28 अप्रैल, 2007

शब्दों की शवयात्रा और हिंदी चिट्ठाकारिता

कहते हैं--शब्द ब्रह्म है. मेरे लिए तो रोज़ी-रोटी,लोटा-लंगोटी है शब्द. शब्द मर रहे हैं, मैं चिंतित हूँ. मैं चाहता हूँ आप भी हों. शब्द कोई आज नहीं मर रहे, हमेशा से मरते और जन्मते रहे हैं शब्द. मौत दुख की वजह हो सकती है, चिंता की नहीं. चिंता महामारी की होती है, यह महामारी ही तो है. मुझे एक विचित्र सा डर है कि जिन शब्दों की मदद से मैं अपनी बात कहता हूँ अगर एक-एक करके वे सब मर गए तो मैं क्या लिखूँगा, कौन समझेगा. वैसे ही नई पीढ़ी के लोगों को मेरी हिंदी कभी अबूझ, कभी अटपटी लगती है.

भाषा वही जीवित रहती है जो वक़्त के साथ बहती-बदलती रहती है लेकिन यहाँ तो बदलाव भाषा की कोशिकाओं में वायरस बनकर बैठ गया है जो हर रोज़ उसके शब्दों को कुतरता जाता है. वक़्त के साथ भाषा बदले, कोई ग़म नहीं, ग़म तो वक़्त की रफ़्तार और उसकी अंधाधुंध मार को लेकर है. शब्द हमेशा से बेकार होते रहे हैं और मरते रहे हैं. जिस 'तार' के आने पर लोग उसे पढ़ने से पहले ही अशुभ की आशंका में रोने लगते थे उसका आज क्या अर्थ रह गया है?

ईमेल और एसटीडी जैसे शब्दों के हिंदी में आने के बाद यह 'तार' शब्द की स्वाभाविक मृत्यु है, मरे हुए शब्दों पर विलाप करने का कोई लाभ नहीं है लेकिन शब्दों की हत्या पर भी उज्र न होना ख़तरनाक बात है.

भाषा सिर्फ़ माध्यम नहीं है, भाषा साबुत विचार है. शब्द भावना का वाहक नहीं, पूरी भावना है.

पहले दो छोटे संस्मरण उसके बाद बाक़ी बातें...

पहला--इंदिरा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर मेरी जामातलाशी (घर की तलाशी को ख़ानातलाशी कहते हैं, अगर आप भूले न हों तो माफ़ कर दीजिएगा) हो रही थी, सिपाही जी का हाथ मेरी कमर के पास उभरी हुई चीज़ पर टिक गया, मैंने कहा, "बटुआ है." सिपाही जी ने तलाशी रोक दी, हतप्रभ रह गए, उनका चेहरा खिल गया, बोले, "आप तो हिंदी बोल रहे हैं, भैलेट..पर्स सुनते-सुनते बटुआ तो भूल ही गया था."
दूसरा--1980 के दशक के आख़िरी बरसों में कलकत्ता गया, अंडरग्राउंड रेल...मेट्रो रेल की बड़ी धूम थी, भारत का पहला मेट्रो. एस्पलैनेड पर खड़ा था, एक देसी आवाज़ आई--"भइया, 'पतालगाड़ी' देखल जाई पहिले."

एक समृद्ध परंपरा की देन है 'पतालगाड़ी' जो एक सहज प्रत्युत्पन्नमति (प्रेजेंस ऑफ़ माइंड) है, उसी गौरवशाली भाषिक परंपरा के वारिस शब्दों को कुपोषण की मौत मरते देखना ह्रदयविदारक है.

पहले बिचड़ा बोया जाता है, फिर धान की रोपनी होती है, फ़सल पकने पर दाने निकलते हैं, दानों को चावल कहा जाता है, उन्हें खौलते पानी में डाला जाता है जिसे अदहन कहते हैं, जब दाने पक जाते हैं तो भात कहा जाता है. बहरहाल, हममें से ज़्यादातर लोगों के लिए चावल की खेती होती है और हमारी थाली में भी चावल ही होता है.

शब्द बताते हैं कि वे जिनके मुँह से निकल रहे हैं वह कौन है. धान और भात कहने से ज़ाहिर होता है कि आप शायद खेत-खलिहान के बारे में थोड़ा-बहुत जानते हैं जो 'मेट्रोसेक्सुअल' व्यक्ति के लिए अशोभनीय बात है. सिर्फ़ दो-तीन पीढ़ी पहले शहरी हुए लोग गाँव और क़स्बे की धूल-मिट्टी का एक-एक दाग़ जल्द से जल्द पोंछ देना चाहते हैं. महानगरीय व्यक्ति बनने की शुरूआत हमेशा उन शब्दों की हत्या से होती है जो आपके क़स्बाई होने की चुगली करते हैं.

अगर आप मुंबईकर या डेल्हाइट नहीं हैं तो यह शर्म की बात है, मज़ेदार बात ये है कि पुराने मुंबईकर और पुरानी दिल्लीवाले दोनों ही अपने रंग-ढंग, बोल-बचन, खान-पान में पूरे देहाती हैं. अजीब कमाल है कि हर बिहारी दिल्लीवाला बन जाना चाहता है लेकिन पुरानी दिल्लीवाला नहीं.

शायद थोड़ा विषयांतर हो गया. बहरहाल, भाषा के रूप में हिंदुस्तानी की कोंपले निकल ही रही थीं कि भारत विभाजन और उसके बाद की राजनीति ने उसका गला घोंट दिया, हिंदी को सरकारी कामकाज के लायक़ बनाने के नाम पर राजभाषा विभाग ने एक-से-एक नाक़ाबिले इस्तेमाल शब्द दिए, ये शब्द सिर्फ़ फ़ाइलों में ज़िंदा हैं और उनकी कोई चिंता मुझे नहीं है लेकिन ऐसे हज़ारों शब्द हैं जिन्हें तिलांजलि भी नहीं दी गई, सिर्फ़ बिसरा दिया गया है. हिंदुस्तानी से हिंदी बनने के बाद हमारी भाषा पर अब जो मार पड़ रही है वह है ग्लोबलाइजेशन की.

टेलीविज़न, टेलीफ़ोन, ट्रेन, रेडियो, इंटरनेट, कंप्यूटर जैसे नाम और उनसे जु़ड़ी शब्दावली का इस्तेमाल जायज़ है. विद्युत कंचगोलक (बल्ब), लौह पथगामिनी (रेल), धूम्रदंडिका (सिगरेट) जैसे प्रयोग तो हास्यास्पद हैं लेकिन फलों के रस की जगह उनका जूस पीना, मुर्ग़ी को काटकर उसे चिकेन बनाकर खा जाना सहज है. ऐसा इसलिए है क्योंकि भाषा का हमारा मूल स्रोत अँगरेज़ी है, हमारे शब्द ही नहीं उन्हें पिरोने का तरीक़ा तक, सब कुछ ट्रांसलेटेड है. शब्द मैनहटन से चलकर मुंबई पहुँच जाते हैं लेकिन मथुरा से दिल्ली नहीं पहुँच पाते. मैनहटन वाले शब्दों का हमेशा स्वागत और मथुरा वालों का तिरस्कार, इसने हमारी भाषा को नीरस, थोथा और बदशक़्ल बना दिया है.

अगर आपको कार्रवाई, विरोध, प्रदर्शन, चिंता, ताज़ा समाचार, संकट, समस्या, आरोप, बैठक...जैसे कोई 200 शब्द आते हैं तो आप मीडिया में नौकरी कर सकते हैं और अगर आप 'खुलासा करने', 'साफ़ करने', 'जलवा बिखेरने', 'आड़े हाथों लेने', 'ठंडे बस्ते में डालने' जैसे जुमलों के इस्तेमाल में माहिर हैं तब तो आप बहुत आगे जाएँगे.

हिंदी टीवी चैनलों की सफलता के बाद हिंदी भाषा की कमाई खाने वाले लोगों को लगा कि हिंदी के दिन सुधरने वाले हैं, दिन हिंदीवालों के सुधर गए लेकिन हिंदी की गत बन गई. ऐसी हिंदी लिखने-बोलने की कोशिश हुई जो 'हर किसी' की समझ में आ जाए, इस 'हर किसी' के अज्ञान की कोई सीमा ही नहीं है, अंधा कुआँ है. उसकी सहूलियत के लिए उन सभी शब्दों को प्रतिबंधित कर दिया गया जो ज़रा भी कठिन लगे. ऐसी जेनेरिक भाषा बन गई है जिसमें धड़कते हुए शब्द नहीं हैं. इस 'हर किसी' को कॉकलेट, मॉकटेल की जितनी वेराइटीज़ बता दीजिए उसे सब याद हो जाएँगी लेकिन अगर आपने धान की खेती और पछुआ हवा की बात की तो वह आपको डाउनमार्केट मानकर आपका साथ छोड़ देगा.

ऐसे माहौल में हिंदी चिट्ठाकारिता एक उम्मीद की किरण बनकर आई है, देशज शब्दों और क्षेत्रीय रंग से सँवरी सुंदर हिंदी, जो अपनी हिंदी लगती है. किसी पर कोई व्यावसायिक दबाव नहीं है कि वह एक कटी-छँटी भाषा लिखे, 'हर किसी' के समझने के लिए हर ब्लॉग नहीं है, जिसे समझना होगा वह शब्द कोश की मदद ले लेगा. मुझ पर हिंदी चिट्ठाकारिता का नशा इसलिए चढ़ा है लगभग हर रोज़ मेरे अंदर सो चुके किसी न किसी शब्द को कोई हिलाकर जगा देता है. न जाने कितने दशक बाद प्रत्यक्षा जी ने अपनी कविता के ज़रिए याद दिलाया 'पेटकुनिए' एक सुंदर शब्द है पेट के बल लेटने के लिए.

नई भाषा सीखते समय जैसे लोग संकल्प लेते हैं कि हर रोज़ पाँच नए शब्द सीखेंगे, उसी तरह शायद हमें हर रोज़ पाँच भूले हुए शब्दों को याद करने की ज़रूरत है जो अभी कोमा में हैं और उन्हें बचाया जा सकता है.

15 टिप्‍पणियां:

Pramod Singh ने कहा…

क्‍या बात है, अनामदास जी, बधाई! मगर पहले हम एक शिकायत फरिया लें. शिकायत यह कि ऐसी मीठी-सुरीली बतकही परोसते-परोस्ते अचानक कहां आप एकदम गायब हो जाते हैं? अब यह मत समझाने लगियेगा कि कामकाजी आदमी का बड़ टंटा है, और लिख रहा है लोग सब खलिहा, फेलियर अमदी है!..
वैसे आपकी यह चर्चा एक नहीं तीन पोस्‍ट का विस्‍तार मांगती थी. एक ही में सब लपेट कर आप निपटा लिये, अच्‍छी बात नहीं. अगला पोस्‍ट सोचना शुरू कीजिये, हम कमेंट अभी से तैयार करके रखते है.

Divine India ने कहा…

अच्छा लगा यह लेख…।भाषा को दिशा की आवश्यकता होती है पर जो मुख सुख भी लगे कुछ शब्द हिंदी भाषी विद्वान भी नहीं प्रयोग करते क्योंकि उसका जन्म मात्र अन्य भाषा के शब्दों को न लेने के कारण हुई-"लौह पथ द्रुतगामी" आदि…।'पेटकुनिये' शब्द मात्र क्षेत्रिय प्रयोग की भाषा है…खड़ी बोली इससे भिन्न है। मैं भी 5-6 महीने से जुड़ा हूँ अंतर्जाल से किंतु दु:ख से कहता हूँ कि इतने कम लोग हैं अच्छी रचनाओं को लिखने-पढ़ने बाले की जो एक आधार या झंडा उठाया है कि हिंदी,हिंदी यह मात्र छोटा सा रंग का छींटा बन कर
सुदूर से देखने का प्रयास कर रहा है…अंतर्जाल पर देवनागरी लिखी जाती है न की अच्छी हिंदी…।
Its an another kind of news paper not like Hindu or jansatta...like navbharat...THnx...

Aflatoon ने कहा…

एकजाई लेख । 'तोरा दिल्ली में कीन देबो हावा गाड़ी' गाने वाले ही पाताल गाड़ी जैसा सुन्दर लफ़्ज गढ़ेंगे ।
१९७८ में दिल्ली की एक अभिजनों की महफ़िल में मैंने कहा,'वह गली ही उठ गयी है'। एक महिला उत्तेजित हो गयी और अंग्रेजी में समझाने लगी कि इस जुमले पर गौर करो ।

बेनामी ने कहा…

प्रिय प्रमोद भाई
बिल्कुल सही कहा आपने, बीच-बीच में गायब हो जाता हूँ. सप्ताह में दो से अधिक पोस्ट नहीं लिख पाता, हालाँकि लिखने का मन करता है. आपकी शिकायत सिर-आँखों पर...यह भी सही है कि इस विषय पर दो-तीन पोस्ट क्या पूरी किताब लिखी जा सकती है, सारे शब्द बिला गए हैं...सचमुच डर लगता है. स्नेह बनाए रखें, अच्छा लगता है.
अनामदास

बेनामी ने कहा…

आइए, देवनागरी को अच्छी हिंदी बनाइए, स्वागत है. वैसे क्षेत्रीय प्रयोगों से ही हिंदी समृद्ध हो सकती है, जैसी कि ग्लोबलाइजेशन के पहले तक होती रही है लेकिन अब ऐसा नहीं हो रहा इसी का दुख है. अच्छा लिखने वाले हर जगह कम होते हैं, ब्लॉगिंग उसका अपवाद नहीं है लेकिन कई लोग बेहतरीन लिख रहे हैं. अनुपात शायद वही है जो अखबार पत्रिकाओं में होगा, अच्छे और बुरे लेखन का.
टिप्पणी के लिए आभार
अनामदास

masijeevi ने कहा…

आपके इसी हुनर के कारण तो हम आपकी कलम के मुरीद हैं। चिटृठाकारी केवल उन पहली पीढ़ी के शहराती लोगों के ही लिए उम्‍मीद की किरण लेकर नहीं आई है जो बिसारे हुए पेटकुनिये को याद करने की चाह लिए हुए हैं वरन हम जैसे यहीं जन्‍मे पले देहलाईट के लिए भी आस की किरण है जिसे पेटकुनिए को सीखने अपनाने का अवसर देती है।

अभय तिवारी ने कहा…

आप्का ख्याल अच्छा है.. और इस सिलसिले को बनाए रखने का एक तरीक़ा ये हो सकता है कि आप खोते जा रहे शब्दों को याद करते रहें.. और हर पाँच दस शब्द बाद हमारे सामने परोस दें.. शब्द और उनका इस्तेमाल..जैसे प्रभाकर गोपालपुरिया जी ने अपने ब्लॉग में भोजपुरी कहावतों को संजोया है.. और लक्ष्मी एन.गुप्ता जी ने अवधी कहावतों को दर्ज़ किया है.. क्या खयाल है.. सौ पचास शब्दों के चक्कर में देर होगी.. और जबरिया सर पर बोझ भी होगा.. यही काम दूसरे लोग भी कर सकते हैं..

Shrish ने कहा…

बहुत अच्छा लेख अनामदास जी। आपसे सहमत हूँ लोग प्रगतिशीलता के नाम पर देशज शब्दों को विस्मृत करते जा रहे हैं। हिन्दी में प्रचलित अंग्रेजी के शब्दों की तो कोई बात नहीं लेकिन कई उन शब्दों जिनके लिए बहुत ही आसान हिन्दी शब्द हैं उनके लिए भी जबरदस्ती अंग्रेजी के शब्द प्रयोग करते हैं।

पता नहीं इस देश का क्या होगा...

Piyush ने कहा…

अति सुंदर अनामदास जी..
बहुत शानदार लिखा है..
वैसे,अब तो हालत यह हो गई है कि कई बार कोई अच्छा हिन्दी का शब्द अरसे बाद जुबां पर आता है,तो खुद ही हैरान हो जाते हैं कि क्या ये हमारे दिमाग की ही उपज है।
शानदार
पीयूष

नितिन बागला ने कहा…

वाकई हिन्दी चिट्ठों पर कभी कभी ऐसे शब्द टकरा जाते हैं कि अपने गांव-घर की याद ताजा हो जाती है।
बेहतरीन लेख!

Srijan Shilpi ने कहा…

अपनी मिट्टी की महक से सने शब्द हमारी सांसों में बस जाते हैं। पत्रकारिता और अनुवाद से जुड़े लोगों की भाषा से ऐसे शब्दों का नाता टूटता जा रहा है। शब्द अपने अर्थ खो रहे हैं और असरहीन होते जा रहे हैं।

आर्थिक पत्रकारिता की भाषा पर शोध करते समय मेरा ध्यान इस तथ्य की ओर गया था कि सदियों तक विश्व की सबसे समृद्ध अर्थव्यवस्था रहे भारत के बाजार और कारोबार में रोजमर्रा के काम आने वाले शब्द कहां विलुप्त हो गए। आज आर्थिक और बिजनेस पत्रकारों का अंग्रेजी से शब्दों को उधार लिए बिना काम ही नहीं चलता। लेकिन यदि भारतीय अर्थव्यवस्था में सदियों से प्रचलित शब्दों को ढूंढा जा सके तो आर्थिक पत्रकारिता के लिए शब्दों की दरिद्रता नहीं रह जाएगी।

Pratyaksha ने कहा…

सही है सही

ravish kumar ने कहा…

अनामदास जी
ठीक कहा कि मथुरा से दिल्ली नहीं पहुंच पाते । शब्द विदेशज हो गए हैं । जिस तरह देसी के बीच एनआरआई का भाव होता है उसी तरह देसी शब्दों के बीच विदेशी शब्दों का भाव होता है । अब देसी शब्द इसलिए भी कम दिखते हैं क्योकि देसी बैंकग्राउंड के लोग कम होंगे माध्यमों में । माध्यमों में अब महानगर के लोग काम कर रहे हैं । इसलिए देसी सिपाही बटुआ कहता है और हिंदी का पत्रकार पर्स । अच्छा लिखा है ।

प्रियंकर ने कहा…

राजस्थानी में एक लोकगीत है, जिसकी शुरुआत कुछ यूं है :

"भाया चीलगाडी आ'गी रै
चूल्हो बळतो छोड़ बीनणी देखण भागी रै ।"

यानी जैसे ही ऊपर आकाश में हवाई जहाज आता दिखाई दिया नई बहू जलता हुआ चूल्हा छोड़कर उसे देखने के लिए घर के बाहर दौड़ पड़ी . यह है लोकगीतों की दुनिया में प्रवेश करती आधुनिकता और उसके साथ परम्परा का गठजोड़.

ऐसा ही एक शानदार गीत रेलगाड़ी को लेकर है.अद्भुत
गीत है. तमाम फ़िल्मी गीत उसके आगे फ़ेल . जिसकी चर्चा फिर कभी .

तो 'पाताल रेल' या 'पाताल गाड़ी' के साथ यह 'चील गाड़ी' शब्द कैसा लगा . ऐसे शब्दों का हमें बहुत जतन और साज-संभाल करनी चाहिए.पर दिक्कत यह है कि जिस संस्कृति के साथ इन शब्दों का नाभि-नाल संबंध है वह कहां से लाएंगे.असली खतरा तो उसी पर है.

gaurav jain ने कहा…

अनामदास जी,
बहुत अच्छी जानकारी दी है।
आप कोंसी software उपयोग किया
मुजको www.quillpad.in/hindi अच्छा लगा