के गुम होते अर्थ पर पिछली शाम एक दोस्त के साथ हुई बहस याद आई, एक फ़िज़ूल लेख का ख़याल आया जिसके बारे में मैंने कहा था- 'पाँच सौ शब्दों की आपराधिक बर्बादी', या फिर फ़ोन रिसीव करने के लिए बेटे का कार्टून चैनल म्यूट कर दिया था जिसकी वजह से ये सपना आया...या कि मेरे मोबाइल पर आज दो-तीन फ़ोन आए जिनमें कोई आवाज़ नहीं आ रही थी...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वजह जो भी हो, सपना था घबराहट भरने वाला. शब्दों में ध्वनि हो लेकिन अर्थ न हों, शब्दों की वर्तनी हो लेकिन कोई मायने न हो. कितनी भयानक बात है न!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रोज़मर्रा के संसार में कुछ घंटे बिताने के बाद लगा कि ऐसी कोई भयानक बात नहीं है. सब तरफ़ सुख-चैन है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कोई ऐसा शब्द नहीं मिला जिसमें अर्थ हो, कोई ऐसी वर्तनी नहीं मिली जिसमें मायने हों. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जो प्रहसन है उसे लोग गंभीर राजनीतिक चर्चा बता रहे हैं, जिन बातों पर चिंता होनी चाहिए उन पर मनोरंजन हो रहा है...लेकिन किसी को वैसी घबराहट नहीं हो रही जैसी मुझे कल आधी रात को हुई थी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आधी रात की नीम बेहोशी का सच या भरी दोपहरी की भागदौड़ का झूठ. सच कितना झूठा है, झूठ कितना सच्चा है. आप ही बताइए!&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6853758773001535028-3797092418460957933?l=anamdasblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://anamdasblog.blogspot.com/feeds/3797092418460957933/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6853758773001535028&amp;postID=3797092418460957933&amp;isPopup=true' title='4 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6853758773001535028/posts/default/3797092418460957933'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6853758773001535028/posts/default/3797092418460957933'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://anamdasblog.blogspot.com/2008/07/blog-post_19.html' title='अर्थ की तलाश व्यर्थ की तलाश'/><author><name>अनामदास</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06852915599562928728</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_fR7cWVj99s0/SKvHGScbUlI/AAAAAAAAAIY/dP4fvrpVCXk/S220/images.jpg'/></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6853758773001535028.post-8584257576796172469</id><published>2008-07-02T00:15:00.000+01:00</published><updated>2008-07-02T00:23:07.161+01:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='ब्लॉग'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='हिंदी'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अनामदास का ब्लाग'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='हिन्दी'/><title type='text'>पोते के नाम थर्डवर्ल्ड के अम्मा-बाबा का संदेश</title><content type='html'>अगले शनिवार को मेरा बेटा चार साल का हो जाएगा, हम ख़ुश हैं कि वीकेंड है, बच्चों की कोई छोटी सी पार्टी कर लेंगे. बच्चे के बाबा-अम्मा (दादा-दादी) कई हज़ार किलोमीटर दूर बैठे तीन हफ़्ते से हलक़ान हो रहे हैं कि पोते का जन्मदिन आ रहा है, टाइम पर कार्ड मिलना चाहिए, पहुंचने में पता नहीं कितना वक़्त लगे. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सत्तर पार कर चुके बाबा मानसून के मौसम में कितने सरोवरों से गुज़रकर, पता नहीं कहाँ गए होंगे ग्रीटिंग कार्ड ख़रीदने. अम्मा-बाबा ने टिप-टिप करती दुपहरी पोते के लिए संदेश लिखने में ख़र्च की होगी. घर के पास कोई पोस्ट बॉक्स भी नहीं है, वे रिक्शे से जीपीओ गए होंगे, लाइन में लगकर लिफ़ाफ़ा रवाना किया होगा, इस आस के साथ कि मिल जाए और वक़्त पर मिल जाए. पिछले पाँच दिन से जब फ़ोन करो, एक ही सवाल होता है--"कार्ड मिला कि नहीं".&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रुपए के नींबू तीन कि चार, इसी पर दस मिनट तक बहस करने वाले रिटायर्ड बाबा ने एक पल नहीं सोचा कि इस कार्ड के तीस रूपए क्यों. पोता ख़ुश होगा, कार्ड पर फुटबॉल बना है और दो गोरे लड़के खुश दिख रहे हैं, पोता उनके साथ आइडेंटिफाई कर सकता है. अपने इलाक़े के बच्चे भी फुटबॉल खेलते हैं लेकिन उनके फोटो वाला कार्ड थोड़े न छपता और बिकता है.  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अम्मा-बाबा आपकी मेहनत सफल हो गई है, पोते का 'हैप्पी बर्थडे कार्ड' मिल गया है, जन्मदिन से तीन दिन पहले. पोते को कार्ड पढ़कर सुना दिया गया  है. सुविधा के लिए बाबा ने अँगरेज़ी में लिखा है, प्यार से अम्मा ने हिंदी में. मज़मून एक ही है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अनुवाद अम्मा ने कर दिया है, या फिर बाबा ने अम्मा वाले का अनुवाद अँगरेज़ी में किया है. वैसे तो बहुत फ़र्क़ पड़ता है कि अनुवाद अँगरेज़ी से हिंदी में किया गया है या हिंदी से अँगरेज़ी में. मगर इस मामले में कोई ख़ास फ़र्क़ नहीं पड़ता. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बाबा-अम्मा का पत्र शब्दशः &lt;br /&gt;....................&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऊँ नमः शिवाय&lt;br /&gt;दिनाँक 26-06-2008&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;परम प्रिय चिरंजीव कृष्णाजी,&lt;br /&gt;अम्मा-बाबा की ओर से ढेर सारा प्यार और शुभ आशीर्वाद, जन्मदिन मुबारक. तुम्हारा चौथा दिन है, तुम खूब खुश रहो, पूर्ण स्वस्थ और निरोग रहो. अपने पापा मम्मी की सब बातें मानना और उनको खुश रखना. पढ़ाई में मन लगाना. तुम जब लिखना सीख जाओगे तब हमें चिट्ठी लिखना. ईश्वर तुम्हें सारी प्रसन्नता और दीर्घायु प्रदान करें. जीवन में खूब उन्नति करो. &lt;br /&gt;ढेर सारे प्यार के साथ &lt;br /&gt;तुम्हारे अम्मा-बाबा&lt;br /&gt;........................&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पूरी चिट्ठी सुनने और कार्ड उलट-पलटकर देखने के बाद अनपढ़ पोते ने कहा है--थैंक यू. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बाबा को ठीक-ठीक पता नहीं है, उनका जन्मदिन मकरसंक्राति के एक दिन पहले होता है या एक दिन बाद. कार्ड भेजने, केक काटने का सिलसिला उनके लिए कभी नहीं हुआ, हमारा जन्मदिन मनाया गया और अब पोते का.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं कुछ ज्यादा भावुक हो रहा हूँ. रहने दीजिए, इतना बता दीजिए कि पीढ़ियों का यह प्यार ऊपर से नीचे ही क्यों चलता है, नीचे से ऊपर क्यों नहीं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्या यही वह जेनेटिक कोडिंग है जो हर अगली पीढ़ी को सींचती जाती है ताकि मानवीय जीवन धरती पर क़ायम रहे. क्या पलटकर उस प्यार को आत्मसात करने और महसूस करने का कोई गुणसूत्र हममें नहीं हैं, अगर हैं तो इतने क्षीण क्यों हैं?&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6853758773001535028-8584257576796172469?l=anamdasblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://anamdasblog.blogspot.com/feeds/8584257576796172469/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6853758773001535028&amp;postID=8584257576796172469&amp;isPopup=true' title='18 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6853758773001535028/posts/default/8584257576796172469'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6853758773001535028/posts/default/8584257576796172469'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://anamdasblog.blogspot.com/2008/07/blog-post.html' title='पोते के नाम थर्डवर्ल्ड के अम्मा-बाबा का संदेश'/><author><name>अनामदास</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06852915599562928728</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_fR7cWVj99s0/SKvHGScbUlI/AAAAAAAAAIY/dP4fvrpVCXk/S220/images.jpg'/></author><thr:total>18</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6853758773001535028.post-7437539564195984929</id><published>2008-06-30T01:24:00.000+01:00</published><updated>2008-06-30T01:33:08.154+01:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अनामदास का चिट्ठा'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='blogger'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='ब्लॉग'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='हिंदी'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='ब्लाग'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='हिन्दी'/><title type='text'>व्यवस्था के अंदर, बाहर और ऊपर</title><content type='html'>मैं इस व्यवस्था से ख़ुश नहीं हूँ लेकिन इसका हिस्सा हूँ.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जीवन और परिवार चलाना है तो इस व्यवस्था के भीतर ही चलाना होगा. सारे क़ानून मानने होंगे, जिन्हें उन लोगों ने लिखा है जिन्होंने क़ानून लिखते वक़्त उसका जवाब भी अलग से लिख लिया था, ठीक वैसे ही जैसे कोई अख़बार में छपी पहेली का जवाब देने से पहले, पन्ना उल्टा करके जल्दी से नज़रें बचाकर, जवाब देख लेता है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लिखित क़ानून से परे जिनकी सत्ता है, वे ही व्यवस्था के संचालक हैं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;व्यवस्था, जिसे चलाने वाले क़ानून बनाते-तोड़ते हैं, बाक़ी हर किसी को बस पालन करना होता है. कम या ज़्यादा, वह तो इस बात पर निर्भर है कि आप दुनिया के किस हिस्से में रहते हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं व्यवस्था का हिस्सा हूँ क्योंकि टैक्स देता हूँ, अमरीका में देता हूँ तो मासूम इराक़ियों के ख़ून के छींटों से अपने दामन को कैसे बचा सकता हूँ, अगर भारत में देता हूँ तो किसी मासूम की पुलिसिया पिटाई का स्पॉन्सर मैं भी तो हूँ.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं इस व्यवस्था की शिकायत लेकर इस व्यवस्था से बाहर कहाँ जा सकता हूँ? जो लोग विकल या बेअक्ल होते हैं वे शिकायत लेकर जनता तक जाते हैं, जनता भी तो व्यवस्था का ही हिस्सा होती है, व्यवस्था की बुनियाद. वैसे नेता भी जनता के पास जाते हैं लेकिन वे सीधे उनके पास जाने की जगह उनकी 'अदालत' में जाते हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जनता को पुलिस से शिकायत होती है तो सीबीआई के पास जाती है, सीबीआई से शिकायत हो तो उसी की विशेष अदालत में जाती है, विशेष अदालत में बात न सुनी जाए तो हाइकोर्ट में जनहित याचिका दायर होती है जो आख़िरकार सुप्रीम कोर्ट तक जाती है, सुप्रीम कोर्ट इस पर कुछ नहीं कर सकती क्योंकि वह सिर्फ़ कानून की व्याख्या कर सकती है, इसके लिए तो संसद को क़ानून बनाना होगा, संसद यूँ ही कैसे क़ानून बनाए, लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनता से पूछना होगा...जनता सिस्टम के बाहर है, भीतर है, कहीं है या नहीं है, पता नही.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कितनी झूठी बहसों, कितने फ़र्जी विचार-विमर्शों के बाद कारगर व्यवस्थाएँ बनती हैं जो सत्य-निष्ठा से अनुकरण न करने वालों को जेल भेज देती हैं. अगर आप जेल नहीं जाना चाहते, नक्सली नहीं बनना चाहते तो व्यवस्था में आस्था रखने के अलावा सिर्फ़ एक विकल्प है कि आप क़ानूनन पागल घोषित कर दिए जाएँ ताकि व्यवस्था आपके ऊपर कोई ज़िम्मेदारी आयद न कर सके. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस व्यवस्था के भीतर आप कुछ भी हो सकते हैं, पुलिस वाले या मानवाधिकार कार्यकर्ता, सत्य की खोज करने वाले व्याकुल पत्रकार या फिर सरकारी कर्मचारी...इस पर किसी को आश्चर्य नहीं होता कि सरकारी शराब के ठेके के बाहर मद्य निषेध प्रचार निदेशालय के बोर्ड लगे होते हैं...सब अपना-अपना काम करते हैं, व्यवस्था के भीतर. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बाहर होते ही आप व्यवस्था के ही नहीं, दुनिया की सारी व्यवस्थाओं के, सारे संसार के शत्रु हो जाते हैं...आपका मरना-हारना लगभग निश्चित है लेकिन अगर आप किसी तरह जीत गए तो आप ही व्यवस्था हो जाते हैं, चक्र पूरा हो जाता है. क्यूबा से नेपाल तक. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;व्यवस्था के भीतर बहुत जगह है, व्यवस्था से ऊपर चंद लोगों के लिए बहुत आरामदेह कुर्सियाँ हैं, व्यवस्था से बाहर कोई जगह नहीं दिखती. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं शायद व्यवस्था विरोधी हूँ, लेकिन व्यवस्था से बाहर क़तई नहीं हूँ. क़ानून तोड़ने के आरोप में जेल नहीं गया, क़ानून जिसने बनाया है उसी से ज़ोर-ज़ोर से कह रहा हूँ कि अपना बनाया हुआ क़ानून क्यों नहीं मानते. कई बार सोचता हूँ कि इस क़ानून का पलड़ा एक तरफ़ झुका हुआ क्यों है, अगले पल सोचता हूँ कि मैं क्या कर सकता हूँ, क़ानून तो क़ानून है, व्यवस्था तो व्यवस्था है. यानी मैं व्यवस्था में आस्था रखता हूँ लेकिन उसका विरोधी भी हूँ. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरी जनहित याचिका जैसे अपने ख़िलाफ़, अपनी ही अदालत में, ख़ुद की शिकायत है.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6853758773001535028-7437539564195984929?l=anamdasblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://anamdasblog.blogspot.com/feeds/7437539564195984929/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6853758773001535028&amp;postID=7437539564195984929&amp;isPopup=true' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6853758773001535028/posts/default/7437539564195984929'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6853758773001535028/posts/default/7437539564195984929'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://anamdasblog.blogspot.com/2008/06/blog-post_30.html' title='व्यवस्था के अंदर, बाहर और ऊपर'/><author><name>अनामदास</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06852915599562928728</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_fR7cWVj99s0/SKvHGScbUlI/AAAAAAAAAIY/dP4fvrpVCXk/S220/images.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6853758773001535028.post-1827434187309612694</id><published>2008-06-16T01:02:00.000+01:00</published><updated>2008-06-16T01:19:52.011+01:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अनामदास का चिट्ठा'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='ब्लॉग'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='anamdas ka chitta'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='हिंदी'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='ब्लाग'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='हिन्दी'/><title type='text'>आम बगइचा आदर्श विद्यालय</title><content type='html'>दू एकम दू,  दू दुनी चार,  दू तिया छै,  दू चौके आठ...हिल-हिल के याद किया है,  नए ज़माने  के टू टू जा फ़ोर वाले बच्चे तो हिलते ही नहीं हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब सिर्फ़ अलीफ़ बे वाले बच्चों को हिलता हुआ देखता  हूँ जबकि हमारा इस्कूल पंडित जी चलाते थे, उनमें और मदरसा वाले मौलवी साहब में एक समानता थी,  दोनों को यक़ीन था कि हिल-हिलकर याद करने से दिमाग़ में बात अच्छी तरह अंटती है,  जैसे मर्तबान को हिलाने से उसमें ज्यादा सामान भरा जा सकता है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हिल-हिलकर याद करना कट्टरपंथ का नहीं,  रट्टरपंथ का मसला है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ अच्छा सा ही नाम रहा होगा,  मेरे पहले स्कूल का,  आदर्श शिक्षा मंदिर जैसा कुछ,  क्योंकि उन दिनों सेंट या पब्लिक नाम वाले स्कूल चलन में नहीं थे. मुझे जो नाम पता है,  वह है आम बगइचा (बागीचा).  यथा नाम तथा पता,  आम के बगान के बीचोंबीच स्थित चार कमरों का खपरैल,  टाट पट्टी स्कूल से बेहतर रहा होगा क्योंकि वहाँ अपना आसन ले जाने की ज़रूरत नहीं होती थी, लकड़ी के बेंच थे. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं अपनी क्लास का सबसे होशियार छात्र था,  ऐसा मुझे इसलिए लगता है कि मुझे सबसे अधिक टॉफ़ियाँ मिलती थीं. हरे-नारंगी रंग के लेमनचूस मटमैले सूती कपड़े की पोटली में छप्पर की लकड़ी से लटके होते थे. उत्तर से प्रसन्न होने पर माधो सर अपनी छड़ी से खोदकर एक टॉफ़ी गिराकर मेरा नाम लेते,  बाक़ी बच्चे तरसते हुए देखते रह जाते,  वह टॉफ़ी कम और ट्रॉफ़ी ज्यादा लगती.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुझे मटमैली पोटली से अक्सर टॉफ़ी मिलती और क्लास के मटमैले बच्चों को उसी छड़ी का प्रसाद जिससे ठेलकर मेरे लिए टॉफ़ी निकाली जाती. मैं स्कूल के उन गिनेचुने बच्चों में था जो साफ़-सुथरे कपड़े पहनते थे, जिनके अभिभावकों को हमारे सर लपककर नमस्कार करते थे और जिन्हें घर में प्यार से पढ़ाया जाता था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आम बगइचा विद्यालय की एक बात जो मुझे बेहद पसंद थी कि साल के ज्यादातर महीनों में वहाँ तक पहुँचने के रास्ते में इतना कीचड़ होता था कि प्राइमरी स्कूल का बच्चा आकंठ  डूब जाए,  इसलिए हमें हमेशा नाना के नौकर गौरीशंकर की कंधे की सवारी मिलती या फिर किसी की साइकिल की.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धुंधली सी याद है,   बारिश के दिन थे,  कोई हमें लेने नहीं आ पाया,  घुटने से ऊपर नाले का पानी बह रहा था,  झालो भइया (दो भाई थे, झालो और मालो) जो नाना के घर के सामने रहते थे उन्होंने हमें गोद में उठाकर घर पहुँचाया. वे हमारे ही स्कूल में पढ़ते थे,  उनका असली नाम और क्लास का मुझे पता नहीं था लेकिन वे काफ़ी समय तक हमारी नज़रों में बजरंग बली जैसे बलशाली रहे. तीस साल बाद पता चला कि सचमुच बलशाली थे,  बैंक लूटने के चक्कर में पटना में गोली खाकर शहीद हो गए.&lt;br /&gt;          &lt;br /&gt;पंडित जी के आम बगइचा स्कूल में लड़कियाँ भी पढ़ती थीं,  इसी स्कूल में पहली बार एक लड़की से दोस्ती हुई जिसका नाम रश्मि था,    उस लड़की से मैंने दोस्ती के लिए कुछ किया हो ऐसा याद नहीं है, लेकिन वह मेरे साथ ही आकर बैठती थी. मुझे जब चेचक निकला और मैं कई दिनों तक स्कूल नहीं गया तो वह अपनी माँ के साथ मुझे देखने पहुँच गई. पहली क्लास की बच्ची को मैंने अपने घर का पता नहीं बताया था (मुझे ही कहाँ मालूम था),   वह स्कूल मास्टर से पूछकर किस तरह मुझ तक पहुँची होगी,   अब सोचता हूँ.&lt;br /&gt;     &lt;br /&gt;रश्मि के बारे में इतना ही याद है कि उसका गोल सा, साफ़-सुथरा चेहरा था, नाक-कान ताज़ा-ताज़ा छिदवाए गए थे जिनमें वो नीम की सींक खोंसकर घूमती थी, मुझे ऐसा लगता कि उसके पापा ने अपनी सुविधा के लिए उन्हें वहाँ रखा है जब खाना दाँत में अटकेगा तो सींक उसके कानों से निकालकर दाँत साफ़ कर लेंगे. इस बात पर वह थोड़ी देर के लिए चिढ़ जाती थी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आम बगइचा स्कूल में मैं सिर्फ़ कुछ महीने पढ़ा लेकिन बड़ी शान से पढ़ा,  बाद में कथित इंग्लिश मीडियम प्राइमरी स्कूल में जाते ही मेरा हाल वही हो गया जो आम बगइचा के मटमैले बच्चों का था, शुरू के कुछ महीनों के लिए तो ज़रूर.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6853758773001535028-1827434187309612694?l=anamdasblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://anamdasblog.blogspot.com/feeds/1827434187309612694/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6853758773001535028&amp;postID=1827434187309612694&amp;isPopup=true' title='11 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6853758773001535028/posts/default/1827434187309612694'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6853758773001535028/posts/default/1827434187309612694'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://anamdasblog.blogspot.com/2008/06/blog-post_16.html' title='आम बगइचा आदर्श विद्यालय'/><author><name>अनामदास</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06852915599562928728</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_fR7cWVj99s0/SKvHGScbUlI/AAAAAAAAAIY/dP4fvrpVCXk/S220/images.jpg'/></author><thr:total>11</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6853758773001535028.post-3302831817844400889</id><published>2008-06-10T02:17:00.000+01:00</published><updated>2008-06-10T02:26:16.199+01:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अनामदास का चिट्ठा'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='ब्लॉग'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='हिंदी'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='ब्लाग'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='हिन्दी'/><title type='text'>वसंत की वीकेंड डायरी</title><content type='html'>ऋतुराज वसंत आता है, चला जाता है, हम अपनी धुन में चले जाते हैं. थोड़ा रुकें तो पता चले, कौन आया, कौन गया. न अपने क़स्बे में, न दिल्ली में पता चला कि वसंत क्या होता है.   लंदन में मेरे लिए दस साल से वसंत आता है,  ठंड से सिहरे मन की कोंपले खिलती हैं लेकिन नवांकुरों का हर्ष कहीं दर्ज नहीं कर पाता.  इस बार इरादा किया कि वसंत में आँखें जो देखें उन्हें उँगलियाँ कागज़ पर उतार लें, कुछ छोटी-छोटी बातें पुर्जियों पर लिख पाया. तस्वीरें वक़्त का नहीं, लम्हों का सच बताती हैं...कुछ ऐसा ही.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;19 अप्रैल&lt;/strong&gt;--खिड़की से आती किरणों ने इस मौसम में पहली बार जगाया है, ठंड है, जैकेट पहननी पड़ेगी लेकिन पीले वसंती डेफ़ोडिल्स कह रहे हैं- बस चंद रोज़ और...आसमान साफ़ है,रोशनी भी है मगर इसे धूप नहीं कहा जा सकता, फिर भी गुनगुने दिनों का आलाप शुरू हो गया है. बालकनी से दिखने वाली घास में हरियाली लौट रही है हालाँकि ज्यादातर पेड़ अब भी सहमे खड़े हैं पत्तों के बिना. जिसने पतझड़ के ठूंठ न देखे हों, उसे इस बहार का उल्लास कैसे समझ में आए, मुझे ही कितने साल लग गए.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;20 अप्रैल&lt;/strong&gt;--हल्की सी बारिश सुबह हुई है लेकिन ठंड नहीं है. हरी घास पर छोटे-छोटे सफ़ेद और पीले फूल खिल आए हैं, लगता है कि छींट वाले कपड़ों का खयाल शायद हरी घास पर खिले फूलों से ही आया होगा. शॉपिंग सेंटर जाते हुए नहर में रहने वाली बत्तखों के तीन छोटे बच्चे दिखाई दिए. पता नहीं बत्तख के बच्चों को बदसूरत (अग्ली डकलिंग) क्यों कहते हैं, मुझे तो ख़ासे सुंदर लग रहे हैं, बच्चे तो सूअर के भी अच्छे लगते हैं बशर्ते नालियों में लोट न लगा रहे हों.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;26 अप्रैल&lt;/strong&gt;--देर से सोकर उठने पर अक्सर दिन कुछ नाराज़ सा लगता है, लेकिन आज जैसे मुस्कुराकर कह रहा है--इतना क्यों सोते है,अच्छा जाने दो, कोई बात नहीं. दिन भी अच्छे मूड में है. खिड़की से दिखने वाले चेरी के पेड़ पर सफेद फूल रातोरात उग आए हैं मानो उनमें रसे भरे फल बनने की बड़ी बेचैनी हो. सिहरे-सहमे नंगे खड़े पेड़ों ने अंगड़ाई ली है, कोंपले दिखने लगी हैं...नेचर के टाइम डिलेड कैमरे का जादू धीरे-धीरे खुल रहा है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;27 अप्रैल&lt;/strong&gt;--ठंडी हवा बह रही है, आसमान पर बादल हैं, सुबह के नौ बज गए लेकिन पता नहीं चल रहा. वसंत आया है या मौसम ने अपने क़दम सर्दी की तरफ़ वापस खींच लिए हैं. झाड़ी में दुबकी गिलहरी भी शायद मेरी तरह सोच रही है जिसका सर्दियों में जमा किया रसद ख़त्म होने को होगा. गिलहरी ग्लोबल वार्मिंग के बारे में नहीं सोच सकती, हम सोच सकते हैं, न गिलहरी कुछ कुछ कर सकती है,न हम.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;3 मई&lt;/strong&gt;--पता नहीं सर्दियों में ये चिड़िया कहाँ छिप जाती है, या गूंगी हो जाती है...सुबह पानी पीने उठा, दो-एक घंटे और सोने का इरादा लेकर, ऐसा गाने लगी कि सोने का खयाल गुम हो गया. मगर मैं तो मैं हूं, कोई और होता तो घूमने निकल पड़ता, कलरव सुनने के बदले कीपैड की पिटपिट शुरु कर दी. पहली बार बालकनी का दरवाज़ा खोलकर बैठा हूँ, हीटिंग ऑफ़ है और गर्म कपड़ों की ज़रूरत नहीं. ऐसा लग रहा है जैसे भारी कर्ज़ उतर गया हो.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;4 मई&lt;/strong&gt;--शायद वसंत की अपनी ऊर्जा होती है जिससे फूल खिलते हैं, पेड़ हरियाते हैं, अंडों में से चूज़े निकलते हैं, एक अदभुत सृजनात्मक ऊर्जा. मन हो रहा है कि टहलता हूआ कहीं दूर तक निकल जाऊँ. अपने पोर खुलते हुए से लग रहे हैं, एक अजीब सा उत्साह है, भूरे मटमैले गंदले से माहौल से चटक हरे रंग की ओर जाने का हुलास.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;10 मई&lt;/strong&gt;--हर ओर फूल दिख रहे हैं, ऐसी वाहियात दिखने वाली डालों पर कैसे लहलहाकर फूल खिल सकते हैं, सोचना भी मुश्किल है. सफ़ेद,पीले ही नहीं,बैंगनी,नीले और हरे रंग के फूल भी दिख रहे हैं. कितना कुछ है इस हवा,पानी,मिट्टी और धूप में, मेरा कौतूहल कुछ बचकाना सा हो रहा है, छिपाना पड़ता है लोगों से, लोग कहते हैं कि इसमें ऐसी कौन सी बात है...क्या वे सही कहते हैं?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;17 मई&lt;/strong&gt;--शाम के आठ बजे हैं, रात के नहीं..उजाला अब भी है, रात कैसे कहें. पड़ोसियों ने बारबीक्यू के लिए चारकोल सुलगाई है, बियर खोली है और शायद मौसम पर बात नहीं कर रहे हैं, और अच्छी बातें हैं करने को जो इस मौसम की ही बदौलत है. पड़ोसी ने पिछले साल शादी की है, बरसों से खर-पतवार का मेहमान बने उसके लॉन में नए फूलों की क्यारियाँ दिख रही हैं. बच्चे गार्डन से वापस घर नहीं आना चाहते, बालकनी में खड़ी माँ ज़्यादा ज़ोर नहीं दे रही, कितना इंतज़ार था इन दिनों का...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वसंत बहुत सुंदर है, सप्ताह के सातों दिन लेकिन मेरे लिए सिर्फ़ वीकेंड पर.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6853758773001535028-3302831817844400889?l=anamdasblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://anamdasblog.blogspot.com/feeds/3302831817844400889/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6853758773001535028&amp;postID=3302831817844400889&amp;isPopup=true' title='9 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6853758773001535028/posts/default/3302831817844400889'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6853758773001535028/posts/default/3302831817844400889'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://anamdasblog.blogspot.com/2008/06/blog-post.html' title='वसंत की वीकेंड डायरी'/><author><name>अनामदास</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06852915599562928728</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_fR7cWVj99s0/SKvHGScbUlI/AAAAAAAAAIY/dP4fvrpVCXk/S220/images.jpg'/></author><thr:total>9</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6853758773001535028.post-2981367384346580301</id><published>2008-03-29T04:25:00.000Z</published><updated>2008-03-29T04:29:33.575Z</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अनामदास का चिट्ठा'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='ब्लॉग'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='anamdas ka chitta'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='हिंदी'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='hindi blog'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='ब्लाग'/><title type='text'>अजित भाई, हिम्मत जवाब दे रही है</title><content type='html'>आपका बकलमख़ुद सरकलमख़ुद जैसा ही है. कई लोग हिम्मत जुटा लेते हैं, एक हफ़्ते से चिंता में घुला जा रहा हूँ कि आत्मकथानुमा क्या लिखूँ. आपका रिमाइंडर आने ही वाला होगा, दुनिया में शायद आप ही हैं जिसे मेरे सरकलमख़ुद न करने पर मलाल होगा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सच मैं लिख नहीं सकता, झूठ भी लिखा नहीं जाएगा, तो फिर बचा क्या लिखने को. क्या आप मुझे इतना मूर्ख समझते हैं कि सब सच-सच लिख दूँ और कहीं मुँह दिखाने के काबिल न रहूँ. ऐसी बातें सबकी ज़िंदगी में होती हैं. जिसके जीवन में नहीं हैं वो झूठ बोल रहा है या फिर उसने जीवन बहुत संभालकर ख़र्च किया है, मानो किसी से माँगकर लाया हो, ज्यों की त्यों लौटानी हो, कबीर की चदरिया की तरह.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक जीवन जिसे मैंने अपने जीवन की तरह जिया है, किसी और के जीवन की तरह बेलाग होकर उसके बारे में सच-सच कैसे लिख दूँ. इस बात के कोई आसार नहीं हैं कि मैं ये ग़ैर-मामूली काम कर पाऊँ. जो अपने जीवन को किसी और का समझकर जीते हैं वो अगर आत्मकथा लिख दें तो कमाल हो जाता है, माइ कन्फ़ेशंस इसकी सबसे अच्छी मिसाल है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक मध्यवर्गीय, सवर्ण, नौकरीपेशा, भीरू क़िस्म का पारिवारिक आदमी क्या खाकर पठनीय आत्मकथा लिख देगा. कुछ देखा हो, कुछ झेला हो, कुछ गुल खिलाए हों तब तो बताए. सोचता हूँ कि मैं कायर नहीं हूँ, कि मैं ईर्ष्यालु नहीं हूँ, कि मैं दंभी नहीं हूँ, कि मैं ढोंगी नहीं हूँ, कि मैं हिपोक्रेट नहीं हूँ...टाइप बातें लिख दूँ लेकिन फिर लगता है कि मैं अगर ये सब नहीं हूँ तो फिर क्या हूँ.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जो किया वो अच्छा नहीं लगा, जो नहीं किया वही अच्छा लगता है. काम में मन नहीं लगा, मन का काम नहीं किया. ऐसा जीवन हो और कोई प्यार से कहे कि बकलमख़ुद लिखिए तो जी घबराने लगता है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कई बार लगता है-जिंदगी कुछ भी नहीं, फिर भी जिए जाते हैं, ऐ वक़्त तुझ पे एहसान किए जाते हैं...फिर लगता है- नहीं-नहीं ऐसा नहीं है, जीवन में इज़्ज़त की नौकरी (?) है, अपना घर है, अच्छी सी बीवी है, प्यारा सा बच्चा है, सब तो है. अगर नौकरी, घर, बीवी, बच्चे से आत्मकथा बनती तो पाँच अरब लोग बना चुके होते. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ख़ूबियाँ तो हैं नहीं, खोज-खोजकर अपने सारे ऐब गिना दूँ तो भी नहीं बनेगी पढ़ने लायक आत्मकथा. 37 साल क्या करने में गुज़ार दिए कि एक अदद आत्मकथा लिखने लायक़ नहीं हुए. इस उम्र में करने वाले क्या-क्या कर गुज़रते हैं, हम नौकरी करते रह गए. हर साल कम से कम दो-तीन बार ज़रूर सोचा कि नौकरी छोड़कर दुनिया घूम लें, कुछ लिखने लायक़ अनुभव जुटा लें फिर कुछ ऐसा तगड़ा सा लिखेंगे कि आग लग जाए हिंदी के बाज़ार में. नौकरी तो हम छोड़ने से रहे, अब नौकरी हमें छोड़ दे तो कुछ बात आगे बढ़े.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पता नहीं कितनी पचासों बातें हैं जो मैं ख़ुद से छिपाता रहा हूँ अगर मैं उन्हें लिखूँ तो पढ़ने वालों को बहुत मज़ा आएगा मगर वो बातें मन के अंधेरे कोनों में दफ़न होती हैं जहाँ ख़ुद जाने की हिम्मत नहीं होती है. कभी कोई घटना, कोई सपना बता देता है कि अंधेरे कोने में क्या-क्या दबा है, हमारा मन ढेर सारी इच्छाओं-कुंठाओं और वेदनाओं की कब्र है. शायद इसीलिए हम इतना कठिन जीवन फिर भी जी लेते हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अजित भाई, आप नहीं कह रहे हैं कि जो लिखूँ वह सच ही हो, आप कह रहे हैं जो अच्छा लगे लिखिए, जैसे अच्छा लगे लिखिए...बस अपने बारे में  लिखिए. लेकिन बकलमख़ुद इतना डरावना नाम है कि मेरी हिम्मत पस्त हो रही है. रोचक संस्मरण, यादगार पल, प्रेरक प्रसंग टाइप कोई नाम नहीं सोच सकते थे आप. आपके प्रस्ताव पर बहुत विचार किया लेकिन डरा-सहमा सा हूँ, क्या लिखूँ, क्यों लिखूँ, कोई क्यों पढ़ेगा? ब्लॉग पर तो कुछ भी अल्लम-गल्लम लिखते रहते हैं, बकलमख़ुद में कैसे लिखेंगे?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अपने ढेर सारे ऐबों में एक ये भी है कि बहुत इमेज कॉन्शस हैं, इसी इमेज के भूत से बचने के लिए अनामदास नाम रखा, अब आप लोगों ने अनामदास की भी इमेज बना दी है इसलिए डर लग रहा है. कुछ बचपन की फुटकर मज़ेदार बातें लिखने का इरादा है, चलेगा क्या? फिर भी आप उसे बकलमखुद कहने का इसरार करेंगे?&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6853758773001535028-2981367384346580301?l=anamdasblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://anamdasblog.blogspot.com/feeds/2981367384346580301/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6853758773001535028&amp;postID=2981367384346580301&amp;isPopup=true' title='21 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6853758773001535028/posts/default/2981367384346580301'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6853758773001535028/posts/default/2981367384346580301'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://anamdasblog.blogspot.com/2008/03/blog-post_29.html' title='अजित भाई, हिम्मत जवाब दे रही है'/><author><name>अनामदास</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06852915599562928728</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_fR7cWVj99s0/SKvHGScbUlI/AAAAAAAAAIY/dP4fvrpVCXk/S220/images.jpg'/></author><thr:total>21</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6853758773001535028.post-6298334376900231577</id><published>2008-03-11T01:27:00.000Z</published><updated>2008-03-11T01:38:02.078Z</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अनामदास का चिट्ठा'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='ब्लॉग'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='anamdas ka chitta'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='हिंदी'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='hindi blog'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='ब्लाग'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='हिन्दी'/><title type='text'>खिलौना बंदूक और असली ख़ौफ़</title><content type='html'>हिंसा का पारसी थिएटर हमने आपने ही नहीं, मेरे साढ़े तीन साल के बेटे ने भी खूब देखा है. मगर हिंसा का परिणाम किसने, कहाँ और कितनी बार देखा है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक्सीडेंट एंड इमरजेंसी के डॉक्टरों, पुलिसवालों और कुछ दूसरे बदक़िस्मत लोगों को पता है कि गोली लगने पर ख़ून कैसे बलबल करके निकलता है, छुरा जब अँतड़ियाँ बाहर निकाल देता है तो आदमी कैसे हिचकियाँ लेता है. एक विधवा, एक असहाय माँ, एक अनाथ बच्चा...वे अपनी ज़िंदगी में कैसे घिसटते हैं, उसकी फ़िल्में कौन बनाता है, कौन देखता है? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरा बेटा पिछले तीन महीने से खिलौना बंदूक यानी गन खरीदने के लिए बेहाल है.  गन चाहिए उसे ताकि वह फिश्श फिश्श कर सके, फ़ायर शब्द उसे बताने की ज़रूरत नहीं समझी गई इसलिए उसने ख़ुद ही फिश्श फिश्श गढ़ लिया है. बंदूक न सही, वह चम्मच, पेंसिल या टीवी के रिमोट को गन बनाकर कूद-कूदकर गोलियाँ दाग़ने लगा है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उसे पुलिसमैन बहुत अच्छे लगते हैं क्योंकि उनके पास गन होती है जिससे वे फिश्श फिश्श कर सकते हैं. वह बड़ा होकर पुलिसमैन बनना चाहता है ताकि वह भी फिश्श फिश्श कर सके. बंदूक के घोड़े के पीछे की ताक़त उसे समझ में आ गई है जबकि उसे कई बुनियादी काम अभी नहीं आते.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;टीवी पर हमने उसे बालजगत टाइप कार्यक्रम दिखाना शुरू किया है और हिंदी फ़िल्मों की डोज़ कम से कम कर दी गई है लेकिन बंदूक के प्रति उसका आकर्षण कम नहीं हुआ है. ख़ून-ख़राबा, मार-पीट के सीन देखने पर वह हमारे रटाए हुए जुमले को दोहराता है, 'दैट्स नॉट वेरी नाइस,'  लेकिन साढ़े तीन साल का बच्चा भी शक्ति संतुलन समझता है, उसे सिखाने की ज़रूरत नहीं पड़ी कि उसे बंदूक के किस तरफ़ रहना चाहिए, पीछे या सामने.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारत यात्रा से लौटने के बाद बच्चे को हिंदू परंपरा से अवगत कराने के उद्देश्य से बालगणेश और रामायण की वीडियो सीडी ख़रीदी गई थी. बालगणेश के शुरूआती दस मिनट बीतने से पहले ही शिवजी ने बालगणेश का सिर धड़ से अलग कर दिया...रामायण में भी राम जी तीर से, हनुमान जी गदा से और दूसरे योद्धा तलवार से खून बहाते दिखे...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यानी जिस मुसीबत से बचने की कोशिश कर रहे थे उससे पीछा नहीं छूटा. बताना पड़ा कि पुलिसवाले,गणेशजी, हनुमान जी सिर्फ़ बुरे लोगों को मारते हैं, बात फ़ौरन उसकी समझ में आ गई. उसे खेल-खेल में जिसको भी फिश्श फिश्श करना होता है उसे बुरा आदमी बना लेता है. दुनिया भर में बंदूक के पीछे बैठे जितने लोग ख़ुद को अच्छा आदमी बताते हैं उनका खेल अब समझ में आ रहा है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हिंसा से मुझे डर लगता है, हिंसा का निशाना बनने की कल्पना से ज्यादा भयावह कुछ नहीं है मेरे लिए, क्योंकि मैं शारीरिक-मानसिक तौर पर हिंसा से निबटने में ख़ुद को अक्षम पाता हूँ, जो ख़ुद को सक्षम पाते हैं वे मूर्ख हैं क्योंकि वे सोचते हैं कि वे दो-तीन लोगों को पीट देंगे, मार देंगे लेकिन हिंसा कितनी बड़ी और कितनी घातक हो सकती है, इसे वे भूल जाते हैं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हिंसा से हर हाल में डरना चाहिए, बचना चाहिए, वैसे इसके लिए काफ़ी कोशिश करनी पड़ती है, करना या न करना आपकी मर्ज़ी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुझे तो बच्चे की बंदूक से भी डर लगता है. सोमालिया, सिएरा लियोन, श्रीलंका, इराक़-फ़लस्तीन और पाकिस्तान के बच्चे आज खिलौना बंदूक से खेल रहे हैं लेकिन उनके लिए एके-47 कोई अप्राप्य खिलौना नहीं है. सामने खड़े साँस लेते आदमी को फिश्श फिश्श कर देना उनके लिए बहुत बड़ी बात नहीं है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हम अपने बच्चे को स्क्रीन पर हिंसा देखने से रोकना चाहते हैं, उसे बताते हैं कि यह अच्छी बात नहीं है लेकिन जब उन बच्चों का खयाल आता है जिन्होंने टीवी और सिनेमा के स्क्रीन पर नहीं, अपनी ज़िंदगी में ये सब देखा है तो सिर पकड़कर-आँखें मूँदकर सोफ़े पर धम्म से बैठने के अलावा हमसे कुछ और नहीं हो पाता.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6853758773001535028-6298334376900231577?l=anamdasblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://anamdasblog.blogspot.com/feeds/6298334376900231577/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6853758773001535028&amp;postID=6298334376900231577&amp;isPopup=true' title='11 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6853758773001535028/posts/default/6298334376900231577'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6853758773001535028/posts/default/6298334376900231577'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://anamdasblog.blogspot.com/2008/03/blog-post_11.html' title='खिलौना बंदूक और असली ख़ौफ़'/><author><name>अनामदास</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06852915599562928728</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_fR7cWVj99s0/SKvHGScbUlI/AAAAAAAAAIY/dP4fvrpVCXk/S220/images.jpg'/></author><thr:total>11</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6853758773001535028.post-1733408568515193303</id><published>2008-03-09T01:37:00.000Z</published><updated>2008-03-09T01:42:03.936Z</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अनामदास का चिट्ठा'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='ब्लॉग'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='anamdas ka chitta'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='हिंदी'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='hindi blog'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='ब्लाग'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='हिन्दी'/><title type='text'>क्या करें, कहाँ जाएँ, क्या बन जाएँ?</title><content type='html'>मैं एक भूरा आदमी हूँ. गोरों के देश में कुछ लोग मुझसे नफ़रत करते हैं, मुझे अल क़ायदा वाला समझते हैं, पाकिस्तानी मान लेते हैं, जबकि मैं भारत का हूँ.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;किसी ने कहा परदेस जाकर क्यों बसे, अपने देश में रहते तो अच्छा था. कहाँ रहता, आप ही बताइए, बिहारी हूँ, मुंबई जाकर रहूँ कि असम जाऊँ? हिंदू हूँ, कश्मीर चला जाऊँ? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक संघी संगी कहते हैं हिंदू होना ही भारी समस्या है, मैंने कहा कि बौद्ध होने में बड़ा आराम है लेकिन वो आप बनने नहीं देते. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुसलमान बनकर शायद अरब दुनिया में अमन-चैन से गुज़ारा हो जाए लेकिन उसके लिए वहीं पैदा होना पड़ेगा वर्ना शेख़ ताउम्र बेगार ही कराते रहेंगे, लेकिन अगर अरब दुनिया में फ़लस्तीन में पैदा हो गए तो?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;काला बनने की तो ख़ैर सोच भी नहीं सकते, गोरे भी मारते हैं और भूरे भी.  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शायद सबसे अच्छा गोरा बनना है. मिस्टर व्हाइट ने बताया कि मैं मुग़ालते में हूँ, ब्रिटेन और अमरीका की ट्रेवल एडवाइज़री देखी तो समझ में आया कि वे सूडान से लेकर अफ़ग़ानिस्तान तक कहीं सुरक्षित नहीं हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उर्दू में चमड़ी के लिए एक बेहतरीन शब्द है, ज़िल्द. ज़िल्द के रंग से ही लोग किताब का हिसाब कर देते हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन जैसा आप देख ही रहे हैं मसला सिर्फ़ ज़िल्द का नहीं है, कहीं ज़बान का है, कहीं कुरआन का, कहीं जीसस का, कहीं भगवान का. कहीं कुछ और... &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुंबई में मराठी, गुजरात में गुजराती हिंदू, पाकिस्तान में पंजाबी सुन्नी टाइप जीने के अलावा... अगर दुनिया में कहीं आदमी की तरह जीना हो तो कहाँ जाया जाए, ज़रा मार्गदर्शन करिए.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6853758773001535028-1733408568515193303?l=anamdasblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://anamdasblog.blogspot.com/feeds/1733408568515193303/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6853758773001535028&amp;postID=1733408568515193303&amp;isPopup=true' title='12 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6853758773001535028/posts/default/1733408568515193303'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6853758773001535028/posts/default/1733408568515193303'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://anamdasblog.blogspot.com/2008/03/blog-post.html' title='क्या करें, कहाँ जाएँ, क्या बन जाएँ?'/><author><name>अनामदास</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06852915599562928728</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_fR7cWVj99s0/SKvHGScbUlI/AAAAAAAAAIY/dP4fvrpVCXk/S220/images.jpg'/></author><thr:total>12</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6853758773001535028.post-1023564978323245914</id><published>2008-02-06T02:54:00.000Z</published><updated>2008-02-06T03:09:43.472Z</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अनामदास का चिट्ठा'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='ब्लॉग'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='हिंदी'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='ब्लाग'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='हिन्दी'/><title type='text'>मी मंदबुद्धि मुंबईकर बोलतो आहे</title><content type='html'>"मैं अकेला नहीं है, मेरे साथ 'ठोक रे' जी की सशक्त विचारधारा है, हमारे साथ तोड़फोड़कर है, काँचफोड़े है, माचिसमारे है, भाईतोड़े है. हमने बहुत अन्याय सहा है, अब नहीं सहेंगे, झुनका-भाखर आधा पेट खाके हम पहले ढोकला-थेपला वालों से लड़े, फिर इडली-सांभर वालों से, उसका बाद लिट्ठी-चोखा वालों से भी लड़ेंगे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमारे साथ शुरू से अन्याय हुआ है. अँगरेज़ों से भी पहले मुगलों के जमाने में कोल्हापुर-सोलापुर-ग्वालियर-इंदौर तक हमारा राज रहा है लेकिन हमें आज़ादी के बाद गुजरातियों के ताबे में ला दिया, मुंबई का चीफ़ मिनिस्टर वलसाड़ का गुजराती मूत्रपायी देसाई को बनाया, मराठवाड़ा में कोई मरद माणूस नहीं था मुख्यमंत्री बनने के लिए. कहने को स्टेट का नाम मुंबई था लेकिन आज़ादी के तेरह साल बाद तक हमने भाऊ की जगह भाई को, पाटील के बदले पटेल को झेला. 1960 में जाकर हमें अलग स्टेट मिला माझा महाराष्ट्र.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आमची मुंबई अब स्टेट से कैपिटल बना, ठोक रे साहब ने देखा कि मराठी मानूस कार्टून बन गया है वो कार्टून बनाना छोड़ दिया और बाघ छाप का लाकेट बनाया जो हमने अपना गला में लटकाया. पहले सब सापड़-उडुपी बंद करा दिया, हमारा इधर का नौकरी में कोई दामले नहीं, कांबले नहीं, तांबे नहीं,  पुणतांबेकर नहीं, सब वरदराजन, अय्यर, पिल्लै, अयंगार...उनको गुस्सा ऐसे नहीं आया. जो 'सामना' नहीं पढ़ता उसको कइसा समझ आएगा इतना बड़ा साजीश?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;साजीश तो बहुत हुआ मराठियों के खिलाफ, दाऊद,शकील और अबू सालेम भाई लोग सब मुसलमान है, शेयर मार्केट हमारा है लेकिन उधर सोपारीवाला-खोराकीवाला-चूड़ीवाला है, फिल्म इंडस्ट्री हमारा है लेकिन उधर भी खान-कपूर है, क्रिकेट खेलता है तेंदुलकर-कांबली मगर कप्तान बनता है अज़रुद्दीन-गंगोली, मराठी पार्टी बनाई उसमें भी रायगढ़ का नहीं, रोहतास का बिहारी भइया संजय निरूपम एमपी बन गया, तांबे-खरे-खोटे सब किधर जाएँगे? उनके पास भिड़े होने के सिवा उपाय क्या है बोलो.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बोलते हैं कि भइया लोग नहीं होंगे तो दूध नहीं मिलेगा, टैक्सी नहीं चलेगा, सब्ज़ी नहीं मिलेगा, मैं कहता हूँ झुग्गी नहीं रहेगा, कचरा नहीं रहेगा, बास नहीं रहेगा...हम म्हाडा वन बेडरूम फ्लेट में गाय बाँधेंगे, टैक्सी नहीं बेस्ट का बस में जाएँगे, अमिताभ बच्चन नहीं श्रेयस तलपड़े का सिनेमा देखेंगे... &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इन्हीं मराठी विरोधी प्रवृत्तियों और लोकशाही विरोधी पत्रकारों से निबटने के लिए हमारे ठोक रे साहब ने शिवाजी की प्रेरणा से सेना बनाई. हमारी सरकार बनी लेकिन दुर्भाग्य है कि बालासाहेब का भतीजा उनके बेटे जैसा दिखता है और बेटा किसी और के जैसा...इस पर भी हमारे दुश्मन ठोक रे साहेब का चरित्रहनन करते हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उन्होंने देश का कितना काम किया, भारत-पाकिस्तान मैच का विरोध किया, कितना फ़िल्म का मातुश्री में स्पेशल स्क्रीनिंग कराके राष्ट्रविरोधी सीन कटवा दिया, कितनी मराठी मुल्गियों को रोल दिला दिया.  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;घर की बात है, मैं बाहर नहीं बोल सकता लेकिन उद्धव ठंडा है, इसीलिए ठोक रे साहब ने अपना ट्रेनिंग,आशीर्वाद और पार्टी का कमान राज को दिया था लेकिन घर का झगड़ा में उद्धव ने ठोक रे साहब को ठग लिया. राज ने सिद्धांत वही रखा है जो ठोक रे साहेब से सीखा है, बोलने का लोकशाही-करने का ठोकशाही. ठोक रे साहब को आज तक किसी ने नहीं ठोका, राज का राज नहीं है तो क्या हुआ एक दिन ज़रूर आएगा, तब तक उसका राज हमारे दिल पर है".   &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इतना कहकर मनोज तिवारी के घर से आ रहा मंदबुद्धि मुंबईकर भोजपुरी के दूसरे स्टार रविकिशन के घर की ओर रवाना हो गया है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरा इतना ही कहना है कि मंदबुद्धि मुंबईकर कम ही मिलते हैं, ठीक वैसे ही जैसे वाघमारे ने कभी बाघ नहीं मारा होता, पोटदुखे के पेट में दर्द शायद ही होता है और हर पांचपुते से पाँच बेटे हों यह ज़रूरी नहीं है. मराठियों का जेनरलाइज़ेशन करने का इरादा बहुत ख़तरनाक है, उसके बारे में सोचना भी पाप है, इरादा सिर्फ़ उन मुंबईकरों की भावनाओं को ठेस पहुँचाने का है जिनकी भावनाएँ निर्मल नहीं हैं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शिव सेना और उसके मानस पुत्र महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना से सहानुभूति न रखने वाले सभी मराठियों से क्षमा याचना सहित, ख़ास तौर पर जिनके सरनेम का यहाँ इस्तेमाल हुआ है, सिर्फ़ प्रांतवादी मानसिकता का उपहास करने के लिए. राज ठाकरे का समर्थक होने के लिए मराठी होना ज़रूरी नहीं है, आप जहाँ हैं वहाँ राज ठाकरे टाइप लोगों को टाइट रखें वर्ना आप भी पाप के भागी होंगे.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6853758773001535028-1023564978323245914?l=anamdasblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://anamdasblog.blogspot.com/feeds/1023564978323245914/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6853758773001535028&amp;postID=1023564978323245914&amp;isPopup=true' title='20 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6853758773001535028/posts/default/1023564978323245914'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6853758773001535028/posts/default/1023564978323245914'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://anamdasblog.blogspot.com/2008/02/blog-post.html' title='मी मंदबुद्धि मुंबईकर बोलतो आहे'/><author><name>अनामदास</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06852915599562928728</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_fR7cWVj99s0/SKvHGScbUlI/AAAAAAAAAIY/dP4fvrpVCXk/S220/images.jpg'/></author><thr:total>20</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6853758773001535028.post-4298619399498347720</id><published>2008-01-31T23:18:00.000Z</published><updated>2008-01-31T23:27:36.174Z</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अनामदास का चिट्ठा'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='blogger'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='ब्लॉग'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='anamdas ka chitta'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='हिंदी'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='war'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='hindi blog'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='ब्लाग'/><title type='text'>दुख ने दुख से बात की बिन चिट्ठी बिन तार</title><content type='html'>गरम-गरम ख़बरों को साफ़-सुथरा करके आगे बढ़ाने में अब हथेलियाँ नहीं जलतीं, सालों हो गए, आदत पड़ गई है. धमाका, धुआँ, लाशें, आँसू, बिलखते बच्चे... सब होते हैं लेकिन वे अब बेचैन नहीं करते. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इराक़, अफ़ग़ानिस्तान और इसराइल की ख़बरों ने नहीं, अफ्रीकी देश आइवरी कोस्ट की एक 'सॉफ्ट' ख़बर मेरे लिए अचानक बहुत 'हार्ड' हो गई है. इस ख़बर में चिपचिपा ख़ून नहीं है, बारूद की गंध नहीं है लेकिन मन परेशान है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लड़ाइयाँ बार-बार हमें रौंदती हैं. कौन जीता-कौन हारा, किसने किसकी कितनी ज़मीन छीन ली, जहाँ लड़ाई हुई उस जगह का सामरिक महत्व क्या है, किस देश का कूटनीतिक रवैया क्या है,  और हाँ, इस सब में कुल कितनी जानें गईं, ये सब हम जान जाते हैं. जो जानना रह जाता है वही हमारे लिए बार-बार लड़ाइयाँ रचता है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जानना रह जाता है कि कितने आँसू बहे, कितने बच्चे ख़ाली पेट सोए, कितने अरमानों के चिथड़े उड़े, कितनी प्रेम कहानियाँ हवा में तैरती रहीं अतृप्त-विक्षत आत्माओं के साथ. कितने प्रेमपत्र, कितने शोक संदेश जो नहीं पहुँचे अपने पते तक. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आइवरी कोस्ट में यही सब हुआ, कुछ आंकड़े आए जो इराक़-अफ़ग़ानिस्तान के मुक़ाबले फीके थे, ऊपर से एक अफ्रीकी देश जहाँ बनमानुस-हब्शी-नीग्रो रहते हैं. वहीं से एक ख़बर आई है कि पाँच साल बाद वहाँ डाक की छँटाई का काम शुरू हुआ है क्योंकि किसी तरह शांति समझौता हो गया है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आँखें बंद करिए और सोचिए! पाँच साल की डाक! &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;डेढ़ दिन से इंटरनेट कनेक्शन दुबई, रियाद और दिल्ली में ठीक नहीं चल रहा है, कितने परेशान हैं हम सब. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जहाँ न फ़ोन है, न नेट, वहाँ की डाक कैसी होगी, उसकी पाँच साल की कुल जमा बेबसी-बेचारगी-बेचैनी को मापने का पैमाना क्या होगा?  किसी ने माँ को अपने ठीक-ठाक होने का हाल लिखा होगा जो कुछ दिन-महीनों बाद मारा गया होगा, अम्मा तक न ठीक होने की ख़बर पहुँची, न ही न होने की.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कैसी-कैसी चिट्ठियाँ होंगी, किसी में प्यार का इज़हार होगा, किसी बच्चे के जन्मदिन का निमंत्रण, किसी की टाँगे टूटने, किसी की नौकरी छूटने से लेकर न जाने क्या-क्या...सब बेकार हो चुका है अब तक. कहीं भेजने वाला बारूदी सुरंग की चपेट में आ गया होगा तो कहीं पाने वाला मशीनगन के दायरे में.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बँटी हुई सरहदों, ख़ूनी लड़ाइयों के बीच इंसान का इंसानियत से ही नहीं, इंसानों से भी रिश्ता टूट जाता है. लड़ाइयों का हिसाब करते वक़्त अगर आइवरी कोस्ट की चिट्ठियों का हिसाब नहीं हुआ तो अगली लड़ाइयों के प्रतिकार का कोई ठोस तर्क इंसानियत के पास नहीं होगा.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6853758773001535028-4298619399498347720?l=anamdasblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://anamdasblog.blogspot.com/feeds/4298619399498347720/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6853758773001535028&amp;postID=4298619399498347720&amp;isPopup=true' title='12 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6853758773001535028/posts/default/4298619399498347720'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6853758773001535028/posts/default/4298619399498347720'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://anamdasblog.blogspot.com/2008/01/blog-post_31.html' title='दुख ने दुख से बात की बिन चिट्ठी बिन तार'/><author><name>अनामदास</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06852915599562928728</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_fR7cWVj99s0/SKvHGScbUlI/AAAAAAAAAIY/dP4fvrpVCXk/S220/images.jpg'/></author><thr:total>12</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6853758773001535028.post-3125499656877472440</id><published>2008-01-29T19:15:00.000Z</published><updated>2008-01-29T19:26:42.119Z</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अनामदास का चिट्ठा'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='blog'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='bihar'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='hindi'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='ब्लॉग'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='anamdas ka chitta'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='हिंदी'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='ब्लाग'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='बिहार'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='हिन्दी'/><title type='text'>बिहार और बिहारी अच्छे लगने लगेंगे...</title><content type='html'>बिहारी सिर्फ़ वही हैं जो बिहार में रह गए हैं या बिहार से बाहर निकलकर भी ग़रीब हैं या फिर जिनकी बोली चुगली कर देती है,  बाक़ी लोगों का बिहारी होना या न होना स्वैच्छिक है.  जिन्होंने पद पा लिया है, पैसा कमा लिया है,  अँगरेज़ी साध ली है... उन्हें बिहारी कौन बुलाता है?  उनसे कहा जाता है, 'तो आप बिहार से हैं.'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बिहारी होना और बिहारी बुलाया जाना दो अलग-अलग बातें हैं.  बिहारी कहा जाना भौगोलिक-सांस्कृतिक-भाषायी पहचान से बढ़कर एक सामाजिक-आर्थिक टिप्पणी है. दिल्ली में छत्तीसगढ़ का मज़दूर,  बंगाल का कारीगर, उड़ीसा का मूंगफलीवाला, बंदायूँ का गुब्बारेवाला... सब बिहारी हैं.  बिहारी होने का फ़ैसला अक्सर व्यक्ति के पहनावे, रोज़गार और हुलिए से होता है,  पूछने की ज़रूरत नहीं पड़ती कि व्यक्ति कहाँ का रहने वाला है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ लोग अपना 'श'  दुरुस्त करके, बस और रेल को 'चल रहा है'  की जगह यत्नपूर्वक 'चल रही है'  कहकर बिहारी बिरादरी से तुरत-फुरत नाम कटाना चाहते हैं (झारखंड बनने से ढेर सारे लोगों को स्वतः आंशिक मुक्ति मिल गई). दुसरी ओर लाखों-लाख लोग ऐसे हैं जो बिहारी न होकर भी बिहारी होने के 'आरोप' को ग़लत नहीं ठहरा सकते, उसके लिए उन्हें अपनी क़िस्मत बदलनी होगी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बिहार में जन्मे-पले-बढ़े ज्यादातर लोगों पर उनका प्रांत किसी और राज्य के लोगों के मुक़ाबले कुछ ज्यादा ही सवार रहता है. वजह बहुत साफ़ है, बिहारी होने के साथ जिस सामाजिक-आर्थिक कलंक का भाव जुड़ा है उससे कौन पीछा नहीं छुड़ाना चाहेगा? जो किसी वजह से छुड़ा नहीं पाएगा वह ज़रूर झल्लाएगा और यह झल्लाहट कभी बिहारी होने के उदघोष में, कभी दूसरे राज्यों के लोगों की बुराई करने में और कभी बिहार को ही बढ़-चढ़कर कोसने में प्रकट होती है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जैसे माँ-बाप की हैसियत से तय होता है कि रिश्तेदार उनके बच्चों से कैसा व्यवहार करेंगे उसी तरह राज्यों की आर्थिक हैसियत से तय होता है कि उसके बाशिंदों से दूसरे राज्य के लोग कैसा व्यवहार करेंगे. ग्लोबल स्तर पर यही सिद्धांत लागू होता है. ग़रीब का कुछ भी अनुकरणीय नहीं होता, न उसकी भाषा, न उसका खान-पान. आग में भुनी हुई नाइजीरियाई मछली को देखकर लोग मुँह बिचकाते हैं और जापान की कच्ची मछली वाली सुशी खाते ही लोगों को जापानी सिंपलिसिटी की ब्यूटी समझ में आ जाती है. लोग फ्रेंच सीखते हैं, स्वाहिली नहीं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बिहार भारत के लिए वैसा ही है जैसा भारत बाक़ी दुनिया के लिए, बड़ी आबादी, पिछड़ापन, जात-पात, क्षेत्रवाद, भ्रष्टाचार वगैरह. मैं जानता हूँ कि जिन्हें भारत पर गर्व है लेकिन बिहार को कलंक मानने का आसान रास्ता अपनाते हैं, उन्हें यह वाक्य पसंद नहीं आएगा. राष्ट्रवाद जैसी अमानवीय और सत्तापोषित अवधारणा का ही विकृत रूप है प्रांतवाद या क्षेत्रवाद, इसकी सबसे बड़ी बुराई यही है कि यह व्यक्ति के ऊपर प्रांत और राष्ट्र को जबरन लाद देती है, जन्म के आधार पर, ठीक जाति की तरह.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बिहारी होना एक लांछन है, यह हर बिहारी जानता है, अलग-अलग लोग इससे अपने-अपने तरीक़े से निबटते हैं. बिहारी होने की अपनी कुंठाएँ भी हैं, हीनभावना भी है. इसका ये मतलब नहीं है कि बिहार के लोग अपनी करनी के लिए जवाबदेह नहीं हैं, उन्हें बिहारी होने के लिए जवाबदेह नहीं ठहराया जा सकता लेकिन बिहार की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक अनीति-कुनीति का जवाब तो उन्हें नागरिक और मतदाता के रुप में देना ही होगा, उसे स्वीकार करना होगा, उसे ठीक करना होगा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पंजाब की दरियादिली पाँच नदियों की देन और हरित क्रांति की उपज है तो बिहार का संयम और संघर्ष सूखे और सामंतवाद की पैदाइश. सबका अपना इतिहास, भूगोल, समाज, अर्थतंत्र और संस्कृति है और उसे पूर्णता में समझना चाहिए. बिहार की तरह सारे ऐब कमोबेश देश के सारे राज्यों में हैं लेकिन वे उनकी बेहतर आर्थिक स्थिति, कम आबादी वग़ैरह के कारण छिप जाते हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बिहार का संकट सिर्फ़ छवि का नहीं बल्कि एक जटिल संकट है, क्या भारत का संकट पिछले दशक तक जटिल नहीं था. अब लोगों को लगने लगा है कि सारे संकट टल गए हैं और देश प्रगति के स्वर्णिम पथ पर अग्रसर है. इसकी वजह सिर्फ़ मध्यवर्ग का जीवनस्तर सुधरना है जिससे दुनिया में भारत की छवि पर लगा ग्रहण छँटता दिखने लगा है हालांकि वास्तविक समस्याएं अपनी जगह बनी हुई हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बिहार की समस्या भी वैसे ही सुझलेगी और उतनी ही सुलझेगी जैसे भारत की सुलझ रही है. पूंजीनिवेश, उद्योग, बाज़ार और रोज़गार के अवसर उपलब्ध होंगे, मित्तल, जिंदल, अंबानियों को करोड़ों की ख़रीदार आबादी दिखेगी तो छोटे-मोटे सियासी लुच्चों की ज़मीन अपने-आप खिसक जाएगी. करोड़ो की पूंजी का खेल छवि की समस्याएँ दूर कर देगा.यह सब कब और कैसे होगा,  देखना काफ़ी दिलचस्प होगा, लेकिन यह होगा ज़रूर.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह निष्कर्ष भी उतना ही सिंपलिस्टिक है जितना भारत में विकास की अवधारणा. जहाँ से विकास का आइडिया आया है वहीं से एक मिसाल भी लीजिए. अठारहवीं सदी में किसने सोचा था कि अमरीका में मरुस्थल का मारा-हारा बेचारा 'नेवाडा वाला' होना शर्मनाक नहीं रह जाएगा, इज़्ज़त जुआ खिलवाने से भी मिल सकती है. बिहार के लिए विकल्पों की क्या कमी हो सकती है.&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;जब देश के दूसरे हिस्सों के लोग मोटी तनख्वाह पर कार्पोरेट नौकरी के लिए बिहार जाएँगे तो सच मानिए, बिहार और बिहारी उतने बुरे नहीं लगेंगे. ऐसा होने में जिन्हें शक है क्या उन्होंने सोचा था कि भारत में अंगरेज़ और अमरीकी वर्क परमिट लेकर नौकरी करने आएँगे, उनसे पूछिए भारत और भारतीय कितने अच्छे लग रहे हैं आजकल.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6853758773001535028-3125499656877472440?l=anamdasblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://anamdasblog.blogspot.com/feeds/3125499656877472440/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6853758773001535028&amp;postID=3125499656877472440&amp;isPopup=true' title='8 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6853758773001535028/posts/default/3125499656877472440'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6853758773001535028/posts/default/3125499656877472440'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://anamdasblog.blogspot.com/2008/01/blog-post_29.html' title='बिहार और बिहारी अच्छे लगने लगेंगे...'/><author><name>अनामदास</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06852915599562928728</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_fR7cWVj99s0/SKvHGScbUlI/AAAAAAAAAIY/dP4fvrpVCXk/S220/images.jpg'/></author><thr:total>8</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6853758773001535028.post-333411901068730739</id><published>2008-01-19T23:51:00.000Z</published><updated>2008-01-19T23:59:18.045Z</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='ब्लॉगर'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='blogger'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='blog'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='hindi'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='ब्लॉग'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='anamdas ka chitta'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='चिट्ठा'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='हिंदी'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='ब्लाग'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अनामदास'/><title type='text'>उम्रेदराज़ के चारों दिन कटे</title><content type='html'>महीने भर की छुट्टी का महीनों से इंतज़ार था. बहुत सारे वादे-इरादे थे, अपनों से और अपने-आप से भी. दस साल से हर बार यही होता है, मंसूबे बनाए जाते हैं, कुछ पूरे होते हैं और ज्यादातर धरे रह जाते हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारत से जाते हुए हर बार अजब सी कसक होती है, ये सोचकर कि इसी तरह एक दिन दुनिया से चेक-आउट करने का वक़्त आ जाएगा और 'विशलिस्ट' में कई चीज़ों के आगे 'डन' नहीं लिख सकूँगा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वक़्त की ही तो बात है न, थोड़ा ज़्यादा या कम. एक महीना या एक जीवन. मुझे पता है कि काफ़ी कुछ रह जाएगा, जो कुछ पूरा होगा उसे गिनने कब बैठूँगा. जो रह जाएगा, वही सताएगा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बड़े-बड़े काम तो हो जाते हैं, करने ही पड़ते हैं. छोटे-छोटे रह जाते हैं जो चैन की नींद के बीच अचानक चुभ जाते हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भोपाल जाकर रम पीने का वादा, किसी के लिए एमपी3 प्लेयर ख़रीदने का इरादा, अम्मा के दाँतों का इलाज...पुरानी दिल्ली के कबाब...एनएसडी में नाटक..पुराना ऑफ़िस, मुंबई-चेन्नई...आई टेस्ट...सब रह गए. बीसियों ऐसी मुलाक़ातें जो नहीं हो सकीं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ढेर सारी माफ़ियाँ जो फ़ोन पर माँगी गईं, वहाँ भी और यहाँ से भी. तरह-तरह के शिकवे-गिले सुने, कुछ झूठे-कुछ सच्चे. सच्चा वाला--'आपकी राह देखते रहे, आप आए नहीं.' झूठा वाला--'भारत आकर एक फ़ोन तक नहीं किया.'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सारी यात्राएँ ख़त्म हो जाती हैं, इब्न बतूता-मार्को पोलो-कोलंबस-कैप्टन कुक जैसों की यात्राएँ समाप्त हो गईं. पता नहीं उन्हें कितनी बातों का अफ़सोस रह गया होगा, लंबी यात्रा में अधूरी आकांक्षाओं की सूची भी तो लंबी होती होगी. पता नहीं, मेरी यात्रा कितनी लंबी होगी, कितना कुछ पाकर पीछे छोड़ दूँगा, कितना कुछ अधूरा रह जाएगा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लंदन-दिल्ली-लंदन की 14वीं यात्रा पूरी हुई, बुरी नहीं थी, ज़्यादातर मामलों में बेहतरीन थी. डिब्बाबंद रसगुल्ले, हल्दीराम के नमकीन, ढेर सारी किताबें, सैकड़ों हँसती-मुस्कुराती डिजिटल तस्वीरें, जीवन में हरियाली भर देने वाले केरल के अनुभव, आठ-दस किताबें, नए-नए कपड़े, सीडी-वीसीडी-डीवीडी...सर्दी में अपनत्व की सेंक से भरे दिन, कुछ दोस्तों से मुलाक़ात के सुखद क्षण साथ आए हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जो छूट गए हैं उनसे फिर मिलने का वादा. ढेर सारे नाम हैं जिनसे मिलने के बाद उनके नाम के आगे सही का निशान लगाना है, उसके लिए फिर आना होगा, अतृप्त आत्माएँ दोबारा यूँ ही जन्म लेने की तकलीफ़ नहीं उठातीं.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6853758773001535028-333411901068730739?l=anamdasblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://anamdasblog.blogspot.com/feeds/333411901068730739/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6853758773001535028&amp;postID=333411901068730739&amp;isPopup=true' title='16 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6853758773001535028/posts/default/333411901068730739'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6853758773001535028/posts/default/333411901068730739'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://anamdasblog.blogspot.com/2008/01/blog-post.html' title='उम्रेदराज़ के चारों दिन कटे'/><author><name>अनामदास</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06852915599562928728</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_fR7cWVj99s0/SKvHGScbUlI/AAAAAAAAAIY/dP4fvrpVCXk/S220/images.jpg'/></author><thr:total>16</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6853758773001535028.post-3821576627911957368</id><published>2007-11-13T23:15:00.001Z</published><updated>2007-11-13T23:15:13.653Z</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='blog'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='hindi'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='ब्लॉग'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='anamdas ka chitta'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='हिंदी'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='ब्लाग'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अनामदास'/><title type='text'>उदासी के भूरे चुभते कंबल में लिपटे दिन-रात</title><content type='html'>हरे पेड़ नंगे हो गए हैं, दो महीने पहले तक अधनंगे घूम रहे लोग लबादे लादे डोल रहे हैं. लाल, पीले, गुलाबी फूलों और हरियाली पर धूसर पेंट की बाल्टी उलट दी है किसी ने. यूरोप में सर्दी सांकल खड़का रही है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सड़क पर डाल से बिछड़े पत्तों का अंबार है जो ठंडी हवा में उड़कर मुँह पर आते हैं, जूतों के नीचे उदास-सी आवाज़ करते हैं. कहीं कोई रंग नहीं, बस मुँह से भाप छोड़ती भूरी-काली आकृतियाँ हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धूप, मूंगफली, गन्ने और रंग-बिरंगे स्वेटर नहीं हैं. दिन भर सूरज की सेंक और शाम को अलाव, सिगड़ी या हीटर...मकर संक्रांति तक की बात है उसके बाद तो सर्दी अपने मामा के घर चली जाती है. यूरोप की सर्दी का कोई मामा नहीं है जहाँ वह चली जाए, वह छह महीने तक बेघर भटकती है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यूरोप में आसमान पर कंबल तन गया है, सब धुंधला-सा है कंबल के अंदर, सर्द हवा हड्डियाँ छेदती है कंबल के अंदर भी. सारे पुराने चोट-दर्द और घाव याद आते हैं. आँख बहती है, नाक जम जाती है, कान सुन्न हो जाते हैं...पाँचों ज्ञानेंद्रियों को पाला मार जाता है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ये शुरुआत है जिसे विंटर कहलाने का गौरव हासिल नहीं है, यह पतझड़ है यानी ऑटम. गहरी उदासी का मौसम, सारी ख़ुशियों और उल्लास के स्थगन का मौसम. सर्दियों में फूल नहीं खिलेंगे, अंडों से बच्चे नहीं निकलेंगे, गिलहरी नहीं फुदकेगी, सब इंतज़ार करेंगे कंबल के हटने का, कोहरे के छंटने का. अप्रैल यानी स्प्रिंग तक कठजीव इंसानों के अलावा कुछ भी जीता-जागता नहीं दिखेगा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस बर्फ़ानी ठंड का प्रतिकार करने की एक कोशिश होगी क्रिसमस. ब्रांडी, जगमगाती बत्तियाँ और तोहफ़े थोड़ी गर्मी देने की कोशिश करेंगे लेकिन उस आख़िरी कोशिश के बाद सिर्फ़ वसंत की राह देखकर ही दिन-रात काटे जा सकेंगे. काली-डरावनी सर्दी क्रिसमस के जश्न के बाद थककर चूर यूरोप पर घात लगाकर हमला करेगी और कोई बच न पाएगा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगले छह महीने यूरोप एक मटमैली ब्लैक एंड व्हाइट फ़िल्म की तरह दिखेगा, लोग ठंड की वजह से वैसे ही चलेंगे जैसी बहुत पुरानी फ़िल्मों में गाँधी जी चलते दिखते हैं. सड़क पर कोई बेवजह एक पल नहीं बिताना चाहेगा, कहीं ऐसी जगह पहुँचने की जल्दी होगी जहाँ ख़ून दोबारा पिघलकर धमनियों में बहने लगे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुनहरी धूप वाले मौसम में पार्क, बीच और गार्डन की तरफ़ भागने वाले लोगों को अब गुनगुने घर में लौट आने का सुख महसूस होगा. गर्म पानी, गर्म रज़ाई, गर्म चाय और घर में बसने वालों की उष्मा, इन सबका मोल फिर से समझ में आने लगेगा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ ही महीने में हम सब कुछ कैसे भूल जाते हैं. लगता है, धूप खिली रहेगी, तितलियाँ उड़ती रहेगी, हम रंग-बिरंगे टी-शर्ट पहनकर यूँ ही फहराते रहेंगे अनंतकाल तक डरावनी सर्दी अब कभी नहीं आएगी. लेकिन हर बार की तरह वह आ रही है, यूरोप भूरा, भयभीत और मलिन-सा होता जा रहा है.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6853758773001535028-3821576627911957368?l=anamdasblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://anamdasblog.blogspot.com/feeds/3821576627911957368/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6853758773001535028&amp;postID=3821576627911957368&amp;isPopup=true' title='14 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6853758773001535028/posts/default/3821576627911957368'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6853758773001535028/posts/default/3821576627911957368'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://anamdasblog.blogspot.com/2007/11/blog-post.html' title='उदासी के भूरे चुभते कंबल में लिपटे दिन-रात'/><author><name>अनामदास</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06852915599562928728</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_fR7cWVj99s0/SKvHGScbUlI/AAAAAAAAAIY/dP4fvrpVCXk/S220/images.jpg'/></author><thr:total>14</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6853758773001535028.post-7251139437684952462</id><published>2007-10-30T22:18:00.001Z</published><updated>2007-10-30T22:18:23.576Z</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अनामदास का चिट्ठा'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='blogger'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='blog'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='hindi'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='ब्लॉग'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='anamdas ka chitta'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='हिंदी'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='ब्लाग'/><title type='text'>पहला नशा, उम्र भर का ख़ुमार</title><content type='html'>मौसम यही था, बस उमर कुछ और थी. दीवाली से पहले की हल्की ठंड, बारिश की टिपिर-टिपिर से राहत. अच्छी-सी धूप, मीठा-मीठा गन्ना बिकने लगा था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बारिश में जमी काई धूप से सूखकर झड़ गई और सारे काले-भूरे भुए तितलियाँ बनकर उड़ गए, बरसों बाद हासिल ज्ञान से पता चला कि उस एकरंगे मटमैले फड़फड़ाते जीव को तितली कहलाने का गौरव हासिल नहीं, उसे मॉथ कहते हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसे मौसम में 14 साल की उम्र में छत पर पी गई चाय का मज़ा लंदन के किसी बेहतरीन पब की बियर से बेहतर है, उम्र का अपना नशा होता है जिस पर बियर की बोतल की तरह एल्कोहल का परसेंट नहीं लिखा होता.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उम्र का नशा ईरान-सऊदी अरब और वेटिकन में भी होता है जहाँ ज्यादातर ऐसी चीज़ों की मनाही होती है जो अच्छी लगती हैं. मगर भारत के एक क़स्बे में निम्न मध्यवर्गीय परिवेश में जहाँ आपका परिवार दो-तीन पीढ़ियों से रहता है वहाँ या तो दीदियाँ होती हैं या आप भइया होते हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसे ही एक अच्छे से मुहल्ले में, अच्छे से मौसम में एक अच्छी सी लड़की आई, कहीं बाहर से यानी उसके दीदी होने या मेरे भइया होने का कोई अंदेशा नहीं था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दसवीं क्लास में पढ़ने वाले लड़के ने उसे बालकनी पर खड़े देखा, ख़ुद को देखते हुए देखा, वह अपनी छत पर गया, दोनों ने एक-दूसरे को देखा, बस देखा, खूब देखा. लड़की तो याद है लेकिन उसका चेहरा नहीं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लड़के ने पहली बार किसी लड़की को लड़की की तरह देखा और शायद लड़की ने भी जाने-अनजाने ऐसा ही किया, दो-तीन सौ फुट की दूरी से.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उसके बाद ब्रश, चाय, नाश्ता, पढ़ाई सब छत पर. सुबह से लेकर सूरज ढलने तक. आँखों-आँखों में भी नहीं, सब दो आकृतियों में. काफ़ी कुछ इंटरनेट के आभासी रोमांस की तरह, बस कोई चैट या ईमेल नहीं, बाक़ी सब वैसा ही, दूर से कल्पना का प्यार.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अपनी सबसे अच्छी कमीज़ पहनकर, किताबें लिए धूप खिलते ही छत पर पहुँचना, उसका बालकनी में आना, मुझे थोड़ी देर देखना, फिर अचानक चले जाना, वापस आना, सूरज ढलने तक बार-बार.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पंद्रह दिन हो गए, घर में पढ़ाई के प्रति मेरे लगन की तारीफ़ हुई, मुझे मैट्रिक पास करने की चिंता हुई. सीढ़ियों पर आहट होते ही मैं किताबों में खो जाता और वह दूसरी ओर देखने लगती.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अफ़सोस कि उसे 'लड़की' लिखना पड़ रहा है जो बीस दिनों तक मेरे लिए सब कुछ थी और आज भी मैं उसे भूल नहीं सकता, बस नाम नहीं जानता.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दीवाली की अगली सुबह घर के सामने से रिक्शा गुज़रा, क्रिकेट का बल्ला हाथ से छूट गया, गेंद का होश नहीं रहा, वह जा रही थी, रिक्शे पर सूटकेस लदे थे, मतलब साफ़ था, उसने मुझे मुड़कर देखा, मैंने उसे पहली बार इतने क़रीब से देखा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वह कहाँ से आई थी, पता नहीं, कहाँ जा रही थी, मालूम नहीं. फिर कभी नहीं दिखेगी इसका अहसास था. वह सुंदर थी या नहीं, मालूम नहीं. उसका चेहरा याद नहीं, लेकिन एक आकृति याद है जो मेरे मन पर उम्र ने खींची थी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं बहुत रोया लेकिन सिर्फ़ थोड़ी देर के लिए जब तक भाई ने क्रिकेट खेलने के लिए बुला नहीं लिया.&lt;br /&gt;एक लड़की, जो मेरी ज़िंदगी में न आई थी, न कभी मेरी ज़िंदगी से गई.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6853758773001535028-7251139437684952462?l=anamdasblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://anamdasblog.blogspot.com/feeds/7251139437684952462/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6853758773001535028&amp;postID=7251139437684952462&amp;isPopup=true' title='20 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6853758773001535028/posts/default/7251139437684952462'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6853758773001535028/posts/default/7251139437684952462'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://anamdasblog.blogspot.com/2007/10/blog-post_30.html' title='पहला नशा, उम्र भर का ख़ुमार'/><author><name>अनामदास</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06852915599562928728</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_fR7cWVj99s0/SKvHGScbUlI/AAAAAAAAAIY/dP4fvrpVCXk/S220/images.jpg'/></author><thr:total>20</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6853758773001535028.post-2999706878483345147</id><published>2007-10-19T01:29:00.001+01:00</published><updated>2007-10-19T01:29:46.047+01:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अनामदास का चिट्ठा'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='blogger'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='हिंदू'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='blog'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='culture'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='india'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='hindi'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='भारत'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='anamdas ka chitta'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='धर्म'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='religion'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='संस्कृति'/><title type='text'>नवरात्र में शेर और स्कूटर पर सवार माताएँ</title><content type='html'>नवरात्र चल रहा पुण्यभूमि भारत में. नारी शक्ति की अराधना उत्कर्ष पर है. एक ऐसे देश में जहाँ शाम ढलने के बाद बाहर निकलने में महिलाओं को डर लगता है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारत विडंबनाओं और विरोधाभासों का देश है, इसकी सबसे अच्छी मिसाल नवरात्र में देखने को मिलती है जब लोग हाथ जोड़कर माता की प्रतिमा को प्रणाम करते हैं और हाथ खुलते ही पूजा पंडाल की भीड़ का फ़ायदा उठाने में व्यस्त हो जाते हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारत का कमाल हमेशा से यही रहा है कि संदर्भ, आदर्श, दर्शन, विचार, संस्कार सब भुला दो लेकिन प्रतीकों को कभी मत भुलाओ.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिस देश की अधिसंख्य जनता नारीशक्ति की इतनी भक्तिभाव से अर्चना करती है उसी देश में कन्या संतान को पैदा होने से पहले ही दोबारा भगवान के पास बैरंग वापस भेज दिया जाता है, 'हमें नहीं चाहिए यह लड़की, कोई गोपाल भेजो, कन्हैया भेजो, ठुमक चलने वाले रामचंद्र भेजो, लक्ष्मी जी को अपने पास ही रखो'.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अदभुत देश है जहाँ 'जय माता की' और 'तेरी माँ की'...एक जैसे उत्साह के साथ उच्चारे जाते हैं. माता का यूनिवर्सल सम्मान भी है, यूनिवर्सल अपमान भी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नौ दिन तक जगराते होंगे, पूजा होगी, हवन होंगे, मदिरापान-माँसभक्षण तज दिया जाएगा और देवी प्रतिमा की भक्ति होगी, मगर साक्षात नारी के सामने आते ही प्रौढ़ देवीभक्त की आँखें भी वहीं टिक जाएँगी जहाँ पैदा होते ही टिकी थीं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारत में पूजा करने का अर्थ यही होता है कि रोज़मर्रा के जीवन से उस देवी-देवता का कोई वास्ता नहीं है, हमारे यहाँ सरस्वती पूजा में वही नौजवान सबसे उत्साह से चंदा उगाहते रहे हैं जिनका विद्यार्जन से कोई रिश्ता नहीं होता.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;स्त्रीस्वरूप की पूजा तभी हो सकती है जब वह शेर पर सवार हो, उसके हाथों में तलवार-कृपाण-धनुष-वाण हो या फिर उसे जीते-जी जलाकर सती कर दिया गया हो, दफ़्तर जाने वाली, घर चलाने वाली, बच्चे पालने वाली, मोपेड चलाने वाली औरतें तो बस सीटी सुनने या कुहनी खाने के योग्य हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भक्तिभाव से नवरात्र की पूजा में संलग्न कितने लाख लोग हैं जिन्होंने अपनी पत्नी को पीटा है, अपनी बेटी और बहन को जकड़ा है, अपनी माँ को अपने बाप की जागीर माना है. वे लोग न जाने किस देवी की पूजा कर रहे हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भवानी प्रकृति हैं और शिव पुरूष हैं, यह हिंदू धर्म की आधारभूत अवधारणा है. दोनों बराबर के साझीदार हैं इस सृष्टि को रचने और चलाने में. मगर पुरुष का अहंकार पशुपतिनाथ को पशु बनाए रखता है इसका ध्यान कितने भक्तों को है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिस दिन पंडाल में बैठी प्रतिमा का नहीं, दफ़्तर में बैठी साँस लेती औरत का सच्चा सम्मान होगा, जिस दिन शेर पर बैठी दुर्गा को नहीं, साइकिल पर जा रही मोहल्ले की लड़की को भविष्य की गरिमामयी माँ के रूप में देखा जाएगा, उस दिन भारत में नवरात्र के उत्सव में भक्ति के अलावा सार्थकता भी रंग होगा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फ़िलहाल यह उत्सव है जो नारी शक्ति की आराधना के नाम पर पुरुष मना रहे हैं.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6853758773001535028-2999706878483345147?l=anamdasblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://anamdasblog.blogspot.com/feeds/2999706878483345147/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6853758773001535028&amp;postID=2999706878483345147&amp;isPopup=true' title='18 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6853758773001535028/posts/default/2999706878483345147'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6853758773001535028/posts/default/2999706878483345147'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://anamdasblog.blogspot.com/2007/10/blog-post_19.html' title='नवरात्र में शेर और स्कूटर पर सवार माताएँ'/><author><name>अनामदास</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06852915599562928728</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_fR7cWVj99s0/SKvHGScbUlI/AAAAAAAAAIY/dP4fvrpVCXk/S220/images.jpg'/></author><thr:total>18</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6853758773001535028.post-2998179252728860114</id><published>2007-10-06T01:23:00.001+01:00</published><updated>2007-10-06T01:23:36.993+01:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अनामदास का चिट्ठा'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='blog'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='ब्लॉग'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='anamdas ka chitta'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='विदेश 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रोक लगाकर, बौद्ध भिक्षुओं के सिर में गोली मारकर.....&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारत चुप है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;संयुक्त राष्ट्र से लेकर चीन तक के बोलने के बावजूद भारत चुप है क्योंकि उसके मुताबिक़ यह बर्मा का आंतरिक मामला है, आंतरिक मामला इसलिए है क्योंकि बर्मा के पास प्राकृतिक गैस का प्रचुर भंडार है जिस पर अमरीका, फ्रांस के अलावा भारत की भी नज़र है. पड़ोसी है इसलिए पाइपलाइन आ सकती है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पाइपलाइन राष्ट्रहित में है. किसकी नैतिकता कब उसके अपने हित में हुई है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब से दुनिया ग्लोबलाइज़ हुई है, भारत सहित सबको समझ में आता है कि अमरीका ही रोल मॉडल है जिसने कंबोडिया, सऊदी अरब, चिली, इराक़ से लेकर बर्मा तक में तानाशाहियों को पाला-पोसा और भरपूर दुहा है. भारत भी उसी राह पर चल रहा है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नैतिकता की परीक्षा हमेशा लालच के परिप्रेक्ष्य में होती है, भिखारी के कटोरे से उछली चवन्नी वापस दे देना ईमानदारी नहीं है. ईमानदारी नोटों का बंडल लौटाने पर होती है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अमरीका की विदेश नीति के नैतिकता-निरपेक्ष होने पर भारत के लोगों ने वक़्तन-फवक़्तन शोर मचाया लेकिन अपने देश की विदेश नीति के बारे में उनका रवैया आम अमरीकी से कहाँ अलग है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्या यह भी याद दिलाना होगा कि नैतिकता एक उच्च मानवीय आदर्श है जिसकी वजह से दुनिया अब भी कुछ हद तक रहने लायक़ है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगर सिर्फ़ फ़ायदा ही देखना है तो 'अल क़ायदा' और 'अल फ़ायदा' में से कौन कम बुरा है, तय करना मुश्किल है.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6853758773001535028-2998179252728860114?l=anamdasblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://anamdasblog.blogspot.com/feeds/2998179252728860114/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6853758773001535028&amp;postID=2998179252728860114&amp;isPopup=true' title='14 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6853758773001535028/posts/default/2998179252728860114'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6853758773001535028/posts/default/2998179252728860114'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://anamdasblog.blogspot.com/2007/10/blog-post_06.html' title='भारत की नैतिकता गई तेल लेने'/><author><name>अनामदास</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06852915599562928728</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_fR7cWVj99s0/SKvHGScbUlI/AAAAAAAAAIY/dP4fvrpVCXk/S220/images.jpg'/></author><thr:total>14</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6853758773001535028.post-6722605712382775033</id><published>2007-10-01T03:02:00.001+01:00</published><updated>2007-10-01T03:02:36.796+01:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अनामदास का हिंदी चिट्ठा'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='anamdas ka chitta'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='hindi blog'/><title type='text'>कृषि प्रधान देश की सेवा प्रधान संस्कृति</title><content type='html'>मैं एक क़स्बाई आदमी हूँ. मेरे शहरी दोस्तों को मुझसे देहाती बू आती है, वे बू के साथ 'बद' उपसर्ग नहीं लगाते मगर 'खुश' भी नहीं. देहाती सहकर्मी भी पूरी तरह नहीं अपनाते क्योंकि उन्हें मुझसे शहरी बू आती है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं शहरियों की बुनावट में छिपी बनावट देखता हूँ, देहातियों की सादगी से उपजी नाकामी की कुंठाएँ भी. मैं कहीं फिट नहीं होता, मगर इसका कोई मलाल नहीं है क्योंकि 'ऑब्ज़र्वर स्टेटस' का मज़ा ही कुछ और है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारत के जो भी रस-रूप-गंध-सुर-स्वाद मैंने जाने हैं (बॉलीवुड को छोड़कर) उनकी जड़ें हमारे खेतों में हैं. 'भारत एक कृषि प्रधान देश है,' इस बेहद घिसे हुए वाक्य में नई किताब के अनुसार व्याकरण की एक गंभीर भूल है. 'भारत एक कृषि प्रधान देश था,' या ज्यादा सही वाक्य है--'भारत एक सेवा प्रधान देश है.'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सर्विस सेक्टर के उभार के दौर में जब खेत श्मशान बन रहे हैं तो उनसे उपजी संस्कृति की गत क्या होगी? मैं पूरी निर्ममता के साथ विकासवादियों की बात मान सकता हूँ कि भारत में तेज़ी से विकास हुआ और वह इंडिया बन गया है, मॉल-मल्टीप्लेक्स हैं, फ्लाइओवर हैं, होम डिलिवरी सर्विस है, पित्ज़ा हट है, क्या नहीं है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;डोरहारे नहीं हैं, डफाली नहीं हैं, बहरुपिए नहीं हैं, नट नहीं, मदारी नहीं हैं, चाकू पर सान देने वाले नहीं हैं, सिल पर छेनी से रेखाएँ खींचने वाले नहीं हैं, कलई करने वाले नहीं हैं... जाने दीजिए, इन गंदे-मंदे लोगों के लिए ज्यादा भावुक होने की ज़रूरत नहीं है. टीवी पर एंकर हैं, कॉरपोरेट सेक्टर में एमबीए हैं, बोर्डरूम में सीईओ हैं, मैनेजिंग बोर्ड में स्ट्रेटिजिस्ट हैं, सरकार के पास टेक्नोक्रैट्स हैं...ये पहले तो नहीं थे. संस्कृति कोई ठहरा हुआ तालाब नहीं है, वह तो बहता हुआ दरिया है, परिवर्तन ही स्थायी है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरी आँखों को सामने असंख्य अवसान हुए लेकिन श्राद्ध-तर्पण-तेरहवीं नहीं. जितने नए पैदा हुए उनकी छट्ठी और सोहर के गीत तो बहुत गाए गए लेकिन जो गुज़र गए उनके नाम पर आँसू बहाने का मतलब है विकासविरोधी होने का बिल्ला पहनना. जो कृषि प्रधान समाज में फ़सल कटने के मौसम में दराँती पर सान देते थे, जो होली-दीवाली पर नाप लेकर कपड़े सिलते थे, जो मकर-संक्राति पर तिलकुट बनाते थे, जो हर मेले में सिंदूर-टिकुली बेचते थे वो अब कहाँ हैं, क्या करते हैं? यह सांस्कृतिक सवाल से ज़्यादा एक मानवीय प्रश्न है. लाखों लाख लोग गुमशुदा हैं, जब आप गाज़ियाबाद में रिक्शे पर बैठें तो इन लोगों के बारे में पूछिएगा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिन लोगों ने भारत की संस्कृति बनाई, बचाई और चलाई वे कभी मध्यवर्गीय शहरी लोग नहीं रहे. बुनकर मुसलमान थे, चर्मकार दलित, काष्ठकार, ठठेरे, लुहार और ज्यादातर शिल्पकार पिछड़े. गीत-संगीत को चलाए रखने में हरिप्रसाद चौरसिया, बिसमिल्लाह ख़ान से लेकर तीजन बाई, लोकसंगीत में बलेसर यादव जैसों का हाथ ज्यादा रहा, नाम के आगे लगे पंडित या उस्ताद पर मत जाइएगा. गली-गली में रामलीला कौन करता है, होलिका दहन के लिए लकड़ियाँ कौन जुटाता है? ज़रा ग़ौर से देखेंगे तो पता चलेगा कि शहरी मध्य वर्ग हमेशा से एक ही संस्कृति जीता रहा है, उच्च वर्ग में दाख़िल होने की योग्यता हासिल करने का रिहर्सल.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बस बात इतनी है कि देहाती, ग़रीब, अँगरेज़ी शिक्षा से वंचित व्यक्ति इस बुरी तरह से तिरस्कृत-बहिष्कृत,दीन-हीन-मलिन पहले शायद कभी नहीं रहा इसलिए जो उसकी संस्कृति है वह किस तरह बचेगी, क्योंकि सवाल यही है कि उसका तबक़ा किस तरह बचेगा?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'ज़माना बहुत बदल गया है,' यह हर ज़माने का सबसे प्रिय डॉयलॉग रहा है. मगर जाते हुए ज़माने की विदाई इतनी बेरुख़ी से पहले कभी नहीं हुई. किसी ने भर्राए गले से इतना तो कहा होता--जाओ शिकंजी-लस्सी-आमरस तुमने बहुत साथ दिया फ़िलहाल पेप्सी पीने दो, या जाओ मोचीराम तुमने बहुत जूते गाँठें लेकिन अब रीबॉक-एडिडैस-नाइके ही जमते है या जाओ टेलर मास्टर अब तो हम पीटर इंग्लैंड पहनते हैं...इंडिया के इस विकास में कितने लोगों को फोन सुनने का काम मिला और कितनों की आख़िरी पुकार अनसुनी रह गई, यह एक गंभीर बहस का मुद्दा है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दस-पंद्रह वर्षों में मेलों का देश मॉलों का देश, कारीगरों का देश एसईज़ेड का देश, किसानों का देश कॉलसेंटर का देश बन गया. इस पूरे प्रक्रिया का जो हिस्सा नहीं है, वह कहीं नहीं है. इस प्रक्रिया ने एक झटके में महानगरों की विकासोन्मुख परिधि से बाहर जो कुछ भी है सबको निंदनीय, शर्मनाक और डाउनमार्केट बना दिया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;डाउनमार्केट समाज के खान-पान, तीज-त्योहार, बोली-बचन, गीत-संगीत, रीति-रिवाज़ सब ऐसे हो गए कि उससे किसी तरह का रिश्ता रखना अपमानजनक-सा हो गया है. किसान से किसी तरह का संबंध ग्लोबल हाइट्स से गिराकर कीचड़ में लथेड़ देता है. किसान को व्यवस्थित तरीक़े से मिटाया जा रहा है. खाद और ट्रैक्टर के विज्ञापन के अलावा आपने टीवी पर आख़िरी बार किसान कब देखा है? अगर देखा होगा तो प्रधानमंत्री के दौरे की वजह से विदर्भ का किसान देखा होगा जिसका भाई आत्महत्या कर चुका है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;संस्कृति, वह भी भारतीय संस्कृति के बारे में कुछ भी दावे से कहने की हिम्मत मुझमें नहीं है. मगर इतना तो तर्जुबे से समझ में आता है कि जो हेय, तिरस्कृत, पिछड़ा हो वह 'कल्चर्ड' नहीं होता, उसकी कोई संस्कृति होती होगी लेकिन वह अपनाने लायक़ नहीं होती, सीखने-समझने-सराहने लायक़ नहीं होती. अगर ऐसा नहीं होता तो लोगों को सोमालियाई, भूटानी, लात्वियाई या चिलियन संस्कृति के बारे में कुछ पता होता. संस्कृति सिर्फ़ सफलता की होती है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;देश 'सफलता की राह' पर है इसलिए इंडियन कल्चर पहले से कहीं ज्यादा वाइब्रेंट है क्योंकि वह उन तीस करोड़ लोगों का कल्चर है जो फादर्स डे, मदर्स डे, वेलेन्टाइंस डे, फ्रेंडशिप डे, परंपरागत हर्षोल्लास के साथ मनाते हैं. हैप्पी होली, हैप्पी दीपावली, हैप्पी दशहरा, हैप्पी राखी के एसएमएस और कार्ड भेजते हैं. अगर अगले कुछ वर्षों में भारत में हैलोवीन और थैंक्सगिविंग डे नहीं मनाए गए तो मुझे आश्चर्य अधिक होगा और थोड़ी खुशी भी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;संस्कृति के बारे में कोई वैल्यू जजमेंट कभी नहीं हो सकता, ऐसा नहीं है कि जो कुछ देहाती है वह सब अदभुत और अनुकरणीय है और जो महानगरीय है वह निकृष्ट है. मिलने से पहले फ़ोन करके सुविधा पूछ लेना, सॉरी-थैंक यू, एक्सयूज़ मी बोलना, मुँह खोलकर डकार न लेना, जम्हाई लेते समय मुँह पर हाथ रखना, नाक में ऊंगली न घुसेड़ना, इधर-उधर न खुजाना...ये तो अच्छी बाते हैं. मुद्दे की बात सिर्फ़ इतनी है कि क्या ग्रामीण-खेतिहर परिवेश से आने वाले व्यक्ति को तमाम गुणों के बावजूद वह सम्मान मिलेगा जो उससे कम योग्य-कुशल-ज्ञानी-सक्षम शहरी व्यक्ति को मिलता है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमारे समाज में जातिवाद, रुढ़िवादिता, अंधविश्वास कुछ ऐसी चीज़ें हैं जो आधुनिक मानवीय मूल्यों के ख़िलाफ़ हैं और हर तरह से निंदनीय हैं. मगर और भी बहुत है जो इस देश को भारत बनाता है, सबसे जुदा, सबसे ख़ास. हमारी दार्शनिक अदा (भोग के दर्शन के अलावा भी), हमारी श्रृंगारिक रुमानियत (बॉलीवुड के परे भी), आत्मा को छूने वाली वास्तु-मूर्ति-चित्र कला, हृदय को झंकृत करने वाला संगीत, नदियों-पेड़ों-जानवरों को पूजनीय बना लेने वाली हमारी सबके प्रति कृतज्ञता, काटने वाली चींटियों को भी आटा खिलाने वाली सह-अस्तित्व की संस्कृति. यह सब पूरी तरह से ख़तरे में है क्योंकि ये ग्लोबल कल्चर में कहीं फिट नहीं होता.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिट तो वही होगा जो मशीन के नाप का हो. फैक्ट्री और एसेंबलीलाइन वाले सिस्टम में अलग होना किसी काम नहीं, बहुत बड़ी मुसीबत है. मैकडॉनल्डस पित्ज़ा हट और बर्गर किंग को शेफ की ज़रूरत नहीं होती क्योंकि हर बर्गर एक ही स्पेसिफ़िकेशन का होता है, किसी दिन ज़रा करारा बर्गर माँगकर देखिए.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बहरहाल, मैं कोई अलबेला आदमी नहीं हूँ, रेडीमेड कपड़े पहनता हूँ, कोक-पेप्सी पीता हूँ, देहाती लोग कहीं टकरा जाएँ तो इज़्ज़त से पेश आता हूँ लेकिन गाँव-देहात से कोई सीधा सरोकार नहीं है. मगर मन में एक टीस है, दर्द है, बेचैनी है, भारत के 60 करोड़ से ज्यादा लोगों के बारे में सोचकर दिल दुखता है. उनके बारे में टीवी से नहीं, पत्रिकाओं से नहीं, अख़बारों से नहीं बल्कि उन लोगों से पता चलता है जो नई सेवा प्रधान वर्ण व्यवस्था के शूद्र हैं. ड्राइवर, अपार्टमेंट के सिक्युरिटी गार्ड, सुबह-सुबह बालकनी में अख़बार फेंकने वाले...वे बताते हैं कि गाँव में क्या हो रहा है, वे बताते हैं कि तीन भाई झुग्गी में रहते हैं, माँ-बाप सूखे खेत अगोरते हैं. आपको हो न हो, मुझे तो दुख होता है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लोगों के मन में कल-कल बहती विकास की इस धारा के प्रति अपार श्रद्धा है लेकिन वह जिन तटबंधों को तोड़ आई है, जिन लोगों को बहा ले गई है उनके प्रति कोई संवेदना नहीं है. यह मेरे दुख को दोहरा कर देता है, ग्लोबलाइज़ेशन के हर सुंदर फल का आस्वादन मैं करता हूँ लेकिन वह मुझे आह्लाद के बदले अवसाद से भर देता है. क्या ये मेरी व्यक्तिगत समस्या है?&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6853758773001535028-6722605712382775033?l=anamdasblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://anamdasblog.blogspot.com/feeds/6722605712382775033/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6853758773001535028&amp;postID=6722605712382775033&amp;isPopup=true' title='11 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6853758773001535028/posts/default/6722605712382775033'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6853758773001535028/posts/default/6722605712382775033'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://anamdasblog.blogspot.com/2007/10/blog-post.html' title='कृषि प्रधान देश की सेवा प्रधान संस्कृति'/><author><name>अनामदास</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06852915599562928728</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_fR7cWVj99s0/SKvHGScbUlI/AAAAAAAAAIY/dP4fvrpVCXk/S220/images.jpg'/></author><thr:total>11</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6853758773001535028.post-5380398509605365591</id><published>2007-09-09T01:48:00.001+01:00</published><updated>2007-09-09T01:48:56.842+01:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अनामदास का चिट्ठा'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='blogger'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='blog'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='hindi'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='ब्लॉग'/><category 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पर छिपाकर प्यारा-सा गिफ़्ट देते हैं, कोई बाइक, कोई सूटकेस, कोई चॉकलेट या मारूति की चाभी...ओह ब्यूटीफुल इंडियन कल्चर...कितने विभोर हो जाते हैं हम लोग अपना कल्चर देखकर और प्यार जताने के लिए दुकान की ओर भागते हैं--'ए गिफ़्ट फॉर समवन यू लव'.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पिछली सदी में भारत का एक और स्नैपशॉट यूरोपियों-अमरीकियों ने बनाया था. जादूगरों, हठयोगियों, साँप-भालू-बंदर नचाने वालों का देश. अंधविश्वासी-अशिक्षित लोगों का देश, कौतूहल जगाने वाला देश. सारे स्नैपशॉट, टैगलाइन, पंचलाइन बेचने के लिए बनाए जाते हैं. इंडिया का नया पंचलाइन पिछले दस वर्षों से लिखा जा रहा है, 'फास्टेस्ट ग्रोइंग इकॉनॉमी', 'राइजिंग पावर', 'सुपरपावर इन मेकिंग'..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारत का स्नैपशॉट तो वही है, इंडिया वाले से ताज़ा पेंट की बू आ रही है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारत अब भी गुड़ी पड़वा, घोंघा नवमी, गंगा दशहरा, मकर संक्राति और बैसाखी मनाने वालों का देश है, शादियाँ कुंडलियाँ मिलाकर होती हैं, खरमास में कोई शुभ काम नहीं होता, कुएँ पूजे जाते हैं, तुलसी-बरगद-आँवला की पूजा होती है. गाय लक्ष्मी है, कुत्ता भैरव है, लंगूर हनुमान है, हाथी गणेश हैं, साँप शेषनाग हैं...एक बहुत ही असभ्य क़िस्म का सहअस्तित्व है. आपने लंदन या न्यूयॉर्क की सड़क पर गाय देखी है, कभी पेरिस में बंदर ने आपका बर्गर छीना है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारत आस्था का, कृतज्ञता का, सहज विश्वास का देश है जहाँ पानी देने वाली नदी माता है, जहाँ रोग हरने वाली तुलसी पूजनीय है, वहीं गणेश जी दूध पीते हैं, समंदर का पानी मीठा हो जाता है और ज़िंदा मछली निगलने से दमा ठीक होता है...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इंडिया में ग्रोथ, प्रॉस्पेरिटी, स्टाइल और सबसे बढ़कर आर्थिक सत्ता पूजनीय है. इंडिया का क्लचर वहाँ से आता है जहाँ से उसकी प्रेरणा नहीं, बल्कि एस्पीरेशन आता है. बेस्वाद कॉन्टीनेंटल खाना हेल्थी है, बाक़ी सारे उच्चारण ग़लत हों लेकिन शेड्यूल नहीं एस्केड्यूल होता है...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक ओर मंदिरों-मठों-मज़ारों-आश्रमों का देश है और कॉल सेंटर-बीपीओ-प्रॉसेंगिंग यूनिट-ब्लॉटलिंग प्लांट की कंट्री है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नो फुल स्टॉप्स इन इंडिया, कंट्री ऑफ़ आयरनीज़, ए मिलियन गॉड्स एंड पैराडॉक्स...अनेकता में एकता, रंगीन गुलदस्ता वगैरह. एक अरब की आबादी, पाँच हज़ार वर्ष पुरानी सभ्यता, ऐसे में कोई निष्कर्ष निकाल कर मुझे अपना गला नहीं फँसाना. मगर मामला सिर्फ़ धर्म, अंधविश्वास, विकास या पच्छिम-परस्ती का नहीं है, घालमेल बहुत गहरा है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गाँव में ज़मींदारी चलाने वाले दादाजी के दुलारे, अमरीका में पढ़े, सात्विक लेकिन मद्यपायी, विदेशी पत्नी के स्वामी, बच्चों को हिंदी सिखाने में नाकाम लेकिन हर महीने सत्यनारायण कथा कराने वाले लाखों लोग हैं, मल्टीनेशनल कंपनी के दफ़्तर के लिए जाते समय जयगणेश-राधास्वामी-नमो भगवते वासुदेवाय से लेकर झक्कड़ बाबा की जय तक बोलने वाले करोड़ों हैं, बिल्ली रास्ता काटे तो रूक जाते हैं, मंगलवार को हनुमान मंदिर जाते हैं और मन ललचाने पर चिकेन नहीं खाते, शुक्रवार-शनिवार (वीकेंड) को दिन-दिन में संतोषी माता और शनि मंदिर, रात को पब और डिस्को.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह घालमेल मामूली नहीं है बल्कि हम सबकी ज़िंदगी ही सांस्कृतिक दृष्टि से एक विचित्र पहेली है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारत और इंडिया के बीच में अब भी ख़ासा इंटरेक्शन है लेकिन दोनों अलग-अलग ही हैं. भारत की संस्कृति भारत के लोगों के हाथों में हैं. न्यू इंडियावाले हर शुक्रवार को संतोषी माता को भी आर्चीज़ का कार्ड पोस्ट करने से बाज़ नहीं आएँगे और भारत वाले भी बिल क्लिंटन और बिल गेट्स को टीका लगाकर मंगलाचरण गाते रहेंगे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कल्चर या संस्कृति का मतलब समझाना बड़े-बड़े विद्वानों के बूते के बात नहीं है, लेकिन समाजशास्त्रीय और अकादमिक दृष्टि से थोड़ा ग़लत होने की छूट दी जाए तो सारा सवाल जीवनशैली का है. भारत और इंडिया की जीवनशैली इसलिए अलग है क्योंकि दोनों के जीने का आधार अलग है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उत्तम खेती, मध्यम बान, अधम चाकरी... का जाप करने वाले जानते हैं कि खेती कितनी उत्तम है,चाकरी के मौज क्या हैं. खेतिहरों की दूसरी-तीसरी पीढ़ी ऐसे बात करती है मानो उनके पुरखे जरायमपेशा हों. तीन-चार पीढ़ी से शहरी रहे लोग भारतीय देश की आबादी में दो-चार फ़ीसदी भी नहीं हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जितनी ते़ज़ी से अपना देश पिछले दस वर्षों में बदला है उतनी तेज़ी से बदलाव के दशक शायद पहले कभी इक्का-दुक्का ही आए होंगे. इस बदलाव ने शहरी मध्यवर्ग को बहुत काफ़ी कुछ मुहैया कराया है लेकिन उसकी क़ीमत भी हमने चुकाई है. अच्छे-बुरे का वैल्यू जजमेंट करने के बदले इरादा यही है कि बदलते भारत की संस्कृति और राइजिंग इंडिया के कल्चर पर एक गहरी नज़र डाली जाए, आप सबकी मदद से.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह एक प्रस्तावना है, भारत की संस्कृति के ध्वजवाहकों पर अगली बार.इंडियावालों पर उसके बाद...और फिर क़स्बे वालों की बात भी...आप साथ बने रहिए तो सफ़र का मज़ा आएगा.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6853758773001535028-5380398509605365591?l=anamdasblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://anamdasblog.blogspot.com/feeds/5380398509605365591/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6853758773001535028&amp;postID=5380398509605365591&amp;isPopup=true' title='19 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6853758773001535028/posts/default/5380398509605365591'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6853758773001535028/posts/default/5380398509605365591'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://anamdasblog.blogspot.com/2007/09/blog-post_09.html' title='संस्कृति यानी कल्चर, कल्चर यानी संस्कृति?'/><author><name>अनामदास</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06852915599562928728</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_fR7cWVj99s0/SKvHGScbUlI/AAAAAAAAAIY/dP4fvrpVCXk/S220/images.jpg'/></author><thr:total>19</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6853758773001535028.post-974287412833544966</id><published>2007-08-30T22:11:00.001+01:00</published><updated>2007-08-30T22:11:47.915+01:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अनामदास का चिट्ठा'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='blogger'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='blog'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='hindi'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='ब्लॉग'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='anamdas ka chitta'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='हिंदी'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='ब्लाग'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='हिन्दी'/><title type='text'>मन रे तू काहे न धीर धरे</title><content type='html'>असमंजस, उधेड़बुन, किंकर्तव्यविमूढ़ता, उलझन, सशोपंज, कश्मकश, अंतर्द्वंद्व, डाइलेमा....कितने सारे शब्द हैं एक मनोभाव को प्रकट करने के लिए. शायद इसीलिए कि हम सब अक्सर जीवन के दोराहे, तिराहे या चौराहे पर खड़े सोचते हैं किधर जाएँ.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ये दोराहा, तिराहा और चौराहा भविष्य और वर्तमान का हो सकता है, अतीत का भी. यूँ हो तो क्या हो, यूँ हो रहा है तो क्यों हो रहा है, यूँ हुआ होता क्या होता.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मन का द्वंद्व है जो इस संसार का सारा साहित्य रचता है, यही द्वंद्व है जो हमें पतन और उत्कर्ष के अंनत में जाने से रोकता है, इस संसार के संतुलन में बनाए रखता है. अगर अर्जुन के मन में कोई द्वंद्व नहीं होता तो गीता क्योंकर होती?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मन में सवाल उठते हैं तो द्वंद्व होता है, मन में संवेदना होती है तो द्वंद्व होता है, मन में भावनाएँ होती हैं तो द्वंद्व होता है, हमारी सीमाएँ हैं इसलिए द्वंद्व हैं, समाज-नियम, रीति-रिवाज़, आशा-अपेक्षा है इसलिए द्वंद्व हैं, ज़रूरत-फ़ितरत, अपने-सपने हैं इसलिए द्वंद्व हैं. एक होता है तो दूसरा नहीं हो सकता इसलिए द्वंद्व है, दोनों हो तों भी द्वंद्व है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;द्वंद्व एक अदभुत मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया है, जो हमें पागल होने से बचा लेती है और बहुत बढ़ जाए तो पागल बना देती है. द्वंद्व एक अदभुत खगोलीय प्रक्रिया है जो अपने अपने-अपने दायरे घूमते लोगों की धुरी तय करती है, तरह-तरह के खिंचाव का काउंटर बैलेंस.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;द्वंद्व अच्छी चीज़ है या बुरी इसको लेकर मेरे मन में कोई द्वंद्व नहीं है. द्वंद्व अच्छा-बुरा नहीं होता वह हमारे सॉफ़्टवेयर का हिस्सा है. वही हमें बनाता है जो हम होते हैं, कुछ लोग निर्द्वंद्व होते हैं. उन्हें पता होता है कि वो जो कर रहे हैं सब सही कर रहे हैं, जो वो नहीं कर रहे हैं सब ग़लत है. द्वंद्व दुख देता है, लेकिन क्या आपने कोई संवेदनशील व्यक्ति देखा है जो निर्द्वंद्व हो? अगर आप जानते हों तो ज़रूर बताइगा.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6853758773001535028-974287412833544966?l=anamdasblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://anamdasblog.blogspot.com/feeds/974287412833544966/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6853758773001535028&amp;postID=974287412833544966&amp;isPopup=true' title='15 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6853758773001535028/posts/default/974287412833544966'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6853758773001535028/posts/default/974287412833544966'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://anamdasblog.blogspot.com/2007/08/blog-post_30.html' title='मन रे तू काहे न धीर धरे'/><author><name>अनामदास</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06852915599562928728</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_fR7cWVj99s0/SKvHGScbUlI/AAAAAAAAAIY/dP4fvrpVCXk/S220/images.jpg'/></author><thr:total>15</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6853758773001535028.post-4275150775197283009</id><published>2007-08-27T21:40:00.000+01:00</published><updated>2007-08-27T21:40:55.098+01:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अनामदास का चिट्ठा'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='blogger'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='blog'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='anamdas'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='hindi'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='ब्लॉग'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='anamdas ka chitta'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='हिंदी'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='ब्लाग'/><title type='text'>जादू का खिलौना है, मिल जाए तो भी सोना है</title><content type='html'>कई दिनों से रैटल मेरे दिमाग़ में बज रहा है. वैसे तो वह झुनझुना है जिससे खेलना तीन साल के बच्चे को ख़ास शोभा नहीं देता लेकिन मेरे बेटे ने उसे अपने वजूद से जोड़ लिया है जैसे चर्चिल की सिगार, शरलक होम्स का पाइप, करुणानिधि का काला चश्मा, गाँधी जी की छड़ी या प्रभु के हाथों में घूमता सुदर्शन चक्र.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हरी वाली गेंद टॉम है, नारंगी वाली जेरी, दोनों गोल गोल घूमकर तेज़ी से एक दूसरे का पीछा करते हैं. यही कभी चश्मा है, कभी पिस्तौल और कभी मोबाइल फ़ोन. कभी गाना गाते समय यही माइक बन जाता है और कभी कुछ और.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शायद यही मोह की शुरूआत है, यह बहुत चकित और मोहित करने वाला मोह है. टीवी देखने वाले, नर्सरी जाने वाले, बीसियों कार्टून कैरेक्टरों को अपना दोस्त समझने वाले इस बच्चे को इस रैटल से क्या मिलता है? सारे चीनी-जापानी बैटरी वाले खिलौनों, सारे नरम-मुलायम टेडी-डॉगी को छोड़कर उसे रैटल जैसे खट-खट करने वाले प्लास्टिक इस खिलौने से प्यार हो गया है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सोते समय, खाते समय, रेल में, बस में, बिस्तर पर, यहाँ तक कि नहाते समय और पॉटी में भी रैटल उसके हाथ में रहता है, साधु के चिमटे की तरह. उसका पास होना एक बहुत बड़ा आश्वासन है मानो वह भयानक युद्ध में अचूक अस्त्र हो या विदेश यात्रा में पासपोर्ट. वह उसे आँख से ओझल नहीं होने देता.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दो दिन पहले की बात है, कमोड पर बैठे सुपुत्र के हाथ से छूटकर रैटल सीधा अंदर गिरा जहाँ पहले से छिःछिः तैर रही थी. बहुत डाँट पड़ी, फिर मैंने निर्णय सुनाया कि फ्लश चला दिया जाएगा, रैटल का अंत हो चुका है. वह इस तरह शायद ही कभी रोता है, रोने में शोर मचाना ज़्यादा होता है, लेकिन इस बार उसकी आँखें भरीं थीं और होंठ नीचे लटक गए थे. नैपी बदलते-बदलते प्रैक्टिस तो हो गई है लेकिन कमोड में हाथ डालकर रैटल निकालना फिर भी बड़ी चुनौती थी. आख़िरकार मैंने चुनौती स्वीकार की और रैटल का भरपूर शुद्धिकरण करके उसे उसके मालिक के हवाले किया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सोकर उठने के बाद पहला सवाल होता है, "ह्वेयर इज़ माइ रैटल?" रैटल की रट तब तक जारी रहती है जब तक प्लास्टिक की दो गेंदों वाली टिकटिकी उसे वापस न मिल जाए. रैटल के बरामद होने में जितनी देरी होती है वैसे-वैसे उसका सुर बदलता है, पहले उसे खोज देने का अनुरोध, फिर झल्लाहट, फिर विवशता, फिर गहरी बेचैनी और आख़िर में रुआँसापन. रैटल मिल जाने पर उसे जैसी खुशी होती है वैसी ख़ुशी अपनी याद्दाश्त में मुझे कभी नहीं हुई. क्या आगे कभी होगी?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;घर-गृहस्थी की कई वाजिब चिंताओं पर इस समय रैटल की चिंता भारी है. है तो खिलौना, टूट जाएगा, गुम जाएगा, उसके बाद क्या होगा? यह कोई मामूली चिंता नहीं है. यह रैटल उसे किसी जन्मदिन की पार्टी में तोहफ़े के तौर पर मिला था. हम चाहते हैं कि घर की डुप्लीकेट चाभी तरह एक ऐसा ही रैटल ख़रीदकर रख लें वर्ना अनहोनी हो गई तो बच्चे का दुख भी हमसे देखा नहीं जाएगा. हम किस-किस दुख से उसे बचाने के लिए कब तक ऐसे बैकअप तैयार करेंगे?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कई बार उसने बहुत ग़लत वक़्त पर 'रैटल खोज अभियान' शुरू करने की माँग की है, लेकिन हर बार मैंने उसकी माँग पूरी की है चाहे दफ़्तर के लिए देरी हो रही हो या खाना ठंडा हो रहा हो...क्योंकि रैटल उसके लिए सिर्फ़ एक खिलौना नहीं है, वह अपने रैटल को उतना महत्व ज़रूर देता है जितना मैं अपने दफ़्तर की किसी फ़ाइल को. उसे संभालकर रखता है, उसे किसी को हाथ नहीं लगाने देता और उसे सीने से लगाकर सोता है, इससे ज्यादा प्यार कोई और क्या कर सकता है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;निदा फ़ाज़ली बहुत गहरा शेर है--"दुनिया जिसे कहते हैं, जादू का खिलौना है, मिल जाए तो मिट्टी है, खो जाए तो सोना है". मगर इस गहराई से भी गहरा है बचपन का फ़लसफ़ा जहाँ मिट्टी के खिलौने मिल जाने के बाद भी सोने से ज़्यादा क़ीमती होते हैं. जैसे ही हम उसे सोने का मतलब समझा देंगे यह जादू ख़त्म हो जाएगा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुझे अपने बचपन की एक धुंधली-सी याद है जब मैं चार-पाँच साल का रहा होऊँगा, गहरे हरे रंग की प्लास्टिक की चकई (यो-यो) हमारे हाथ आई जिसे धागे से बांधकर ऊपर-नीचे चलाया जाता था, मैं किसी ऊँची जगह पर खड़े होकर उसे नचाता था क्योंकि उसका धागा लंबा था. एक बार उसका धागा बुरी तरह उलझ गया, तब वही मेरे जीवन की सबसे बड़ी उलझन थी. अम्मा ने कहा- "पापा को आने दो", पापा बहुत देर से आए उस दिन. आते ही हमने अपनी माँग रखी, उन्होंने कहा- "चलो सो जाओ, कल सुबह ठीक कर देंगे." सूरज के उगने का, मुर्गे के बोलने का, कुएँ पर बाल्टी के खनकने का, पापा के अलार्म के बजने का इंतज़ार करता रहा, ऐसा इंतज़ार कि पूरी रात आँखों में काट दी. उतनी बेसब्री से सुबह का आसरा कभी नहीं देखा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कई बार रैटल की रट पर झल्ला जाता हूँ लेकिन जल्दी ही अपनी चकई याद आ जाती है, उसके उलझे धागे याद आते हैं तो मौजूदा उलझनों को कुछ देर के लिए भूल जाता हूँ.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6853758773001535028-4275150775197283009?l=anamdasblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://anamdasblog.blogspot.com/feeds/4275150775197283009/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6853758773001535028&amp;postID=4275150775197283009&amp;isPopup=true' title='16 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6853758773001535028/posts/default/4275150775197283009'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6853758773001535028/posts/default/4275150775197283009'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://anamdasblog.blogspot.com/2007/08/blog-post_4388.html' title='जादू का खिलौना है, मिल जाए तो भी सोना है'/><author><name>अनामदास</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06852915599562928728</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_fR7cWVj99s0/SKvHGScbUlI/AAAAAAAAAIY/dP4fvrpVCXk/S220/images.jpg'/></author><thr:total>16</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6853758773001535028.post-6792206642178085751</id><published>2007-08-17T01:51:00.001+01:00</published><updated>2007-08-17T01:51:04.287+01:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अनामदास का चिट्ठा'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='blog'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='hindi'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='ब्लॉग'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='anamdas ka chitta'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='हिंदी'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='ब्लाग'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='हिन्दी'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='ब्लौग'/><title type='text'>होनहार विरवान के होत चिकने पात</title><content type='html'>स्थानः षष्ठ 'घ' की कक्षा&lt;br /&gt;वर्षः 1980&lt;br /&gt;समयः प्रात: 9.30&lt;br /&gt;अवसरः नामांकन के बाद पहला दिन&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गुरू-शिष्य संवाद&lt;br /&gt;---------------&lt;br /&gt;सरः नाम बोले रे सब अपना-अपना&lt;br /&gt;छात्र एकः अकट राय&lt;br /&gt;सरः पिताजी का नाम?&lt;br /&gt;छात्रः सुराज राय&lt;br /&gt;सरः तुम रे? (दूसरे से)&lt;br /&gt;दूसरा छात्रः विकट राय&lt;br /&gt;सरः बाप का नाम?&lt;br /&gt;दूसरा छात्र- रामराज राय&lt;br /&gt;सर--वाह-वाह, अकट-विकट, सुराज-रामराज, ऐं, भाई है का?&lt;br /&gt;पहला छात्र- हाँ सर जी, चचेरा भाई है&lt;br /&gt;सर--पिताजी का करते हैं&lt;br /&gt;पहला छात्र--दुहते हैं&lt;br /&gt;सर--(दूसरे वाले से) और तुम्हारे?&lt;br /&gt;दूसरा छात्र- जी, चराते हैं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;" अउर पानी कउन मिलाता है....हैं हैं हैं हैं... क्लास खुलते ही अहीर से पाला पड़ा... हा हा हा, " क्लास-टीचर चौबे सर तोंद छलका-छलका कर हँसे, उनके साथ हम भी हँसे. सिर्फ़ वो दो लड़के नहीं हँसे जो छठी क्लास में पहली बार अपने ख़ानदान का प्रतिनिधित्व कर रहे थे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमारा राजकीय उच्च माध्यमिक बालक विद्यालय विविधताओं से भरा था, सिर्फ़ दुहने-चराने वाले ही नहीं, सवर्ण सरकारी बाबुओं से लेकर इज़्ज़तदार विधवाओं तक के बच्चे वहाँ पढ़ते थे. हमारा स्कूल भविष्य के भारत की सच्ची झाँकी प्रस्तुत करता था. इंडिया उस वक़्त भी था लेकिन उसके अस्तित्व का कोई ठोस आभास हमें नहीं था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सेंट नाम वाले पास के स्कूलों में भी बच्चे पढ़ते थे जिनके लिए उनके माँ-बाप मोटी फ़ीस भरते थे. हम ये नहीं जानते थे कि उन्हें क्या-क्या आता है लेकिन हम बहुत अच्छी तरह जानते थे कि उन्हें क्या-क्या नहीं आता. मसलन, मार-पीट करने, पेड़ पर चढ़ने, तालाब से मछलियाँ पकड़ने, कीचड़ में फुटबॉल खेलने, ट्रक से उतरती बोरियों में से मूंगफली और इमली निकालने, उल्लू बनाने, गालियाँ बकने और क्लास से भागकर फ़िल्म देखने में हमारी उनसे कोई होड़ नहीं थी, वे क़ाबिलेरहम थे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इन क़ाबिलेरहम बच्चों ने अपनी हीन भावना को छिपाने के लिए हमें बताया था कि उनके स्कूल में प्रार्थना नहीं, बल्कि प्रेयर होती है. आसमानी कमीज़ और नीले हाफ पैंट वाले मेरे आधे सहपाठी कभी प्रार्थना के समय पर स्कूल ही नहीं आए, जो आए उनमें से अनेक जन-गण-मन की धुन पर सिर्फ़ होंठ हिलाते थे मगर आवाज़ नहीं निकलती थी, ढेर सारे ऐसे भी थे जो जन-गण-मन की धुन पर 'जानेमन जानेमन '... गाते.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जानेमन गाने की वजह पड़ोस की हरियाली थी, आधे से ज़्यादा लड़के सावन के अंधे बने घूमते थे क्योंकि उन्हें बालिका विद्यालय की हरी-हरी पोशाक के सिवा कुछ नज़र नहीं आता. बालक विद्यालय के होनहार पूरे वक़्त रामानारायण कन्या पाठशाला के बारे में बातें करते. कुछ निर्द्वंद्व थे और कुछ के भीतर गहरे द्वंद्व थे, दो ही श्रेणियाँ थीं. कुछ की बहनें वहाँ पढ़ती थीं और कुछ की नहीं. वैसे स्कूल आने-जाने के लिए ज़्यादातर लड़के 'हरियाली वाला रास्ता' ही चुनते थे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमारा स्कूल सर्वधर्म समभाव के सिद्धांत के ठीक विपरीत था. अंदर आने का रास्ता एक ही था लेकिन वहाँ से निकलने के रास्ते अनेक थे. घर की तरफ़, बाज़ार की तरफ़, अप्सरा टॉकीज़ की तरफ़, कन्या पाठशाला की तरफ़.... हर ओर जाने के शॉर्टकट स्कूल की बाउंड्रीवाल में मौजूद थे जिनका भरपूर लाभ सभी उठाते थे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमारा अपने समाज में घुलना-मिलना और उससे जीवन जीने का ढंग सीखना हमारे कई शिक्षकों को नहीं भाता था. लंचब्रेक के बाद बड़ी तादाद में आसमानी कमीज़ और नीली हाफ़पैंटें अलग-अलग शॉर्टकटों से निकलकर शहर में तैरने लगती थीं. इसे रोकने की नाकाम कोशिश में हमारे कुछ विध्नसंतोषी शिक्षकों ने लंच के बाद भी हाज़िरी का प्रावधान शुरू किया, जो ग़ायब पाया गया उसे जुर्माने के तौर पर अठन्नी भरनी पड़ेगी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;डार्विन के सिद्धांत को सच साबित करते हुए लड़के हमेशा मास्टरों से एक क़दम आगे चलते. जिन्होंने नून शो की योजना बनाई होती वे सुबह की हाज़िरी के बाद ही क्लास रूम का रुख़ करते या वहाँ बैठकर भी चुप रहते. कई बार ऐसा होता कि क्लास में चालीस लड़के हैं और टीचर ने सिर्फ़ तीस नामों के आगे निशान लगाया, फिर गिनती की और झल्लाकर बोले, " यस सर बोलने में नानी मरती है?" लड़कों ने मन ही मन कहा, "अठन्नी लगती है."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दूसरा परिणाम ये हुआ कि लंच के बाद की हाज़िरी के समय कई लड़के बेहतरीन मिमिकरी आर्टिस्ट बन जाते और मास्साब निशान तीस नामों के आगे लगा देते. जब गिनती करते तो पता चलता कि दोस्ती का फ़र्ज़ निभाने लिए फ़र्ज़ी हाज़िरी यानी प्रॉक्सी हो रही है, आख़िर सबको अपनी अठन्नी बचानी थी. मगर कई बार किसी दोस्त की अठन्नी बचाने के लिए बेंत खानी पड़ती लेकिन वह लेन-देन का सौदा था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेन में सर का सोंटा तो देन में फिलिम की कहानी. "एक ग़रीब लड़का बना है जीतेंद्र और अमीर लड़की है रेखा"....टाइप कहानी सुनकर हमारे कई साथी बेंत की मार को सार्थक मान लेते. तीन सिनेमाघर स्कूल से सौ क़दम की दूरी पर थे, लंच के बाद भागकर फिलिम देखने का फ़ायदा ये था कि ठीक स्कूल की छुट्टी के समय बेचारा बच्चा थका-हारा घर पहुँच जाता.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;स्कूल से भागकर फिलिम देखने के अलावा कई ऐसे काम राजकीय बालक उच्च विद्यालय के बालकों ने किए हैं जिनसे पता चलता है कि वे अपने वक़्त से आगे चल रहे थे. इसकी बड़ी रेंज थी, नज़र बचाकर सिगरेट पीने, टेक्स्टबुक के बीच में फँसाकर पीली किताब पढ़ने से लेकर चक्कू-कट्टा लेकर आने तक. अपने गिजर-गुर्दे के हिसाब जितना बन पड़ा उतना मैंने किया, लेकिन मैं किसी मामले में ऐसा नहीं रहा कि कोई मुझ पर ग़ौर करे, न पढ़ने में और न ही इन एक्स्ट्रा करिकुलर कामों में.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हाँ गवाह ज़रूर रहा बहुत सारे दिलचस्प वाक़यों का, जिन्हें कलमबंद करने की सलाहियत उन्हें अंज़ाम देने वालों में नहीं रही इसलिए यह भार मेरे कंधों पर आ पड़ा. एक छोटी सी मिसाल, प्रिसिंपल सर के कमरे में बम का ज़ोरदार धमाका, मास्टरों की मीटिंग के दौरान.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वाक़या कुछ यूँ है कि बम विस्फोट के दो दिन पहले हमारे मार्गदर्शक अज्जू भइया की कारसेवा प्रिसिंपल सर ने अपने कर कमलों से की थी क्योंकि वे नौवीं की गणित की क्लास में ट्रांजिस्टर सुनकर क्रिकेट के स्कोर का हिसाब लगाते पकड़े गए थे. अज्जू भइया अपना खोया हुआ आत्मसम्मान और गौरव पाना चाहते थे और प्रेरणा शायद उन्हें भगत सिंह से मिली थी. लेकिन उन्होंने भगत सिंह की तरह बम फोड़ने के बाद आत्मसमर्पण करने की जगह स्क्रिप्ट में थोड़ा बदलाव किया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अज्जू भइया ने आत्मसमर्पण पहले किया. प्रिसिंपल सर के कमरे में बाअदब गए, क्लास में कमेंटरी सुनने के लिए माफ़ी माँगी. देवी सरस्वती की मूर्ति को झुककर प्रणाम किया, सर के पैर छुए और बाहर आ गए. कोई सात मिनट बाद प्रिसिंपल सर के ऊँची सीलिंग वाले विशाल कमरे में ज़ोरदार धमाका हुआ, ऐन उसी वक़्त जब वे बाकी टीचरों को समझा रहे थे कि उनकी कारसेवा की बदौलत एक बिगड़ैल लड़का सुधर गया. मैं गवाह हूँ कि अज्जू भइया 'सरस्वती वंदना' के बहाने जलती हुई अगरबत्ती के आख़िरी सिरे पर बाज़ार में उपलब्ध सबसे बड़ा 'आलू बम' रख आए थे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसा नहीं था कि हमारा स्कूल अज्जू भइया जैसे स्वाधीनता के सेनानियों का गढ़ था, दीपू भइया जैसे भी थे जो बोर्ड परीक्षा में स्टेट भर में थर्ड आए थे. हम आधा तीतर आधा बटेर होकर रह गए क्योंकि दोनों को हमने प्रेरणास्रोत बना लिया इसलिए कहीं के नहीं रहे, अनामदास बन गए.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अज्जू भइया की अब शादी हो गई है तीन बच्चे हैं. उनके रोबदाब का इतना सिला मिला कि कचहरी चौक पर उनकी चाय की दुकान है जिसका किराया नहीं देना पड़ता और दीपू भइया आईएएस बनना चाहते थे लेकिन एलायड सर्विस में रेलवे में हैं.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6853758773001535028-6792206642178085751?l=anamdasblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://anamdasblog.blogspot.com/feeds/6792206642178085751/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6853758773001535028&amp;postID=6792206642178085751&amp;isPopup=true' title='21 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6853758773001535028/posts/default/6792206642178085751'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6853758773001535028/posts/default/6792206642178085751'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://anamdasblog.blogspot.com/2007/08/blog-post_17.html' title='होनहार विरवान के होत चिकने पात'/><author><name>अनामदास</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06852915599562928728</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_fR7cWVj99s0/SKvHGScbUlI/AAAAAAAAAIY/dP4fvrpVCXk/S220/images.jpg'/></author><thr:total>21</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6853758773001535028.post-826476447667039156</id><published>2007-08-13T22:25:00.001+01:00</published><updated>2007-08-13T22:25:55.428+01:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अनामदास का चिट्ठा'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='blogger'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='blog'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='hindi'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='ब्लॉग'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='anamdas ka chitta'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='हिंदी'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='ब्लाग'/><title type='text'>बलिहारी गुरू आपकी, कोर्स कम्प्लीट दियो कराए</title><content type='html'>जब पढ़ाई की महत्ता समझ में आई उससे काफ़ी पहले गुरुओं का पढ़ाने से मोहभंग हो चुका था. वे उतनी ही रुचि से पढ़ाते थे जितनी रुचि से खादी ग्रामोद्योग भंडार का सेल्समैन कपड़े दिखाता है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वर्षों के अनुभव से हमारे सारे शिक्षक जान गए थे कि जिसे पढ़ना होगा अपने-आप पढ़ लेगा, जिसे नहीं पढ़ना है वह कितना भी पढ़ाने पर नहीं पढ़ेगा. विद्यार्थियों के माँ-बाप और शिक्षकों में वैचारिक समानता थी--पढ़ना होगा तो हर हाल में पढ़ लेगा. बलभद्र पांडे सर मानो सबकी भावनाओं को स्वर देते थे--पढ़त सो भी मरतन, ना पढ़तन सो भी मरतन, तो दाँत खटाखट काहे को करतन...यह उनका व्यंग्य था शायद लेकिन सब कुछ इतना बड़ा व्यंग्य था कि यही सबसे बड़ा सच लगता था. छठी क्लास से वैराग्य का पाठ जीवन में आगे बड़ा काम आया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इतिहास, भूगोल, हिंदी, अँगरेज़ी, समाजशास्त्र कुछ ऐसे विषय थे जिनकी पढ़ाई का मतलब था कि सब किताब खोल लें, जैसे ही पैराग्राफ़ ख़त्म हो बोल-बोलकर पढ़ने वाला छात्र बदल जाए, इस तरह पाठ समाप्त हो जाता था और जल्दी ही 'कोर्स कम्प्लीट'. विज्ञान और गणित जैसे विषयों में ब्लैकबोर्ड&lt;br /&gt;साइन-कॉस-बीटा-थीटा के रहस्यों से भर जाता, फिर मास्साब कहते, कुछ न समझ आया हो तो पूछ लो. आठवीं क्लास के किसी लड़के ने कभी नहीं पूछा कि ग्रीस के पाइथोगोरस के नियम का हमें क्या करना, छठी कक्षा में किसी ने नहीं पूछा कि बंदर खंभे पर चढ़कर-फिसलकर-चढ़कर आख़िरकार कितनी देर में ऊपर पहुँचेगा या नहीं पहुँचेगा इससे हमें क्या लेना-देना. बंदर है, नहीं मन करेगा तो बीच में ही कूद जाएगा. ऐसी बात किसी छात्र ने नहीं पूछी और 'कोर्स कम्प्लीट' मान लिया गया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सातवीं में एक विषय था जिसका 'कोर्स कम्प्लीट' घोषित नहीं किया जा सका क्योंकि उसकी कोई क्लास ही नहीं लगी थी, पता नहीं ऐसा कैसे हुआ लेकिन बहुत देर से पता चला कि "अरे, भूगोल तो रह ही गया." रघुवर प्रसाद सिंह शर्मा 'निष्कलंक' ने उस दिन पान के बीड़े के बदले एक दिन में भूगोल का&lt;br /&gt;'कोर्स कम्प्लीट' कराने का बीड़ा उठाया. 'निष्कलंक' सर के कलंकों के बारे में हम छात्रों को ज्यादा पता नहीं था, उनका चोला-बाना कवियों वाला था और तीन जातिसूचक नामों के साथ एक अदद उपनाम भी था. जब बीसियों साल में एक बार विद्यालय पत्रिका का प्रकाशन हुआ था तो उन्होंने संपादक का&lt;br /&gt;पद सुशोभित किया था, हम इतना ही जानते थे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब उन्होंने अचानक हमारे क्लास को सुशोभित किया तो हम सब चकरा गए. पान की पीक निगलकर, आँख बंद करके उन्होंने कहा, "बच्चों, भूगोल दुनिया का सबसे आसान विषय है क्योंकि यह भू- गोल है इसलिए हम चाहे कहीं से भी चलना शुरू करें, वहीं पहुँच जाएँगे. यह इसलिए भी आसान है क्योंकि हम इसी भू पर रहते हैं इसलिए सब कुछ जानना कोई कठिन बात नहीं है. इस धरती पर पहाड़, झील, झरने, जंगल हैं और सात समंदर हैं, सैकड़ों देश हैं... भारत के उत्तर में हिमालय है और दक्षिण में समुंदर... सबसे घने जगल असम और मध्य प्रदेश में हैं...आदि आदि...कोर्स कम्पलीट."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;निष्कलंक सर के बारे में एक ही बात विचित्र लगती थी कि वे पान वाले की दुकान से पान के पत्ते का पेस्ट मँगवाते थे. सखुए के पत्ते में लिपटा हरे रंग का गीला गोला, इसे निगलने के बाद वे सुपारी-चूना-कत्था-ज़र्दा वाला पान भी खाते थे, यही बात हमारी समझ में नहीं आती थी. पान खाने से पहले पान की चटनी क्यों खाए कोई? कई साल बाद एक देहाती दोस्त ने बताया कि "अबे मूरख, ई तो बाबूजी भी खाते हैं, इसको भाँग कहते हैं." अब समझ में आता है कि किस तरह सर ने आँखें बंद करके सात समंदर, हिमालय और सैकड़ों देश आधे घंटे में लाँघ दिए थे. वे पूरी तरह आश्वस्त थे कि उन्होंने भूगोल का कोर्स अच्छी तरह कम्प्लीट करा दिया था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसी तरह विज्ञान का कोर्स कम्प्लीट कराने की ज़िम्मेदारी भोगेंद्र झा सर के ऊपर थी. वे सबसे पहले पता लगाते थे कि किसका बाप क्या करता है, इस सूचना का बहुत ही विज्ञान सम्मत प्रयोग भी करते थे. जिन्हें लगता था कि कोर्स कम्प्लीट नहीं हुआ है वे उनसे ट्यूशन भी पढ़ते थे. मेरा सहपाठी रामेंद्र&lt;br /&gt;राय साइकिल पर एक झोला लटकाए चला जा रहा था, हमने पूछ लिया कि कहाँ जा रहे हो? उसने बताया, "फादर मिलिटरी में हैं न, इसलिए सर ने कैंटीन से रम मँगवाया है." मैं उसके साथ सर के दर्शनार्थ हो लिया. भोंगेद्र सर ने सफ़ाई दी कि भोग वे नहीं लगाएँगे. बोले, "घर में कोई-कोई मेहमान आता-जाता है ने, तो हम्मै खरीदने जाएं, अच्छा नै लगता है नै, हें हें हें..." उनके घर मनीप्लांट बहुत लहलहा रहा था, चलते-चलते हमने देखा काँच के गोल-गोल मटकों में उनकी जड़ें डूबी हैं. किताब में पढ़ा था कि इसी को बीकर कहते हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमारा स्कूल कहने भर को हिंदी मीडियम था, लेकिन असल में स्कूल की पढ़ाई अनेक भाषाओं में होती थी. मसलन, भोजपुरी, मगही, मैथिल, अंगिका... छपरा के चौबे सर हिंदी पढ़ाते थे. पूछते थे, "ताई कहानी का मूख पात्र का नाम बताओ बउआ." नहीं बताने पर उनकी प्रिय सज़ा थी पेट की चमड़ी खींचना या ज़्यादा नाराज़ हों तो दुखहरन गोंसाईं का प्रसाद. लेकिन सज़ा देने से पहले वे ज़रूर पूछते थे, "घर कहवाँ बा बउआ..." आरा, छपरा, सिवान, गोपालगंज, सासाराम जैसा जवाब मिला तो हल्के से गाल खींचते थे, अगर पटना, गया, जहानाबाद हुआ तो पेट की चमड़ी खींची जाती और अगर मिथिलांचल का कोई ज़िला हुआ तो दुखहरन गोंसाईं काम आते. दुखहरन गोंसाई उनकी प्रिय बेंत का नाम था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ शिक्षक थे जो मारते नहीं थे लेकिन धमकियाँ एक से एक बढ़कर देते थे. बुद्धिनाथ सर कन्या विद्यालय से ट्रांसफर होकर आए थे, तबीयत से मुलायम थे, लड़कों को पढ़ाते-पढ़ाते आदतन पूछते थे, "समझ गई न रे." नाराज़ होने पर कहते, "अतना न मारबउ के बाप नै चिन्हतो." बंगाली मोशाय&lt;br /&gt;दास सर कहते थे, "बोदमाश, बोरा, बंडल शोब, कोबाड़ी में किलो के भाव बेचके तोमारा बाप को पाँच टाका देगा तो वो भी खुब खुश होगा कि कूछ तो मीला." सबसे दुबले-पतले मोहंती सर हमेशा नाराज़गी में दाँत किटकिटाते थे, कहते थे, "येहाँ हार्टअटैक होगा मेरा, मोरेगा सिर खपाके लेकिन तूम बूझेगा नेई." ऐसा लगता उन्हें सचमुच हार्ट अटैक आने वाला है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमारे ज़्यादातर टीचर बहुत अच्छे भविष्यवक्ता थे, वे क्लास में बता देते थे कि कौन लड़का नींबू बेचेगा, कौन भीख माँगेगा, कौन जेबकतरा बनेगा. मोटे चश्मे वाले, काले, ठिगने श्यामा सर भी वर्षों से छात्रों का भविष्य बता रहे थे, रिटायरमेंट के करीब पहुँच रहे थे. एक दिन स्कूल ख़त्म होने के बाद घर जाने से पहले सब्ज़ी ख़रीदने के लिए रुके. नींबू रुपए के चार या छह, इस पर दुकानदार से उलझ पड़े. दुकानदार ने बहुत विनम्रता से कहा, "सर, हम जो भी हैं आपकी ही की बदौलत हैं, चार-छह की क्या बात है, आप आठ नींबू ले लीजिए, आप तो आठ साल पहले बता दिये थे कि हम नींबू बेचेंगे."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'कैम्पस सब कागद करो, गुरू महिमा बरनि न जाई.' यहाँ सिर्फ़ तीन-चार का ज़िक्र हुआ, कुल 33 थे. तीन-चार को छोड़कर यहाँ सब क़ाबिले ज़िक्र हैं लेकिन लग रहा है कि हम ही कौन से दूध के धुले थे, वे भी तो बेचारे हमारे जैसे छात्रों के बनाए हुए शिक्षक थे. हमारे अपने कारनामे अगली बार... अगर आप पढ़ना चाहें.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6853758773001535028-826476447667039156?l=anamdasblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://anamdasblog.blogspot.com/feeds/826476447667039156/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6853758773001535028&amp;postID=826476447667039156&amp;isPopup=true' title='18 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6853758773001535028/posts/default/826476447667039156'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6853758773001535028/posts/default/826476447667039156'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://anamdasblog.blogspot.com/2007/08/blog-post_7935.html' title='बलिहारी गुरू आपकी, कोर्स कम्प्लीट दियो कराए'/><author><name>अनामदास</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06852915599562928728</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_fR7cWVj99s0/SKvHGScbUlI/AAAAAAAAAIY/dP4fvrpVCXk/S220/images.jpg'/></author><thr:total>18</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6853758773001535028.post-8819012743064001439</id><published>2007-08-11T14:13:00.000+01:00</published><updated>2007-08-11T14:13:02.216+01:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='blogger'/><category 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फैले मैदान में चलने वाले प्रैक्टिकल क्लासों में.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रैक्टिकल के टीचरों में मुख्य थे 'संजै भइया' जिनका बड़ा सम्मान था, स्कूल के कैम्पस के बाहर भी उनकी धाक बताई जाती थी. उनके चलने में गजब का बांकपन था और उनके चक्कू चलाने के फ़न के बारे कई तरह के क़िस्से मशहूर थे लेकिन निष्पक्ष सूत्रों से उनकी पुष्टि नहीं हो सकी थी, वे अक्सर स्कूल के परिसर में छींटदार कमीज़ पहनकर आते थे और नौंवी-दसवीं के कुछ महत्वाकांक्षी लड़के उनके चारों तरफ़ मँडराने लगते थे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बरगद के पेड़ के नीचे उनकी क्लास लगती थी, लड़के दौड़-दौड़कर पान-सिगरेट लाते थे संजै भइया के लिए. संजै भइया बोली बचन से ज्यादा पढ़े-लिखे नहीं लगते थे लेकिन उनका स्टाइल अनुकरणीय था. यह शायद उनकी ज्ञानपिपासा ही थी जो नौकरी की उम्र में भी उन्हें स्कूल के परिसर में खींच लाती थी. लड़के अक्सर उनके कान में फुसफुसाते कि आज मनोजवा चक्कू खोंस के आया है या आज पंकजवा कट्टा लाया है, संजै भइया धीरे से मुस्कुराते.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लंचटाइम में प्यार से दो लप्पड़ लगाके लड़के का निशस्त्रीकरण कर देते, उनके पास ज़खीरा जमा होता जाता, क्या पता आगे बेच देते थे या सिर्फ़ परोपकारवश लड़कों को बिगड़ने से बचाने के लिए ऐसा करते थे. वे अक्सर उसी तोड़े हुए बाउंड्रीवाल से स्कूल में दाख़िल होते थे जहाँ से ढेर सारे लड़के लंच के बाद फिलिम देखने भाग जाते थे. हमारा स्कूल प्रधान डाकघर, तीन सिनेमाघरों, टेलीफ़ोन एक्सचेंज, मेन रोड, कोतवाली थाने और मारवाड़ी मुहल्ले से घिरा था, यह एक निहायत दिलचस्प सराउंडिंग थी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रैक्टिकल की दूसरी टीचर थीं 'लंगड़ी मैडम'. उनकी क्लास में बच्चे दूर से ही और अंदाज़े से शामिल होते थे, ये वाली मैडम रंग-बिरंगी साड़ी पहनती थीं, पान खाती थीं और पूरे स्कूल परिसर में प्रिसिंपल से भी ज्यादा रोब से घूमती थीं. स्कूल के मैदान के झाड़ी वाले कोने उन्हें ख़ास पसंद थे, वे अक्सर या तो तड़के दिखाई देती थीं या देर शाम को. मॉर्निंग क्लास के लिए जाते समय हमें पता होता था उनकी नाइट क्लास खत्म हो गई है, वे स्कूल के हैंडपंप पर हाथ-मुँह धोती थीं और उनका छात्र हरी घास पर, पेड़ के नीचे खर्राटे ले रहा होता.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;स्कूल के कुछ अध्यापकों ने उनके अनधिकृत पाठ्यक्रम को स्कूल से बाहर ऱखने की कोशिश की लेकिन ऐसा नहीं हो सका. इसलिए कि वे अक्सर कोतवाली वाली दीवार की तरफ़ से सुबह स्कूल के हैंडपंप की तरफ़ जाती देखी जाती थीं, जैसे संजै भइया सिनेमाहाल वाली साइड से आते थे. संस्कृत के हमारे अति संस्कारवान अध्यापक श्रीनारायण मिश्र के सरकारी आवास के पास ही लंगड़ी मैडम का एकड़ों में फैला फार्महाउस था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तीसरे मास्टर 'तीन पत्ती वाले सर' थे. वे सुविधा, मौसम और माहौल के मुताबिक़ कभी स्कूल के अंदर और कभी ऐन बाहर अपनी क्लास लगाते थे. वे कभी कैरम के तीन स्ट्राइकरों में से दो पर स्टिकर चिपका कर या फिर कभी ताश के पत्तों से प्रशिक्षण देते थे. वे बहुत तेज़ी से पत्ती या स्ट्राइकर घुमाते थे, ताश या स्ट्राइकर को इज़्ज़त बख़्शने के लिए वे लाल रूमाल जरूर बिछाते थे. शुरू में कोतवाली के तोंदवाले प्राणियों ने हमारे इस शिक्षक के साथ अपमानजनक बर्ताव किया लेकिन बाद में क्लास निर्बाध रूप से चलने लगी, प्राथमिक शिक्षा के महत्व को समझते हुए उनका सम्मान शुरू हो गया था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इनके अलावा हमारे कुछ 'विजिटिंग प्रैक्टिकल टीचर' थे जो स्कूल की टूटी दीवार के पार कोतवाली में आते थे, हम दीवार में बनी फाँक से होकर ज्ञान अर्जन के लिए कभी-कभी उनके पास चले जाते थे. इनकी क्लास की दिलचस्प बात ये थी कि इसमें आप मर्ज़ी से आते और जाते थे, टीचर का कोई कंट्रोल नहीं था. इनमें से एक सर ने मुझे बताया था कि "बेटा, किसी से डरना मत, डरने वाले को सब डराते हैं. अगर नहीं डरोगे तो काम सही करो या ग़लत, सब ठीक रहेगा." ये सीख मैं कभी नहीं भूल पाया, न ही कभी ग़लत साबित हुई.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरे जीवन में जो कुछ छोटे-मोटे अपराध बोध हैं उनमें से एक ऐसे ही शिक्षक के साथ किए विश्वासघात को लेकर है. अच्छा बच्चा बनने के दबाव में किसी बड़े अपराध बोध की लज़्ज़त अपने हिस्से में नहीं आई. हुआ यूँ कि हम दो साथी दीवार फाँद कर नए 'विजिटिंग प्रैक्टिकल टीचर' से मिलने की उत्सुकता में अंदर गए. थानेदार साहब के मुंशी जी हमेशा की तरह बुड़बुड़ाए थे, "पढ़ना-लिखना साढ़े बाइस.. फेन आ गया इस्कुलिया छौंडा सब..." थोड़ी इधर-उधर की बातचीत के बाद रात भर हुई सेवा के परिणामस्वरूप चेहरे पर आई सूजन की जगह नरमी लाते हुए उन्होंने पाँच का नोट दिया, "बेटा, एक पैकेट नंबरटेन ला दो." हमने एक बेबस आदमी के पैसे से पहले फ़िल्म देखी जिसका नाम था 'कालिया' और मूंगफली खाई. बताइए अपराध बोध होना चाहिए कि नहीं?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जैसा कि बेहतरीन शिक्षण संस्थानों में होता है, सीनियर छात्र भी जूनियर छात्रों को पढ़ाते हैं. ऐसे कई प्रैक्टिकल टीचर भी थे, अजै भइया, विजै भइया और दिप्पु भइया इनमें प्रमुख थे. इन्हीं के एक्स्ट्रा करिकुलर एक्टिविटी की क्लासों में अनेकानेक बालकों ने अपनी पहली सिगरेट पी, पहली पीली किताब पढ़ी और पहली बार हरे रंग के सलवार सूट वाली बालिका विद्यालय की लड़कियों को चिट्ठी पकड़ाई.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ये तो बात हुई हमारे अवैतनिक प्रैक्टिकल टीचरों की, वेतनभोगी पूर्णकालिक सैद्धांतिक टीचरों की चर्चा अगले अंक में. अगर आप पढ़ना चाहें तो कुछ सहपाठियों के बारे में उसके बाद...&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6853758773001535028-8819012743064001439?l=anamdasblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://anamdasblog.blogspot.com/feeds/8819012743064001439/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6853758773001535028&amp;postID=8819012743064001439&amp;isPopup=true' title='16 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6853758773001535028/posts/default/8819012743064001439'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6853758773001535028/posts/default/8819012743064001439'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://anamdasblog.blogspot.com/2007/08/blog-post_10.html' title='विद्या धन उद्यम बिना कहो जो पावे कौन'/><author><name>अनामदास</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06852915599562928728</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_fR7cWVj99s0/SKvHGScbUlI/AAAAAAAAAIY/dP4fvrpVCXk/S220/images.jpg'/></author><thr:total>16</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6853758773001535028.post-7745982261317225136</id><published>2007-08-06T00:56:00.001+01:00</published><updated>2007-08-06T00:56:50.794+01:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अनामदास का चिट्ठा'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='blogger'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='blog'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='hindi'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='ब्लॉग'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='anamdas ka chitta'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='हिंदी'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='ब्लाग'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='हिन्दी'/><title type='text'>हमारी अपनी ज़बान की साठवीं बरसी</title><content type='html'>हमारी हिंदी, जिसे हम इतना प्यार करते हैं अपंग है, वह जन्म से विकलांग नहीं थी लेकिन उसका अंग-भंग कर दिया गया. वह बहुत बड़ी सियासत का शिकार हुई, अभी वह बड़ी हो ही रही थी कि 1947 में उसके हाथ-पैर काटके उसे भीख माँगने के लिए बिठा दिया गया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;करोड़ों लोगों की भाषा क्या हो, कैसी हो, उसमें काम किस तरह किया जाए, इसका फ़ैसला रातोरात दफ़्तरों में होने लगा. राजभाषा विभाग बना और लोग उस अपंग की कमाई खाने लगे जिसका नाम हिंदी है. ऐसा दुनिया में कहीं और नहीं हुआ.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ठीक ऐसा ही ताज़ा-ताज़ा पैदा हुए पड़ोसी देश पाकिस्तान में भी हुआ, वे जिस्म के कुछ हिस्से काट लाए थे बाक़ी सब अरबी-फ़ारसी वाले भाइयों से माँगने थे, उन्हें किसी तरह जोड़ा जाना था. पाकिस्तान जहाँ कोई उर्दू बोलने वाला नहीं था वहाँ उर्दू राष्ट्रभाषा बनी. पंजाबी, सिंधी, बलोच, पठान सबको उर्दू सीखना पड़ा. ऊपर से तुर्रा ये कि उर्दू का देहली, लखनऊ या भोपाल से कोई ताल्लुक नहीं है, वह तो जैसे पंजाब में पैदा हुई थी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इधर भारत में मानो 'सुजला सुफला भूमि पर किसी यवन के अपने पैर कभी रखे ही नहीं, इस पावन भूमि की भाषा तो देवभाषा संस्कृत है. यहाँ सब कुछ पवित्र-पावन-वैदिक है, विदेशी आक्रमणकारी आए थे, कुछ सौ साल बाद मुसलमान और क्रिस्तान दोनों चले गए, अपनी भाषा भी वापस ले गए, हम वहीं आ गए जहाँ इनके आक्रमण से पहले थे, इन्हें बुरा सपना समझकर भूल जाओ'...ऐसा कम-से-कम भाषा और संस्कृति में मामले में कभी नहीं हुआ. न हो सकता है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारत में सदियों से जो ज़बान बोली जा रही थी उसका नाम हिंदुस्तानी था, लेकिन मुसलमान चूँकि 'अपनी उर्दू' पाकिस्तान ले गए थे इसलिए ज़रूरी था कि जल्द-से-जल्द बिना उर्दू हिंदुस्तानी यानी हिंदी के लिए जयपुर फुट तैयार हो जाए और वह चल पड़े, इसके लिए सबके आसान काम था पलटकर संस्कृत की तरफ़ देखना. वही हुआ, ऐसे-ऐसे भयानक प्रयोग हुए कि बेचारी अपंग हिंदी दोफाड़ हो गई. एक हिंदी जो लोग बोलते हैं, एक हिंदी जो दफ़्तरों में शब्दकोशों से देखकर लिखी जाती है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नेहरू की भाषा कभी सुनिए जो ख़ालिस हिंदुस्तानी थी लेकिन उन पर भी शायद अँगरेज़ी का जुनून इस क़दर सवार था कि उन्हें अपनी हिंदुस्तानी की फिक्र नहीं रही. देश का धर्म के आधार पर विभाजन होने के बाद समझदारी दिखाते हुए उसे धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र घोषित किया गया, वहीं भाषा के मामले में ऐसा बचपना क्योंकर हुआ, समझ में नहीं आता.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारत के विभाजन को साठ वर्ष पूरे होने वाले हैं. दुनिया का हर भाषाशास्त्री मानता है कि किसी भाषा को जड़ें जमाने में कई सौ वर्ष लगते हैं. ब्रज, अवधी, भोजपुरी के साथ अमीर खुसरो फ़ारसी मिला रहे थे, रसखान कृष्णभक्ति का माधुर्य घोल रहे थे, इनके बीच शेरशाह सूरी जैसे तुर्क-अफ़गान भी अपनी भाषा ले आए थे. इन सबसे मिलकर एक जादुई ज़बान बनने लगी जिसमें मीर-ग़ालिब-मोमिन-ज़ौक लिखने लगे, भारतेंदु-प्रेमचंद-रतननाथ सरसार-देवकीनंदन खत्री से लेकर मंटो, कृशनचंदर तक आए. एक सिलसिला बना था जो अचानक झटके से टूट गया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक ही रात में कई अपने शायर-कवि पराये हो गए, इधर भी-उधर भी. कई नए अंखुए उग आए जिन्होंने दावा किया कि वे सीधे जड़ से जुड़े हैं यानी संस्कृत या फ़ारसी से लेकिन उस भाषा का होश किसी को नहीं रहा जिसने उत्तर भारत में तीन-चार सौ साल में अपनी जगह बना ली थी और खूब परवान चढ़ रही थी. वह सबकी भाषा थी, जन-जन की भाषा थी, वह सहज पनपी थी, उसमें कोई बनावट नहीं थी, उसमें हिंदी-संस्कृत के शब्द थे, बोलियाँ-मुहावरे, ताने-मनुहार, दादरा, ठुमरी थी, अदालती ज़बान थी, जौजे-मौजे साक़िन, वल्द, रक़ीब, रक़बा था...क्या नहीं था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक ऐसी ज़बान जो मुग़लिया दौर में सारी ज़रूरतें पूरी कर रही थी और ठहर नहीं गई थी बल्कि आगे बढ़ रही थी, जिसने ज़रूरत भर अँगरेज़ी को भी अपनाया. उसमें अभी और बदलाव हो सकते थे, जो स्वाभाविक तरीक़े से होते जिनमें बनावट के कंकड़ न दिखते शायद. मगर दुर्भाग्य ये है कि देश के बँटने के साथ ही भाषा भी बँट गई और लोग एक नई भाषा गढ़ने में लग गए जो किसी की भाषा नहीं थी, नहीं रही है. यह एक बहुत बड़ी वजह है कि लोग हिंदी को मुश्किल मानकर त्याग देने में सुविधा महसूस करते हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सच बात ये है कि अगर हिंदी को वाक़ई आम ज़बान बनाना है, सबकी बोली बनाना है तो उसे लोगों से दूर नहीं, नज़दीक ले जाना होगा. हिंदू हों या मुसलमान, जब कोई शिकायत होती है तो लोग यही कहते हैं कि हमें शिकायत है, फिर दिल्ली में बसों पर क्यों लिखा होता है कि "प्रतिवाद करने के लिए संपर्क करें"...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उर्दू और हिंदी से पहले एक भाषा है जिसने सारी ज़रूरतें पूरी कीं हिंदुस्तानी के रूप में, जो आज भी उत्तर भारत के रग-रग में बहती है. यह चिट्ठा उसी हिंदुस्तानी में लिखा गया है, उस हिंदी में नहीं जो 1947 में अपंग हुई उसके बाद दिन-ब-दिन इतनी बनावटी होती चली गई कि हिंदी बोलने वाला भी, लिखी हुई हिंदी को अपनी भाषा के तौर पर नहीं पहचानता.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब पंद्रह अगस्त धूमधाम से मनाइएगा तो याद रखिएगा कि यह हिंदुस्तानी की साठवीं बरसी भी है. साझे की सदियों की विरासत के लिए अगर सिर झुकाने का जज़्बा दिल में आए तो ऐसी भाषा बरतिए जो हिंदुस्तान की है, हिंदुस्तानी है.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6853758773001535028-7745982261317225136?l=anamdasblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://anamdasblog.blogspot.com/feeds/7745982261317225136/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6853758773001535028&amp;postID=7745982261317225136&amp;isPopup=true' title='10 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6853758773001535028/posts/default/7745982261317225136'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6853758773001535028/posts/default/7745982261317225136'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://anamdasblog.blogspot.com/2007/08/blog-post_06.html' title='हमारी अपनी ज़बान की साठवीं बरसी'/><author><name>अनामदास</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06852915599562928728</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_fR7cWVj99s0/SKvHGScbUlI/AAAAAAAAAIY/dP4fvrpVCXk/S220/images.jpg'/></author><thr:total>10</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6853758773001535028.post-3871643964023980292</id><published>2007-08-04T02:28:00.001+01:00</published><updated>2007-08-04T02:28:03.094+01:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अनामदास का चिट्ठा'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='blogger'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='blog'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='hindi'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='ब्लॉग'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अँगरेज़ी'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='anamdas ka chitta'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='हिंदी'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='ब्लाग'/><title type='text'>उम्मीद सिर्फ़ अँगरेज़ी न जानने वालों से है</title><content type='html'>भाषा भावुकता से नहीं, ताक़त से चलती है. जिस तरह सिक्के चलाए जाते हैं वैसे ही भाषा भी चलाई जाती है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भाषा का ईंधन सत्ता से उसकी निकटता है. अगर वह शक्ति की कुंजी नहीं है तो कुछ सिरफिरों का शौक़ भर बन सकती है, कामयाब लोगों की ज़बान और उनकी कलम से फूटने वाली धारा नहीं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दुनिया की चार बड़ी भाषाएँ अँगरेज़ी, फ्रेंच, स्पैनिश और अरबी विशुद्ध रूप से सत्ता की वजह से प्रसार पाने वाली भाषाएँ हैं, उनका गहरा औपनिवेशिक अतीत है, अगर इन भाषाओं को बोलने वाले लोग कोलोनाइज़र नहीं होते तो तमिल, गेलिक, स्वीडिश या हिब्रू से अधिक इन भाषाओं का क्या महत्व होता?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भाषा चला देने से चल जाती है, अगर कोई भाषा सबके लिए ज़रूरी हो जाए तो लोग रातोंरात उसे सीख जाते हैं. भारत शायद दुनिया का अकेला देश है जहाँ अपनी भाषा हिंदी, तमिल, कन्नड़, मराठी, मलयालम... जाने बिना काम चल जाता है, बाइज़्ज़त चल जाता है. वैसे काम तो अँगरेज़ी जाने बिना भी चल जाता है लेकिन बेइज़्ज़त होकर चलता है. अँगरेज़ी जाने बिना तरक्की नहीं हो सकती, अपनी भाषा जाने बिना जितनी चाहें उतनी तरक्की हो सकती है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारत में ग्लोबलाइज़ेशन की जो चकाचौंध दिख रही है उसके पीछे भारतीय कामगारों के अँगरेज़ी ज्ञान की भारी भूमिका है. जहाँ चीनी भाई अँगरेज़ी सीखने के लिए बेहाल हैं वहीं भारत में अँगरेज़ी बच्चों को ही नहीं, बल्कि पिल्लों को भी सिखाई जाती है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ठीक है कि अँगरेज़ी जानने की वजह से शहरी मध्यवर्ग को कुछ हज़ार नई नौकरियाँ मिल गई हैं लेकिन प्रतापगढ़, सिवान, झाँसी-झूँसी के करोड़ों लौंडे बेरोज़गार घूम रहे हैं, ज़्यादा से ज़्यादा 'सिकोरटी गारड' बन सकते हैं. वैसे एक से एक बढ़कर 'इंटलीजेंट' हैं लेकिन "इंगलिस में मार खा जाते हैं."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जॉर्ज बुश भारत आते हैं और बेहिचक कह जाते हैं कि जितनी आबादी अमरीका की है, उतने तो भारत में उपभोक्ता हैं इसलिए वे भारत को इतना महत्व दे रहे हैं. यहाँ बात तकरीबन 30 करोड़ शहरी लोगों की हो रही है जिनके लिए किसी अमरीकी प्रोडक्ट के ऊपर हिंदी में नाम लिखने की भी मशक्कत नहीं करनी है. लेकिन बाकी बचे 70 करोड़ लोगों का क्या?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चीन में ऐसा नहीं हो सकता, बिना चीनी के काम नहीं चल सकता. अब ज़रा ठहरकर सोचिए, यह चीन की ताक़त है या कमज़ोरी?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चीनी अँगरेज़ी सीखने के लिए बेताब हैं वहीं यूरोपीय-अमरीकी लोग भी चीनी भाषा सीख रहे हैं, हिंदी नहीं. माइक्रोसॉफ़्ट ने सबसे पहले चीनी और उसके बाद आइसलैंडिक से हौसा तक पचासों भाषाओं में अपने ऑपरेटिंग सिस्टम लॉन्च किए लेकिन हिंदी की ज़रूरत नहीं समझी, ऐसे देश के लिए जहाँ उसके ग्राहक लाखों में नहीं बल्कि करोड़ो में हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुझे कई बार लगता है कि भारत की असली ताक़त अँगरेज़ी न जानने वाली बिरादरी है जिनकी वजह से शायद बाज़ार को होश आए. एक मिसाल लीजिए-- ट्रैक्टर, खाद और कीटनाशक बनाने वाली विदेशी कंपनियों के विज्ञापन कभी अँगरेज़ी में नहीं होते. धीरे-धीरे, देर-सबेर जब देश के बहुसंख्यक लोगों के बीच माल बेचने की बात आएगी तब हिंदी, तमिल, गुजराती, असमिया और ओड़िया के बारे में भी कंपनियों को सोचना होगा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन यहाँ एक बहुत बड़ा प्रश्नचिन्ह है, वो ये कि अँगरेज़ी जाने बिना कुछ ज़मींदारों-रंगदारों-ठेकेदारों को छोड़कर बाक़ी लोगों के पास पैसा कब तक आएगा, वे दमदार ग्राहक कैसे बन पाएँगे, क्योंकर बन पाएँगे, किसी को नहीं पता. देश में सत्ता की संरचना कुछ ऐसी बन चुकी है कि उसमें अँगरेज़ी के बिना सेंध लगाना असंभव दिखता है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारत में हिंदी या अन्य क्षेत्रीय भाषाओं को वही लोग बचा सकते हैं जो अँगरेज़ी की अग्निजिह्वा से बचे हुए हैं. शायद किसी समानांतर-वैकल्पिक तरीक़े से वे इतनी क्रयशक्ति हासिल कर लें कि उनके बीच माल बेचने के लिए हिंदी, तमिल, गुजराती, असमिया या ओड़िया जैसी भारतीय भाषा अनिवार्य हो जाए. लेकिन क्या उसके पहले सब लोग अँगरेज़ी ही नहीं सीख जाएँगे?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अँगरेज़ी नहीं भी सीखेंगे तो इतना आत्मविश्वास कहाँ से आएगा कि कहें, "हमें नहीं पता क्या लिखा है, हम नहीं ख़रीदते." किसी अधपढ़े से पढ़वा लेंगे और अपनी क़िस्मत को कोस लेंगे लेकिन माल तो वही बिकेगा जो जिसके ख़रीदने में शान हो, वही शान जो शहर में अँगरेज़ी बोलने वाले की है. रामलाल-कुंदनलाल एंड कंपनी की वो इज़्ज़त कैसे हो सकती है जो जॉनसन एंड निकल्सन की होती है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुचक्र है कि क्रयशक्ति बिना अँगरेज़ी के सिर्फ़ गुंडागर्दी से आती है. यह कुचक्र कब और कैसे टूट सकता है इसके बारे कुछ सोचिए, बोलिए और बताइए.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6853758773001535028-3871643964023980292?l=anamdasblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://anamdasblog.blogspot.com/feeds/3871643964023980292/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6853758773001535028&amp;postID=3871643964023980292&amp;isPopup=true' title='13 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6853758773001535028/posts/default/3871643964023980292'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6853758773001535028/posts/default/3871643964023980292'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://anamdasblog.blogspot.com/2007/08/blog-post.html' title='उम्मीद सिर्फ़ अँगरेज़ी न जानने वालों से है'/><author><name>अनामदास</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06852915599562928728</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_fR7cWVj99s0/SKvHGScbUlI/AAAAAAAAAIY/dP4fvrpVCXk/S220/images.jpg'/></author><thr:total>13</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6853758773001535028.post-1017296082929943374</id><published>2007-07-26T17:05:00.001+01:00</published><updated>2007-07-26T17:05:29.854+01:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अनामदास का चिट्ठा'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='blog'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='hindi'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='ब्लॉग'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='anamdas ka chitta'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='हिंदी'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='ब्लाग'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='हिन्दी'/><title type='text'>कथित न्यूज़ चैनल बॉलीवुड से कुछ सीखें</title><content type='html'>बॉलीवुड से सीख लेने की सलाह गुस्ताख़ी नहीं, इज़्ज़तअफ़ज़ाई है क्योंकि कथित समाचार चैनलों की होड़ मुक्ता आर्ट्स, नाडियाडवाला या अब्बास-मस्तान एंड कंपनी से नहीं बल्कि छोटे पर्दे पर चाँदी काटने वाली कंपनी बालाजी टेलीफ़िल्म्स से है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कथित समाचार चैनलों के कर्ताधर्ता अनेक बार रिकॉर्ड पर कह चुके हैं कि "हम वही दिखाते हैं जो दर्शक देखना चाहते हैं." डेविड धवन और सुभाष घई इससे अलग क्या कहते हैं?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;समाचार चैनलों के आला अफ़सर बार-बार 'कथित' के प्रयोग पर नाराज़ हो सकते हैं लेकिन वे तब तक कथित ही रहेंगे जब तक वे सचमुच समाचार नहीं दिखाते. समाचार-विचार दिखाने का काम फ़िलहाल दूरदर्शन के सिवा हिंदी में कहीं नहीं हो रहा है. मगर वहाँ समाचार और विचार दोनों सरकारी हैं क्योंकि उन्हें एकता कपूर की नहीं, प्रियरंजन दासमुंशी की चिंता है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;व्यावसायिक दबाव की बात तो जायज़ है, घर से पैसा लगाकर कौन समाचार दिखाएगा? पत्रकारों को तनख़्वाह देनी है, मालिक को फ़ायदा चाहिए, ओबी वैन, स्टूडियो और दिल्ली-नोएडा में अच्छी जगह पर दफ़्तर के अपने ख़र्चे हैं... लेकिन जीबी रोड-सोनागाछी-कमाटीपुरा की व्यावसायिकता और पत्रकारिता की व्यावसायिकता का कुछ तो अंतर हो? हिंदी में अभी ये अंतर नहीं दिख रहा है, अपवादों को छोड़कर.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बहरहाल, मुक़ाबला कथित समाचार चैनल के रिपोर्टरों और 'क्योंकि सास भी कभी बहू थी' वाले राम या तुलसी के बीच है. इस मुक़ाबले को जीतने के लिए ज़रूरी है कि याद्दाश्त खो जाए, पुनर्जन्म हो जाए और नागिन पिछले जन्म का बदला ले...कम से कम अपराध-साज़िश या रंजिश तो ज़रूर हो.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दरअसल, भारत का दुर्भाग्य है कि दो बहुत बड़ी घटनाएँ लगभग एकसाथ हुईं, भारत का बाज़ारीकरण और भारतीय टीवी चैनलों का बाज़ारूकरण. निजी समाचार टीवी चैनलों का दौर थोड़ा पहले या कुछ बाद शुरू होता तो स्थिति संभवतः अलग होती. जिस टीवी जैसे सशक्त माध्यम से बदलते समाज पर सार्थक टिप्पणी की अपेक्षा हो सकती थी वही बाज़ार के ताल पर सबसे ज़्यादा नाच रहा है. ख़ैर, रास्ता बाज़ार से बहुत दूर जाकर नहीं, उसी के बीच से निकलेगा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;टीवी टुडे और बालाजी फ़िल्म्स की कमाई के आँकड़ों का अंतर देख लीजिए तो आपको इस बेचैनी की वजह समझ में आ जाएगी. भारत में कथित समाचार चैनलों की सारी आपाधापी की वजह यही है कि वे अपने हर कार्यक्रम के प्रायोजकों की सूची में उतने ही नाम चाहते हैं जितने सास बहू वाले सीरियलों में होते हैं. देश में कुछ गिने-चुने कलाकर हैं जो कबड्डी-कबड्डी से चार गुना तेज़ गति से बोल सकते हैं इस कार्यक्रम के प्रायोजक हैं...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पैसे देने वाले हिंदुस्तान लीवर, कोलगेट-पामोलिव से लेकर बरनाला सरिया जैसे ये नाम यूँ ही नहीं आते, उन्हें इस बात का आश्वासन नहीं चाहिए कि कार्यक्रम अच्छा है, वे जानना चाहते हैं कि इस कार्यक्रम को कितने लोग देख रहे हैं यानी टीआरपी कितनी है. यहीं आकर टीवी चैनल के वरिष्ठ पत्रकार बॉलीवुड प्रोड्यूसर की भूमिका अख़्तियार कर लेते हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इक्का-दुक्का अपवादों को छोड़ दें और अस्सी के दशक के बॉलीवुड को देखें तो माहौल वही था जो आज टीवी का है. तब जितेंद्र का हिम्मतवाला चल रहा था आज उनकी बेटी के 'क' वाले सड़ियल चल रहे हैं. सिनेमा के धंधे में बड़ा बदलाव जो आया है उसकी एक वजह मल्टीप्लेक्स थिएटर हैं जहाँ लोग अधिक पैसे देकर भी अपनी पसंद की 'मक़बूल', 'नीली छतरी वाली लड़की' और 'मैंने गाँधी को नहीं मारा' जैसी छोटे बजट की कुछ समझदारी वाली फ़िल्में देखते हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;डेविड धवन, धर्मेश दर्शन, गुड्डू धनोआ, हैरी बावेजा टाइप लोगों के नेतृत्व में चलने वाले अक़ल से पूरी तरह पैदल बॉलीवुड के भीतर भी जगह बनी है 'डोर,' 'खोसला का घोंसला' और 'इक़बाल' जैसी ढेर सारी फ़िल्मों के लिए. बॉलीवुड ने जुडवाँ, प्लास्टिक सर्जरी, हमशक्ल, खोई याद्दाश्त वगैरह के जितने फार्मूलों को भरपूर इस्तेमाल के बाद फेंक दिया उन सबको शरण मिली टीवी सीरियलों और थोड़े अलग अंदाज़ में कथित न्यूज़ चैनलों पर. अक्लमंद लोगों के इस पेशे में सचमुच के समाचार के लिए जगह कैसे और कब निकलेगी यही लाख टके का सवाल है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;टीवी की दुनिया में एक बड़ा बदलाव आ रहा है, महानगरों के ज़्यादातर अपार्टमेंटों में टाटा-स्काई और डिशटीवी ने अपनी पैठ बना ली है. उनके सेट टॉप बॉक्स से मिलने वाले आँकड़े चंद शहरों के कुछ घरों में लगे टीआरपी रेटिंग के बक्सों से अधिक विश्वसनीय हैं. यही नहीं, जिस किसी ने पैसे ख़र्च करके अपने घर में डिजिटल क्वालिटी में टीवी देखने के लिए डिशटीवी या स्काई लगवाया है उसकी क्रयक्षमता भी अधिक है. वह दिन दूर नहीं है जब टीआरपी विज्ञापन देने वालों के लिए कोई भरोसेमंद पैमाना नहीं रह जाएगा क्योंकि उसका आधार तुलनात्मक रूप से बहुत छोटा है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं मानने को तैयार नहीं हूँ कि दिल्ली, कलकत्ता, मुंबई और बंगलौर जैसे शहरों के पढ़े-लिखे और भारी जेब वाले लोग नाग-नागिन या किसी चमत्कार को देखकर रोज़-रोज़ चकित होना चाहते हैं, उनकी ज़्यादा दिलचस्पी मध्यवर्ग से उच्चवर्ग में दाख़िल होने में है. भूत-प्रेत या अंधविश्वास के दूसरे कार्यक्रमों से उनका स्टेटस नहीं सुधरेगा बल्कि उनकी रुचि उन चैनलों में ज़्यादा होगी जो बीबीसी, ब्लूमबर्ग और डिस्कवरी के टक्कर की सामग्री देकर समझदारी के मामले में उन्हें ग्लोबल स्तर पर ले जा सकें.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;टीवी के कथित समाचार चैनलों का बाज़ार इतना सीधा-सपाट बहुत दिन तक नहीं रहने वाला है जैसा अभी है. जल्दी ही समाचार चैनलों को संपन्न उपभोक्ता यानी शहरी मध्यवर्ग की असली रुचि का अंदाज़ा टीआरपी से परे जाकर होगा, उसी दिन यह सूरत बदलने लगेगी. शायद लाइफ़स्टाइल, लेटनाइट पार्टी, फ़ैशन और बुटिक की कवरेज़ अब से कई गुना ज़्यादा बढ़ जाएगी लेकिन भूत-प्रेत बेरोज़गार हो जाएँगे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;असली समस्या लेकिन तब भी बनी रहेगी. भारत के 10 करोड़ महानगरीय, शिक्षित, अपव्ययी और उच्चाभिलाषी लोगों की ज़रूरत शायद जल्दी परिभाषित हो जाए लेकिन बाक़ी के 90 करोड़ देहाती-क़स्बाई लोगों की समस्याओं को ख़बरों में लाने के बदले उन्हें तरह-तरह के टोटकों से बहलाने की ठगविद्या चलती रहेगी. इससे बड़ी मिथ्या कोई नहीं हो सकती कि क़स्बों-गाँवों में रहने वाले लोग जड़बुद्धि हैं जो समाचार में सिर्फ़ सस्ती सनसनी खोजते हैं. भूलिए मत कि नीमच, दमोह, खुर्जा से लेकर गुमला-दुमका तक में लोग ख़रीदकर अख़बार और पत्रिकाएँ पढ़ते हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"कान, लोकार्नो और वेनिस जैसे फ़िल्म फ़ेस्टिवलों में कोई नहीं पूछता, ऑस्कर नहीं मिलता तो क्या हुआ, हम अपने बाज़ार में मस्त हैं, हम वही दिखाते हैं जो दर्शक देखना चाहते हैं."... ऐसा मेनस्ट्रीम बॉलीवुडीय रवैया जिन टीवी न्यूज़ चैनलों का रहेगा उनको लेकर यही बहस जारी रहेगी. मगर कई और लोग प्रणय रॉय-राजदीप सरदेसाई की भी तरह होंगे जो समाचारों-विचारों और मुद्दों की बात करेंगे जैसा कि किसी भी सभ्य-सुसंस्कृत देश में होता है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शायद बहस का अगला दौर इस पर केंद्रित होगा कि क्या सिर्फ़ शहर के पढ़े-लिखे समृद्ध लोगों के बाज़ार को मुख्यधारा माना जाए या फिर अधिसंख्य देहाती, हिंदीभाषी और निर्धन लोगों को. दोनों की अपनी जगह रहेगी, अपनी ताक़त और समस्याएँ भी बनी रहेंगी. ऐसा मानना मेरे लिए असंभव है कि देश के सारे लोग वाक़ई वही देखकर ख़ुश हैं जो उन्हें परोसा जा रहा है. भारत में टीवी समाचारों के बाज़ार में अभी बहुत बदलाव बाक़ी है.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6853758773001535028-1017296082929943374?l=anamdasblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://anamdasblog.blogspot.com/feeds/1017296082929943374/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6853758773001535028&amp;postID=1017296082929943374&amp;isPopup=true' title='12 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6853758773001535028/posts/default/1017296082929943374'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6853758773001535028/posts/default/1017296082929943374'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://anamdasblog.blogspot.com/2007/07/blog-post_26.html' title='कथित न्यूज़ चैनल बॉलीवुड से कुछ सीखें'/><author><name>अनामदास</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06852915599562928728</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_fR7cWVj99s0/SKvHGScbUlI/AAAAAAAAAIY/dP4fvrpVCXk/S220/images.jpg'/></author><thr:total>12</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6853758773001535028.post-2563444944853834925</id><published>2007-07-20T02:22:00.000+01:00</published><updated>2007-07-20T02:22:23.383+01:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अनामदास का चिट्ठा'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='blogger'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='blog'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='hindi'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='ब्लॉग'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='anamdas ka chitta'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='हिंदी'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='ब्लाग'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='हिन्दी'/><title type='text'>हिंदी सम्मेलन हुआ, अँगरेज़ी की बात करें?</title><content type='html'>मैं बुनियादी तौर पर एक क़स्बाई आदमी हूँ. देश के औपनिवेशिक अतीत ने सबकी तरह मेरे लिए भी अँगरेज़ी को ज़रूरी बना दिया और ज़रूरत की मार ने उसे माँजने पर मजबूर किया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं अँगरेज़ी का भक्त नहीं हूँ, उसका विरोधी था एक ज़माने में, जब भावुक था. अब व्यावहारिक हूँ इसलिए समझता हूँ कि अँगरेज़ी के बिना हिंदी में भी काम नहीं किया जा सकता. मिसाल के तौर पर महाविनाशकारी राजभाषा अधिकारी बनने की योग्यता पर ग़ौर कीजिए-- 'स्नातक स्तर तक हिंदी और&lt;br /&gt;अँगरेज़ी दोनों तथा हिंदी या अँगरेज़ी अथवा दोनों में स्नातकोत्तर...'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरी पक्की राय थी कि आदमी अँगरेज़ी जाने बिना भी जानकार और समझदार हो सकता है लेकिन मेरी इस राय से शायद सिर्फ़ फ्रांसीसी या कुछ हद तक रूसी और स्पेनी सहमत हो सकते हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगर आपको फ्रांसीसी-रूसी या स्पेनिश आती है तो अँगरेज़ी के बिना भी इस हरी-भरी वसुंधरा के बारे में कुछ ज्ञान पा सकते हैं. अगर आप इस ख़ामख्याली में हैं कि साम्राज्यवादी अँगरेज़ी का विरोध करके और हिंदी-हिंदुस्तान गाकर आप अपने हिस्से का ज्ञानार्जन कर लेंगे तो आप अँगरेज़ी में स्टूपिड हैं.  हिंदी में अपनी पसंद का कोई नाम च वर्ग से चुन लीजिए...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस संसार के कटु सत्यों के अनंत कोश में से एक प्रमुख सत्य ये भी है कि पिछले चार सौ वर्षों में दुनिया में सिर्फ़ पाँच-सात भाषाओं का प्रसार हुआ है और सारा प्रसार साम्राज्यवादी ताक़त की बदौलत हुआ है. संस्था, नियम और व्यापार-व्यवस्था बनाने-चलाने की ताक़त और इस ताक़त से उपजा रौब हमारे-आपके ऊपर हावी है. बोलिविया में स्पेनिश, ब्राज़ील में पुर्तगाली, अल्जीरिया में फ्रांसीसी या सूडान में अरबी...आदमी पाँचों महाद्वीपों में ताक़त की भाषा सीखना चाहता है, दासता की नहीं. क्यूबा में क्रांति के नारे स्पैनिश में ही लगते हैं जो स्पेन से कई हज़ार किलोमीटर दूर है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गाँव-देहात वाले हिंदी बोलने की कोशिश करते हैं, हिंदी वाले अँगरेज़ी, अँगरेज़ी वाले ऑक्सब्रिज...यह प्रवाह निजी फितूर में उल्टा हो सकता लेकिन सामाजिक स्तर पर ऐसा कोई उदाहरण आज तक देखने को नहीं मिला कि किसी देश के लोगों ने साम्राज्यवादी ताक़त की भाषा को दरकिनार करके अपनी ज़बान को दोबारा वही जगह दी हो जो विदेशी आक़ाओं के काबिज़ होने से पहले थी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वक़्त गवाह है कि पिछली कई सदियों में इक्का-दुक्का मौक़ों को छोड़कर इस दुनिया में व्यवस्थापक बदले गए हैं, व्यवस्थाएँ नहीं.  भारत में व्यवस्था और सत्ता तंत्र की भाषा अँगरेज़ी थी और अब भी वही है. हिंदी हमारी अपनी भाषा है, प्यारी भाषा है, मन-आत्मा की भाषा है लेकिन सत्ता-सम्मान और समृद्धि की भाषा नहीं है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अँगरेज़ी बोलकर पृष्ठभूमि की खाई को पाटा जा सकता है, अँगरेज़ी न बोलने पर आज के बाज़ार में पैसे देकर भी इज़्ज़त से सामान ख़रीदना मुहाल है. रौब से अँगरेज़ी बोलने पर ही बड़े लोग फ़ोन पर आते हैं. दुनिया का सारा ज्ञान अँगरेज़ी की किताबों में है जिनका जूठन घटिया हिंदी अनुवाद के ज़रिए उन लोगों तक पहुँचता है जिन्हें परिस्थिति की मार की वजह से अँगरेज़ी नहीं आती या जिन्होंने अँगरेज़ी की ताक़त से ऊपर न सीखने की इच्छाशक्ति को रखा है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारत में कोई भी ऐसा पेशेवर क्षेत्र नहीं है जहाँ आप अँगरेज़ी जाने बिना ठीक तरीक़े से काम कर सकें, राजनीति पेशा तो है लेकिन वहाँ व्यवस्था के अनुरूप ठीक तरीक़े से काम करना ज़रूरी नहीं है इसलिए उनके उदाहरण यहाँ रहने दीजिए. छोटी सी मिसाल लीजिए, हिंदी पत्रकारिता में डेस्क पर काम करने वाले अनेक लोग 'स्टेट ऑफ़ द आर्ट' जैसे जुमले का अनुवाद 'कला की अवस्था' करके पर्याप्त शर्मिंदगी झेलते रहते हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने अपनी सारी पढ़ाई-लिखाई हिंदी माध्यम से की है, अँगरेज़ी से आतंकित भी रहा हूँ. अँगरेज़ी भारत में निश्चित रूप से आतंक और अलगाव की भाषा है लेकिन वह भारत की अपनी भाषा हो चली है, बहुत हद तक वैसे ही जैसे लातीनी अमरीका में स्पैनिश या उत्तरी अफ्रीका में अरबी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अँगरेज़ी को रौब की भाषा की तरह इस्तेमाल करने पर मेरे गंभीर एतराज़ हैं, वैसे भारत में हिंदी का ठीक अँगरेज़ी जैसा इस्तेमाल बस्तर-विदर्भ से लेकर उत्कल-कोल्हान तक होता है. यहाँ सवाल भाषा की राजनीति का नहीं बल्कि शोषण की राजनीति का है, उसका तो हर हाल में विरोध होना चाहिए लेकिन अँगरेज़ी का निर्रथक विरोध करके कोई सार्थक काम करने की कोशिश करना समंदर में साइकिल चलाने की कल्पना करने जैसा है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस तेज़ी से ग्लोबलाइज़ हो रही दुनिया में अगर कोई भाषा है जो आपको बाक़ी संसार से जोड़ सकती है और जिसके सीखने के लिए आपको अपेक्षाकृत बहुत कम प्रयास करना होगा तो वह अँगरेज़ी ही है. यक़ीन मानिए कि आप अँगरेज़ी बोलकर शोषण-दमन का विरोध कर सकते हैं जो हिंदीवालों से नहीं हो रहा, कम से कम ब्रितानी-अमरीका अख़बार अरुंधति रॉय की तरह उनके लेख तो नहीं छाप रहे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हम ऐसे दौर में जी रहे हैं जहाँ हिंदी संसार ज्ञान के लिए लगभग पूरी तरह अँगरेज़ी पर निर्भर है, ऐसे में अच्छा यही होगा कि अपनी अँगरेज़ी ठीक करें, भले ही काम हिंदी में करते हों लेकिन अँगरेज़ी न सीखने का हठ क़दम-क़दम पर भारी पड़ेगा, अगर करियर बनाने की आकांक्षा न हो, तब भी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हिंदी में लिखने-पढ़ने का आग्रह बहुत अच्छा-आवश्यक और अर्थपूर्ण है लेकिन अँगरेज़ी को त्याज्य बनाकर जो भी लिखा-पढ़ा जाएगा वह बच्चन, अज्ञेय, फिराक़, त्रिलोचन, निर्मल वर्मा, भीष्म साहनी... जैसा नहीं हो सकेगा. अँगरेज़ी से डरकर, अँगरेज़ी वालों को देखकर हीनता की ग्रंथि सहलाने से बेहतर बेहतर विकल्प है एक सरल-सरस भाषा सीखना.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बाक़ी आपकी मरज़ी, पढ़तन सो भी मरतन, ना पढतन सो भी मरतन...&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6853758773001535028-2563444944853834925?l=anamdasblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://anamdasblog.blogspot.com/feeds/2563444944853834925/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6853758773001535028&amp;postID=2563444944853834925&amp;isPopup=true' title='14 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6853758773001535028/posts/default/2563444944853834925'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6853758773001535028/posts/default/2563444944853834925'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://anamdasblog.blogspot.com/2007/07/blog-post_20.html' title='हिंदी सम्मेलन हुआ, अँगरेज़ी की बात करें?'/><author><name>अनामदास</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06852915599562928728</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_fR7cWVj99s0/SKvHGScbUlI/AAAAAAAAAIY/dP4fvrpVCXk/S220/images.jpg'/></author><thr:total>14</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6853758773001535028.post-8461865961787095149</id><published>2007-07-16T22:41:00.000+01:00</published><updated>2007-07-16T22:41:50.267+01:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अनामदास का चिट्ठा'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='blog'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='hindi'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='ब्लॉग'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='anamdas ka chitta'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='हिंदी'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='ब्लाग'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='हिन्दी'/><title type='text'>हिंदी की सेवा मत करिए, प्लीज़</title><content type='html'>दुनिया भर में हिंदी अकेली बड़ी भाषा है जिसकी सेवा अधिक हो रही है और प्रयोग कम. हिंदी न हुई, मरती हुई गाय है जिसकी सेवा करने के लिए लोग गौशाला में जुट गए हैं और गली-गली चंदा माँग रहे हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिसने भी हिंदी की सेवा की बात की वो मेरी नज़रों से गिर गया. मैं हिंदी में काम करता हूँ, अधिक से अधिक करना चाहता हूँ, मेरी रोज़ी-रोटी हिंदी से चलती है, मेरा मानना है कि बहुत सारे लोगों के मन की भाषा हिंदी है लेकिन उसके प्रयोग की ज़रूरत है, उसकी सेवा की नहीं. सेवा की बात वही कर रहे हैं जिनकी नज़र हिंदी पर नहीं, मेवा पर है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;न्यूयॉर्क कुछ गए, कुछ नहीं गए, ज़्यादातर बुलाए नहीं गए लेकिन सेवा सब एक-दूसरे से अधिक कर रहे हैं. आगे भी करेंगे जिसने भी कहा वह हिंदी की सेवा कर रहा है, साफ़ समझ लीजिए कि उसे हिंदी नहीं आती, अँगरेज़ी तो क़तई नहीं आती और उसका इरादा भी दोनों में से किसी भाषा को सीखने या तमीज़ से बरतने का नहीं है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हिंदी की सेवा सत्यनारायण कथा की तरह है जिसमें सत्यनारायण की कथा के अलावा सब कुछ है, उसका महात्म्य है लेकिन कथा नहीं है. महात्म्य है तथाकथित पंडितों, आलोचकों, विद्वानों, साहित्यकारों का. जिसकी वजह से मैंने हिंदी में पहली बार ईमेल लिखा उसका क्या, जिसकी वजह से मैं हिंदी में ब्लॉग लिख रहा हूँ, पढ़ रहा हूँ उसका क्या...जिनकी वजह से हिंदी में टीवी के चैनल और वेबसाइटें चल रही हैं उनका क्या... उन्हें परवाह भी नहीं है. वे अपना काम कर रहे हैं, पैसे कमा रहे हैं, बाज़ार पर उनकी नज़र है, उन्हें सरकारी ख़र्चे पर न्यूयॉर्क जाने की नहीं पड़ी है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं हिंदीवाला हूँ और उसे आसान बनाने वालों का आभारी. मैं हिंदी में काम करता हूँ क्योंकि वह मेरी अपनी भाषा है और मुझे खूब अच्छी तरह आती है, मुझे अँगरेज़ी भी ठीक-ठाक आती है लेकिन वह मेरे मन की भाषा नहीं है, वह ज़रूरत की भाषा है इसलिए पर्याप्त ज्ञान के बावजूद उसमें लय नहीं है, लचक नहीं है, धार नहीं है. अँगरेज़ी में अगर मैं वही असर पैदा कर सकता जो हिंदी में कर लेता हूँ तो मैं बेवकूफ़ नहीं हूँ जो हिंदी में लिखता, मैं कोई हिंदी सेवक नहीं हूँ. हिंदी मेरे व्यक्तित्व का हिस्सा है, मैं हिंदी में सोचता हूँ इसलिए हिंदी में ही अपने आपको बेहतर व्यक्त कर सकता हूँ, बाक़ी सब अनुवाद है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिस तरह मैं हिंदी की सेवा नहीं कर रहा हूँ, उसी तरह बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान के लाखों-लाख लोग नहीं कर रहे हैं, उन्हीं के दम से हिंदी में पत्र-पत्रिकाएँ छप और बिक रही हैं, राजभाषा विभाग या विदेश मंत्रालय की कृपा से वे परे हैं इसलिए जीवित और सार्थक हैं वरना उनका भी अहर्ता, उपरोक्त, कदाचित, कदापि, यथोचित, निर्दिष्ट, तथापि, अधोहस्ताक्षरी वाला हाल हो चुका होता.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हर सरकारी दफ़्तर में मौजूद राजभाषा अधिकारी का काम ही है हिंदी को ऐसा बना देना ताकि अँगरेज़ी में काम करते रहने को जायज़ ठहराया जा सके. आपने कभी सोचा है कि आपको ब्लॉग लिखने में, हिंदी में पत्र-पत्रिकाएँ पढ़ने में कोई दिक्क़त नहीं होती तो सरकारी काम करने वालों को क्यों समस्या आती है. सिर्फ़ इसलिए कि हिंदी में काम नहीं हो रहा है, उसकी सेवा हो रही है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हिंदी का भला किसी के किए हो सकता है इससे ज़्यादा दंभ और मूर्खता की बात कोई और नहीं हो सकती. हिंदी का भला भी उसी तरह होगा जिस तरह अँगरेज़ी, स्पैनिश या किसी और बड़ी भाषा का हुआ है. सेवा करके नहीं बल्कि उसे बोलने-लिखने-पढ़ने की वजहें पैदा करके. इतना बड़ा सम्मेलन हो रहा है, किसी महान हिंदी सेवी की समझ में मामूली बात नहीं अँट रही कि हिंदी के बिना भारत में हर कॉर्पोरेट हाउस का काम चल रहा है जो चीन में नहीं चलता. भारत में हिंदी के बिना शान से काम चलता है और हिंदी वाले शर्मसार हैं, कल्पना कीजिए कि भारत जैसे बड़े बाज़ार में पैठ बनाने के लिए हिंदी आवश्यक होती तो स्थिति क्या होती.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारत में जितनी हिंदी बची है वही बचा हुआ भारत है, बाक़ी इंडिया है. इंडिया में हिंदी के बिना मज़े में काम चलता है बल्कि वहाँ हिंदी डाउनमार्केट है, सिर्फ़ ड्राइवर, चपरासी, सब्ज़ीवाले और नौकरों से बोली जाने वाली भाषा है जो भारत से आते हैं. महानगरों में वही लोग हिंदी वाले हैं जिनके संस्कार क़स्बाई हैं, जो पैदाइशी या दूसरी पीढ़ी के शहरी हैं उनके लिए हिंदी एक गंवारू, डिफ़िकल्ट या यूज़लेस भाषा है, कम से कम ऐसी भाषा तो नहीं है जिसमें लिखा जाए और पढ़ा जाए, ठीक है टीवी पर चल सकता है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जो भाषा अपनी ज़मीन पर तिरस्कृत है उसे संयुक्त राष्ट्र की भाषा बनाने का पोला अभियान चलाने वाले अगर यही कार्यक्रम कर्नाटक या असम कर लेते तो शायद ज़्यादा सार्थकता होती, लेकिन सेवा का मेवा कैसे मिलता, न्यूयॉर्क गए बिना?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हिंदी का जो भी प्रचार-प्रसार हुआ है वह किसी हिंदी सेवक की कृपा या साधना से नहीं हुआ है, वह हुआ है सिर्फ़ बाज़ार की ताक़त की वजह से. मुंबई का सिनेमा हो या देश का हिंदी टीवी उसने हिंदी का प्रसार किया. 14 सितंबर को हिंदी का श्राद्ध करने वालों या न्यूयॉर्क में हिंदी का जश्न मनाने वालों से न पहले कभी हुआ है, न आगे कभी होगा. हिंदी चैनलों की भाषा बहस का मुद्दा हो सकती है, हिंदी सेवकों की भूमिका पर वक़्त ज़ाया करने का कोई तुक नहीं है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सीधी सी बात है जिसे मानने में लोग बहुत देर लगा रहे हैं, जब तक हिंदी जानने, बोलने और लिखने की वजह से लोगों का जीवन बेहतर नहीं होगा तब हिंदी का यही हाल रहेगा. हिंदीवाला समृद्ध होगा तो हिंदी प्रतिष्ठित होगी वरना उसकी दरिद्रता की गुदड़ी पहने उसकी भाषा घूमती रहेगी. एक छोटी सी मिसाल लीजिए, हिंदी के टीवी समाचार चैनल चले, पत्रकारों के लिए महीने के लाख रूपए की तनख्वाह आम हो गई, हिंदी का मीडिया मार्केट रातोरात अपमार्केट हो गया. अँगरेज़ी में सोचने वाले, आह-उह के बदले आउच करने वाले फटाफट सीखने लगे कि नो कॉन्फिडेंस मोशन को अविश्वास प्रस्ताव कहा जाता है....कू को तख़्तापलट कहते हैं और इमरजेंसी मतलब आपातकाल... वीर संघवी गुलाबी हिंदी बोलने लगे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब तक पैसे नहीं थे तब तक हिंदी वर्नाकुलर था, अब मेनस्ट्रीम है. लेकिन यह सिर्फ़ मीडिया में हुआ है, इसे और क्षेत्रों में जो कर दिखाएगा वही हिंदी की सेवा भी करेगा और मेवा भी खाएगा. बाक़ी सब बकबक है या कोरी लालच, ज़्यादा ध्यान मत दीजिए.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6853758773001535028-8461865961787095149?l=anamdasblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://anamdasblog.blogspot.com/feeds/8461865961787095149/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6853758773001535028&amp;postID=8461865961787095149&amp;isPopup=true' title='27 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6853758773001535028/posts/default/8461865961787095149'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6853758773001535028/posts/default/8461865961787095149'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://anamdasblog.blogspot.com/2007/07/blog-post_16.html' title='हिंदी की सेवा मत करिए, प्लीज़'/><author><name>अनामदास</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06852915599562928728</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_fR7cWVj99s0/SKvHGScbUlI/AAAAAAAAAIY/dP4fvrpVCXk/S220/images.jpg'/></author><thr:total>27</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6853758773001535028.post-8825555468480702280</id><published>2007-07-12T00:43:00.000+01:00</published><updated>2007-07-12T00:43:08.795+01:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अनामदास का चिट्ठा'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='blogger'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='blog'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='hindi'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='ब्लॉग'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='anamdas ka chitta'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='हिंदी'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='ब्लाग'/><title type='text'>सत्ता के शीर्ष पर पहुँचने वाले संत नहीं होते</title><content type='html'>इतिहास में किसी आदमी की सही जगह आँकना बहुत कठिन काम होता है, ख़ास तौर पर अगर व्यक्ति अभी-अभी इस संसार से विदा हुआ हो.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आम तौर पर उसे नापसंद करने वाले कम बोलते हैं और पसंद करने वाले भाव-विभोर होकर नए-नए गुण ढूँढ लेते हैं जिनका खंडन करने वाला व्यक्ति (अगर संयोगवश ईमानदार हुआ तो) जा चुका होता है और ज्यादातर सज्जन पुरुष तेरहवीं से पहले मुँह नहीं खोलना चाहते.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जो लोग सत्ता के शीर्ष पर पहुँच चुके होते हैं उन्हें कड़ी परीक्षा से गुज़रना होता है. गांधी या लोहिया को कभी उस परीक्षा से नहीं गुज़रना होगा जिससे नेहरू, इंदिरा जैसे दूसरे नेता गुज़रे. चंद्रशेखर बहुत कोशिश करके अल्पकाल के लिए सत्ता सुख भोगने वालों की श्रेणी में पहुँचे थे, वरना उनके मूल्यांकन में भी बिनोबा-जेपी वाली रहमदिली बरती जाती. उन्हें जॉर्ज फर्नांडिस से बहुत बेहतर साबित करने के लिए राजनीतिक शोध के धरातल पर जाने की ज़रूरत पड़ेगी. बिना पड़ताल के महान की श्रेणी में आने के दावेदार वे नहीं हो सकते.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जैसा कि अक्सर होता है, सत्ता में उनके कुछ महीने उनकी विपक्ष की शानदार पारी पर भारी पड़े. उन्होंने बहुत संघर्ष किया, युवा तुर्क कहलाए, विपक्ष और सत्ता की राजनीति दोनों की. उन्होंने हमेशा दिखाया कि वे भारत की रग-रग से वाकिफ़ हैं, सियासत और समाज की नब्ज़ पर उनकी पकड़ बहुत गहरी है. वे ज़मीन से जुड़े नेता थे, जनता की भाषा बोलते थे और साथ ही बड़े आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक मुद्दों पर उनकी समझ काफ़ी साफ़ थी. मगर...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भूलना नहीं चाहिए कि वे चंद्रास्वामी जैसे पापी और सुब्रह्मण्यम स्वामी जैसे कपटी के निकटतम थे, भूलना नहीं चाहिए कि वे सूरजदेव सिंह जैसे जालिम कोयला माफ़िया के सरपरस्त थे...भूलना नहीं चाहिए कि उन्होंने अपने ख़ासम-ख़ास लोगों के लिए पर्याप्त निर्लज्जता से (जिसे उनके चाहने वाले निर्भीकता कहेंगे) सभी नियमों-मर्यादाओं-परंपराओं की हेठी की जिनकी बात वे गरज-गरजकर करते थे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरा इरादा चंद्रशेखर के बहाने एक दूसरी बात कहने का है, उनका दिन-तारीख़-घटना के हिसाब से मूल्यांकन करने का नहीं है. मेरा अनुरोध सिर्फ़ इतना है कि अगर किसी प्रिय व्यक्ति की मृत्यु से दुख पहुँचा हो तो अपने दर्द को झेलें-बाँटें, लेकिन जब सार्वजनिक स्तर पर किसी के राजनीतिक-सामाजिक मूल्यांकन की बात आए तो ध्रुवों पर जाने से बचें. यह चंद्रशेखर के साथ भी अन्याय है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तमाम तरह की जोड़-तोड़ की राजनीति करके सत्ता के शीर्ष पर पहुँचने वाले व्यक्ति को संत महात्मा आदि कहना भावातिरेक की अतिशयोक्ति है. सत्ता की संरचना को समझने वाला कोई भी आदमी जानता है कि वहाँ ऊपर चढ़ने के लिए क्या-क्या करतब करने पड़ते हैं. संत-महात्मा ऐसे करतब नहीं करते और जो करते हैं वे संत-महात्मा नहीं होते.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लालू के गाय दुहने और कर्पूरी बाबू के हजामत बनाने की तस्वीरें जो मीडिया में दिखीं थीं वो अनायास नहीं थीं. वाजपेयी का कवि एक योजना के तहत झाड़-पोंछकर ज़िंदा किया गया और राजा वीपी सिंह की चित्रकारी में नए रंग भरे गए. वाजपेयी और राजा दोनों ऐसी अदा दिखाते हैं कि हम तो कवि और चित्रकार थे, ग़लती से राजनीति में आ गए.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सबकी अपनी-अपनी छवि होती है, चंद्रशेखर की छवि जो विपक्ष के विद्रोही नेता की थी उसी के तौर पर उनका सम्मान था, और रहेगा. राजनीति के बाज़ार में इमेज का सबसे ज्यादा मोल होता है. चंद्रशेखर बागी, विद्रोही, बेलाग होने की छवि को खाद-पानी देते रहे लेकिन उन्होंने सत्ता में आने के लिए हर वो काम किया जो कोई दूसरे घाघ नेता करते हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चंद्रशेखर बड़े नेता थे, खाँटी थे, ऑरिजनल थे, जुझारू थे, अपना अलग तेवर था, बाद के दौर में जब अकेले रह गए थे तो काफ़ी स्टेट्समैन की तरह हो गए थे. वे निश्चित तौर पर असाधारण नेता थे क्योंकि वे कोई ख़ानदानी नेता नहीं थे, न ही देवेगौड़ा की तरह भाग्यवान. उन्हें हार्दिक श्रद्धांजलि मगर...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस असहमति के साथ कि वे कोई संत नहीं थे, समझदार सियासतदाँ ज़रूर थे.  अंतिम बड़े नेता थे समाजवादी धारा के शायद इसलिए कुछ लोग अधिक भावुक हो रहे हैं.  दुखी तो मैं भी हूँ.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6853758773001535028-8825555468480702280?l=anamdasblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://anamdasblog.blogspot.com/feeds/8825555468480702280/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6853758773001535028&amp;postID=8825555468480702280&amp;isPopup=true' title='10 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6853758773001535028/posts/default/8825555468480702280'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6853758773001535028/posts/default/8825555468480702280'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://anamdasblog.blogspot.com/2007/07/blog-post_12.html' title='सत्ता के शीर्ष पर पहुँचने वाले संत नहीं होते'/><author><name>अनामदास</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06852915599562928728</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_fR7cWVj99s0/SKvHGScbUlI/AAAAAAAAAIY/dP4fvrpVCXk/S220/images.jpg'/></author><thr:total>10</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6853758773001535028.post-594217598292798347</id><published>2007-07-10T02:09:00.000+01:00</published><updated>2007-07-10T02:09:31.956+01:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अनामदास का चिट्ठा'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='blogger'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='blog'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='hindi'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='ब्लॉग'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='anamdas ka chitta'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='हिंदी'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='ब्लाग'/><title type='text'>परत-दर-परत, चक्कर-पर-चक्कर</title><content type='html'>जीवन में कुछ भी ऐसा नहीं है जो परतदार न हो. जीवन की अपनी परतें हैं. अवस्था की परतें, दुरावस्था की परतें, व्यवस्था की परतें, चीज़ों के होने की परतें, उनके न होने की परतें.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इन सबसे बढ़कर इन परतों को लट्टू की तरह घुमाने वाला चक्र...लट्टू की रंग-बिरंगी धारियाँ जब घूमती हैं तो कुछ और होती हैं, जब रूकती हैं तो कुछ और. लट्टू के खेल में जीवन का आनंद लेने वाले भी हैं और उसकी गति को समझने में सिर खपाने वाले भी...यह फ़ितरत की बात है, इस फ़ितरत की भी परतें हैं. कुछ चीज़ों की परतें हमें दिखती हैं कुछ की नहीं दिखतीं, लेकिन होती ज़रूर हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दुकानदार का लालच दिखता है, उसकी बिन-ब्याही बेटी दिखती है, उसकी जवानी दिखती है, उसका दहेज नहीं दिखता, उसके रिश्तेदारों के ताने नहीं दिखते...सब एक ही चीज़ की परतें हैं, कुछ दिखती हैं, कुछ नहीं दिखतीं, कुछ किसी को दिखती हैं तो कुछ किसी और को, सब कुछ सबके लिए अंधों का हाथी है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ग्राहक की भी अपनी परतें हैं, उसकी भी बेटी है, उसके लिए सबसे बड़ा सवाल रोटी है..उसके लिए दुकानदार पापी है लेकिन उसके अपने पाप भी हैं, वह पीड़ित भी है लेकिन वह अपनी पत्नी का सामंत भी है मगर उन गायों का मालिक कोई और है जिन्हें वह चराता है...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;...इच्छा हो तो गाय से घास तक की परतों पर जाइए. भूलिए मत कि बीच में दूध, मलाई, हलवाई, गोबर, गोचर, धर्म, संवेदना, सांप्रदायिकता, वगैरह भी परतों की शक्ल में मौजूद हैं, जिनकी अगली परतें हैं---दही, रोज़गार, गंदगी, गृहप्रवेश की रस्म, भूसा, चरवाहा, बाज़ार, पैसा, राजनीति और दुकान पर खड़ा गाँव से भागा लड़का वगैरह... हर चीज़ की तरह लड़के के जीवन की भी परतें हैं--गाँवों की बदहाली, शहरीकरण, अशिक्षा, बेरोज़गारी, माँ-बाप की लाचारी...चाहे-अनचाहे गाँव अमलाकोट से अटलांटिस तक सब परतें एक दूसरे जुड़ जाती हैं. और ध्यान रहे सब कुछ घूमता भी है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बहरहाल, घास के नीचे मिट्टी है जिसके नीचे केंचुए हैं और उसके नीचे पानी और फिर खनिज-लवण, गाय के मालिक के ऊपर भी देखिए ज़रा-- बीडीओ-सीएम-पीएम-यूएस-यूएन...प्लैनेट अर्थ...उसका वायुमंडल, उपग्रह चाँद, सौरमंडल...उसके बाद...थोड़ा-थोड़ा पता है...उसके बाद कुछ पता नहीं...इन सबके आपस के रिश्ते और उन सबकी परतें और फिर उन परतों का घूमता लट्टू...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सपनों, भावनाओं, ज़रूरतों, मजबूरियों, बेचैनियों, उम्मीदों, आशाओं...की अपनी परतें हैं. ये सब परतें एक-दूसरे से लिपट जाती हैं और उसके बाद घूमती हैं...हम भी घूमते हैं उस लट्टू के रंगों को पढ़ने की कोशिश करते हुए.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हम से कुछ नहीं बन पड़ा, हमने डींगें बहुत हाँकी, न सबसे छोटा हमारे पल्ले पड़ा, न सबसे बड़ा. कोई वैज्ञानिक नहीं कह सकता कि परमाणु से छोटी कोई चीज़ नहीं, न ही पता कि ब्रह्मांड से बड़ा क्या है, कैसा है... है भी या नहीं...ब्रह्मांड का ही कहाँ पता है? ठहरिए, आप भूल गए कि कर्षण, गुरुत्वाकर्षण, चुंबकीय बल से घूम रहा है सब कुछ लट्टू की तरह. वाक़ई आश्चर्य होता है कि इतना कम जानते हुए अगर आदमी वाक़ई सफल है, तो इतना सफल कैसे है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस धरती से चार हज़ार गुना बड़ा पिंड जिसकी ब्रह्मांड के स्केल पर कोई औक़ात नहीं, गिर सकता है अचानक और कर सकता है सारी परतों को एक-बराबर, और माइक्रोस्कोप से भी न दिखने वाला अब तक अनजान रहा वायरस भी कर सकता है यही कारनामा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमारी सारी उछलकूछ बीच में कहीं है, जानने-समझने की होड़ लगी है--एक दूसरे से भी और अनंत से भी. हम हमेशा अपना दायरा खींचते हैं और उसके बीच सबसे अक्लमंद, दूसरे या तीसरे बड़े अक्लमंद होने की बात करते हैं लेकिन अगर हम सचमुच अक्लमंद होते हैं तो अपना दायरा भी जानते हैं कि वह पाँच सौ लोगों का है, पाँच हज़ार लोगों का.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अक्लमंद होने की निशानी यही है कि बेवकूफ़ होने का एहसास बना रहे ताकि जानने की प्यास बनी रहे, इसका ठीक उल्टा भी सही है कि अक्लमंद होने का एहसास बना रहे कि जानने की ज़रूरत न महसूस हो और हम वही बने रहें जो हमें पसंद है.  वैसे जानने की प्यास बनी रहने में भी कोई खुश होने की बात नहीं है क्योंकि उसकी भी अपनी परतें हैं जो घूम रही हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब घूमती धरती का नक्शा बन सकता है तो इस धरती पर घूम रहे 'श्रेष्ठतम जीव' के ज्ञान का भी नक्शा बन सकता है, उसमें कुछ लोग लगे हैं... उनकी अपनी परतें हैं...लगे हैं ज्ञान का नक्शा बनाने में. सूचना, जानकारी, अनुभव, इन सबसे मिलकर बनता है ज्ञान, ज्ञान के परिमार्जन और विश्लेषण से बनती है बुद्धिमत्ता और उसके बाद यह आभास कि सारे ज्ञान तो पोले हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अनामदास का सूत्र बस इतना है कि परत-दर-परत अनवरत और चक्कर-पर-चक्कर जब तक चक्कर न आ जाए, जिसने अपने-आपको समझदार समझा वह ज़रूर किसी परत पर ठहर गया है या किसी चक्कर पर चकरा गया है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब बनाइए नक्शा और इसकी सूचना फ़ौरन भेजिए मुझे या मेरे प्रिय प्रमोद सिंह जी को, बीच में परत या चक्कर मेरी जानकारी के मुताबिक़ कोई और नहीं है.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6853758773001535028-594217598292798347?l=anamdasblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://anamdasblog.blogspot.com/feeds/594217598292798347/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6853758773001535028&amp;postID=594217598292798347&amp;isPopup=true' title='6 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6853758773001535028/posts/default/594217598292798347'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6853758773001535028/posts/default/594217598292798347'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://anamdasblog.blogspot.com/2007/07/blog-post_10.html' title='परत-दर-परत, चक्कर-पर-चक्कर'/><author><name>अनामदास</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06852915599562928728</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_fR7cWVj99s0/SKvHGScbUlI/AAAAAAAAAIY/dP4fvrpVCXk/S220/images.jpg'/></author><thr:total>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6853758773001535028.post-4342079573963847710</id><published>2007-07-01T01:35:00.000+01:00</published><updated>2007-07-01T01:35:39.031+01:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अनामदास का चिट्ठा'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='ब्लॉगर'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='blogger'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='blog'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='hindi'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='anamdas ka chitta'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='हिंदी'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='ब्लाग'/><title type='text'>गालियों के बारे में सोचो #!$%^&amp;*()+#</title><content type='html'>गालियाँ देना अँगरेज़ी बोलने की तरह है, अभ्यास होना बहुत ज़रूरी है. पूरा नेसफ़ील्ड ग्रामर रट जाने के बाद भी अँगरेज़ी नहीं बोल पाते हैं कुछ लोग. कितना भी ज़हर भरा हो कुछ लोग गालियाँ नहीं दे पाते.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं भी गालियाँ नहीं दे पाता, मगर मैं गालियाँ देने वाले को बुरा और गालियाँ न देने वाले संस्कारवान व्यक्ति मानने के लिए तैयार नहीं हूँ. इससे बुरा सामान्यीकरण शायद कोई दूसरा नहीं है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सदियों से गालियाँ सर्वव्यापी हैं, मुंगेर से लेकर मैनहैटन तक कमोबेश एक जैसे भाव लिए हवा में तैरती हैं. सिर्फ़ आरामदेह सत्य का संधान करने की सभ्य समाज की आदत ने गालियों को हमेशा दायरे से बाहर रखा. गालियाँ सुनना किसी को अच्छा नहीं लगता इसलिए एक आम सहमति है कि कोई उनकी बात न करे. इसी आम सहमति के कारण गालियों की भूमिका और उनकी आवश्यकता स्थापित नहीं हो सकी, मगर देखिए कि उनका सहज प्रवाह भी किसी के रोके नहीं रुका.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अच्छी-अच्छी किताबों और अच्छे घरों से झाड़-पोंछकर गालियों को निकाल दिया गया हो लेकिन म्युनिसापालिटी के नल पर गालियाँ देने से एक कनस्तर पानी ज्यादा मिलता है, फुटपाथ पर एक फुट जगह निकल आती है, नहर का पानी अपने खेत की ओर मोड़ा जा सकता है... अनंत रूप, गुण, आकार-प्रकार, उपयोग-दुरुपयोग हैं गालियों के. आपको नहीं लगता कि सोचने की ज़रूरत है उनके बारे में.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हम और आप सभ्य लोग हैं, हम चाहते हैं कि हमारे आसपास कोई गंदगी न हो लेकिन चाय की दुकान पर काम करने वाले लौंडे का पूरा जीवन ही गाली है. सभ्य लोग न तो उस लौंडे के बारे में बात करते हैं और न ही उन गालियों के बारे में जो उस पर अनवरत बरसती रहती हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गालियाँ कौन दे रहा है, किसे दे रहा है, क्यों दे रहा है...इन सवालों पर गालियों का गाली होना छा जाता है. यहीं गाली देने वाला हार जाता है, अपना केस ख़राब कर बैठता है, भले मुद्दा कितना भी जायज़ क्यों न हो. होशमंद लोगों को क्या एक पल ठहरकर देश-काल-परिस्थिति पर विचार नहीं करना चाहिए? इस बारिश में कोई कारवाला किसी को कीचड़ से सराबोर करके चला जाए तो नहाने वाला क्या देगा?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दुरुपयोग धर्मग्रंथों का होता है तो गालियों का क्यों नहीं होगा, आख़िर उनमें दम है. जिस चीज़ में दम है उसका उपयोग-दुरुपयोग दोनों होता है. मार्क ट्वेन ने कहा था--'कई बार गालियाँ देकर आत्मा को जो सुकून मिलता है वह प्रार्थना से भी नहीं मिलता.' मैं गालियों के दुरुपयोग के उतना ही ख़िलाफ़ हूँ जितना धर्मग्रंथों के दुरुपयोग के. मैं न धर्मग्रंथों के ख़िलाफ़ हूँ, न गालियों के, सारा सवाल संदर्भ का है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मध्यवर्गीय संस्कार कहते हैं गालियाँ हर हाल में बुरी हैं. ठीक वैसे ही जैसे कई बुरी चीज़ें हर हाल में अच्छी बताई जाती हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब एक तादाद में लोग एक गाली पर सहमत हो जाते हैं तो नारा बन जाता है. इस लिहाज से दुनिया में कोई परिवर्तन गालियों के बिना नहीं हुआ. किसी आदमी को कुत्ता कहना गाली है इसलिए नहीं कहना चाहिए, यह बात सभी बच्चों को बताई गई है. पाकिस्तान में आजकल एक बड़ा दिलचस्प नारा लग रहा है--'अमरीका ने कुत्ता पाला, वर्दी वाला, वर्दी वाला.' पाकिस्तान में बच्चा-बच्चा यह नारा लगा रहा है, कोई नहीं कह रहा कि 'बंद करो ये गाली है.'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गालियों का समर्थक नहीं हूँ लेकिन अंधविरोधी भी नहीं. जो गालियाँ खाने का हक़दार है, वह खाएगा और उसे बचाना शायद अधर्म हो.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक गंभीर एतराज़ ज़रूर है, माँ-बहन की गालियों को लेकर. ग़ौर से देखिए तो समझ में आएगा कि ये गालियाँ महिलाओं को नहीं बल्कि सभी पुरूषों को दी जा रही हैं जिन्होंने महिलाओं को अपनी दौलत समझा और उनके शरीर को अपनी जायदाद. औरतों के नाम से दी जाने वाली सभी गालियाँ पुरुषवादी समाज पर पड़ रही हैं, एक ऐसे समाज पर जिसने महिलाओं का सम्मान नहीं किया बल्कि उसे अपने सम्मान का सामान बनाया. गाली देने वाले का उद्देश्य आपके सम्मान को ही तो आहत करना है तो वह किसे गाली देगा?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मनसा-वाचा-कर्मणा हिंसा करने वालों के ख़िलाफ़ न्यूनतम हिंसा है गालियाँ. गालियों में आह-कराह-हेठी-हिकारत-हिमाकत-साहस-दुस्साहस सब है. गालियों में टुच्चापन-लुच्चापन-बेहूदगी-बेहयाई-बदतमीज़ी भी है. गालियों के बारे में सोचिए, आप-हम नहीं रहेंगे लेकिन गालियाँ रहेंगी, तब तक जब तक दुनिया में दर्द, बेचैनी, अन्याय, शोषण, अनाचार, कदाचार, ग़ैरबराबरी...रहेगी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ ऐसे भी होते हैं जो कारक की तरह वाक्य को पूरा करने के लिए गालियाँ देते हैं, शहर, धूप साइकिल और बिल्डिंग से लेकर अपने आप तक को. ऐसे निर्गुन संतों की बात और है, आप संयोगवश उनकी ज़द मे आ जाते हैं तो बुरा न मानिए. उनकी गारी, गारी नहीं तरकारी होती है. भावशून्य गाली में धार कहाँ.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भूलिए मत, गालियाँ प्यार और अपनापे के इज़हार के लिए भी होती हैं, शादी के शुभ अवसर पर भी गाई जाती हैं. गालियाँ अच्छी-बुरी नहीं होंतीं, परिस्थिति और पात्र पर ग़ौर करके ही उचित-अनुचित का निर्णय संभव है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(चौपटस्वामी और अफ़लातून जी के भड़काने पर दी गई हैं ये गालियाँ.)&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6853758773001535028-4342079573963847710?l=anamdasblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://anamdasblog.blogspot.com/feeds/4342079573963847710/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6853758773001535028&amp;postID=4342079573963847710&amp;isPopup=true' title='9 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6853758773001535028/posts/default/4342079573963847710'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6853758773001535028/posts/default/4342079573963847710'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://anamdasblog.blogspot.com/2007/07/blog-post.html' title='गालियों के बारे में सोचो #!$%^&amp;*()+#'/><author><name>अनामदास</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06852915599562928728</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_fR7cWVj99s0/SKvHGScbUlI/AAAAAAAAAIY/dP4fvrpVCXk/S220/images.jpg'/></author><thr:total>9</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6853758773001535028.post-2890399139139106950</id><published>2007-06-22T02:53:00.001+01:00</published><updated>2007-06-22T02:53:16.946+01:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अनामदास का चिट्ठा'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='blog'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='hindi'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='anamdas ka chitta'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='हिंदी'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='ब्लाग'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='हिन्दी'/><title type='text'>मुहल्ले, क़स्बे और महानगर में भटकता अनामदास</title><content type='html'>अचानक वो सब अच्छा लगने लगा है जो पीछे छूट गया, मैंने कुछ भी रौंदा नहीं मगर पीछे छूट गई चीज़ों को न उठा पाने का अफ़सोस सालता है. रेला आगे जा रहा है जहाँ छूट गई चीज़ को पलटकर उठाना मुमकिन नहीं है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने नहीं उठाया इसीलिए सब रौंदे गए, हाथ से गिरे गली, मुहल्ले, आँगन, कुएँ, आम-अमरूद, गिल्ली डंडे, लट्टू, पतंग, कंचे... वक़्त के क़दमों तले. अपराध बोध है जो जाता ही नहीं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नॉस्टेलजिया एक रोमैंटिक चीज़ हुआ करती थी, आजकल स्क्रित्ज़ोफिनिया की तरह एक मनोविकार है, कम से कम बुढ़ा रहे आदमी का प्रलाप तो ज़रूर.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क़स्बे में निम्न-मध्यमवर्गीय परिवार पैदा होकर पहले भारत और उसके बाद दुनिया के महानगरों को देखने वाले चालीस के करीब पहुँच रहे आदमी की त्रासदी बड़ी विचित्र है, न बताते बनती है, न छिपाते. वह पूरी तरह वस्तुहारा है, न इधर का न उधर का. उसकी प्यास कहीं नहीं बुझती, उसकी बेचैनी कभी नहीं मिटती.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सैटेलाइट टीवी के सैकड़ों चैनल मिलकर घुर्र-घुर्र करने वाले आकाशवाणी जैसा सुकून नहीं दे रहे, महँगे से महँगे रेस्तराँ नंदू की कचौड़ी-जिलेबी का सुख नहीं दे रहे, फ्रिज की आइसकोल्ड बियर से वह तरावट नहीं मिल रही जो सौंफ या बेल के शर्बत से मिलती थी...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गर्मी की दुपहरी में दाल-भात-सब्ज़ी के ऊपर से आम खाकर सफ़ेद गंजी-पजामा पहनकर छह नंबर पर पंखा चलाकर डेढ़ घंटे सोने का स्वर्गतुल्य सुख अब कहाँ है. उसके लिए वही घर चाहिए, अपने पेड़ का आम चाहिए और शायद वही उम्र चाहिए...और किसी तरह की नौकरी कतई नहीं चाहिए.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;घर था, फ्लैट नहीं, आँगन था, बालकनी नहीं, मालती, हेना, गुलाब सब पसरे थे, आँगन में आम-अमरूद तो थे ही ओल (सूरन,जिमीकंद) न जाने कैसे अपने-आप ज़मीन के नीचे आ बैठता था. नालियों में छछूंदर रेंगते थे, दीवारों पर काई जमती थी, पूरी बारिश भुए रेंगते थे जो धूप निकलने पर भूरी-धूसर-काली तितलियाँ बनकर उड़ने लगते थे, चार-पाँच तरह के मेढ़क, पाँच-सात तरह के फतिंगे, दस-बीस तरह के कीड़े सब अपने-अपने चक्र के अनुरूप दर्शन देते. जिसे आजकल इकॉलॉजी कहा जाता है वह सब हमारे घर में था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बारिश की बूंदे पूरी रात छप्पर से स्विस घड़ी की तरह सेंकेंड-दर-सेकेंड गिरती थीं, मुंडेर पर बिल्लियाँ और चौराहे पर कुत्ते लड़ते थे, चौकी के नीचे चूहे दौड़ लगाते थे और मोड़ पर शराबी एक-दूसरे को पहले गालियाँ देते और बाद मे गले मिलते थे. सुबह हम गन्ना चूसते थे, दोपहर में झेंगरी (हरा चना) और शाम को फुचका (गोलगप्पा). लकड़ी के चूल्हे पर खाना पकता जिसमें शामिल थी अधगिरी छप्पर पर उगी तुरई की तरकारी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह गया वक़्त है जो लौटकर आ नहीं सकता. क़स्बे तो कुओं को पाट चुके हैं, आम-अमरूदों को काट चुके हैं, वे उन लड़कों की तरह हैं जो जवान होने की जल्दी में उगने से पहले ही दाढ़ी बनाने लगते हैं. मैं जिस क़स्बे को याद करके आँखें गीली करता हूँ आज का गाँव वहाँ आ पहुँचा होगा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं सोचता हूँ मेरे पिता कितने निर्द्वंद्व थे कि ख़ानदानी घर है, बच्चे यहीं रहेंगे, सब कुछ ऐसा ही रहेगा आम-अमरूद, आँगन-कुआँ...जैसा उनकी जवानी में था लेकिन कुछ भी नहीं रहा. मैं सोचकर डरता हूँ और दावे से नहीं कह सकता कि मेरा बेटा चाँद पर नहीं रहेगा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसे में कोई &lt;a href="http://www.blogger.com/feeds/2179815305421953170/posts/default/9076667054293314550"&gt;खवनई&lt;/a&gt; की बात करे, कोई &lt;a href="http://radiovani.blogspot.com/2007/05/blog-post_26.html"&gt;आकाशवाणी&lt;/a&gt; ट्यून करे, कोई &lt;a href="http://hgdp.blogspot.com/2007/04/blog-post_13.html"&gt;कोंहडौरी&lt;/a&gt; की याद दिलाए, कोई &lt;a href="http://pratyaksha.blogspot.com/2007/04/blog-post_18.html"&gt;पेटकुनिए&lt;/a&gt; लेटने की मुद्रा बताए, कोई &lt;a href="http://nirmal-anand.blogspot.com/2007/05/blog-post_1332.html"&gt;बिल्लू&lt;/a&gt; के बचपन का ज़िक्र छेड़ दे, कोई घर में पहली बार रखे गए &lt;a href="http://naisadak.blogspot.com/2007/04/blog-post_27.html"&gt;दर्शनीय फ्रिज&lt;/a&gt; की तस्वीर पेश करे, कोई &lt;a href="http://dilli-darbhanga.blogspot.com/2007/06/blog-post.html"&gt;दरंभगा के माटसाब&lt;/a&gt; की तस्वीर खींचे, कोई &lt;a href="http://kashivishvavidyalay.wordpress.com/"&gt;बनारस के क़िस्से&lt;/a&gt; छेड़े दे (कई और हैं...) तो ऐसा लगता है कि किसी ने ज़ख़्मों पर नरम फाहा रख दिया हो.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हम बदलते वक़्त के शरणार्थी हैं. कश्मीरी पंडित से चिनार और गुश्ताबा की बात दिल्ली में करो या न्यूयॉर्क में, आहें भरने के अलावा उसके पास चारा क्या है. वह कश्मीर नहीं लौट सकता, हम भी प्री-ग्लोबलाइज़ेशन दौर में नहीं जा सकते, बस आहें भर सकते हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक नया भरम है, आभासी दुनिया में अपने जैसे लोगों की खोज में भटक सकते हैं. ऐसे लोग जिनका अतीत हो, जो उन्हें याद हो, और भविष्य के सुनहरे सपनों से उनकी मेमरी चिप फुल न हो गई हो. उनसे गले मिल लें, हँस लें,  रो लें,  झूठ-मूठ ही एक बार फिर उस दौर को जी लें.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6853758773001535028-2890399139139106950?l=anamdasblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://anamdasblog.blogspot.com/feeds/2890399139139106950/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6853758773001535028&amp;postID=2890399139139106950&amp;isPopup=true' title='17 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6853758773001535028/posts/default/2890399139139106950'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6853758773001535028/posts/default/2890399139139106950'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://anamdasblog.blogspot.com/2007/06/blog-post_22.html' title='मुहल्ले, क़स्बे और महानगर में भटकता अनामदास'/><author><name>अनामदास</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06852915599562928728</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_fR7cWVj99s0/SKvHGScbUlI/AAAAAAAAAIY/dP4fvrpVCXk/S220/images.jpg'/></author><thr:total>17</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6853758773001535028.post-5235538918586182051</id><published>2007-06-20T01:19:00.001+01:00</published><updated>2007-06-20T01:19:36.602+01:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अनामदास का चिट्ठा'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='blogger'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='blog'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='hindi'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='ब्लॉग'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='anamdas ka chitta'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='हिंदी'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='ब्लाग'/><title type='text'>जो न हो सका उसकी तलाश है मुझे</title><content type='html'>आभासी लोक में विचर रहे दो जीवों (&lt;a href="http://pratyaksha.blogspot.com/2007/06/blog-post_19.html"&gt; प्र1&lt;/a&gt; &lt;a href="http://azdak.blogspot.com/2007/06/blog-post_4672.html"&gt;प्र2&lt;/a&gt;) ने सवाल सामने रखा कि कोई यहाँ क्यों आया, क्या चाहता है. ठीक वैसे ही जैसे लोग पूछते हैं--'आपके जीवन का उद्देश्य क्या है?'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जवाब तो नहीं है, बस एक सवाल है, अरे भाई जब पैदा होने का उद्देश्य नहीं था, मरने का कोई उद्देश्य नहीं है तो वक़्फ़े का उद्देश्य क्यों होना चाहिए? अगर होगा तो वही जाने जिसने हमारी इच्छा के बिना हमें बनाया और हमारी इच्छा के बग़ैर मार डालेगा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ लोग दावा करते हैं कि उन्हें उनके जीवन का उद्देश्य मिल गया है--देशसेवा, गौसेवा, जनसेवा, हिंदीसेवा से लेकर कारसेवा और अब नेटसेवा तक. मुझे कोई उद्देश्य नहीं मिला है, जिस तरह जीता हूँ उसे उद्देश्य कहने का हौसला मुझमें नहीं है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुझे जीवन का उद्देश्य तो नहीं पता लेकिन जिसे आभासी दुनिया कहा जाता है वहाँ मैंने स्वेच्छा से जन्म लिया. स्वयंभू हूँ, हर्मोफ़र्डाइट हूँ--एककोशीय जीव, जो ख़ुद से टूटकर बना है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आभासी दुनिया का उल्टा क्या हो सकता है, सोचता रहा मगर कोई ठीक शब्द नहीं मिला-स्पर्शी दुनिया? जीवन इहलोक है तो आप जिसे आभासी दुनिया कह रहे हैं वह शायद उहलोक. आभासी दुनिया में उतरने का सादा सा लेकिन बहुत बड़ा सा आकर्षण है, इहलोक में रहते हुए उहलोक में विचरण करना.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं वह सब कुछ चाहता हूँ जो इहलोक में नहीं मिल पाया, इहलोक में नौकरी है तो उहलोक में आज़ादी, इहलोक में सीमाएँ हैं तो उहलोक में स्वच्छंदता. उहलोक में जीने का आनंद उठाने के लिए सबसे ज़रूरी था नाम, काम, दाम आदि का त्याग इसलिए अनामदास का चोला पहना और निकल लिए ऐसा जीवन जीने जिसकी सीमाएँ नहीं मालूम, इहलोक वाले बंदे की सब सीमाएँ समय रहते मालूम हो गईं इसलिए चाकरी खोजी और लग गए नून तेल लकड़ी में.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जो उहलोक वाला था हमेशा से कसमसाता था, एक और जीवन जीने के लिए. उसके लिए एक और जन्म तक इंतज़ार करना पड़ता और इस जन्म को इतने बोरिंग तरीक़े से गुज़ारना पड़ता कि अगले जन्म में भी मनुष्य बनना नसीब हो. तभी अचानक &lt;a href="http://www.secondlife.com/"&gt;'सेंकेड लाइफ़'&lt;/a&gt; जैसा आइडिया आया, हमने कहा जो कुछ तनख़्वाह देने वाले ने नहीं ख़रीदा है वह उहलोक वाले के नाम. अनामदास गरियाता है कि साले ने कुछ नहीं दिया, एक-सवा घंटा देता है हफ़्ते में एकाध बार एहसान करके...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्या-क्या बिक गया है ठीक-ठीक नहीं पता, क्या-क्या बचा है, नहीं मालूम. शायद यही पता लगाने की कोशिश है आभासी दुनिया की मटरगश्ती. जब तक यही पता न हो कि खींसे में क्या है तब कैसे पता चलेगा कि झोले में क्या आएगा. आभासी दुनिया में कई जीव भटकते हैं अपनी तरह के, दूसरी तरह के भी, वही बता पाएँगे कि मेरे पास कुछ खरा है या बाउंस होने वाला चेक लिए घूम रहा हूँ.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बात ये है कि इहलोक में रहते हुए उहलोक की रेकी कर रहे हैं, देख रहे हैं कि अगर इधर से निकलकर उधर गए तो कोई आसन-पाटी मिलेगी या लतिया दिए जाएँगे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हर आदमी के अंदर कई-कई जीव रहते हैं, अभी तक दो का सस्ता-मद्दा इंतज़ाम हो पाया है, बाक़ियों को टरका दिया गया है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;समानांतर जीवन जीने की इस युक्ति से मुझे सचमुच निर्मल आनंद मिल रहा है लेकिन कई लोग हैं जो लगातार धमकाते रहते हैं कि पोल खोल देंगे. जो भाई इहलोक वाले को किसी भी तरह से जानते हैं उनसे अनुरोध है कि उहलोक वाले के असमय अवसान के पाप का भागी न बनें.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उहलोक में क्योंकर विचरण हो रहा है यह बताने की कोशिश की है, आगे सोचकर बताता हूँ कि धूप-छाँव, शहर-गाँव, ध्वनि-प्रतिध्वनि, आलाप-विलाप-प्रलाप क्या सुनना चाहता हूँ, क्या सुनकर मन खुश होता है और क्यों... फूड फॉर थॉट के लिए आप दोनों का आभार...&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6853758773001535028-5235538918586182051?l=anamdasblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://anamdasblog.blogspot.com/feeds/5235538918586182051/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6853758773001535028&amp;postID=5235538918586182051&amp;isPopup=true' title='7 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6853758773001535028/posts/default/5235538918586182051'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6853758773001535028/posts/default/5235538918586182051'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://anamdasblog.blogspot.com/2007/06/blog-post_20.html' title='जो न हो सका उसकी तलाश है मुझे'/><author><name>अनामदास</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06852915599562928728</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_fR7cWVj99s0/SKvHGScbUlI/AAAAAAAAAIY/dP4fvrpVCXk/S220/images.jpg'/></author><thr:total>7</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6853758773001535028.post-5845461188765819803</id><published>2007-06-18T01:37:00.001+01:00</published><updated>2007-06-18T01:37:20.580+01:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='blogger'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='hindi'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='anamdas ka chitta'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='चिट्ठा'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='हिंदी'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अनामदास'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='हिन्दी'/><title type='text'>नारद के सभी ईस्वामियों के समर्थन में</title><content type='html'>शीतल छाँव है, कलियाँ खिली हैं, खुशियाँ बिखरी हैं, भ्रमर गुंजन कर रहे हैं, गीत-संगीत का माहौल है, सब कुशल-मंगल है, शांति-शांति है, छेड़छाड़ थोड़ी-सी है जैसे शादियों में गालियाँ गाई जाती हैं. समधी मिलन जैसा समाँ है, सब एक-दूसरे को बधाई दे रहे हैं. अहा! कितना सुंदर आयोजन है, आप धन्य हैं, अरे आप भी धन्य हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दिन भर के थके-हारे योद्धा यहाँ कहानियों, कविताओं और चुटकुलों के चंदोवे में विश्राम करते हैं. भोमियो, जावा, ड्रीमवीवर, विस्टा जैसे-जैसे अग्रगामी पात्र हैं जो पूरी दुनिया के दुख-दर्द मिटाकर आनंदवर्षा कर रहे हैं. पूरी दुनिया एक दूसरे से जुड़ी है, जो नहीं जुड़े हैं वे चूहड़े हैं, पहले भी थे आगे भी रहेंगे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हम इस हरी-हरी वसुंधरा की स्वस्थ-समृद्ध संतानें हैं, हमने अपना भाग्य अपनी मेहनत से रचा है, जो नीचे से कराहते हैं उनकी बात करने के लिए नेता लोग हैं, टुटपुंजिए पत्रकार हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह हमारी दुनिया है, हमने बनाई है, यहाँ हमारी प्रगति की ललक है, यहाँ हमारी समझ की चमक है, यहाँ हमारी शक्ति की दमक है, हमारे पास इसका पासवर्ड है. यहाँ उन लोगों की बात क्यों करते हो जो किसी कैम्प-वैम्प में अपनी करनी का फल भोग रहे हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हवाई बातों के पवनपुत्र हमारी इस अ-शोक वाटिका में उत्पात मचाने आ गए हैं, हँसते-खेलते सरल परिवार में गरल लेकर 'विषराज' आ गए हैं, लेकिन सुन लो अब कलियामर्दन के लिए बाल-गोपाल तैयार हैं. अधरों पर मीठी-मीठी वंशी है लेकिन सुदर्शन चक्र को न भूलो, वह भी है हमारे पास.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रगति हो रही है, शेयर बाज़ार आसमान छू रहा है, अमरीका-यूरोप लोहा मान रहे हैं, जीडीपी उठान पर है...यह सब आपके दलित-गलित, वामपंथी-दामपंथी विचारों की वजह से नहीं हो रहा है, यह हमारी प्रतिभा है, योग्यता है...विचारों से न कुछ हुआ है, न होगा, ज़रूरत है मेहनत, लगन और सबसे बढ़कर बहसबाज़ी में समय बर्बाद न करने की.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पसीना बहाकर, सॉफ्टवेयर उड़ाकर, लिंक लगाकर, रातों की नींद गँवाकर...हमने एक कुनबा बनाया जिसमें सब समानधर्मा लोग थे, सबको विश्वास था कि--लेकर हाथों में हाथ, हम चलेंगे साथ-साथ, हम
