02 फ़रवरी, 2009

माँ सारदेSS कहाँ तू बीना बजा रही हैSS

हम बच्चों की पुकार माँ सारदे क्यों सुनतीं, लक्ष्मी ने हमारी प्रार्थना को पहले ही अनसुना जो कर दिया था. बाल विकास इस्कूल के बच्चे रोज़ाना माँ सारदे से पूछते थे कि वो कहाँ बीना बजा रही हैं. नीली कमीज़, खाकी हाफ़पैंट और बहती नाक बाले बच्चों को दून स्कूल, वेलहैम, शेरवुड और स्प्रिंगफ़ील्ड का पता ही नहीं था, जहाँ वे वीणा बजाती हैं.

माँ सारदे बीना बजाने में व्यस्त रहीं, उनकी कृपा जिन लोगों पर हुई उन्होंने प्राइमरी स्कूल में फ्रेंच, सितार, स्विमिंग और घुड़सवारी भी सीखी. हम ककहरा, तीन तिया नौ, भारत की राजधानी नई दिल्ली है...पढ़कर समझने लगे कि माँ सारदे की हम पर भी कृपा है. हमने सरसती पूजा को सबसे बड़ी पूजा समझा.

जाड़े की गुनगुनी धूप में चौथी से लेकर दसवीं क्लास तक हर साल गन्ना चूसते हुए या छीमियाँ खाते हुए प्लान बनाते--'इस बार सरसती पूजा जमके करना है.' तभी शंकालु आवाज़ आती, 'अबे, चंदा उठाना शुरू करो', कोई कहता, 'अभी से माँगोगे तो भगा देंगे लोग', दूसरा कहता, 'कोई बार-बार थोड़े न देगा, पहले ले लो तो अच्छा रहेगा...'

'सरस्वती पूजा समिति' नाम की खाकी ज़िल्द वाली हरी-नारंगी रसीद-बुक लेकर हमारी टोली निकल पड़ती चंदा उगाहने. हम इक्यावन, इक्कीस, ग्यारह से चलकर दो रुपए पर आ जाते थे. कई दुकानदार चवन्नी निकालते और उसकी भी रसीद माँगते थे. जंगीलाल चौधरी कोयले वाले ने जो बात सन सत्तर के दशक के अंत में कही थी उसका मर्म अब समझ में आता है--'अभी तो ले रहे हो, जब देना पड़ेगा न, तब फटेगा बेटा...'

गहरी चिंताओं और आशंकाओं का दौर होता, मूर्ति के लिए पैसे पूरे पड़ेंगे या नहीं, घर से माँगने के सहमे-सहमे से मंसूबे बनते, रात को नींद में बड़बड़ाते-- 'पाँच रुपए से कम चंदा नहीं लेंगे...'. कुम्हार टोली के चक्कर लगते, अफ़वाहें उड़तीं कि इस बार रामपाल सिर्फ़ बड़ी-बड़ी मूर्तियाँ बना रहा है हज़ार रुपए वाली, दो सौ वाली नहीं...दिल धक से रह जाता, कोई मनहूस सुझाव देता, 'अरे, पूजे न करना है, कलेंडर लगा देंगे.'

कलेंडर वाली नौबत कभी नहीं आई, कुछ न कुछ जुगाड़ हो ही गया, सरसती माता ने पार लगा दिया. रिक्शे पर बिठाकर, मुँह ढँककर, 'बोलो-बोलो सरसती माता की जय'...कहते हुए किसी दोस्त के बरामदे पर उनकी सवारी उतर जाती. टोकरियाँ उल्टी रखकर उनके ऊपर बोरियाँ बिछाकर सिल्वर पेंट करके पहाड़ बन जाते, चाचियों-मौसियों-बुआओं की साड़ियों से कुछ न कुछ सजावट हो जाती.

शू स्ट्रिंग बजट, टीम वर्क, मोटिवेशन, प्लानिंग, क्रिएटिव थिंकिंग...जैसे जितने मैनेजमेंट के मुहावरे हैं उनका सबका व्यावहारिक रूप था दस साल के लड़कों की सरसती पूजा. आटे को उबालकर बनाई गई लेई से सुतली के ऊपर कैंची से काटर चिपकाए गए रंगीन तिकोने झंडों के बीच रखी हंसवाहिनी-वीणावादिनी की छोटी-सी मूर्ति. कैसी अनुपम उपलब्धि, हमारी पूजा, हमारी मूर्ति...ठीक वैसी ही अनुभूति, जिसे आजकल कहा जाता है--'यस वी डिड इट'.

पूरे एक साल में एक बार मौक़ा मिलता था मिलजुल कर कुछ करने का, धर्म के नाम पर. क्रिकेट टीम बनाने और सरसती पूजा-दुर्गा पूजा-रामलीला करने को छोड़कर कोई ऐसा काम दिखाई नहीं देता जो निम्न मध्यवर्गीय सवर्ण उत्तर भारतीय हिंदू किशोर के लिए उपलब्ध हो जिसमें सामूहिकता और सामुदायिकता का आभास हो.

आटे के चूरन में लिपटे गोल-गोल कटे गाजर, एक अमरूद के आठ फाँक और इलायची दाना की परसादी. घर में बहुत कहा-सुनी के बाद दोस्तों के साथ पुजास्थल पर देर रात तक रहने की अनुमति. रात को भूतों की कहानियाँ और माता सरसती की किरपा से परिच्छा में अच्छे नंबर लाने के सपने. कैसे जादू भरे दिन और रातें...अचानक कोई कहता, 'अरे भसान (विसर्जन) के लिए रेकसा भाड़ा कहाँ से आएगा?'

रिक्शा भाड़ा भी आ जाता, जैसे मूर्ति आई थी, सरसती मइया किरपा से सब हो जाता था. रिक्शे पर माँ शारदा को लेकर गंदले तालाब की ओर चलते बच्चों की टोली सबसे आगे होती क्योंकि जल्दी घर लौटने का दबाव होता. माता सरसती की कृपा से पूरी तरह वंचित बड़े भाइयों की अबीर उड़ाती टोली, बैंजो-ताशा की सरगम पर थिरकती मंडली, माता सरस्वती की कृपा से दो दिन के आनंद का रसपान करते कॉलेज-विमुख छात्रों का दल 'जब छाए मेरा जादू कोई बच न पाए' और 'हरि ओम हरि' की धुन पर पूरे शहर के चक्कर लगाता.

अगले दिन सब कुछ बड़ा सूना-सूना लगता.

16 टिप्‍पणियां:

yunus ने कहा…

हम तो अभी तक 'हे सारदे मां अज्ञानता से हमें तारदे मां...नहीं नहीं तार्दे मां ।' गा रहे हैं । मिचमिची आंखों से...बीच बीच में मिचमिचा के देख लेते हैं कि हमारे आंख बंद करने के बाद दुनिया वैसी की वैसी ही है या नहीं । सरसती-पूजा किए, परसादी खाए, किताबों में विद्या-पत्‍ती रखे, पर रहे पूरे अज्ञानी ।
ज्ञानी गुणजन तो सब गए बैंकों में, मल्‍टीनेशनलों में, समंदर-पार की कंपूटर कंपनियों में । और हम दीन-हीन-अज्ञानी 'बोल-बचन' की दुनिया में आंखें मिचमिचा के गा रहे हैं--'अज्ञानता से हमें तारदे मां', हर बार मिचमिची आंखों से जब देखते हैं तो दुनिया पूरी तरह बदली नज़र आती है । अज्ञानता से हमें तारदे मां । सारदे मां ।

Pramod Singh ने कहा…

अगले दिन सब सूना क्‍या लगता, अगले दिन सरसती मैया का गोड़ का बाजू बइठे रहने की जगह हम एक मर्तबा हावालातों में सुबही किये हूं, मोहल्‍ला का मकानी से फूल चोरी का इल्‍जाम में चार ठो छौंड़ा सब को पुलिस रात भर थाना में बइठा के रखी थी, हम एकले औचकियाये बिहारी थे, बकिया का तीनों बंगाली बर्मन था, एगो तो हूंवें थाना में पापाजी का नाम बोलने का नाम पे पैंट से पानी छोड़ने लगा! ओह, निरमल बरमा जी कहां 'बे दिन' देखे होंगे?

Sanjay Sharma ने कहा…

"शू स्ट्रिंग बजट, टीम वर्क, मोटिवेशन, प्लानिंग, क्रिएटिव थिंकिंग...जैसे जितने मैनेजमेंट के मुहावरे हैं उनका सबका व्यावहारिक रूप था ".{ विस्तार की जरूरत है }
बेहद खूबसूरत आलेख ! ये सही है कि सरस्वती पूजा में ज्यादर भुश्कौल विद्यार्थी ही बढ़ चढ़ कर हिसा लेते है या थे. पर कोई साबित नही कर सकता कि बौद्धिक स्तर पर वो किसी से कम रहा हो .वो नीव की ईट कहे जाने चाहिए .हमारे कालोनी के पास रिक्शा वाले सरस्वती पूजा हर साल करता है क्या मतलब निकाले ?

रंजना ने कहा…

" शू स्ट्रिंग बजट, टीम वर्क, मोटिवेशन, प्लानिंग, क्रिएटिव थिंकिंग...जैसे जितने मैनेजमेंट के मुहावरे हैं उनका सबका व्यावहारिक रूप था दस साल के लड़कों की सरसती पूजा. आटे को उबालकर बनाई गई लेई से सुतली के ऊपर कैंची से काटर चिपकाए गए रंगीन तिकोने झंडों के बीच रखी हंसवाहिनी-वीणावादिनी की छोटी-सी मूर्ति. कैसी अनुपम उपलब्धि, हमारी पूजा, हमारी मूर्ति...ठीक वैसी ही अनुभूति, जिसे आजकल कहा जाता है--'यस वी डिड इट'.
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क्या कहूँ....हर वाक्य पर इतने दाद निकले मन से कि यहाँ सबको उडेलूं तो न जाने कितने पन्ने रंग जायेंगे........
लाजवाब लिखा है आपने.......सबकुछ आंखों के आगे चित्रवत खिंच गया.एकदम अपना सा लगा....आनंद आ गया......बहुत बहुत सुंदर लिखा है आपने........

Mired Mirage ने कहा…

गजब का लेख है। सच सरसती माँ अपने इन भक्तों पर भी कृपा करतीं तो सही होता।
घुघूती बासूती

अजित वडनेरकर ने कहा…

सरस्वती भी हिन्दू संस्कारों में समायी है। रिक्शेवाला भी उससे बुद्धि ही मांगता होगा, जाहिर है सरस्वती मैया उसे बुद्धि के बदले धन आफर करें तो वो मना नहीं करेगा कि ना, मैया...पाप लगेगा।
बहुत अच्छी पोस्ट। बहुत देर से आया हूं। पर आपकी हर पोस्ट को देखने अक्सर आता रहता हूं।
मज़े करें।

महामंत्री - तस्लीम ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति। पढकर लगा जैसे हमारे आस पास की ही घटना है।

बेनामी ने कहा…

बहुत बाड़िया... वाकई मे पड़कर आनंद आगय. आप कॉन्सी टूल यूज़ करते हे ?रीसेंट्ली मे यूज़र फ्रेंड्ली टूल केलिए डुंड रहा ता और मूज़े मिला "क्विलपॅड".....आप भी इसीका इस्तीमाल करते हे...?


सुना हे की "क्विलपॅड" मे रिच टेक्स्ट एडिटर हे और वो 9 भाषा मे उपलाभया हे...! आप चाहो तो ट्राइ करलीजीएगा... www.quillpad.in

Shashi K Jha ने कहा…

अनामदासजी के इस संस्मरण ने कई बातें याद दिला दीं. हम भी सिसु ज्ञान मंदिर में माँ सारदे से रोजाना यह सवाल पूछते थे कि वह कहाँ बीना बजा रही हैं. इसकी अगली पंक्ति कि ‘किस भाव में भवानी तू मौन हो रही है?’ की नौबत ही नहीं आती यदि लेशमात्र भी भान होता कि माँ शारदा दून और शेरवुड में बीना बजा रही होती थीं. अब जाकर उनकी मौनता का सही मर्म जान पाया.

अब बात सरोसती पूजा की भी हो जाए. अग्रजों की देखादेखी हमने भी एकबार छोटापे में ही अलग से यह अनुष्ठान करने की ठानी. वह भी उस समय जब मात्र दो दिन बचे थे. मोहल्ले की तमाम बहनें मदद को आगे आईं और अपने खजाने से पाँच-दस-बीस जो बन सका दिया. फिर हमारी किशोरमंडली चंदा करने निकली तो मोहल्ले के बड़े-बूढ़े डाँट-दबाड़ कर हतोत्साहित करने पर उतर आए कि हमें अलग से यह सब करने की क्या ज़रूरत है. लेकिन हमारी प्रेरणाश्रोत थीं हमारी बड़ी बहनें जिन्हें शायद हमारे अग्रजों के आयोजन में समुचित भागीदारी नहीं मिल पाती थी. फिर भी चंदे में मिले रेजगारी से जेब भर चुका था और आरती में मिले पैसों की तरह हम उसे गिनने बैठे थे. वह पैसे जिसके अब हम मालिक थे. पहली दफा खुद से इतने पैसे सँभालने का उत्साह जितना उस समय था अब हजार-लाख के भी हाथ में आ जाने पर शायद नहीं होता.

आनन-फानन में सारी तैयारियाँ तो हो गईं लेकिन मूर्ति का ऑर्डर तो पहले से दिया नहीं था सो यह संकट खड़ा हो गया. माँएँ कहने लग गईं कि फ्रेम लगी तस्वीर रख कर पूजा कर लो लेकिन मन भीतर ही भीतर बड़ा कचोट रहा था. फिर भी हम हिम्मत करके पास के ही कुम्हारों के टोले में टटोलने निकले. लछमन कुम्हार के यहाँ एक मूर्ति अर्द्धनिर्मित और परित्यक्त सा कोने में पड़ा था. पूछने पर पता चला कि उसका ऑर्डर कैंसल हो जाने की वजह से उसे छोड़ दिया गया है. लेकिन हम बच्चों के मन की बात भाँप कर लछमन जी उस मूर्ति को सही रूप देने पर राजी हुए. रंग-रोगन हुआ. सितारे जड़े गए. मुकुट और चकरी लगाई गई. बाल थोड़े कम पड़ गए लेकिन पता नहीं चलने दिया गया. मूर्ति इतनी अच्छी बन पड़ी जिसकी हमने कल्पना भी नहीं की थी. हम अपनी खुशी छिपा नहीं पा रहे थे और लछमन का संतोष पढ़ पाने की प्रौढ़ता शायद हम में उस समय नहीं आई थीं. लेकिन इतना याद है कि उन्होंने उस मूर्ति के सिर्फ ग्यारह रुपए लिए थे हमसे. उनकी लागत इससे कई गुना ज्यादा रही होगी.

इसके बाद तो मानो सब कुछ इतनी जल्दी और इतना अच्छा हो गया जिसकी किसी को उम्मीद नहीं थी. बहनों ने अपने ससुराल ले जाने के लिए जितने तरह के क्रूसिए पर बुने हुए पर्दों के झालर, थालपोश और साड़ियाँ सँजो रखे थे सब निकल आए और क्या जमकर सजावट हुई. गणित और अंग्रेजी की ‘बीटीबीसी’ की ‘पापु’ पाठ्य पुस्तक (पुराने लोगों को याद होगा) माता सरोसती के चरणों में सबसे ऊपर रखे गए. भुसबा और बुनिया का परसाद बना. प्यालियों (मिट्टी के प्यालियों से बनाए गए तराजू भी कई लोगों को याद होगा) की जगह पुराने कापियों के पन्ने में पुड़िया बनाकर परसाद बाँटा गया.. रात को जगरना हुआ. रजाई में लिपटकर रात भर संतोष कंपनी के टेपरिकॉर्डर पर ‘चाँदनी’ और ‘लाल दुपट्टा मलमल का’ फिल्म के गीत बजाए जाते रहे. साथ में लूडो, शतरंज और ‘चोर-सिपाही-राजा-मंत्री’ का भी दौर चलता रहा.

हमारे इस पहले सार्वजनिक उपक्रम की एक सामूहिक फोटो भी हमने खिंचवाई थी जो वक्त के थपेड़ों के सामने कमजोर पड़ गया और खराब हो गया. आज भी जब सालों बाद हम सब इकट्ठे होते हैं तो उस पूजा को जरूर याद करते हैं.

दूसरे दिन विसर्जन के बाद सरोसती माता को मोहल्ले के ही छुतहरू पोखर में भँसाने निकले. ‘सरोसती माता, जै-जै माता’, ‘सरोसती जी दूर है, जाना जरूर है’, ‘सरोसती जी भँसते/हँसते, नमो नमस्ते’ के नारों के बीच उनकी प्रतिमा अग्रजों के सहयोग से थोड़ी गहराई वाले स्थान पर जाकर डुबो दिया गया.

तब ‘शिक्षा’ और ‘ज्ञान’ की पॉलिटिकल इकॉनॉमी के बारे में कुछ भी पता नहीं था. हम जिस प्रक्रिया के हिस्से थे उससे निकलकर आज कहाँ आ गए. एक और बात याद आ रही है, ‘वैशाली’ ब्रांड के साठ पैसे वाली कॉपी के पहले पन्ने पर हम लिखते थे- “जय माँ शारदे भूल न जाना, कॉपी छोड़कर भाग न जाना”. तब पता नहीं था कि अपने उल्लू जैसी सवारी से गुमराह होकर लछमी महरानी जिनपर किरपा करती रहीं सरोसती माता भी उन्हीं के ‘अजंता’ और दूसरे महंगे ब्रांड वाली कॉपियों में वास करती रहीं. ‘किस भाव में भवानी तू मौन हो रही है’ में उनकी मौनता का कारण उनकी अनुपस्थिति थी.

अनामदास जी माफ करेंगे. टिप्पणी थोड़ी लंबी हो गई है.

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` ने कहा…

अनामदास जी, कितना खूबसुरत बचपन रहा होगा आपका ..आज सरस्वती मैया की कृपा आप पे बनी हुई है
ये बात तो १०० फीसदी पक्की है ..और सभी की टीप्पणियोँ को पढकर बहुत आनँद आया - बम्बई मेँ ,
राम कृष्ण मिशन मेँ गुर्गा पूजा के लिये जाया करते थे ..वो सब याद हो आया ..
- लावण्या

इष्ट देव सांकृत्यायन ने कहा…

मां सारदे से बीने बजवाते रहिएगा आ कि ओसे आगे भी बढिएगा? एके जगह थौंस गए हैं तीन महिन्ने से बरगद के रुख जैसन, लगता है अब इहां से आगे बर्हना ही नईं ऐ.

एं?

राकेश ने कहा…

शानदार संस्‍मरण. ऐसा ही कुछ मेरा भी है. एक चीज़ छूट गया, या हो सकता है आप भले होनहार विद्यार्थी लोगों को उ काम अच्‍छा नहीं लगता होगा, पर हमारी मंडली त गाना बजा कर ब्रेक डेंसो करती थी. आउर परसादी-उरसादी त बड़ा घपला वाला चीज होता था, बांटते समय जैसा चंदा मिला वैसने परसाद की पॉलिशी पालन की जाती थी.

गिरिजेश राव ने कहा…

पहली बार यहाँ आया। सच मानिए पूछ रहा हूँ अपने आप से - अभी तक क्यों नहीं आया।

आज कल चुप हैं! क्यों?

Rajesh Srivastava ने कहा…

Hum bhaiya Saharsa, chhote shahar mein pale aur badhe. Ek dum waisa hi hota thaa jaisaa aapne likhkhaa hai. Haan, jub 9waa, 10waan mein pahuche to girls high school kaa puja dekhne ke liye bahut paapad belna hotaa thaa!

ek dum majaa aa gayaa padh ke!

Jogo ने कहा…

phele bar blog dek raha hu padkar anand ke anubhuti hue

abha ने कहा…

bahut hi badhiya hai, ekdum se dil ko chu gaya aur bachpan ki kai yaaden dohra gaya.

aapke shabdon ke sath ek baar fir se apna bachpan aur uski sadgi ji liya hai.