29 मार्च, 2008

अजित भाई, हिम्मत जवाब दे रही है

आपका बकलमख़ुद सरकलमख़ुद जैसा ही है. कई लोग हिम्मत जुटा लेते हैं, एक हफ़्ते से चिंता में घुला जा रहा हूँ कि आत्मकथानुमा क्या लिखूँ. आपका रिमाइंडर आने ही वाला होगा, दुनिया में शायद आप ही हैं जिसे मेरे सरकलमख़ुद न करने पर मलाल होगा.

सच मैं लिख नहीं सकता, झूठ भी लिखा नहीं जाएगा, तो फिर बचा क्या लिखने को. क्या आप मुझे इतना मूर्ख समझते हैं कि सब सच-सच लिख दूँ और कहीं मुँह दिखाने के काबिल न रहूँ. ऐसी बातें सबकी ज़िंदगी में होती हैं. जिसके जीवन में नहीं हैं वो झूठ बोल रहा है या फिर उसने जीवन बहुत संभालकर ख़र्च किया है, मानो किसी से माँगकर लाया हो, ज्यों की त्यों लौटानी हो, कबीर की चदरिया की तरह.

एक जीवन जिसे मैंने अपने जीवन की तरह जिया है, किसी और के जीवन की तरह बेलाग होकर उसके बारे में सच-सच कैसे लिख दूँ. इस बात के कोई आसार नहीं हैं कि मैं ये ग़ैर-मामूली काम कर पाऊँ. जो अपने जीवन को किसी और का समझकर जीते हैं वो अगर आत्मकथा लिख दें तो कमाल हो जाता है, माइ कन्फ़ेशंस इसकी सबसे अच्छी मिसाल है.

एक मध्यवर्गीय, सवर्ण, नौकरीपेशा, भीरू क़िस्म का पारिवारिक आदमी क्या खाकर पठनीय आत्मकथा लिख देगा. कुछ देखा हो, कुछ झेला हो, कुछ गुल खिलाए हों तब तो बताए. सोचता हूँ कि मैं कायर नहीं हूँ, कि मैं ईर्ष्यालु नहीं हूँ, कि मैं दंभी नहीं हूँ, कि मैं ढोंगी नहीं हूँ, कि मैं हिपोक्रेट नहीं हूँ...टाइप बातें लिख दूँ लेकिन फिर लगता है कि मैं अगर ये सब नहीं हूँ तो फिर क्या हूँ.

जो किया वो अच्छा नहीं लगा, जो नहीं किया वही अच्छा लगता है. काम में मन नहीं लगा, मन का काम नहीं किया. ऐसा जीवन हो और कोई प्यार से कहे कि बकलमख़ुद लिखिए तो जी घबराने लगता है.

कई बार लगता है-जिंदगी कुछ भी नहीं, फिर भी जिए जाते हैं, ऐ वक़्त तुझ पे एहसान किए जाते हैं...फिर लगता है- नहीं-नहीं ऐसा नहीं है, जीवन में इज़्ज़त की नौकरी (?) है, अपना घर है, अच्छी सी बीवी है, प्यारा सा बच्चा है, सब तो है. अगर नौकरी, घर, बीवी, बच्चे से आत्मकथा बनती तो पाँच अरब लोग बना चुके होते.

ख़ूबियाँ तो हैं नहीं, खोज-खोजकर अपने सारे ऐब गिना दूँ तो भी नहीं बनेगी पढ़ने लायक आत्मकथा. 37 साल क्या करने में गुज़ार दिए कि एक अदद आत्मकथा लिखने लायक़ नहीं हुए. इस उम्र में करने वाले क्या-क्या कर गुज़रते हैं, हम नौकरी करते रह गए. हर साल कम से कम दो-तीन बार ज़रूर सोचा कि नौकरी छोड़कर दुनिया घूम लें, कुछ लिखने लायक़ अनुभव जुटा लें फिर कुछ ऐसा तगड़ा सा लिखेंगे कि आग लग जाए हिंदी के बाज़ार में. नौकरी तो हम छोड़ने से रहे, अब नौकरी हमें छोड़ दे तो कुछ बात आगे बढ़े.

पता नहीं कितनी पचासों बातें हैं जो मैं ख़ुद से छिपाता रहा हूँ अगर मैं उन्हें लिखूँ तो पढ़ने वालों को बहुत मज़ा आएगा मगर वो बातें मन के अंधेरे कोनों में दफ़न होती हैं जहाँ ख़ुद जाने की हिम्मत नहीं होती है. कभी कोई घटना, कोई सपना बता देता है कि अंधेरे कोने में क्या-क्या दबा है, हमारा मन ढेर सारी इच्छाओं-कुंठाओं और वेदनाओं की कब्र है. शायद इसीलिए हम इतना कठिन जीवन फिर भी जी लेते हैं.

अजित भाई, आप नहीं कह रहे हैं कि जो लिखूँ वह सच ही हो, आप कह रहे हैं जो अच्छा लगे लिखिए, जैसे अच्छा लगे लिखिए...बस अपने बारे में लिखिए. लेकिन बकलमख़ुद इतना डरावना नाम है कि मेरी हिम्मत पस्त हो रही है. रोचक संस्मरण, यादगार पल, प्रेरक प्रसंग टाइप कोई नाम नहीं सोच सकते थे आप. आपके प्रस्ताव पर बहुत विचार किया लेकिन डरा-सहमा सा हूँ, क्या लिखूँ, क्यों लिखूँ, कोई क्यों पढ़ेगा? ब्लॉग पर तो कुछ भी अल्लम-गल्लम लिखते रहते हैं, बकलमख़ुद में कैसे लिखेंगे?

अपने ढेर सारे ऐबों में एक ये भी है कि बहुत इमेज कॉन्शस हैं, इसी इमेज के भूत से बचने के लिए अनामदास नाम रखा, अब आप लोगों ने अनामदास की भी इमेज बना दी है इसलिए डर लग रहा है. कुछ बचपन की फुटकर मज़ेदार बातें लिखने का इरादा है, चलेगा क्या? फिर भी आप उसे बकलमखुद कहने का इसरार करेंगे?

21 टिप्‍पणियां:

अरुण ने कहा…

काहे डरते है जी ..? ठेके पर लिखवा ले पर छपवाये जरूर,चाहे तो हमे ठेका दे दे..आप क्या सोचते है ये बडे लोग खुद लिख डालते है, और सब ठीक ठीक लिखते है, आप बस हमे ये बतादे किस किस की धज्जिया उडवानी है किस किस को नीचा दिखाना है...:)

काकेश ने कहा…

आपकी एक एक बात से सहमति है.

Gyandutt Pandey ने कहा…

अपने बारें में लिखना बहुत झन्झटिया काम है। पूरे ट्रेन लोड अनुभव से एक पार्सल भर चुनना! और उसमें भी पॉलिश की मिलावट।

हर्षवर्धन ने कहा…

अजीतजी
अनामदास जी के शब्दों के सफर को अनामदास बाकलमखद बचपन में करके ही सही लेकिन, डाल दीजिए। लोगों को पता चले कि बचपन में नाम से इन्होंने क्या-क्या किया।

Pramod Singh ने कहा…

सही है, सुनामदास.. सरकलमख़ुद से बचने का सबको लोकतांत्रिक अधिकार बनता है, बीवी-बच्‍चे वालों को, और बिना बीवी के बच्‍चेवालों को भी..

आशीष ने कहा…

अज्ञेय ने एक बार कहा था कि इंसान को यदि झूठ लिखना हो तो वो आत्‍मकथा लिखता है और सच के लिए कहानी का सहारा लेता है, ऐसे में आप अपनी आत्‍म कथा में सच लिख कर अज्ञेय की इस बात को झुठला सकते हैं

आशीष महर्षि

अफ़लातून ने कहा…

भूमिका सही है । अपने मूल्यों , इस्कूल आदि पर तो पहले भी लिखा ही है । लगाइए छलाँग !

सुजाता ने कहा…

सही कहा अनामदास जी , एक मध्यवर्गीय चिरकुटई ज़िन्दगी जीने और नौकरी पीटते रहने के बाद क्या आत्मकथ्य बनेगा जिसे लोग पढना चाहें ;पर ध्यान से देखिये जो अभी लिख डाला है वह कितना उम्दा आत्मकथ्य बन कर निकला है ।

मैं भी सरलकलमखुद होने के दिन से अभी भयभीत हूँ अजित जी का प्रस्ताव आ चुका ,फाँसी की तिथि निश्चित होनी बाकि है:)इतनी कम {?}उम्र में कैसे अपनी महनता के वर्णन लिखे जायेंगे ;-)
खैर ,
आप सर कलम करिये ,बाखुदा बहुत बेहतर बन कर आयेगा ।

Rajesh Roshan ने कहा…

अनामदास जी केवल एक सवाल आप ब्लॉग क्यों लिखते हैं? कोई खास वजह???? वैसे इन सवालो से ऊपर की यह आपने अच्छा लिखा है

Rajesh Roshan

चंद्रभूषण ने कहा…

अनामदास जी, आपके हिस्से की दुनिया तो सिर्फ आपके ही हिस्से आई है। मुझे आपके 'आम' शायद जिंदगी भर याद रहें, जो आपके अलावा किसी और के नहीं हो सकते थे। इसी तरह दो-एक आपके 'उस्तादों' की, खासकर लंगड़ी मैडम की याद भी जेहन में बाकी है। उम्मीद है, अपने बारे में लिखने के बहाने कुछ और ऐसे ही नायाब तोहफे आप हमें सौंप जाएंगे।

अजित वडनेरकर ने कहा…

हुजूर की सारी बाते सही हैं। अनामदास की समझदारीभरी हर उस पोस्ट की तरह जिसका इंतजार रहता है।
...मगर लगा कि मेरा आग्रह शायद मियादी बुखार बन कर आपमें समा गया। बजाय हमारी दाद देने के कि एक अनाम से कह रहे हैं कि अपने बारे में सुना ! बंदानवाज़,बकलमखुद से क्यो डर रहे हैं ? हम सब सफर में हैं और अपने बारे में कह रहे हैं। उन तमाम गूढ़-गंभीर सवालों से गुज़रने जैसा झमेला इसमें नहीं है जिनसे आप जूझ रहे हैं और अंत में ईमानदारी से कह भी रहे हैं कि -

'अपने ढेर सारे ऐबों में एक ये भी है कि बहुत इमेज कॉन्शस हैं, इसी इमेज के भूत से बचने के लिए अनामदास नाम रखा, अब आप लोगों ने अनामदास की भी इमेज बना दी है इसलिए डर लग रहा है.'

बहरहाल , बकलमखुद पर आपकी दुविधा और सोच का आपने उद्घाटन किया यह अच्छा लगा। बस, फिक्र इस बात की है कि इस ब्लागजगत में आपकी कही से सहमत होने वालों की खासी तादाद है। एक तो अनामदास , ऊपर से चिंतक !! हमें फिक्र है कि बकलमखुद के लिए रजामंदी दे चुके लोग अब खुद से जूझेंगे, ऊहापोह में रहेंगे, आपकी कही उन्हें सही लगेगी और हमारे पास
'क्षमा करें' जैसी चिट्ठिया आने लगेंगी। बकलमखुद का भट्ठा बैठने ही वाला है।
जाजम बिछाई थी कि ....
:)

अविनाश्‍ा ने कहा…

आपके लिए तो फिर भी आसान है बकलमखुद लिखना। उनके लिए मुश्किल है, जो इस वर्चुअल इलाक़े में जाहिर हैं। पर आपकी भूमिका से ऐसा लग रहा है कि जब अनाम को अपनी कथा कहने में इतना सोचना पड़ रहा है - तो फिर नाम वाले क्‍या खाकर लिख पाएंगे। दूसरी बात, कई बार इस तरह की लेखनी पूरी सच्‍चाई के बावजूद भी खुद को विशिष्‍ट मान कर लिखी जाती है। जीवन का अंधेरा कोना हर खास और आम के हिस्‍से का सच होता है, लेकिन जब वो काग़ज़ (और अब तो कंप्‍यूटर) पर उतरता है, तो उसकी तासीर खास हो जाती है। क्‍या हम सब ऐसा तरीक़ा खोज सकते हैं कि लिखते वक्‍त हमारे भीतर का सबसे खास आदमी ग़ायब हो जाए। है, तो बताइए... हालांकि हमारे लिए बेहतर ये है कि अजित जी का रिमाइंडर नहीं आया है। वैसे अपनी बतकही-बकलमखुद दिल्‍ली-दरभंगा पर चलती रहती है।

mamta ने कहा…

अरे ना लिखते हुए जब आपने लिख दिया। :)

तो अब पूरा ही लिख डालिए बकलमख़ुद मे।

Beji ने कहा…

आप वाकई इमेज कॉन्शस हैं। हम तो इमेज को ही घुमा फिरा कर खुद की असली पहचान ढूँढने की कोशिश कर रहे हैं....पता हो तो छिपायें...बतायें।

इष्ट देव सांकृत्यायन ने कहा…

यूँ ज्ञान datt jee ने जो दिया है वह सचमुच बहुत oonchaa ज्ञान है. रूपक bhii क्या khoob chunaa है. मन कर rahaa है jhatak लूँ.
पर nahiin ऐसा काम बड़े लेखक करते हैं. मैं to सिर्फ़ एक बात kahna चाहता हूँ. वह यह की अगर आप सचमुच apnii रामकहानी likhanaa chaahte हैं to uthaaie कलम और एक upanyaas लिख maariye. ख़ुद को ख़ुद बना कर दिन्खाने की जरूरत ही nhaiin है, कुछ और बन jaaiye. alloo, malloo, galloo या thallloo taaip कुछ भी. और लिख maariye. यकीन maanie, saap भी मर jaaega और laathii भी नहीं tootegii. मजा आ jaaega.

Sanjeet Tripathi ने कहा…

सहमत-सहमत!!!!

इरफ़ान ने कहा…

Padhne se lagataa hai aapne image banaane ka kaam pooraa kar liyaa hai aur ab consious hone kee baat kar rahe hain.Is maamle mein hum sukhee hain aur baqalam khud likhte hue is dar se sataaye hue nahin honge.
Is maamle mein shaayar raah dikha gayaa hai. Isee kaa sahaaraa loongaa aur sab kuchh gadd-madd kar doongaa.
"Chehre mein hai aainaa ke aainey mein chehraa
Maloom naheen kaun kise dekh rahaa hai."

anitakumar ने कहा…

पहल करते वक्त पता नहीं क्युं हमारे दिमाग में ऐसी उलझनें क्युं नही पैदा हुई

अजित वडनेरकर ने कहा…

चेहरे मे है आईना कि आईने में चेहरा
मालूम नहीं कौन किसे देख रहा है

वाह इरफान भाई , आपने अनामदास जी को राह सुझा दी है।
वैसे तो वो लिखने को पहले भी तैयार थे मगर अभ ज़रूर लिखेंगे। अभी अभी इलहाम हुआ कि वो हमसे ऐसा ही कह रहे हैं।

अनूप शुक्ल ने कहा…

बड़ा लफ़ड़ा है।

दुविधा ने कहा…

गुरुदेव आत्मकथा तो आत्ममुग्ध लोग लिखते है आप तो साहित्य लिखिए। दुनिया की राय तो आप देख ही रहे हैं। मेरी मानना है कि अपकी लेखनी कई "राग दरबारी" का सृजन कर सकती है। और हिंदी जगत भी कृतार्थ रहेगा।