07 जून, 2007

माले मॉल दिले बेरहम

जिनके पास माल है उनके लिए मॉल है, मॉल वो जगह है जहाँ सुख और सुविधा का एक साथ वास है.

ग़रीब पहले भी थे, आज भी हैं, वे पहले भी दुखी थे, आज भी हैं और आगे भी रहेंगे. फिर इतना मॉल-विरोधी-माहौल क्यों बना रहे हैं कुछ लोग?

इस सवाल पर विचार करना उतना ही ज़रूरी है जितना मॉल से माल ख़रीदना. मॉल से सुख मिल रहा है लोगों को. ऐसे में उस पर सवाल उठाने को सुखी व्यक्ति को कठघरे में लाने जैसा माना जाता है. मगर मेरी राय में सुखी आदमी कठघरे में खड़ा किए जाने का पहला पात्र है, न कि सूखा आदमी.

नुक़्ते की बात ये है कि किसानों के खेत उजाड़कर उद्योगों के रमण के लिए सेज़ बिछाई जा रही है, अच्छा नाम दिया है सेज़ यानी एसईज़ेड (स्पेशल इकॉनॉमिक ज़ोन). मॉल भी सेज़ है, सोशल एक्सक्लूज़न ज़ोन यानी समाज के एक हिस्से को बाहर रखने वाला ज़ोन.

हर मॉल के बाहर वर्दी डाटकर कुछ गार्ड खड़े होते हैं जिन्हें पता होता है कि उन्हें ख़ुद से थोड़ा कमतर दिखने वाले आदमी से कैसे पेश आना है. कोई बेचारा अच्छी तेल-कंघी-इस्तरी की मदद से घुस भी गया तो ग़लत अँगरेज़ी बोलकर डराने वाले सेल्समैन मौजूद हैं. वह ज़्यादा से ज़्यादा रौनक़ देखकर लौट आता है. समझ जाता है कि यह जगह उसके लिए नहीं बनाई गई है.

ज़्यादातर लोग इतने भोले हैं कि उन्हें पता भी नहीं चलता कि उन्हें मॉल से शॉपिंग में अधिक आनंद क्यों आता है. इसलिए कि वहाँ सिर्फ़ उनके जैसे लोग शॉपिंग करते हैं या फिर वे जिनके जैसा बनने की वे तमन्ना रखते हैं. मॉल ने शॉपिंग को एक शानदार एक्सपिरियंस बनाने के लिए उन लोगों को पूरी तरह एलिमिनेट कर दिया है जो आपको देश की दशा की याद दिलाकर दुखी करते हैं.

बाज़ार में जाओ तो साला हर ऐरा-ग़ैरा चला आ रहा है, मैनर्स तो हैं ही नहीं. आप माल पसंद कर रहे हैं कि कोई भिखमंगा आ गया, क़ीमती सामान लेकर चले हैं कि किसी ने साँड़ की पूँछ उमेठ दी...नालियों-गड्ढों से तो किसी तरह बच जाएँगे लेकिन शोर-धूल-धुआँ वग़ैरह-वग़ैरह... यू नो शॉपिंग हैज़ टू बी फ़न.

आपके इस अँगरेज़ी के फ़न को रूपए में बदलने का उर्दू वाला फ़न जिनके पास है उन्हें और भी कई बातें पता हैं. वे घाटा उठाने की योजना बनाकर आपसे मोहब्बत साध रहे हैं, वे जानते हैं कि आपका प्यार अटूट है. 'बाई वन गेट वन फ्री' ज़रा गुप्ता जी से लेकर दिखाइए, रीजेंसी मॉल वाले देते हैं और वजह भी बताते हैं-....बीकॉज़ वी केयर फॉर यू.

गुड़गाँव के एक पाँच मंज़िला शॉपिंग सेंटर में घुसा तो लोगों के चीख़ने की आवाज़ आई, मैं घबराया, ऊपर नज़र गई तो नौजवान पाँचवी मंज़िल पर बने प्लेटफॉर्म से कमर में रस्सी बाँधकर बंजी जंपिग कर रहे थे, फुल सेफ़्टी किट और इंस्ट्रक्टर के साथ, मुफ़्त में. लाइव बैंड था और बच्चों के लिए घूमता-फिरता मिकी माउस भी. चाट-पकौड़ी की दुकानें और अमरीकन बेगल भी. अब शॉपिंग करने यहाँ नहीं आएँगे तो क्या दरीबा और चावड़ी बाज़ार जाएँगे.

ग्लोबलाइज़ेशन का सबसे सुंदर प्रतीक है मॉल, जब आप मॉल के अंदर जाते हैं तो बिना टिकट-पासपोर्ट-वीज़ा के फौरन फॉरेन पहुँच जाते हैं. जैसे ही घुसते हैं मैनहट्टन में मछरहट्टा बाहर रह जाता है, शॉपिंग न भी करनी हो तो बीच-बीच में फॉरेन टूर का आनंद लेते रहना चाहिए, ट्रेंड्स पता रहते हैं. नाली-गंदगी-झोड़पपट्टी-ग़रीबी-बीमारी-भिखारी सबसे दूर जो आपके जीवन को स्थायी तौर पर मैनहट्टन नहीं बनने दे रहे.

मॉल वाले इतना कुछ कर रहे हैं आपके लिए, मज़ा भी आ रहा है, फिर क्यों पूछना कि 'क्यों कर रहे हो', 'कैसे कर रहे हो', 'किसके ख़र्चे पर कर रहे हो', 'क्या ज़रूरी है यह सब करना'? सवाल तो तब करना चाहिए जब आपको कोई तकलीफ़ हो, आनंद में क्या सवाल करना?

अच्छे माहौल में, अच्छा माल, अच्छी क़ीमत पर मिल रहा है तो फिर बाक़ी बातें फिज़ूल हैं. ये सब कैसे हो रहा है, आगे कैसे होगा, ये किसकी क़ीमत पर हो रहा है, सबके लिए क्यों नहीं हो रहा, यह एक अकादमिक बहस है जिसका ग्राहक से कोई सरोकार नहीं है.

ग्राहक देखता है कि उसने कितने पैसे दिए, पैसे के अलावा क़ीमतें और भी चुकाई जाती हैं. वो दूसरे लोग हैं जो अपनी अलग करेंसी में यह क़ीमत चुकाते हैं, मॉल के माल को पैक करने वाले, चढ़ाने-उतारने वाले, उगाने-धोने वाले से लेकर न जाने कौन-कौन...चीन में बैठे मज़दूर तक...जो बेहद दयनीय हालत में जीते हैं अगर उनको ज्यादा पैसा मिलेगा तो आपको सस्ता माल मिल चुका, भूलिए मत- बीकॉज़ वी केयर फ़ॉर यू (नॉट फॉर देम.)

लोकतंत्र में ख़रीदने-बेचने पर कोई रोकटोक नहीं है, साथ ही, सोचने-समझने से रोकने की साज़िशों पर भी पाबंदी नहीं है. सोचने-विचारने की भी स्वतंत्रता है मगर मॉल जैसी सुविधाजनक चीज़ या ग़रीबी जैसी दुविधाजनक चीज़ के बारे क्या सोचना. लेकिन आप मेरी तरह अड़ियल हैं तो ईपीडब्ल्यू (इकॉनॉमिक एंड पॉलिटिकल वीकली) में छपा यह शोधपत्र पढ़ सकते हैं, उसके बाद जब मॉल में जाएँ तो मेरी तरह आपके दिल में भी थोड़ा अपराध-बोध हो.

8 टिप्‍पणियां:

अरुण ने कहा…

अनाम दास जी माल का सच कौन देखना चाहता है
ये तो नये लोगो की तफ़री और मिलन स्थली तथा उच्च मध्यम वर्ग के गर्व का साधन है बस आप कहा खोज करने पहुच गये आ जाईये अपनी दुनिया मे वापस कही पेड खोज कर छाया मे बैठ कर सोचते है

प्रियंकर ने कहा…

भारत के मध्य वर्ग को इन नए चिने गए सामाजिक किलों में खड़े होने पर अपने को अभिजात्य का हिस्सा मानने की गलतफ़हमी होने लगती है . यह अलग बात है कि वह इन मॉल्स से सामान कम और कुंठाएं ज्यादा लेकर लौटता है .

इन मॉल्स की वजह से एक नए किस्म का सामाजिक विभाजन भी दिखने लगा है . पूरी कहानी आदमी के उपभोक्ता बनने की कहानी है . वही अब विकास का सूचक भी है . आपने और मैल्कम वोयस ने, दोनों ने बहुत अच्छे ढंग से और बहुत सच्ची तस्वीर पेश की है .

मध्य और उच्च-मध्य वर्ग के लिए यह मॉलमैनिया का मस्त-मस्त समय है . यह स्मृतिविहीन वर्तमान में जीने वाला आत्मकेन्द्रित वर्ग है .उसका पूरा-पूरा फ़ोकस आज पर है . उसके अनुसार कल किसने देखा है .

vimal verma ने कहा…

भाई अनामदासजी,
मैने अभी तक इतने गहरे धंस कर नहीं देखा था. आपने जो सवाल उठाए है वो वाकई गम्भीर हैं जिसके दूरगामी परिणाम होना स्वाभाविक हैं.दर असल हम मध्यवर्ग इन तात्कालिक सुविधाओं का मन भर उपभोग करना चाहता है. अब तो मध्यवर्ग का एक ही नारा है " हम ही हम फ़िकर न गम" जो मेरी समझ से भविष्य मे खतरनाक साबित होंगे.मेरी समझ मे सेज़ का विरोध भी सेज़ का विरोध नही है वो भी ज़मीन बेदखली का आंदोलन बन कर ही रह गया है. मॉल के प्रति अभी से मेरे मन मे अपराध-बोध की भावना घर कर गई है.अच्छे विश्लेशण के लिये धन्यवाद

बेनामी ने कहा…

यही बीमारी है बुद्दिजिवी लोगों की, कोई अच्छा चीज भी हो तो लगते हैं उसमें बुराई देखने। अरे भाई, समस्या हर जगह है जैसा कि आपने खुद ही लिखा है फिर आदमी के दील में अपराध बोध क्यों होना चाहिए, आपकी बात समझ में नहीं आयी। आप क्यों चाहते हैं कि हर कोइ आपकी तरह दुखी रहै।
मनीष शर्मा

अनामदास ने कहा…

प्रिय मनीष भाई
आपने बिल्कुल सही कहा है. असल में जो जैसा दिखता है असल में वैसा होता नहीं है, आपको दुखी करने का मक़सद नहीं था, हाँ, इतना ज़रूर चाहता हूँ कि चमकदार मॉल के पीछे का सत्य सामने आ सके, उसमें सिर्फ़ अच्छाइयाँ नहीं हैं जैसा कुछ लोग समझ रहे हैं.
धन्यवाद

बेनामी ने कहा…

बहुत सही लिखा है आपने। एक दम सच और संतुलित तरीके से लिखा है, मॉल की अच्छाइयाँ भी दिखाई हैं और बुराइयों की ओर भी ध्यान खींचा है। लेकिन एक बात समझ में नहीं आई कि मॉल का इतना विरोध हो क्यों रहा है, ये आपने नहीं बताया।
सुरेंद्र शर्मा

अनामदास ने कहा…

सुरेंद्र भाई
सबसे बड़ा आधार मानवता का है, एक ऐसे देश में जहाँ करोड़ों लोगों के पास पेट भरने के लिए खाना नहीं है वहाँ कुछ मॉलों के ज़रिए मिथ्या आभास दिया जाए कि देश का विकास हो गया है, अब कुछ और करने की ज़रूरत नहीं है.

दूसरा आधार, सामाजिक है. मॉल अंध उपभोक्तावाद के मंदिर हैं जो आर्थिक रूप से विपन्न लोगों के प्रति घोर अनादार के भाव को प्रश्रय देता है.

तीसरा आधार, पूंजीवादी साम्राज्यवाद का ख़तरा. यह समझना भूल है कि आप अपनी मर्ज़ी से जो चाहे खा-पी और ख़रीद रहे हैं, हर बेज़रूरत चीज़ को जीवनरक्षक बना देना इन्हें अच्छी तरह आता है. आप समझते हैं कि आप मर्ज़ी के मालिक हैं लेकिन वे जानते हैं कि आप उनकी मार्केटिंग स्ट्रेटेजी के गुलाम हैं.

और भी कई हैं बातें हैं लेकिन उन्हें लिखते-लिखते एक और पोस्ट तैयार हो जाएगी, आप लिंक पर क्लिक करके शोधपत्र ज़रूर पढ़ें, ज़्यादा विस्तार से सारी बातें समझाई गई हैं.
धन्यवाद

Isht Deo Sankrityaayan ने कहा…

अनामदास जी
आपने मुद्दा बहुत मौजूं उठाया है. पर हकीकत यह है कि मध्यवर्ग अगर इसकी चिन्ता करे भी तो भी उसकी औकात क्या है, सिवा अपराधबोध से ग्रस्त होने के? अव्वल तो बात यह है कि वह थेथर किस्म का चाकर हो कर रह गया है. जो सिर्फ दुम हिलाता है और जिनके आगे-पीछे दुम हिलाता है उनके ही दिमाग से सोचता है. धीरे-धीरे स्थिति यह हो जाती है कि उसके बाहर-भीतर सिर्फ बाजार बचता है. इस रीढ़विहीन से कोई उम्मीद बेकार है. यहाँ तक कि इसके अपराधबोध से ग्रस्त होने के बारे में सोचना भी सिर्फ 'ग़ालिब ख़्याल अच्छा है' टाइप का मामला है. आप को ऐसा इसलिए लग रहा है क्योंकि आप अभी असली मध्यवर्गीये नहीं हुए होंगे. यह तभी चेतेगा जब वंचित वर्ग लाठी-डंडा लेकर इसके सिर पर आ जाएगा.
इष्ट देव सांकृत्यायन