13 नवंबर, 2007

उदासी के भूरे चुभते कंबल में लिपटे दिन-रात

हरे पेड़ नंगे हो गए हैं, दो महीने पहले तक अधनंगे घूम रहे लोग लबादे लादे डोल रहे हैं. लाल, पीले, गुलाबी फूलों और हरियाली पर धूसर पेंट की बाल्टी उलट दी है किसी ने. यूरोप में सर्दी सांकल खड़का रही है.

सड़क पर डाल से बिछड़े पत्तों का अंबार है जो ठंडी हवा में उड़कर मुँह पर आते हैं, जूतों के नीचे उदास-सी आवाज़ करते हैं. कहीं कोई रंग नहीं, बस मुँह से भाप छोड़ती भूरी-काली आकृतियाँ हैं.

धूप, मूंगफली, गन्ने और रंग-बिरंगे स्वेटर नहीं हैं. दिन भर सूरज की सेंक और शाम को अलाव, सिगड़ी या हीटर...मकर संक्रांति तक की बात है उसके बाद तो सर्दी अपने मामा के घर चली जाती है. यूरोप की सर्दी का कोई मामा नहीं है जहाँ वह चली जाए, वह छह महीने तक बेघर भटकती है.

यूरोप में आसमान पर कंबल तन गया है, सब धुंधला-सा है कंबल के अंदर, सर्द हवा हड्डियाँ छेदती है कंबल के अंदर भी. सारे पुराने चोट-दर्द और घाव याद आते हैं. आँख बहती है, नाक जम जाती है, कान सुन्न हो जाते हैं...पाँचों ज्ञानेंद्रियों को पाला मार जाता है.

ये शुरुआत है जिसे विंटर कहलाने का गौरव हासिल नहीं है, यह पतझड़ है यानी ऑटम. गहरी उदासी का मौसम, सारी ख़ुशियों और उल्लास के स्थगन का मौसम. सर्दियों में फूल नहीं खिलेंगे, अंडों से बच्चे नहीं निकलेंगे, गिलहरी नहीं फुदकेगी, सब इंतज़ार करेंगे कंबल के हटने का, कोहरे के छंटने का. अप्रैल यानी स्प्रिंग तक कठजीव इंसानों के अलावा कुछ भी जीता-जागता नहीं दिखेगा.

इस बर्फ़ानी ठंड का प्रतिकार करने की एक कोशिश होगी क्रिसमस. ब्रांडी, जगमगाती बत्तियाँ और तोहफ़े थोड़ी गर्मी देने की कोशिश करेंगे लेकिन उस आख़िरी कोशिश के बाद सिर्फ़ वसंत की राह देखकर ही दिन-रात काटे जा सकेंगे. काली-डरावनी सर्दी क्रिसमस के जश्न के बाद थककर चूर यूरोप पर घात लगाकर हमला करेगी और कोई बच न पाएगा.

अगले छह महीने यूरोप एक मटमैली ब्लैक एंड व्हाइट फ़िल्म की तरह दिखेगा, लोग ठंड की वजह से वैसे ही चलेंगे जैसी बहुत पुरानी फ़िल्मों में गाँधी जी चलते दिखते हैं. सड़क पर कोई बेवजह एक पल नहीं बिताना चाहेगा, कहीं ऐसी जगह पहुँचने की जल्दी होगी जहाँ ख़ून दोबारा पिघलकर धमनियों में बहने लगे.

सुनहरी धूप वाले मौसम में पार्क, बीच और गार्डन की तरफ़ भागने वाले लोगों को अब गुनगुने घर में लौट आने का सुख महसूस होगा. गर्म पानी, गर्म रज़ाई, गर्म चाय और घर में बसने वालों की उष्मा, इन सबका मोल फिर से समझ में आने लगेगा.

कुछ ही महीने में हम सब कुछ कैसे भूल जाते हैं. लगता है, धूप खिली रहेगी, तितलियाँ उड़ती रहेगी, हम रंग-बिरंगे टी-शर्ट पहनकर यूँ ही फहराते रहेंगे अनंतकाल तक डरावनी सर्दी अब कभी नहीं आएगी. लेकिन हर बार की तरह वह आ रही है, यूरोप भूरा, भयभीत और मलिन-सा होता जा रहा है.

14 टिप्‍पणियां:

Tarun ने कहा…

कुछ ऐसा ही आलम इधर भी है अनामदास जी

Gyandutt Pandey ने कहा…

झरते हैं, झरने दो पत्ते; डरो न किंचित।
रक्त पूर्ण मांसल होंगे; फिर जीवन रंजित।

Beji ने कहा…

आप पत्रकार से कवि होते जा रहे हैं।

अनिल रघुराज ने कहा…

सुनते हैं इन दिनों यूरोप में लोग डिप्रेशन का शिकार भी खूब होते हैं।

अविनाश ने कहा…

गद्यम कविना निकषा वदंति। सुंदर गद्य कवि की कसौटी होती है। आप तो कवि मन हैं जनाब!

Neelima ने कहा…

सुन्दर बिम्ब रचा है आपने ! सर्दी से आक्रांत ,मटमैला और मुरझाया हुआ यूरोप हमें दिख रहा है !

नीरज गोस्वामी ने कहा…

भाई
बहुत अच्छा लिखे हैं आप. गध्य में पद्य सा आनंद आ गया. आप तो शब्दों से कविता रचते हैं. आप के शब्द चित्र से यूरोप में बिताये ठंड के वो दिन याद आ गए, जब पारा शून्य से ८ डिग्री नीचे चला जाता था.
ग़ज़ल पढने का शौक रखते हों तो मेरे ब्लॉग पर आप निमंत्रित हैं.
नीरज

Pratyaksha ने कहा…

सर्दी की उदासी ?

चौपटस्वामी ने कहा…

कविता की कान्ति वाला गद्य . शीत का गद्यगीत . पूस की रात याद हो आई .

neelima sukhija arora ने कहा…

आख़िर उदासी का भूरा मटमैला कम्बल ही यह एहसास दिलाता है की चटख रंग ज़िंदगी में इतने महत्वपूर्ण क्यों होते हैं.

Rajesh Joshi ने कहा…

पहले लिखा... फिर लिख रहा हूँ.

पढ़ा, सोचा, फिर पढ़ा और फिर सोच समझ कर लिखा -- अनामदास जी, आपको अब इसे विस्तार देना चाहिए. यही या ऐसे ही तमाम बिम्ब, इच्छाएँ, उच्छवास अब विस्तृत हों. यही कामना है.

dipti ने कहा…

आपको शायद ठंड बिल्कुल पसंद नहीं, लेकिन ठंड भी सुन्दर होती है। कम से कम मुझे तो लगती है। ज़रा एक बार फिर इस मौसम को देखिएगा थोड़ा प्यार से। शायद ये भयावयता कुछ कम हो जाये।

दीप्ति।

रजनी भार्गव ने कहा…

सर्दी मुझे बहुत अच्छी लगती है पर आपका ये वृतांत
भी अच्छा लगा, बहुत अच्छा लिखा है।

रजनी भार्गव ने कहा…

मुझे ठंड अच्छी लगती है पर आपकी धूसर पेंट से की गई सर्दी बहुत अच्छी लगी.