27 अगस्त, 2007

जादू का खिलौना है, मिल जाए तो भी सोना है

कई दिनों से रैटल मेरे दिमाग़ में बज रहा है. वैसे तो वह झुनझुना है जिससे खेलना तीन साल के बच्चे को ख़ास शोभा नहीं देता लेकिन मेरे बेटे ने उसे अपने वजूद से जोड़ लिया है जैसे चर्चिल की सिगार, शरलक होम्स का पाइप, करुणानिधि का काला चश्मा, गाँधी जी की छड़ी या प्रभु के हाथों में घूमता सुदर्शन चक्र.

हरी वाली गेंद टॉम है, नारंगी वाली जेरी, दोनों गोल गोल घूमकर तेज़ी से एक दूसरे का पीछा करते हैं. यही कभी चश्मा है, कभी पिस्तौल और कभी मोबाइल फ़ोन. कभी गाना गाते समय यही माइक बन जाता है और कभी कुछ और.

शायद यही मोह की शुरूआत है, यह बहुत चकित और मोहित करने वाला मोह है. टीवी देखने वाले, नर्सरी जाने वाले, बीसियों कार्टून कैरेक्टरों को अपना दोस्त समझने वाले इस बच्चे को इस रैटल से क्या मिलता है? सारे चीनी-जापानी बैटरी वाले खिलौनों, सारे नरम-मुलायम टेडी-डॉगी को छोड़कर उसे रैटल जैसे खट-खट करने वाले प्लास्टिक इस खिलौने से प्यार हो गया है.

सोते समय, खाते समय, रेल में, बस में, बिस्तर पर, यहाँ तक कि नहाते समय और पॉटी में भी रैटल उसके हाथ में रहता है, साधु के चिमटे की तरह. उसका पास होना एक बहुत बड़ा आश्वासन है मानो वह भयानक युद्ध में अचूक अस्त्र हो या विदेश यात्रा में पासपोर्ट. वह उसे आँख से ओझल नहीं होने देता.

दो दिन पहले की बात है, कमोड पर बैठे सुपुत्र के हाथ से छूटकर रैटल सीधा अंदर गिरा जहाँ पहले से छिःछिः तैर रही थी. बहुत डाँट पड़ी, फिर मैंने निर्णय सुनाया कि फ्लश चला दिया जाएगा, रैटल का अंत हो चुका है. वह इस तरह शायद ही कभी रोता है, रोने में शोर मचाना ज़्यादा होता है, लेकिन इस बार उसकी आँखें भरीं थीं और होंठ नीचे लटक गए थे. नैपी बदलते-बदलते प्रैक्टिस तो हो गई है लेकिन कमोड में हाथ डालकर रैटल निकालना फिर भी बड़ी चुनौती थी. आख़िरकार मैंने चुनौती स्वीकार की और रैटल का भरपूर शुद्धिकरण करके उसे उसके मालिक के हवाले किया.

सोकर उठने के बाद पहला सवाल होता है, "ह्वेयर इज़ माइ रैटल?" रैटल की रट तब तक जारी रहती है जब तक प्लास्टिक की दो गेंदों वाली टिकटिकी उसे वापस न मिल जाए. रैटल के बरामद होने में जितनी देरी होती है वैसे-वैसे उसका सुर बदलता है, पहले उसे खोज देने का अनुरोध, फिर झल्लाहट, फिर विवशता, फिर गहरी बेचैनी और आख़िर में रुआँसापन. रैटल मिल जाने पर उसे जैसी खुशी होती है वैसी ख़ुशी अपनी याद्दाश्त में मुझे कभी नहीं हुई. क्या आगे कभी होगी?

घर-गृहस्थी की कई वाजिब चिंताओं पर इस समय रैटल की चिंता भारी है. है तो खिलौना, टूट जाएगा, गुम जाएगा, उसके बाद क्या होगा? यह कोई मामूली चिंता नहीं है. यह रैटल उसे किसी जन्मदिन की पार्टी में तोहफ़े के तौर पर मिला था. हम चाहते हैं कि घर की डुप्लीकेट चाभी तरह एक ऐसा ही रैटल ख़रीदकर रख लें वर्ना अनहोनी हो गई तो बच्चे का दुख भी हमसे देखा नहीं जाएगा. हम किस-किस दुख से उसे बचाने के लिए कब तक ऐसे बैकअप तैयार करेंगे?

कई बार उसने बहुत ग़लत वक़्त पर 'रैटल खोज अभियान' शुरू करने की माँग की है, लेकिन हर बार मैंने उसकी माँग पूरी की है चाहे दफ़्तर के लिए देरी हो रही हो या खाना ठंडा हो रहा हो...क्योंकि रैटल उसके लिए सिर्फ़ एक खिलौना नहीं है, वह अपने रैटल को उतना महत्व ज़रूर देता है जितना मैं अपने दफ़्तर की किसी फ़ाइल को. उसे संभालकर रखता है, उसे किसी को हाथ नहीं लगाने देता और उसे सीने से लगाकर सोता है, इससे ज्यादा प्यार कोई और क्या कर सकता है?

निदा फ़ाज़ली बहुत गहरा शेर है--"दुनिया जिसे कहते हैं, जादू का खिलौना है, मिल जाए तो मिट्टी है, खो जाए तो सोना है". मगर इस गहराई से भी गहरा है बचपन का फ़लसफ़ा जहाँ मिट्टी के खिलौने मिल जाने के बाद भी सोने से ज़्यादा क़ीमती होते हैं. जैसे ही हम उसे सोने का मतलब समझा देंगे यह जादू ख़त्म हो जाएगा.

मुझे अपने बचपन की एक धुंधली-सी याद है जब मैं चार-पाँच साल का रहा होऊँगा, गहरे हरे रंग की प्लास्टिक की चकई (यो-यो) हमारे हाथ आई जिसे धागे से बांधकर ऊपर-नीचे चलाया जाता था, मैं किसी ऊँची जगह पर खड़े होकर उसे नचाता था क्योंकि उसका धागा लंबा था. एक बार उसका धागा बुरी तरह उलझ गया, तब वही मेरे जीवन की सबसे बड़ी उलझन थी. अम्मा ने कहा- "पापा को आने दो", पापा बहुत देर से आए उस दिन. आते ही हमने अपनी माँग रखी, उन्होंने कहा- "चलो सो जाओ, कल सुबह ठीक कर देंगे." सूरज के उगने का, मुर्गे के बोलने का, कुएँ पर बाल्टी के खनकने का, पापा के अलार्म के बजने का इंतज़ार करता रहा, ऐसा इंतज़ार कि पूरी रात आँखों में काट दी. उतनी बेसब्री से सुबह का आसरा कभी नहीं देखा.

कई बार रैटल की रट पर झल्ला जाता हूँ लेकिन जल्दी ही अपनी चकई याद आ जाती है, उसके उलझे धागे याद आते हैं तो मौजूदा उलझनों को कुछ देर के लिए भूल जाता हूँ.

16 टिप्‍पणियां:

अभय तिवारी ने कहा…

गजब दीवाना लौंडा पैदा किए हो भाई..बड़ी रंगीन जवानी होने वाली है बालक की..

vimal verma ने कहा…

अगर ऐसा है तो मुझे लगता है उसके साथ खेलने वाले कम हैं दूसरे बच्चों के समपर्क शायद चीज़ें दुरुस्त हो जांय, पर कमोड के अन्दर से रैटल निकालना थोड़ा अजीब नहीं है,बच्चे को अब तो ये भी पता चल गया कि पापा के पास हर मर्ज़ की दवा है.. और कमोड में गई चीज़ भी उसे साधारण बात ही लगेगी,शायद मैं गलत भी हो सकता हूं, क्योंकि दूसरों को उपदेश देना आसान है,
वैसे मुझे लगता है कि इस तरह बच्चे की सारी इच्छाएं पूरे करना बच्चे के लिये ठीक नही है

Udan Tashtari ने कहा…

तीन दिन के अवकाश (विवाह की वर्षगांठ के उपलक्ष्य में) एवं कम्प्यूटर पर वायरस के अटैक के कारण टिप्पणी नहीं कर पाने का क्षमापार्थी हूँ. मगर आपको पढ़ रहा हूँ. अच्छा लग रहा है.

Beji ने कहा…

लाल गेंद ...हरी के पीछे....कभी टाम कहीं जेरी..अच्छी कल्पना है...।

यह कल्पना एक अजीब मुसीबत नहीं है?? जो चीज़ जैसी है वैसी दिखना बंद हो जाती है। पेन्सिल पर पंख लगा कर तितली बना दो, रबर को गति देकर गाड़ी।

तीन साल यानी बच्चों की मानसिकता का तेजी से बढ़ने का समय। यह वो समय है जब वह अपने और पराये का फर्क सीखता है। अपनों से लगाव करना। उस लगाव के प्रति अपनी वफा का इज़हार करना। लायल्टी....हाँ यह अच्छी बात है या बुरी....पता नहीं पर कई बार लायल्टी बेवकूफी ज़रूर हो जाती है।

कमोड़ से रैटल निकालना सरासर बेवकूफी है। कोई हीरा है जो यूँ ही हाथ बिगाड़ लें ??
यह अलग बात है कि हीरे की कीमत आपके बेटे को कंकड़ से भी ज्यादा नहीं लगे।

पता नहीं इस रैटल की खुशी का एक्सचेंज रेट क्या हो ?? और पता नहीं आपके पास ऐसी कोई करंसी भी हो जो इसका भरपाया कर सके।

पर रैटल तो रैटल है....कभी भी खो सकता है। फिर?!!
लगाव करना सीखना जीवन का एक पड़ाव है....तो उससे उभरना सीखना दूसरा।

आपका बच्चा तो सीख रहा है। आप के दोस्त शायद कम हैं क्योंकि नहीं तो इतनी बारीकी से बात आप नहीं महसूस कर पाते। और शायद आप अपनी चकई के गम से उभरे भी नहीं हैं। बताया नहीं पापा ने सुलझा कर चकई दी भी की नहीं।

एक ही सुझाव दूँगी। अगली बार रैटल कमोड़ मे गिर जाये,बेटे के हाथ में प्लास्टिक चड़ा कर उसी को निकालने को कहिये। अपनी चीज़ के खातिर तकलीफ उठाना भी सीख जायेगा।

और हाँ अगर खो जाये तो उसके साथ ढूँढ़ना भी और ना मिले तो उसके दुख के साथ रहना भी।

आगे जब जवान होगा और रैटल खो जायेगा तो पापा के पास लौट कर जरूर आयेगा।

Basant Arya ने कहा…

ये मम्मी नजर नहीं आयी बच्चे की कही पर, मायके गयीं हुई हैं क्या?

Pratyaksha ने कहा…

रैटल की रट से शुल्ज़ के पीनटस का लिनस और उसका कंबल याद आया । बच्चों के ये पासिंग फेज़ हैं । आप उसकी मनोदशा समझ रहे हैं ये उसकी खुशकिस्मती है । एक दिन रैटल छूट जायेगा लेकिन शायद आपका उसे कमोड से निकालना चकई की तरह , उसे उम्र भर याद रहेगा । (ऐसी उम्मीद हम कर सकते हैं )

tanivi ने कहा…

बहुत दिनों के बाद नज़र आए .लगता है कि रेटल खोज रहे थे । गजब का पुत्र प्रेम है आपका .जो बातेंहमारे लिए छोटी होती हैं .वे बच्चों के लिए बहुत बड़ी होती हैं .फिर भी बच्चों को धीरे-धीरे समझाना चाहिए कि तुम इस खिलओने के बिना भी रह सकते हो.नही तो आगे चल कर मुसीबत हो जाती है.मैं एक ऐसे सज्जन को जानती हूँ जो आज तक अपने बचपन की छोटी सी कार साथ लेकर सुबह बाथरूम जातें है .इसके बिना वे नित्यकर्म से निवृत नही हो सकते .यहाँ तक कि जब दफ्तर के काम से टूर पर जातें है तो भी पत्नी को खास हिदायत देतें हैं कि मेरी कार रखना मत भूलना .वस्तुओं के प्रति अनावाश्क आसक्ति से धीरे-धीरे बच्चे को दूर करना ही अच्छा है.जो भी हो लिखा है बहुत सुन्दर.

tanivi ने कहा…

बहुत दिनों के बाद नज़र आए .लगता है कि रेटल खोज रहे थे । गजब का पुत्र प्रेम है आपका .जो बातेंहमारे लिए छोटी होती हैं .वे बच्चों के लिए बहुत बड़ी होती हैं .फिर भी बच्चों को धीरे-धीरे समझाना चाहिए कि तुम इस खिलओने के बिना भी रह सकते हो.नही तो आगे चल कर मुसीबत हो जाती है.मैं एक ऐसे सज्जन को जानती हूँ जो आज तक अपने बचपन की छोटी सी कार साथ लेकर सुबह बाथरूम जातें है .इसके बिना वे नित्यकर्म से निवृत नही हो सकते .यहाँ तक कि जब दफ्तर के काम से टूर पर जातें है तो भी पत्नी को खास हिदायत देतें हैं कि मेरी कार रखना मत भूलना .वस्तुओं के प्रति अनावाश्क आसक्ति से धीरे-धीरे बच्चे को दूर करना ही अच्छा है.जो भी हो लिखा है बहुत सुन्दर.

अफ़लातून ने कहा…

बचवा इस्कूल जाता है?अँग्रेजी कैसे बोलने लगा?अगल-बगल संगी-साथी हैं?साथियों के साथ अपने खिलौने से खेलना हो पाए।
आपके यो-यो की तरह मेरी पतंग की डोर उलझी हुई थी और मैं परेशान था। पिताजी ने उपदेश दे दिया,'जीवन की गुत्थियाँ भी धीरज से ही सुलझती हैं'। बिना गाँठ सुलझा पाना सचमुच धीरज माँगता है।

अनूप शुक्ला ने कहा…

सही है। सारे सुझाव माने जायें। :)

कविता वाचक्नवी ने कहा…

बालमानसिकता को लिपिबद्ध करने से एक सहज पितृत्व का सुख तो मिलता ही है। बच्चे बहुधा ऐसे ही होते हैं। ऐसी घटनाएँ उन में निहित लगाव की द्योतक हैं। इसे जिंदा रखें। छीजने न पाए। क्योकि हम लोग अभी और स्वार्थी व अलगे-से होने में कतई शरमाने वाले नहीं हैं।कहीं तो लगाव जिंदा रहने दें इस तरह।

इरफ़ान ने कहा…

मुझे उपदेश के लिये फ़ौरन हाज़िर हो जानी वाले लोगों से थोड़ी ईर्ष्या होती है क्योंकि अभी तक मैं उतना रेशनल/समझदार नहीं हो पाया हूं. एक बार फिर निदा का शेर-
दो और दो का जोड़ हमेशा चार कहां होता है
सोच समझवालों को थोड़ी नादानी दे मौला.
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सारा जब दो साल की थी तो नियम से काम से लौटने के बाद मैं उसके साथ खेला करता था. एक दिन छुपम छुपाई खेलते हुए, जब वो अभी परदे के पीछे छिपी हुई थी, मैं कुछ करने लगा. थोड़ी देर बाद जब ध्यान आया कि सारा कहां है, तो देखा वो अब भी परदे के पीछे छिपी उस तरफ़ देख रही थी जिधर से मेरी आवाज़ आनी थी-ताअअअअअ!
उस अपराध बोध की अगर डॉक्टर लोग दवा देने लगते हैं तो मैं उसे लेकर जेब में रख लेता हूं और कपड़ों की धुलाई में उसे घुल जाने देता हूं.
रैटल ज़िंदाबाद-
एहतेराम इस्लाम का एक शेर ऐसे ही रैटल के लिये लिये लिखा गया है-
मूर्ति सोने की निरर्थक वस्तु है उसके लिये
मोम की गुड़िया अगर बच्चे को प्यारी है तो है.

बेनामी ने कहा…

अनामदास जी,

इतनी सारी टिप्पणियाँ और आपका जवाब नदारद. ये तो अच्छी बात नहीं है. लगता है अपने एक नितांत निजी अनुभव को सार्वजनिक करने के बाद आपको अपनी गलती का एहसास हुआ. लोग तो पूछेंगे ही कि हिंदी ब्लॉग लिखने वाले का बच्चा अंगरेजी में क्यों पूछता है कि व्हेयर इज माइ रैटल. अगर पूछता है तो फिर ये सवाल भी पैदा होता है कि आप ही उसे घर में भी अंगरेजी बोलना सिखाते होंगे. अगर ऐसा है तो फिर ये सवाल भी उचित ही मन में आएगा कि आखिर हिंदी के लिए इतनी हाय तौबा क्यों. क्या हिंदी के प्रति इतना लगाव सब छद्म है. क्या आप जो कहते हैं उसे बरतते नहीं. क्या आपको भी मालूम हो गया है हिंदी की गाथा ब्लॉग पर गाना तो ठीक है लेकिन बच्चे को हिंदी की स्याह छाया से अलग ही रखना उचित है नहीं तो वो भी हिंदी टाइप्स हो जाएगा. अब आपने एक नितांत निजी अनुभव को सार्वजनिक किया है -- और काफी अच्छी तरह से किया है -- तो फिर इन सवालों का सामना तो करना ही होगा. आशा है बुरा नहीं मानेंगे.

अनामदास ने कहा…

बेनामी भाई
आपने पहले हमारा लिखा पढ़ा, उसके बाद सारी टिप्पणियाँ भी पढ़ीं, इसके लिए आभारी हूं. यह सवाल भाषा का नहीं, भाव का है. भाषा पर अक्सर लिखता हूं, उस पर लिखेंगे तो उस पर उलझेंगे. नाम भले ही अनाम हो लेकिन यह ये तो सब जानते हैं कि हम परदेस में बसते हैं तो बच्चा अँगरेज़ी ही बोलेगा, हिंदी भी बोलता है, उसने जैसा बोला हमने लिखा, अनुवाद में तो उम्र गुज़री, अब ब्लॉग पर भी अनुवाद कराएँगे आप. अनुवाद सिर्फ़ ऑफ़िस में, ब्लॉग घर से लिखा है.

बेनामी ने कहा…

धन्यवाद, अनामदास जी.

'अंगरेजी ही' और 'हिंदी भी' से सब कुछ स्पष्ट हो गया.

Debashish ने कहा…

बच्चे की रैटल रट पढ़ कर अच्छा लगा। साथ ही अंग्रेज़ी प्रयोग पर जो टिप्पणी पढ़ी उस पर और इस वाकये पर एक अनुभव बाँटने का मन हुआ। विदेश में हिंदुस्तानियों के बच्चे भी जिस तरह बड़े होते हैं ये नज़दीक से देखा तो मन थोड़ा खट्टा हुआ। बच्चा मचल रहा है कि माँ या पिता गोद में ले ले, सीने के नज़दीक रखे पर वो तो बैठा है बच्चागाड़ी में, मुँह में चुसना जैसे उसका मुंह बंद करने के लिये ही है। बच्चे का हाथ पकड़कर चलने से परहेज़ करते माँ बाप एक दूसरे का हाथ थामे चल रहे हैं, हर सिग्नल पर एक दूसरे को चूम रहे हैं। माजरा ऐसा कि बच्चा तो फिर भी मिल सकता है पर जीवनसाथी कहीं भाग न जाये। जो चुसना बच्चे के मुँह में उसको एश्योरेंस दे रहा है वही एश्योरेंस जोड़ा हाथ थाम कर, एक दूजे को चुंबन से दे रहा है। परवरिश के लिये जोड़े का "आर्थिक गठबंधन" भी तो ज़रूरी है। कामकाजी कपल की रोज़मर्रा के भागमभाग का ये दृश्य अब भारत में भी दिखता है। और ऐसे बच्चों का सबसे नज़दीकी संगी ये रैटल ही है, जो इस यंत्रवत जीवन शैली में उसका सखा भी है और दाई भी।