04 अगस्त, 2007

उम्मीद सिर्फ़ अँगरेज़ी न जानने वालों से है

भाषा भावुकता से नहीं, ताक़त से चलती है. जिस तरह सिक्के चलाए जाते हैं वैसे ही भाषा भी चलाई जाती है.

भाषा का ईंधन सत्ता से उसकी निकटता है. अगर वह शक्ति की कुंजी नहीं है तो कुछ सिरफिरों का शौक़ भर बन सकती है, कामयाब लोगों की ज़बान और उनकी कलम से फूटने वाली धारा नहीं.

दुनिया की चार बड़ी भाषाएँ अँगरेज़ी, फ्रेंच, स्पैनिश और अरबी विशुद्ध रूप से सत्ता की वजह से प्रसार पाने वाली भाषाएँ हैं, उनका गहरा औपनिवेशिक अतीत है, अगर इन भाषाओं को बोलने वाले लोग कोलोनाइज़र नहीं होते तो तमिल, गेलिक, स्वीडिश या हिब्रू से अधिक इन भाषाओं का क्या महत्व होता?

भाषा चला देने से चल जाती है, अगर कोई भाषा सबके लिए ज़रूरी हो जाए तो लोग रातोंरात उसे सीख जाते हैं. भारत शायद दुनिया का अकेला देश है जहाँ अपनी भाषा हिंदी, तमिल, कन्नड़, मराठी, मलयालम... जाने बिना काम चल जाता है, बाइज़्ज़त चल जाता है. वैसे काम तो अँगरेज़ी जाने बिना भी चल जाता है लेकिन बेइज़्ज़त होकर चलता है. अँगरेज़ी जाने बिना तरक्की नहीं हो सकती, अपनी भाषा जाने बिना जितनी चाहें उतनी तरक्की हो सकती है.

भारत में ग्लोबलाइज़ेशन की जो चकाचौंध दिख रही है उसके पीछे भारतीय कामगारों के अँगरेज़ी ज्ञान की भारी भूमिका है. जहाँ चीनी भाई अँगरेज़ी सीखने के लिए बेहाल हैं वहीं भारत में अँगरेज़ी बच्चों को ही नहीं, बल्कि पिल्लों को भी सिखाई जाती है.

ठीक है कि अँगरेज़ी जानने की वजह से शहरी मध्यवर्ग को कुछ हज़ार नई नौकरियाँ मिल गई हैं लेकिन प्रतापगढ़, सिवान, झाँसी-झूँसी के करोड़ों लौंडे बेरोज़गार घूम रहे हैं, ज़्यादा से ज़्यादा 'सिकोरटी गारड' बन सकते हैं. वैसे एक से एक बढ़कर 'इंटलीजेंट' हैं लेकिन "इंगलिस में मार खा जाते हैं."

जॉर्ज बुश भारत आते हैं और बेहिचक कह जाते हैं कि जितनी आबादी अमरीका की है, उतने तो भारत में उपभोक्ता हैं इसलिए वे भारत को इतना महत्व दे रहे हैं. यहाँ बात तकरीबन 30 करोड़ शहरी लोगों की हो रही है जिनके लिए किसी अमरीकी प्रोडक्ट के ऊपर हिंदी में नाम लिखने की भी मशक्कत नहीं करनी है. लेकिन बाकी बचे 70 करोड़ लोगों का क्या?

चीन में ऐसा नहीं हो सकता, बिना चीनी के काम नहीं चल सकता. अब ज़रा ठहरकर सोचिए, यह चीन की ताक़त है या कमज़ोरी?

चीनी अँगरेज़ी सीखने के लिए बेताब हैं वहीं यूरोपीय-अमरीकी लोग भी चीनी भाषा सीख रहे हैं, हिंदी नहीं. माइक्रोसॉफ़्ट ने सबसे पहले चीनी और उसके बाद आइसलैंडिक से हौसा तक पचासों भाषाओं में अपने ऑपरेटिंग सिस्टम लॉन्च किए लेकिन हिंदी की ज़रूरत नहीं समझी, ऐसे देश के लिए जहाँ उसके ग्राहक लाखों में नहीं बल्कि करोड़ो में हैं.

मुझे कई बार लगता है कि भारत की असली ताक़त अँगरेज़ी न जानने वाली बिरादरी है जिनकी वजह से शायद बाज़ार को होश आए. एक मिसाल लीजिए-- ट्रैक्टर, खाद और कीटनाशक बनाने वाली विदेशी कंपनियों के विज्ञापन कभी अँगरेज़ी में नहीं होते. धीरे-धीरे, देर-सबेर जब देश के बहुसंख्यक लोगों के बीच माल बेचने की बात आएगी तब हिंदी, तमिल, गुजराती, असमिया और ओड़िया के बारे में भी कंपनियों को सोचना होगा.

लेकिन यहाँ एक बहुत बड़ा प्रश्नचिन्ह है, वो ये कि अँगरेज़ी जाने बिना कुछ ज़मींदारों-रंगदारों-ठेकेदारों को छोड़कर बाक़ी लोगों के पास पैसा कब तक आएगा, वे दमदार ग्राहक कैसे बन पाएँगे, क्योंकर बन पाएँगे, किसी को नहीं पता. देश में सत्ता की संरचना कुछ ऐसी बन चुकी है कि उसमें अँगरेज़ी के बिना सेंध लगाना असंभव दिखता है.

भारत में हिंदी या अन्य क्षेत्रीय भाषाओं को वही लोग बचा सकते हैं जो अँगरेज़ी की अग्निजिह्वा से बचे हुए हैं. शायद किसी समानांतर-वैकल्पिक तरीक़े से वे इतनी क्रयशक्ति हासिल कर लें कि उनके बीच माल बेचने के लिए हिंदी, तमिल, गुजराती, असमिया या ओड़िया जैसी भारतीय भाषा अनिवार्य हो जाए. लेकिन क्या उसके पहले सब लोग अँगरेज़ी ही नहीं सीख जाएँगे?

अँगरेज़ी नहीं भी सीखेंगे तो इतना आत्मविश्वास कहाँ से आएगा कि कहें, "हमें नहीं पता क्या लिखा है, हम नहीं ख़रीदते." किसी अधपढ़े से पढ़वा लेंगे और अपनी क़िस्मत को कोस लेंगे लेकिन माल तो वही बिकेगा जो जिसके ख़रीदने में शान हो, वही शान जो शहर में अँगरेज़ी बोलने वाले की है. रामलाल-कुंदनलाल एंड कंपनी की वो इज़्ज़त कैसे हो सकती है जो जॉनसन एंड निकल्सन की होती है.

कुचक्र है कि क्रयशक्ति बिना अँगरेज़ी के सिर्फ़ गुंडागर्दी से आती है. यह कुचक्र कब और कैसे टूट सकता है इसके बारे कुछ सोचिए, बोलिए और बताइए.

13 टिप्‍पणियां:

Gyandutt Pandey ने कहा…

"भाषा भावुकता से नहीं, ताक़त से चलती है."

अनामदास की सोच है कि ताकत जब और जैसे आयेगी - उससे भाषा चली जायेगी.
भाषा की फिक्र छोड़ कर ताकत की बात करें. चीन भी ताकत गार्नर कर रहा है और हम भी. पर यहां विभिन्न लोग निन्दक समाज बना सारे परिवर्तन की पहले छीछालेदर करते हैं.
मेरे ख्याल से भाषा पर सोच पर बाद में चलें. पहले सस्टेंड ग्रोथ की बात कर लें. यह सभ्यता मरी नहीं. मरेगी भी नहीं. संस्कृत जब देशज भाषाओं से हार रही थी तब भी ऐसे ही लेख सामने आ रहे होंगे!

रजनीश मंगला ने कहा…

इस कुचक्र का टूटना अब लगभग असंभव है। ये तब हो सकता है जब हमारे दफ़्तरों में हर काम भारतीय भाषा में हो, तकनीकी पढ़ाई अपनी भाषा में हो। जहाँ अभी तक कंप्यूटर कीबोर्ड भी अपनी भाषा में नहीं उपलब्ध हों, वहाँ क्या होगा? जो भी हो, पहला काम कंप्यूटर कीबोर्ड उपलब्ध करवाने का होना चाहिए।

अरुण ने कहा…

बिल्कुल ठीक कहा जी हिंदी के गढ उत्तर भारत मे देखिये ९९% दुकानो के बोर्ड अग्रेजी मे ही मिलेगे,चाहे गलत ही हो..

अविनाश ने कहा…

बहुत सही बात कही। लेकिन पता नहीं, उस मुल्‍क में हिंदी कभी ज़रूरी भाषा बन पाएगी या नहीं, जहां के प्रधानमंत्री को हिंदी बोलने के लिए अटक-अटक कर सोचना पड़ता है- और अपने भदेस तेवरों के लिए जाने जाने वाले लालू यादव को भी कभी कभी अंग्रेज़ी बोल कर लोगों को बताना पड़ता है कि देखो हम उतने गंवार नहीं है जितने समझे जाते हैं। जन की बात करने वाली कम्‍युनिस्‍ट पार्टियों के तमाम दस्‍तावेज़ और इंटर्नल बैठकें सब अंग्रेज़ी में होती हैं। हिंदी क्‍यों बनेगी मुल्‍क की ज़रूरी भाषा, जब प्राथमिक पाठशालाओं में अंग्रेज़ी की किताब अनिवार्य है।

अभय तिवारी ने कहा…

कुचक्र कैसे टूटेगा.. यह तो बड़ा सवाल है.. अभी तो यह कह सकता हूँ.. कि भाई सही सवाल उठाए हो.. और सही तरीक से उठाए हो.. सवाल पत चल जाने पर आधा काम तो हो ही जाता है.. यह मान कर थोड़ा सन्तोख किया जाय क्या..?

अनुनाद सिंह ने कहा…

साधुवाद, इतना सटीक विचार प्रस्तुत करने के लिये। विषेष रूप से इस प्रविष्टि का शीर्षक बहुत अर्थपूर्ण है।

अंगरेजी को ग्लोबल चिन्तन की भाषा माना जाता है; विमुक्त चिन्तन की भाषा माना जाता है। किन्तु भारत में अंगरेजी पठन-पाठन इसके विपरीत परिणाम दे रहा है। अंगरेजी जानने वालों से उम्मीद थी कि वे अपनी वैश्विक दृष्टि का समुचित उपयोग कर भारतीय भाषाओं को आगे बढ़ाने के लिये समुचित समाधान प्रस्तुत करते; भारतीयों को मानसिक स्वालम्बन के लिये दिग्दर्शक बनते (जैसा गांधी जी ने किया था - दुनिया से कह दो गांधी अंगरेजी भूल गया है) किन्तु ऐसा नहीं हो रहा है।

परिणाम यह है कि एक नकलची और रट्टू समाज बन रहा है। भारत में अभी भी कच्चे मकानों की बहुलता है, पर कोई इंजीनियर नहीं है जो भारतीय जलवायु को ध्यान में रखते हुए और स्थानीय सामग्री का उपयोग करते हुए कोई 'उपयुक्त तकनीकी' (appropriate technological) समाधान प्रस्तुत करे। भारत की चिकिसकीय पढ़ाई भी इसी तरह की है। जो फल, अनाज, शब्जियाँ भारत में आमतौर पर मिलतीं हैं उनमें पाये जाने वाले पोषक तत्वों को बताने वाला चार्ट शायद ही आपको कहीं देखने को मिले। सब किताबें, पत्रिकायें और अखबार आसानी से उपलब्ध यूरोपीय या अमेरिकी चार्टों को ही आपके सामने परोस देते हैं। हमारे फैशन विशेषज्ञों के पास इतना आत्मविश्वास नहीं है कि भारतीय जलवायु के हिसाब से परिधान डिजान कर सकें। यूरोप आदि ठण्डे देशों में जो परिधान प्रचलित हैं हम उन्हे ही ढोने के लिये अभिशप्त हैं। हर क्षेत्र में स्थिति ऐसी ही है।

भगवान ही भारत को मानसिक गुलामी से बाहर निकाल सकता है।

इरफ़ान ने कहा…

आपने ठीक लिखा है. बस ये समझ में नहीं आया कि अंग्रेज़ी न जानने वालों से उम्मीद किस चीज़ की कर रहे हैं. थोडा समय पहले एक घरेलू नौकरानी बताती थी कि वो सुबह कोलगेट करके आती है.जिन निराश्रित और असहाय लोगों में आप उम्मीद देख रहे हैं वो फ़िलहाल तो उपभोक्ता ही हैं.
अतिरेक में अंग्रेज़ी का विरोध दक्षिणपंथ के पक्ष में जाता है. स्पष्ट करें कि आपकी चिंता की सुई किधर इशारा कर रही है?

अनामदास ने कहा…

इरफ़ान भाई
मैं तो बची-खुची उम्मीद की बात कर रहा हूँ. उम्मीद की चीरफाड़ करना ख़तरनाक है, हम दोनों को पता है कि परिणाम क्या निकलेगा. आख़िर किस हद तक निराशावादी हुआ जाए.

अनूप शुक्ला ने कहा…

अच्छा लिखा है। साधारण पर असाधारण विश्वास वाली है, अच्छी लगी। :)

Shrish ने कहा…

बहुत ही अच्छा एवं मनन करने योग्य लेख। स‌चमुच यदि ये अंग्रेजी न जानने वाले लोग न होते तो व्यवहार में बची-खुची हिन्दी भी न रहती।

Pramod Singh ने कहा…

ज्ञानदत्‍त और इरफ़ान ने सवाल करके आपको घेर ही लिया है..

माइक्रोसॉफ़्ट ने सबसे पहले चीनी और उसके बाद आइसलैंडिक से हौसा तक पचासों भाषाओं में अपने ऑपरेटिंग सिस्टम लॉन्च किए लेकिन हिंदी की ज़रूरत नहीं समझी, ऐसे देश के लिए जहाँ उसके ग्राहक लाखों में नहीं बल्कि करोड़ो में हैं.

मुझे यह सवाल ज्‍यादा सताती है. विशुद्ध भाषा की राजनीतिक हैसियत व सत्‍ता का सवाल है. मेरा इस बिंदु पर बहुत पहले से मानना रहा है, कि हिन्‍दी की भारतीय आज़ादी के वक़्त इस लिहाज़ से भले कुछ संभावना रही हो, सन अस्‍सी के बाद वह खत्‍म हुई है, और बदली हुई दुनिया में किसी तरह से उसकी वापसी होगी, मुझे असंभव लगता है. हां, सिर्फ़ चिन्तित होने की एक अदा भर लेनी है, तो मैं अभय और अविनाश वाले सवालों के साथ हूं!

Neelima ने कहा…

बढिया भाषिक चिंतन किया जा रहा है आजकल आपके द्वारा !

Shastri JC Philip ने कहा…

"भारत शायद दुनिया का अकेला देश है जहाँ अपनी भाषा हिंदी, तमिल, कन्नड़, मराठी, मलयालम... जाने बिना काम चल जाता है, बाइज़्ज़त चल जाता है. वैसे काम तो अँगरेज़ी जाने बिना भी चल जाता है लेकिन बेइज़्ज़त होकर चलता है"

कैसी विडंबना है! लेकिन मुझे उम्मीद ही कि कभी न कभी स्थिति बदलेगी. 1857 में किसने सोचा था कि हिन्दुस्तान सचमुच में आजाद हो जायगा -- शास्त्री जे सी फिलिप

हिन्दी ही हिन्दुस्तान को एक सूत्र में पिरो सकती है
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