17 जून, 2007

नारद पर ज़बानदराज़ी चल सकती है ज़बानतराशी नहीं

मुश्किल तब और बढ़ जाती है जब एक ग़लती को दूसरी बड़ी ग़लती से ठीक करने की कोशिश की जाती है.

जिस वाद-विवाद की वजह से बात यहाँ तक पहुँची उसकी क्रमबद्ध 'आपराधिक जाँच' (क्रिमिनल इन्वेस्टीगेशन) का कोई मतलब नहीं है क्योंकि मुद्दा अब वह नहीं रह गया है.

नारद के प्रबंधकों ने जो 'कड़ी कार्रवाई' की और उसके बाद जिस हर्षोल्लास के साथ उसका स्वागत किया गया उससे एक लकीर खिंच गई है. अब हर किसी पर यह बताने का दबाव-सा बन गया है कि वह लकीर के किस तरफ़ है.

ऐसी लकीरें हमेशा वही खींचते हैं जिनकी चर्चा-बहस-संवाद की परंपरा में कोई आस्था नहीं है, यह परंपरा सिर्फ़ लोकतांत्रिक नहीं बल्कि 'आर्गुमेंटेटिव इंडियन' वाली भारतीय परंपरा है. ख़ैर, जाने दीजिए...अनेक विवादों के संदर्भ में यह बात-बात कई बार कही जा चुकी है.

बहकता-चहकता पोस्ट 'शाबास नारद' आया जिसमें गिरिराज जोशी ने रणभेरी बजाते हुए कहा, "नारद से ऐसे सभी चिट्ठों को निकाल फैंको जो इसका विरोध करते हैं..."

इस हिसाब से मैं निकाले जाने का पात्र बन चुका हूँ. मैंने अपनी पात्रता का प्रमाणपत्र फ़ौरन ही गिरिराज जी को भेज दिया था. मुझे लगा कि अब चुप रहना ग़लत होगा, मैंने लिखा-- "आपके विचारों का विरोध न करना और उसे ग़लत न कहना अधर्म होगा, पाप होगा."

लकीर खींचने वाले साहब वही कर गुज़रे जो श्रीमान बुश ने किया था, "या तो आप हमारे साथ हैं या फिर हमारे ख़िलाफ़"..

मुझे बताना पड़ा कि मैं लकीर के दूसरी तरफ़ हूँ, उनकी तरफ़ नहीं. इसका ये मतलब क़तई नहीं है कि मैं ओसामा के साथ था, लेकिन लकीर खींचकर आपने मुझे दूसरी तरफ़ धकिया दिया है.

मुझे अगर बदज़बानी करने वाले और ज़बान काटने का फ़रमान सुनाने वाले में से एक को चुनना ही पड़ेगा तो मैं राजा के ख़िलाफ़ हूँ.

दुखद बात ये है कि नारद को अपने सक्रिय सहयोग से चलाने वाले भाई श्री संजय जी बेंगाणी को गिरिराज जोशी की पोस्ट का मतलब समझ में नहीं आया, उनकी प्रतिक्रिया थी-- "क्या लय में लिखा है, खुब. मुझे तो लगा था आज नारद केवल गालियाँ ही खाने वाला है. शाबास."

संजय जी और अन्य कई चिट्ठाकार दोस्त इस बात से परेशान रहते हैं कि सांप्रदायिकता, हिंदू-मुसलमान, आरक्षण, दलित आदि विषयों पर चर्चा करके कुछ लोग चिट्ठाकारों में फूट डाल रहे हैं. संजय जी की नज़र उस दरार पर नहीं गई जो गिरिराज जी और कुछ अन्य साथियों ने डाली है.

महाशक्ति जी की शक्तिशाली टिप्पणियाँ भी कम विचारणीय नहीं हैं जिनमें 'मक्‍कार पत्रकारों', 'हिन्‍दू‍ विरोधी तालीबानी लेखों', 'दीमकों' और 'विषराजों' का फन कुचलने के साथ-साथ 'मुहल्‍ले को भी सर्वाजनिक रूप से निष्‍क‍ासित एवं बहिष्‍कृत' करने की अनुशंसा की गई है.

अंत में एक निर्णायक उदघोष--"आज समय आ गया है कि इन सॉंपों की पूरी नस्‍ल को कुचल दिया जाना चाहिए." वाक़ई बहुत ज़हर है.

इस पर भी बेंगाणी जी की 'बहुत खुब' वाली टिप्पणी दर्ज है, ढेर सारे साथी हैं जिन्होंने महाशक्ति जी के विचारपरक लेखन का करतल ध्वनि से स्वागत किया है.

विचार, सरोकार, हिंदुत्व, इस्लाम, न्याय, उदारता, लोकतंत्र, सांप्रदायिकता, आरक्षण, गुजरात, मोदी... जैसे कुल दस-पंद्रह शब्द हैं जिनका ज़िक्र आते ही कुछ दोस्तों को सचमुच तकलीफ़ होने लगती है. ये शब्द मुझे भी बहुत तकलीफ़ देते हैं इसलिए उन पर चर्चा ज़रूरी लगती है वह चाहे मुहल्ले वाले अविनाश करें या समाजवादी जन परिषद वाले अफ़लातून जी.

बेंगाणी जी को गालियाँ देने वाले राहुल के कृत्य के ख़िलाफ़ कोई निंदा प्रस्ताव लाया जाता तो अफ़लातून, धुरविरोधी, मसिजीवी, अभय तिवारी, प्रमोद सिंह जैसे अनेक लोग उसका समर्थन करते जो आज नारद के फ़ैसले के विरोध में खड़े हैं. सीधी सी वजह है कि आपने लकीर खींच दी है.

'कड़ी कार्रवाई' और उसके बाद के जश्न में गाए गए विजयगान और प्रयाणगीत से स्पष्ट हो गया है कि अब भीष्म और द्रोण भी तटस्थ नहीं हो सकते, उन्हें बताना होगा कि वे किधर हैं.

यह पोस्ट व्यक्तियों के विरोध या समर्थन में नहीं बल्कि प्रवृत्तियों के बारे में है. विचारहीनता और असहिष्णुता भी व्यक्तिगत स्वतंत्रता है जिसका सम्मान करते हुए इससे ज़्यादा कुछ लिखना ठीक नहीं होगा.

11 टिप्‍पणियां:

अरुण ने कहा…

अब भीष्म और द्रोण भी तटस्थ नहीं हो सकते, उन्हें बताना होगा कि वे किधर हैं.
सबसे पहले यहा शायद मैने ही अपने ब्लाग पर जगह दी थी इस काव्य खंड को
"समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याध,
जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनके भी अपराध।"

,और यह मुझे हमेशा से बहुत प्यारा रहा है,पर आज आपने मुझे झझकोर डाला है
मै खुद तटस्थ रहा हू इस सारे मामले मे,
पहले मै अकेला लडता रहा ,अनाम बहुत आये साथ देने,पर नामो मे हिम्मत नही थी साथ देने की,
नारद से भी झगडा मै’सिर्फ़,एक टिप्पणी के लिये मोहल्ला ब्लोग पर,जो इस विषय पर मै उनसे कराना चाहता था
"कि यह आप गलत कर रहे है,कृपया इसे हटा ले"
पर यह नही हुआ क्यो..? मै आज भी नही जानता,शायद नारद की अपनी आंतरिक मजबूरियो के चलते वो ऐसा कर पाने मे सक्षम नही रहा होगा उस वक्त
इसी लिये मै आज तटस्थ रहा,और अब इस मामाले मे पडने का कोई मतलब नही है
अब मुझ लगता है की मै उस काव्य खंड का प्रयोग अपने ब्लोग पर करने का अधिकार खो चुका हू
अत:मै आज से उसका प्रयोग नही करुगा

ravish ने कहा…

उम्मीद है संजय अपनी भूमिका को समझेंगे। नुक्कड़ों वाली वाह वाही से बचकर समझदारी से काम करेंगे। अनामदास जी मगर ऐसा होता नहीं दिख रहा। संजय जी ने दिल से कमज़ोर महाशक्ति की वाहवाही में सुर मिला दिया है। मगर कोई बात नहीं। हम सब भावावेश और जल्दबाज़ी में ऐसा करते हैं। देखिये संजय बेंगाणी जी क्या करते हैं?

प्रतिरोध की इस बहस में हम भी यही राय रखते हैं। लकीर खींचने वालों की कोई अपनी ज़िम्मेदारी नहीं होती। वो सिर्फ ताली बजाना जानता

Beji ने कहा…

"यह पोस्ट व्यक्तियों के विरोध या समर्थन में नहीं बल्कि प्रवृत्तियों के बारे में है. विचारहीनता और असहिष्णुता भी व्यक्तिगत स्वतंत्रता है जिसका सम्मान करते हुए इससे ज़्यादा कुछ लिखना ठीक नहीं होगा."

चलो विचार विमर्ष का रास्ता अपनाते हैं....किस बात पर विचार करें.....संजय जी और पंकज जी भाई हैं या नहीं......या फिर नैपकिन की नई उपमा पर.....जब मंच का (दुर) उपयोग व्यक्तिगत भड़ास निकालने के लिये किया जाये....और जब ऐसा करने वाले अपनी स्वतंत्रता के खातिर किसी पर भी कैसा भी सवाल उछाल दें....पोस्ट मिटाने के अनुरोध को अनदेखा करें....और फिर मेलोड्रैमेटिक अंदाज़ में उसे मिटा दे..... तो हद से ज़्यादा नाटकीयता इसमें नज़र आती है। मंच के संचालकों को कलाकार और कार्यक्रम दोनों चुनने की छूट है.....और मुझे खुशी है कि नारद लोकतांत्रिक नहीं है। नहीं तो फिर आप जानते ही हैं कि भारत लोकतांत्रिक है....सो कूड़ा कहीं भी फैलाने की छूट है।


और लकीर कहाँ हैं ?
किसने खींची?

आप जिस तर्क वितर्क की बात कर रहे हैं...यही विचार विमर्ष है.....जिसकी छूट अभी भी है.....मैं लकीर के किसी भी तरफ नहीं हूँ.....किन्तु इस फैसले का समर्थन करती हूँ....क्यों कि किसी दो व्यक्तियों के भाई होने या ना होने पर मैं कुछ भी विचार करने में पूर्णतया असमर्थ हूँ।

Nasiruddin ने कहा…

शुक्र है, मुद्दों पर बात होने लगी। पहले और कल ऐसे ही कुछ सवाल मैंने उठाने की कोशिश की थी। नारद को यह देखना होगा कि उन्होंने लकीर खींच कर किसे कहां डाल दिया है। अगर आप में असहमति (गाली गलौज नहीं, व्यक्तिगत और घटिया टीका टिप्पणी नहीं) के स्वर सुनने की आदत नहीं है, तो आप न सिर्फ कि उदार नहीं है बल्कि लोकतंत्र विरोधी है और मनुष्य विरोधी भी हैं क्योंकि फिर असहमति आपको असहनीय होगी और आप उसे खत्म कर देना चाहेंगे। जहां तक पोस्ट पर कमेंट की बात है, पूरा संचालक मंडल कदमताल कर रहा है, कोरस गान कर रहा है। उन टिप्पणियों से एक बात और साफ इन्होंने कर दी है कि जो 'कार्यवाही' की गयी वो निष्पक्ष नहीं थी। अगर ऐसा होता तो पिछले दो दिनों में कम से कम आधा दर्जन ब्लॉग पर ये रोक लगा चुके होते हैं। पर नारदमुनि तो लगता है कि मुदित भाव में भू लोक से कहीं और विचरण कर रहें हैं। इन्हें ये अहसास नहीं है कि ये न सिर्फ अपना नुकसान कर रहे हैं बल्कि उसका भी भला नहीं कर रहे जिसकी पीठ थपथपाने में जुटे हैं।

eSwami ने कहा…

मैं अक्षरग्राम समूह का सक्रीय सदस्य हूं और नारद तकनीकी और सलाहकार टीम के मूल सदस्यों मे से हूं. आपके चिट्ठे पर इस टिप्पणी के रूप में इस विषय पर अपनी चुप्पी तोड रहा हूं.

व्यक्तिगत रूप से, आप ही की तरह इस पूरे मुद्दे को मैं "आर्ग्यूमेंटेटिव इंडियन्स" के "फ़ेवरेट पासटाईम" के एक और उदाहरण के रूप में देखता हूं. ना कम ना ज्यादा.

न चाहते हुए भी यह टिप्पणी कुछ लंबी हो जाएगी इसलिये माफ़ी चाहता हूं.

इस पूरे मुद्दे पर अंग्रेजी की एक बेहतरीन फ़िल्म मेट्रिक्स के कुछ संवाद याद आते हैं -

१) Did you know that the first Matrix was designed to be a perfect human world? Where none suffered, where everyone would be happy. It was a disaster. No one would accept the program. Entire crops were lost. Some believed we lacked the programming language to describe your perfect world. But I believe that, as a species, human beings define their reality through suffering and misery. The perfect world was a dream that your primitive cerebrum kept trying to wake up from. Which is why the Matrix was redesigned to this: the peak of your civilization. - Agent Smith

२) I'd like to share a revelation that I've had during my time here. It came to me when I tried to classify your species and I realized that you're not actually mammals. Every mammal on this planet instinctively develops a natural equilibrium with the surrounding environment but you humans do not. You move to an area and you multiply and multiply until every natural resource is consumed and the only way you can survive is to spread to another area. There is another organism on this planet that follows the same pattern. Do you know what it is? A virus. Human beings are a disease, a cancer of this planet. You're a plague and we are the cure. - Agent Smith

इन संवादों का पूरा संदर्भ समझने के लिये फ़िल्म देखनी होगी लेकिन फ़िर भी बात की भूमिका रखने के लिये लिखे.

रोना यही है की हम अक्षरग्राम और नारद को आदर्श सदस्यों की आदर्श और खुशहाल संजालस्थली बनाना चाहते रहे हैं लेकिन बिलावजह बहस-मुबाहिसों में जिंदगी मुहाल और दिलों को कारगिल किये बिना कुछ लोगों को खाना हज़म नही होता. और इस तरह की हरकतों में कुछ पत्रकार ब्लागर्स माशा अल्लाह खासे आगे रहे हैं. इससे हिंदी ब्लागिंग का एक विधा के रूप में जो नुकसान हो रहा है क्या उन्हें उसका आभास करवाने का जिम्मा उनका कोई वरिष्ठ बिरादर लेगा? हम जैसे कोडिंग-प्रोग्रामिंग की खाने वालों के बोलने का असर होना होता तो हो चुकता अब तक!

बेहतर होता की संबद्ध ब्लाग को असंबद्ध करने के बाद इस फ़ैसले पर इतनी चिल्ल-पों ना होती - इस मुद्दे पर चुप्पी का मतलब तटस्थता या निरपेक्षता नहीं है बोरियत भरी उदासीनता है और खिन्नता इन्हीं बकवादितओं के चलते मुझसे पहले कई लोगों का मोहभंग हुआ है और समूह ने कई अच्छे ब्लागर्स खोए हैं - खोटे सिक्कों ने खरों को बाहर किया है. चिट्ठाकारी जुडने की, नवसाहित्य की, आत्माभिव्यक्ति की विधा है कुरूप राजनीति का अखाडा नहीं है. अच्छे लोग कहीं और बैठक जमा लेंगे.

लेकिन जैसा की आपकी यह पोस्ट प्रवृत्तियों के बारे में है - खुद को मल्टीप्लाई करने जैसी मूल मानवीय प्रवृत्ती है अपनी बेवकूफ़ियों भरी बातें जिन्हें वे "विचारधारा" कहते हैं के वायरस को फ़ैलाना चाहे उन्हें पढ कर कोई वर्चुअल-खुदकुशियां ही क्यों ना करने लग पडें.

यहां पर ये स्पष्ट करना जरूरी है की मैं व्यक्तिगत आक्षेप किये जाने को बर्दाश्त करने का हामी नहीं लेकिन इसका अर्थ यह भी नहीं की जिस पर व्यक्तिगत आक्षेप किया गया उसकी विचारशैली का कायल या समर्थक होऊं या जिसने आक्रमण किया उसके व्यवसाय या कर्म से जुडे हर व्यक्ति को गोलबंद करके देखूं.

पूरे प्रकरण को एक अलग[सेपरेटेड] युनिट फ़ार्म में देखते हुए की गई कार्यवाही गलत नही है और इसे इससे अधिक या कम कर के देखने की जरूरत नहीं होने की वजह से किसी तथाकथित लकीर का होना या उसके इधर या उधर होने का कोई सवाल नहीं है ना होना चाहिए और ना ही किसी को इधर उधर उपर नीचे होने की कोई जरूरत है. और जो हो रहे हैं होते रहें वे बस खुद का प्रतिनिधित्व करते हैं समूह का नहीं.

मेरी प्राथमिकता है मेरे समय का बेहतर प्रयोग - ये सब नहीं... और व्यक्तिगत रूप से अनामदासजी, आप जैसे उम्दा ब्लागर को भी इस सब को नज़र-अंदाज़ कर के हम जैसे मुरीदों के लिये कुछ बढिया लिखने का मूड जमाना होगा.

शोर का दौर ८० के दशक की घटिया फ़िल्मों के दौर के समान आ कर चला जाएगा. विधा और भाषा के सच्चे सुंदर स्वरूप को रखने वालों, अच्छे लिखने वालों के प्रशंसक उन्हें ढूंढ ढूंढ कर पढते रहेंगे. :)

अनूप शुक्ला ने कहा…

आपकी पोस्ट पढ़कर अच्छा लगा और आपके विचार भी। इस प्रतिबंध को विजय घोष के रूप में देखने वाले साथी और उस पर सिर्रीपने की टिप्पणी करने वाले इसे और हल्का बना रहे हैं।

गिरिराज जोशी "कविराज" ने कहा…

आदरणीय अनामदासजी,

नारद के प्रबंधकों ने जो 'कड़ी कार्रवाई' की और उसके बाद जिस हर्षोल्लास के साथ उसका स्वागत किया गया उससे एक लकीर खिंच गई है. अब हर किसी पर यह बताने का दबाव-सा बन गया है कि वह लकीर के किस तरफ़ है.

आपके इस आलेख से स्पष्ट है कि 'कड़ी कार्यवाही" गलत नहीं थी, सही फैसले का स्वागत करना भी गलत नहीं है, सो जिन चिट्ठाकारों ने स्वागत किया आप उन्हें कटघरे में खड़ा नहीं कर सकते। लकीर कड़ी कार्यवाही की वजह से नहीं खिंची, जिस तरह से इस कार्यवाही के विरोध में चंद समर्थक चिट्ठाकारों द्वारा नारद के पृष्ठ अपनी पोस्टो से भरना शुरू हुआ, वह वजह बनी।

ऐसी लकीरें हमेशा वही खींचते हैं जिनकी चर्चा-बहस-संवाद की परंपरा में कोई आस्था नहीं है

क्या चर्चा-बहस-संवाद से आपका तात्पर्य गाली-गलौज से है?

बहकता-चहकता पोस्ट 'शाबास नारद' आया जिसमें गिरिराज जोशी ने रणभेरी बजाते हुए कहा, "नारद से ऐसे सभी चिट्ठों को निकाल फैंको जो इसका विरोध करते हैं..."

आपने यह तो अच्छे से नोट कर लिया कि मैने क्या कहा, मगर क्या यह विचार किया कि क्यों कहा? मैं चर्चा-बहस-संवाद का विरोधी नहीं हूँ, मगर चर्चा-बहस-संवाद में शालीनता का पक्षधर हूँ, आप मेरी जिस पोस्ट की बात कर रहें है वह संभवतया प्रथम पोस्ट थी जिसमें मैने कड़े शब्दों का प्रयोग किया, मगर जब पानी ऊपर से बहने लगे तो हाथ-पैर मारना आवश्यक हो जाता है।

इस हिसाब से मैं निकाले जाने का पात्र बन चुका हूँ

मुझे नहीं लगता कि आपने उक्त पंक्ति का केवल शाब्दिक अर्थ निकाला होगा, आप अच्छे से समझ रहें है कि मैने उक्त पंक्ति किस संदर्भ में लिखी है, फिर आप इसे इस प्रकार पेश कर क्या साबित करना चाह रहें हैं?

बेंगाणी जी को गालियाँ देने वाले राहुल के कृत्य के ख़िलाफ़ कोई निंदा प्रस्ताव लाया जाता तो अफ़लातून, धुरविरोधी, मसिजीवी, अभय तिवारी, प्रमोद सिंह जैसे अनेक लोग उसका समर्थन करते जो आज नारद के फ़ैसले के विरोध में खड़े हैं.

क्या आपको वाकई ऐसा लगता है? यदि ऐसा था तो क्या इनमे से भी कोई उसके खिलाफ़ निंदा प्रस्ताव प्रस्तुत नहीं कर सकता था, पहले भी इस प्रकार की प्रविष्टियाँ मोहल्ला, पंगेबाज, जोगलिखी.. इत्यादि चिट्ठों पर होती रही है, मुझे बतायें कब इन्होनें निंदा प्रस्ताव के लिये सिफ़ारिस की?

'कड़ी कार्रवाई' और उसके बाद के जश्न में गाए गए विजयगान और प्रयाणगीत से स्पष्ट हो गया है कि अब भीष्म और द्रोण भी तटस्थ नहीं हो सकते, उन्हें बताना होगा कि वे किधर हैं

"'कड़ी कार्यवाही' के बाद के जश्न, विजयगान, प्रयाणगीत...", आप एक ठोस एवं अच्छे कदम की स्तुती को इस प्रकार भी प्रस्तुत कर सकते हैं?

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आपकी इस पोस्ट में बहुत सी बाते ऐसी है, जिनका मैं समर्थन भी करना चाहूँगा, मसलन -

1. एक ग़लती को दूसरी बड़ी ग़लती से ठीक करने की कोशिश नहीं होनी चाहिये।

2. व्यक्तियों के विरोध या समर्थन नहीं बल्कि प्रवृत्तियों का विरोध या समर्थन होना चाहिये।

सस्नेह,

- गिरिराज जोशी "कविराज"

RC Mishra ने कहा…

यहाँ पर जो मै कहना चाहता था, काफ़ी हद तक ई-स्वामी ने कह दिया है। मुझे भी आपसे ऐसी प्रविष्टि उम्मीद नही थी, मैने भी अभी जो लिखा,बहुत त्रस्त हो कर ही लिखा।

तुरीय अपराजित ने कहा…

आपके और विचारशीलता के सम्पूर्ण सर्मथन में ........

Pramod Singh ने कहा…

जुग-जुग जियो, गुमनामदास!.. माथा शर्म से.. व आत्‍मा क्षोभ में गड़ी जा रही है!..

vimal verma ने कहा…

अनामदास जी,
कुछ भी कहिये नारद समूह का कोरस अब भा नही रहा.इनमे नारद का प्रवक्ता कौन है. समझ नही आता.ये खुद अपनी डाल काट्ने पर आमादा हैं.किस बात का घमंड है इन्हें इसकी व्याख्या की आवश्यक्ता है.लगता है इनकी कोई सोची समझी रणनीति है.वैसे आपकी पूरी बात से मै सहमत हूं.