01 जुलाई, 2007

गालियों के बारे में सोचो #!$%^&*()+#

गालियाँ देना अँगरेज़ी बोलने की तरह है, अभ्यास होना बहुत ज़रूरी है. पूरा नेसफ़ील्ड ग्रामर रट जाने के बाद भी अँगरेज़ी नहीं बोल पाते हैं कुछ लोग. कितना भी ज़हर भरा हो कुछ लोग गालियाँ नहीं दे पाते.

मैं भी गालियाँ नहीं दे पाता, मगर मैं गालियाँ देने वाले को बुरा और गालियाँ न देने वाले संस्कारवान व्यक्ति मानने के लिए तैयार नहीं हूँ. इससे बुरा सामान्यीकरण शायद कोई दूसरा नहीं है.

सदियों से गालियाँ सर्वव्यापी हैं, मुंगेर से लेकर मैनहैटन तक कमोबेश एक जैसे भाव लिए हवा में तैरती हैं. सिर्फ़ आरामदेह सत्य का संधान करने की सभ्य समाज की आदत ने गालियों को हमेशा दायरे से बाहर रखा. गालियाँ सुनना किसी को अच्छा नहीं लगता इसलिए एक आम सहमति है कि कोई उनकी बात न करे. इसी आम सहमति के कारण गालियों की भूमिका और उनकी आवश्यकता स्थापित नहीं हो सकी, मगर देखिए कि उनका सहज प्रवाह भी किसी के रोके नहीं रुका.

अच्छी-अच्छी किताबों और अच्छे घरों से झाड़-पोंछकर गालियों को निकाल दिया गया हो लेकिन म्युनिसापालिटी के नल पर गालियाँ देने से एक कनस्तर पानी ज्यादा मिलता है, फुटपाथ पर एक फुट जगह निकल आती है, नहर का पानी अपने खेत की ओर मोड़ा जा सकता है... अनंत रूप, गुण, आकार-प्रकार, उपयोग-दुरुपयोग हैं गालियों के. आपको नहीं लगता कि सोचने की ज़रूरत है उनके बारे में.

हम और आप सभ्य लोग हैं, हम चाहते हैं कि हमारे आसपास कोई गंदगी न हो लेकिन चाय की दुकान पर काम करने वाले लौंडे का पूरा जीवन ही गाली है. सभ्य लोग न तो उस लौंडे के बारे में बात करते हैं और न ही उन गालियों के बारे में जो उस पर अनवरत बरसती रहती हैं.

गालियाँ कौन दे रहा है, किसे दे रहा है, क्यों दे रहा है...इन सवालों पर गालियों का गाली होना छा जाता है. यहीं गाली देने वाला हार जाता है, अपना केस ख़राब कर बैठता है, भले मुद्दा कितना भी जायज़ क्यों न हो. होशमंद लोगों को क्या एक पल ठहरकर देश-काल-परिस्थिति पर विचार नहीं करना चाहिए? इस बारिश में कोई कारवाला किसी को कीचड़ से सराबोर करके चला जाए तो नहाने वाला क्या देगा?

दुरुपयोग धर्मग्रंथों का होता है तो गालियों का क्यों नहीं होगा, आख़िर उनमें दम है. जिस चीज़ में दम है उसका उपयोग-दुरुपयोग दोनों होता है. मार्क ट्वेन ने कहा था--'कई बार गालियाँ देकर आत्मा को जो सुकून मिलता है वह प्रार्थना से भी नहीं मिलता.' मैं गालियों के दुरुपयोग के उतना ही ख़िलाफ़ हूँ जितना धर्मग्रंथों के दुरुपयोग के. मैं न धर्मग्रंथों के ख़िलाफ़ हूँ, न गालियों के, सारा सवाल संदर्भ का है.

मध्यवर्गीय संस्कार कहते हैं गालियाँ हर हाल में बुरी हैं. ठीक वैसे ही जैसे कई बुरी चीज़ें हर हाल में अच्छी बताई जाती हैं.

जब एक तादाद में लोग एक गाली पर सहमत हो जाते हैं तो नारा बन जाता है. इस लिहाज से दुनिया में कोई परिवर्तन गालियों के बिना नहीं हुआ. किसी आदमी को कुत्ता कहना गाली है इसलिए नहीं कहना चाहिए, यह बात सभी बच्चों को बताई गई है. पाकिस्तान में आजकल एक बड़ा दिलचस्प नारा लग रहा है--'अमरीका ने कुत्ता पाला, वर्दी वाला, वर्दी वाला.' पाकिस्तान में बच्चा-बच्चा यह नारा लगा रहा है, कोई नहीं कह रहा कि 'बंद करो ये गाली है.'

गालियों का समर्थक नहीं हूँ लेकिन अंधविरोधी भी नहीं. जो गालियाँ खाने का हक़दार है, वह खाएगा और उसे बचाना शायद अधर्म हो.

एक गंभीर एतराज़ ज़रूर है, माँ-बहन की गालियों को लेकर. ग़ौर से देखिए तो समझ में आएगा कि ये गालियाँ महिलाओं को नहीं बल्कि सभी पुरूषों को दी जा रही हैं जिन्होंने महिलाओं को अपनी दौलत समझा और उनके शरीर को अपनी जायदाद. औरतों के नाम से दी जाने वाली सभी गालियाँ पुरुषवादी समाज पर पड़ रही हैं, एक ऐसे समाज पर जिसने महिलाओं का सम्मान नहीं किया बल्कि उसे अपने सम्मान का सामान बनाया. गाली देने वाले का उद्देश्य आपके सम्मान को ही तो आहत करना है तो वह किसे गाली देगा?

मनसा-वाचा-कर्मणा हिंसा करने वालों के ख़िलाफ़ न्यूनतम हिंसा है गालियाँ. गालियों में आह-कराह-हेठी-हिकारत-हिमाकत-साहस-दुस्साहस सब है. गालियों में टुच्चापन-लुच्चापन-बेहूदगी-बेहयाई-बदतमीज़ी भी है. गालियों के बारे में सोचिए, आप-हम नहीं रहेंगे लेकिन गालियाँ रहेंगी, तब तक जब तक दुनिया में दर्द, बेचैनी, अन्याय, शोषण, अनाचार, कदाचार, ग़ैरबराबरी...रहेगी.

कुछ ऐसे भी होते हैं जो कारक की तरह वाक्य को पूरा करने के लिए गालियाँ देते हैं, शहर, धूप साइकिल और बिल्डिंग से लेकर अपने आप तक को. ऐसे निर्गुन संतों की बात और है, आप संयोगवश उनकी ज़द मे आ जाते हैं तो बुरा न मानिए. उनकी गारी, गारी नहीं तरकारी होती है. भावशून्य गाली में धार कहाँ.

भूलिए मत, गालियाँ प्यार और अपनापे के इज़हार के लिए भी होती हैं, शादी के शुभ अवसर पर भी गाई जाती हैं. गालियाँ अच्छी-बुरी नहीं होंतीं, परिस्थिति और पात्र पर ग़ौर करके ही उचित-अनुचित का निर्णय संभव है.

(चौपटस्वामी और अफ़लातून जी के भड़काने पर दी गई हैं ये गालियाँ.)

12 टिप्‍पणियां:

अरुण ने कहा…

गालीयो पर एक शानदार खोज बीन वाला आलेख
वैसे अब मूड तो हमारा भी हो रहा है प्यार वाली सही दो चार तो सुना दे,अ... आ..... यहा न्ही मे ल करते है

Udan Tashtari ने कहा…

वाह भाई, बहुत सही-कभी गालियों के एक और इस्तेमाल पर हम भी बखाने थे:

http://udantashtari.blogspot.com/2007/04/blog-post_09.html

ravish ने कहा…

गालियों से प्रेम का आगाज भी होता है। करीबी दोस्तों के बीच अनायास निकलती रहती हैं। दफ्तर में कम हो कर साला तक सीमित हो जाती हैं। भाषा संस्कार से विद्रोह हैं गालियां। गालियां दी जाती हैं और खाई जाती हैं। यह कमाल है। एक देता है दूसरा खाता है। रसोई से निकलती हैं क्या?
गालियों के समाजशास्त्र पर यह शोध प्रबंध जारी रहे।

अनूप शुक्ला ने कहा…

अच्छा है। गालियों के सामाजिक महत्व के बारे में आप ये लेख देखियेगा।

अफ़लातून ने कहा…

होली में भी कुछ गालियाँ नारा बन जाती हैं । काशी विश्वविद्यालय के छात्रावासों के बीच वसन्त पंचमी से होली तक गाली-स्पर्धा चलती है। काशी में गाली-युक्त कवि-सम्मेलन भी होता था । इसे लोकसंस्कृति बताया जाता है ।
सुन्दर लेख के लिए शुक्रिया ।

subhash_bhadauriasb@yahoo.com ने कहा…

गालियाँ बड़ी काम की हैं यार देने वाले और लेने वाले दोनो ही भाग्यशाली होते हैं. दोनो के दिमाग सही रहते हैं.हम तो यार दिन में एक बार नहीं अनेकबार ये प्रयोग करते हैं अकेले में जिन पर क्रोध आता है सबका नाम लेकर.ऐसा न करें तो एक आध का हम से वध हो सकता हैं अन्याय अत्याचार शोषण जब तक बरकरार है इनका वजूद रहेगा ही.जो काम संस्कृत के श्लोकों से नहीं होते गालियों से हो जाते हैं.
उस रोज प्राइवेट बस में ठूँस टूँस कर भरने पर एक महिला क्रोध में आगयी उस के पांव पर किसी का पांव आगया उसने सीधी गाली ड्राइवर को दी.हमें मज़ा आगया जो काम हम न कर सके उसने कर दिया.हमारे सामने मास्टरी का लेबल लगा है ज्ञानी चढ़ बैठेंगे छि भदौरिया जी आप पागल खाने से आये हैं.ऐसा करते हैं कुछ सलाह देंगे ग़ज़ले लिखिए
वो आपको चिरंजीवी बनायेंगी.इस तरह लोगों के कारण ही ज़िन्दगी दोजख बनी हुई है.अनाचार अत्याचार के समथर्क गालियों का विरोध करते हैं.
गालियों से आगे बढो यार.बकौले दुष्यन्त कुमार-
जरा सा तौर तरीकों में हेर फेर करो,
तुम्हारे हाथ में कालर हो आस्तीन नहीं.अब घिघियाने या खीसें निपोरने का जमाना नहीं दो गाली और क्रान्तिकारी हो जाओ.
डॉ.सुभाष भदौरिया अहमदाबाद

ज्ञानदत्त पाण्डेय Gyandutt Pandey ने कहा…

ये भदौरिया जी सही कह रहे हैं; गाली स्टीम रिलीज करने के लिये सेफ्टी-वाल्व की तरह है. यह अलग बात है कि कई लोगों में स्टीम होती ही नहीं.
बिना स्टीम का मनई भी क्या मनई!

Beji ने कहा…

खाँसना और थूकना अच्छा है या बुरा?

मेडिकल की किताबों में इनका differential diagnosis होता है।
कुछ मामूली सर्दी की वजह से, कुछ टी बी या न्यूमोनिया की वजह से.....कुछ इनसे भी गंभीर रोगों का लक्षण होती हैं।

कुछ से आराम मिलता है। कुछ से रोग फैलता है।

पर यह है लक्षण मात्र!!
इसके अस्तित्व के कारण अलग अलग हैं।

इनका विरोध करें या समर्थन.....शायद दोनों नहीं....अध्ययन जरूरी है क्योंकि तभी इसके पीछे के कारण पता लग सकते हैं।

गालियाँ भी ऐसी ही है। बचपन में मैं और मेरी दोस्त कभी कभार लिस्ट बना कर देखते थे किसे ज्यादा गालियाँ मालूम है.....वह हमेशा हार जाती....टीचर की बेटी थी ...हमेशा सभ्य भाषा ही सुनती थी....और मैं मौहले की सभी लड़ाइयों की चश्मदीद गवाह!!

नहीं मैं गालियों का विरोध नहीं करती....पर कौन किस तरह की गाली देता है उससे उसके व्यक्तित्व,परिवेश और स्वभाव का अंदाज़ा ज़रूर लगाया जा सकता है।

Isht Deo Sankrityaayan ने कहा…

गालियों पर इतनी सारी और ऐसी-ऐसी क्रियाएँ-प्रतिक्रियाएँ पढ़कर अब तो मेरा मन भी गरियाने का करने लगा है भाई. लेकिन अनामदास जी एक बात समझ में नहीं आयी. आप कैसे कलामघिस्सू हैं भाई! कलामघिस्सू तो अपनी स्याही की हर बूँद से गरिईबही करबे करता है. आपो इसमें भी गरियाने से नीं चूके हैं. फिर पियाज न खाने का ढोंग क्यों कर रहे हैं?

रविकर ने कहा…

गालियों पर विशेष चारा के लिए आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति शुक्रवार के चर्चा मंच पर ।। अनुमति दीजिये -

रविकर ने कहा…

आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति शुक्रवार के चर्चा मंच पर ।।

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

कैसी-कैसी गालियाँ, कैसी-कैसी सोच।
दील में सभी पचाइए, बाल रहे क्यों नोच!!