भाषा भावुकता से नहीं, ताक़त से चलती है. जिस तरह सिक्के चलाए जाते हैं वैसे ही भाषा भी चलाई जाती है.
भाषा का ईंधन सत्ता से उसकी निकटता है. अगर वह शक्ति की कुंजी नहीं है तो कुछ सिरफिरों का शौक़ भर बन सकती है, कामयाब लोगों की ज़बान और उनकी कलम से फूटने वाली धारा नहीं.
दुनिया की चार बड़ी भाषाएँ अँगरेज़ी, फ्रेंच, स्पैनिश और अरबी विशुद्ध रूप से सत्ता की वजह से प्रसार पाने वाली भाषाएँ हैं, उनका गहरा औपनिवेशिक अतीत है, अगर इन भाषाओं को बोलने वाले लोग कोलोनाइज़र नहीं होते तो तमिल, गेलिक, स्वीडिश या हिब्रू से अधिक इन भाषाओं का क्या महत्व होता?
भाषा चला देने से चल जाती है, अगर कोई भाषा सबके लिए ज़रूरी हो जाए तो लोग रातोंरात उसे सीख जाते हैं. भारत शायद दुनिया का अकेला देश है जहाँ अपनी भाषा हिंदी, तमिल, कन्नड़, मराठी, मलयालम... जाने बिना काम चल जाता है, बाइज़्ज़त चल जाता है. वैसे काम तो अँगरेज़ी जाने बिना भी चल जाता है लेकिन बेइज़्ज़त होकर चलता है. अँगरेज़ी जाने बिना तरक्की नहीं हो सकती, अपनी भाषा जाने बिना जितनी चाहें उतनी तरक्की हो सकती है.
भारत में ग्लोबलाइज़ेशन की जो चकाचौंध दिख रही है उसके पीछे भारतीय कामगारों के अँगरेज़ी ज्ञान की भारी भूमिका है. जहाँ चीनी भाई अँगरेज़ी सीखने के लिए बेहाल हैं वहीं भारत में अँगरेज़ी बच्चों को ही नहीं, बल्कि पिल्लों को भी सिखाई जाती है.
ठीक है कि अँगरेज़ी जानने की वजह से शहरी मध्यवर्ग को कुछ हज़ार नई नौकरियाँ मिल गई हैं लेकिन प्रतापगढ़, सिवान, झाँसी-झूँसी के करोड़ों लौंडे बेरोज़गार घूम रहे हैं, ज़्यादा से ज़्यादा 'सिकोरटी गारड' बन सकते हैं. वैसे एक से एक बढ़कर 'इंटलीजेंट' हैं लेकिन "इंगलिस में मार खा जाते हैं."
जॉर्ज बुश भारत आते हैं और बेहिचक कह जाते हैं कि जितनी आबादी अमरीका की है, उतने तो भारत में उपभोक्ता हैं इसलिए वे भारत को इतना महत्व दे रहे हैं. यहाँ बात तकरीबन 30 करोड़ शहरी लोगों की हो रही है जिनके लिए किसी अमरीकी प्रोडक्ट के ऊपर हिंदी में नाम लिखने की भी मशक्कत नहीं करनी है. लेकिन बाकी बचे 70 करोड़ लोगों का क्या?
चीन में ऐसा नहीं हो सकता, बिना चीनी के काम नहीं चल सकता. अब ज़रा ठहरकर सोचिए, यह चीन की ताक़त है या कमज़ोरी?
चीनी अँगरेज़ी सीखने के लिए बेताब हैं वहीं यूरोपीय-अमरीकी लोग भी चीनी भाषा सीख रहे हैं, हिंदी नहीं. माइक्रोसॉफ़्ट ने सबसे पहले चीनी और उसके बाद आइसलैंडिक से हौसा तक पचासों भाषाओं में अपने ऑपरेटिंग सिस्टम लॉन्च किए लेकिन हिंदी की ज़रूरत नहीं समझी, ऐसे देश के लिए जहाँ उसके ग्राहक लाखों में नहीं बल्कि करोड़ो में हैं.
मुझे कई बार लगता है कि भारत की असली ताक़त अँगरेज़ी न जानने वाली बिरादरी है जिनकी वजह से शायद बाज़ार को होश आए. एक मिसाल लीजिए-- ट्रैक्टर, खाद और कीटनाशक बनाने वाली विदेशी कंपनियों के विज्ञापन कभी अँगरेज़ी में नहीं होते. धीरे-धीरे, देर-सबेर जब देश के बहुसंख्यक लोगों के बीच माल बेचने की बात आएगी तब हिंदी, तमिल, गुजराती, असमिया और ओड़िया के बारे में भी कंपनियों को सोचना होगा.
लेकिन यहाँ एक बहुत बड़ा प्रश्नचिन्ह है, वो ये कि अँगरेज़ी जाने बिना कुछ ज़मींदारों-रंगदारों-ठेकेदारों को छोड़कर बाक़ी लोगों के पास पैसा कब तक आएगा, वे दमदार ग्राहक कैसे बन पाएँगे, क्योंकर बन पाएँगे, किसी को नहीं पता. देश में सत्ता की संरचना कुछ ऐसी बन चुकी है कि उसमें अँगरेज़ी के बिना सेंध लगाना असंभव दिखता है.
भारत में हिंदी या अन्य क्षेत्रीय भाषाओं को वही लोग बचा सकते हैं जो अँगरेज़ी की अग्निजिह्वा से बचे हुए हैं. शायद किसी समानांतर-वैकल्पिक तरीक़े से वे इतनी क्रयशक्ति हासिल कर लें कि उनके बीच माल बेचने के लिए हिंदी, तमिल, गुजराती, असमिया या ओड़िया जैसी भारतीय भाषा अनिवार्य हो जाए. लेकिन क्या उसके पहले सब लोग अँगरेज़ी ही नहीं सीख जाएँगे?
अँगरेज़ी नहीं भी सीखेंगे तो इतना आत्मविश्वास कहाँ से आएगा कि कहें, "हमें नहीं पता क्या लिखा है, हम नहीं ख़रीदते." किसी अधपढ़े से पढ़वा लेंगे और अपनी क़िस्मत को कोस लेंगे लेकिन माल तो वही बिकेगा जो जिसके ख़रीदने में शान हो, वही शान जो शहर में अँगरेज़ी बोलने वाले की है. रामलाल-कुंदनलाल एंड कंपनी की वो इज़्ज़त कैसे हो सकती है जो जॉनसन एंड निकल्सन की होती है.
कुचक्र है कि क्रयशक्ति बिना अँगरेज़ी के सिर्फ़ गुंडागर्दी से आती है. यह कुचक्र कब और कैसे टूट सकता है इसके बारे कुछ सोचिए, बोलिए और बताइए.
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04 अगस्त, 2007
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