बाबा से एलर्जी या सच्चे लोकतंत्र का आग्रह, आपके भीतर कौन सी भावना अधिक बलवती है?
अनेक बुद्धिजीवी बाबा को दुत्कारने को अपना पहला कर्तव्य मान बैठे हैं, बाबा के पास बहुत सारे सवालों के जवाब नहीं है लेकिन भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ ऐसी मुहिम चलाने कोई और आगे क्यों नहीं आया, इस सवाल का जवाब भी उन्हें ख़ुद से पूछना चाहिए.
भारत की जनता हमेशा से संतों, भिक्षुओं, सूफ़ियों, दरवेशों की सुनती रही है. उनकी सहज बुद्धि कहती है, उसकी बात सुनो जो अपने नफ़ा-नुक़सान के फेर में नहीं है.
ऋषियों की बात बहुत पुरानी है. बुद्ध, शंकराचार्य, गांधी ही नहीं, बिनोबा, जयप्रकाश तक, अलग-अलग दौर में भारत की जनता ऐसे ही लोगों की सुनती रही है जो नेता नहीं, बल्कि संत दिखते हों.
या फिर पीढ़ी-दर-पीढ़ी जिनका राज चल रहा हो, शायद यहाँ भी यही सोच है कि व्यक्ति संयोगवश एक ख़ास ख़ानदान में पैदा हुआ है, अपने फ़ायदे के लिए (नीचे से ऊपर आने की कोशिश में) कुछ नहीं कह-कर रहा है.
अनेक बार धोखा खाने के बावजूद ज्यादातर मौक़ों पर सामूहिक-बुद्धिमत्ता (कलेक्टिव विज़डम) कारगर रही है, बाबा रामदेव के मामले में होगी या नहीं, कोई नहीं कह सकता.
बाबा मुझे शुरू से ही पसंद नहीं हैं, बाबा के ख़िलाफ़ ढेरों सवाल उठाए जा सकते हैं, किसके ख़िलाफ़ नहीं उठाए जा सकते, उठाने भी चाहिए, लोकतंत्र का यही तकाज़ा है.
महात्मा गांधी के नाम से जुड़ी सत्ताधारी पार्टी ने उन्हीं की तरह बिन-सिला कपड़ा पहनने वाले आदमी को रातोंरात जिस तरह अगवा किया उससे घबराहट, डर, सत्ता का मद, बेवकूफ़ी, अपरिपक्वता आदि-आदि का ही सबूत मिलता है.
भारत जैसे विविधता वाले देश में योग गुरू होने की वजह से बाबा रामदेव सरीखे लोग हमेशा शंका की नज़र से देखे जाएँगे. उनसे आरक्षण, पर्यावरण, भूमंडलीकरण, सांप्रदायिकता जैसे पेचीदा राजनीतिक मुद्दों पर विवादों से परे अकादमिक नज़रिया रखने की आशा करना भी फ़ालतू है.
विवादों से बचकर राजनीति करने की नटविद्या वे शायद आगे चलकर सीखें, या न भी सीख पाएँ, लेकिन इस समय वे जो कह रहे हैं उसमें ऐसा क्या है जो भारत का लगभग हर आदमी नहीं सुनना चाहता, वैसे भारत में अपवाद भी लाखों में होते हैं (जनसंख्या के अनुपात में).
फ़िलहाल मामला भ्रष्टाचार का है, कांग्रेस का प्रबल विश्वास है कि नौ प्रतिशत विकास दर की नाव जिस नदी में तैर रही है उसे कोई सूखने नहीं देना चाहता इसलिए बाबा रामदेव की बात पर लोग ज्यादा कान नहीं देंगे.
उन्हें ये भी साफ़ दिख रहा है कि भ्रष्टाचार को मुद्दा बनाने की सदाक़त और बूता मुख्यधारा की किसी पार्टी में नहीं है, अगर बोलने के लिए लब आज़ाद होते तो घोटालों की फ़़ेहरिस्त से लैस विपक्ष मिमियाने से आगे ज़रूर कुछ करता.
इससे पहले जब भ्रष्टाचार राष्ट्रीय मुद्दा बना तो वीपी सिंह के नेतृत्व में ("राजा नहीं, फकीर है" का नारा याद करिए), जिन पर आजीवन भ्रष्टाचार का कोई आरोप नहीं लगा, लोगों को उनसे बाक़ी जो भी शिकायतें रही हों.
यही वजह है कि अन्ना हज़ारे, बाबा रामदेव जैसे लोग आगे आए हैं जो राजनीति के मौजूदा खाँचे में फिट नहीं होते, ग्लोबाइज़्ड दुनिया में खुद आर्थिक शक्ति बनने और इंडिया को बनाने की रेस में नहीं हैं.
बाबा रामदेव, अन्ना हज़ारे, मेधा पाटकर, अरुंधति रॉय, विनायक सेन, इरोम शर्मिला और हज़ारों गुमनाम-बेनाम-कमनाम लोग जो कह रहे हैं, उसमें अंतर हो सकता है, लेकिन एक बात समान है कि वे मौजूदा सत्ता, व्यवस्था, कार्यप्रणाली, संस्कृति, आचरण, नियम-क़ानून और संवेदनाओं पर सवाल उठा रहे हैं.
उनसे आप सहमत भी हो सकते हैं, असहमत भी, मगर अर्मत्य सेन से उधार लेकर कहूँ तो एक 'आर्ग्युमेंटेटिव इंडियन' होने के नाते आप कैसे उन्हें पुलिसिया डंडे से चुप कराए जाने को सहन कर सकते हैं.
बहुत ध्यान से सुनना चाहिए उनको जो आपके भले की बात कर रहे हों क्योंकि वही आपका बहुत बड़ा नुक़सान कर सकते हैं, बहुत ध्यान सुनना चाहिए उनको जिनकी बात रास नहीं आ रही हो क्योंकि वहीं कोई फ़ायदा छिपा हो सकता है.
बोलना और सुनना दोनों चाहिए कि उसके बिना लोकतंत्र नहीं चलता.
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06 जून, 2011
17 जनवरी, 2010
पॉलिश जैसी स्याह क़िस्मत
नई दिल्ली रेलवे स्टेशन के चौदह नंबर प्लेटफार्म पर सैकड़ों जूतों को स्कैन करता बारह साल का एक लड़का मेरे सामने रुका, "पॉलिश, साहब?"
मेरे चेहरे और जूतों की रंगत को अनुभवी आँखों से एक-एक बार देखने के बाद उसने सवाल पूछा था, उसका अंदाज़ा सही था. मेरे जूतों को पॉलिश की ज़रूरत थी.
जूते की पालिश और शरीर की मालिश कुछ ऐसे काम हैं जो मेरे भीतर असमंजस पैदा करते हैं. हाथरिक्शे की सवारी, घरेलू नौकर की सेवाएँ वग़ैरह मेरे लिए जितनी सुविधा हैं, उतनी ही दुविधा भी.
वैसे सुविधा और दुविधा की इस लड़ाई में, सुविधा हमेशा जीतती रही है.
एक तरफ़ पूंजीवादी-सामंतवादी शोषण, तो दूसरी ओर रोज़गार का अवसर. पॉलिश कराना सामंतवादी तौर-तरीक़ों को चलाए रखना है या पॉलिश न कराना एक ग़रीब मज़दूर का बहिष्कार? मेरे लिए यह बहुत कठिन सवाल है जिसका पक्का जवाब मेरे पास नहीं है.
मैंने उसका नाम नहीं पूछा लेकिन कल्लू, बिल्लू, पप्पू जैसा कुछ रहा होगा. प्रियांश, अरुणाभ, श्रेयस जैसा तो नहीं ही रहा होगा, ऐसे नाम उन बच्चों के होते हैं जिनकी देखभाल करने वाले माँ-बाप होते हैं.
"पॉलिश, साहब?" उसके दोबारा पूछने पर मैंने हामी भर दी. सधे हुए हाथों से उसने दो मिनट में जूतों को चमका दिया. पीठ पर भारी बैग था इसलिए मैंने उससे फीते बाँधने को कहा. पहली बार उसने अनसुना कर दिया, जब मैंने दोबारा कहा तो बुरा-सा मुँह बनाकर फीतों से जूझने लगा.
उसने बहुत जुगत लगाकर फीतों को किसी तरह एक दूसरे में फँसा दिया, ठीक उसी तरह जैसे मेरा पाँच साल का बेटा करता है. वक़्त ने उसे जूते चमकाना सिखा दिया है मगर उसे जूते के फीते बाँधना सिखाने वाले पता नहीं कहाँ हैं.
शायद उसे 'उँगलियों का हुनर' सिखाने वाला कोई उस्ताद नहीं मिला वरना वह जूते घिसने के जगह उसी स्टेशन पर जेब तराश रहा होता, वह स्कूल नहीं जाता यानी किसी नेक एनजीओ के दायरे से भी बाहर है.
जब मैं अपने बेटे को जूते को फीते बाँधना सिखाऊँगा तो उस लड़के का मटमैला चेहरा आँखों के सामने आएगा.
मेरे चेहरे और जूतों की रंगत को अनुभवी आँखों से एक-एक बार देखने के बाद उसने सवाल पूछा था, उसका अंदाज़ा सही था. मेरे जूतों को पॉलिश की ज़रूरत थी.
जूते की पालिश और शरीर की मालिश कुछ ऐसे काम हैं जो मेरे भीतर असमंजस पैदा करते हैं. हाथरिक्शे की सवारी, घरेलू नौकर की सेवाएँ वग़ैरह मेरे लिए जितनी सुविधा हैं, उतनी ही दुविधा भी.
वैसे सुविधा और दुविधा की इस लड़ाई में, सुविधा हमेशा जीतती रही है.
एक तरफ़ पूंजीवादी-सामंतवादी शोषण, तो दूसरी ओर रोज़गार का अवसर. पॉलिश कराना सामंतवादी तौर-तरीक़ों को चलाए रखना है या पॉलिश न कराना एक ग़रीब मज़दूर का बहिष्कार? मेरे लिए यह बहुत कठिन सवाल है जिसका पक्का जवाब मेरे पास नहीं है.
मैंने उसका नाम नहीं पूछा लेकिन कल्लू, बिल्लू, पप्पू जैसा कुछ रहा होगा. प्रियांश, अरुणाभ, श्रेयस जैसा तो नहीं ही रहा होगा, ऐसे नाम उन बच्चों के होते हैं जिनकी देखभाल करने वाले माँ-बाप होते हैं.
"पॉलिश, साहब?" उसके दोबारा पूछने पर मैंने हामी भर दी. सधे हुए हाथों से उसने दो मिनट में जूतों को चमका दिया. पीठ पर भारी बैग था इसलिए मैंने उससे फीते बाँधने को कहा. पहली बार उसने अनसुना कर दिया, जब मैंने दोबारा कहा तो बुरा-सा मुँह बनाकर फीतों से जूझने लगा.
उसने बहुत जुगत लगाकर फीतों को किसी तरह एक दूसरे में फँसा दिया, ठीक उसी तरह जैसे मेरा पाँच साल का बेटा करता है. वक़्त ने उसे जूते चमकाना सिखा दिया है मगर उसे जूते के फीते बाँधना सिखाने वाले पता नहीं कहाँ हैं.
शायद उसे 'उँगलियों का हुनर' सिखाने वाला कोई उस्ताद नहीं मिला वरना वह जूते घिसने के जगह उसी स्टेशन पर जेब तराश रहा होता, वह स्कूल नहीं जाता यानी किसी नेक एनजीओ के दायरे से भी बाहर है.
जब मैं अपने बेटे को जूते को फीते बाँधना सिखाऊँगा तो उस लड़के का मटमैला चेहरा आँखों के सामने आएगा.
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02 जुलाई, 2008
पोते के नाम थर्डवर्ल्ड के अम्मा-बाबा का संदेश
अगले शनिवार को मेरा बेटा चार साल का हो जाएगा, हम ख़ुश हैं कि वीकेंड है, बच्चों की कोई छोटी सी पार्टी कर लेंगे. बच्चे के बाबा-अम्मा (दादा-दादी) कई हज़ार किलोमीटर दूर बैठे तीन हफ़्ते से हलक़ान हो रहे हैं कि पोते का जन्मदिन आ रहा है, टाइम पर कार्ड मिलना चाहिए, पहुंचने में पता नहीं कितना वक़्त लगे.
सत्तर पार कर चुके बाबा मानसून के मौसम में कितने सरोवरों से गुज़रकर, पता नहीं कहाँ गए होंगे ग्रीटिंग कार्ड ख़रीदने. अम्मा-बाबा ने टिप-टिप करती दुपहरी पोते के लिए संदेश लिखने में ख़र्च की होगी. घर के पास कोई पोस्ट बॉक्स भी नहीं है, वे रिक्शे से जीपीओ गए होंगे, लाइन में लगकर लिफ़ाफ़ा रवाना किया होगा, इस आस के साथ कि मिल जाए और वक़्त पर मिल जाए. पिछले पाँच दिन से जब फ़ोन करो, एक ही सवाल होता है--"कार्ड मिला कि नहीं".
रुपए के नींबू तीन कि चार, इसी पर दस मिनट तक बहस करने वाले रिटायर्ड बाबा ने एक पल नहीं सोचा कि इस कार्ड के तीस रूपए क्यों. पोता ख़ुश होगा, कार्ड पर फुटबॉल बना है और दो गोरे लड़के खुश दिख रहे हैं, पोता उनके साथ आइडेंटिफाई कर सकता है. अपने इलाक़े के बच्चे भी फुटबॉल खेलते हैं लेकिन उनके फोटो वाला कार्ड थोड़े न छपता और बिकता है.
अम्मा-बाबा आपकी मेहनत सफल हो गई है, पोते का 'हैप्पी बर्थडे कार्ड' मिल गया है, जन्मदिन से तीन दिन पहले. पोते को कार्ड पढ़कर सुना दिया गया है. सुविधा के लिए बाबा ने अँगरेज़ी में लिखा है, प्यार से अम्मा ने हिंदी में. मज़मून एक ही है.
अनुवाद अम्मा ने कर दिया है, या फिर बाबा ने अम्मा वाले का अनुवाद अँगरेज़ी में किया है. वैसे तो बहुत फ़र्क़ पड़ता है कि अनुवाद अँगरेज़ी से हिंदी में किया गया है या हिंदी से अँगरेज़ी में. मगर इस मामले में कोई ख़ास फ़र्क़ नहीं पड़ता.
बाबा-अम्मा का पत्र शब्दशः
....................
ऊँ नमः शिवाय
दिनाँक 26-06-2008
परम प्रिय चिरंजीव कृष्णाजी,
अम्मा-बाबा की ओर से ढेर सारा प्यार और शुभ आशीर्वाद, जन्मदिन मुबारक. तुम्हारा चौथा दिन है, तुम खूब खुश रहो, पूर्ण स्वस्थ और निरोग रहो. अपने पापा मम्मी की सब बातें मानना और उनको खुश रखना. पढ़ाई में मन लगाना. तुम जब लिखना सीख जाओगे तब हमें चिट्ठी लिखना. ईश्वर तुम्हें सारी प्रसन्नता और दीर्घायु प्रदान करें. जीवन में खूब उन्नति करो.
ढेर सारे प्यार के साथ
तुम्हारे अम्मा-बाबा
........................
पूरी चिट्ठी सुनने और कार्ड उलट-पलटकर देखने के बाद अनपढ़ पोते ने कहा है--थैंक यू.
बाबा को ठीक-ठीक पता नहीं है, उनका जन्मदिन मकरसंक्राति के एक दिन पहले होता है या एक दिन बाद. कार्ड भेजने, केक काटने का सिलसिला उनके लिए कभी नहीं हुआ, हमारा जन्मदिन मनाया गया और अब पोते का.
मैं कुछ ज्यादा भावुक हो रहा हूँ. रहने दीजिए, इतना बता दीजिए कि पीढ़ियों का यह प्यार ऊपर से नीचे ही क्यों चलता है, नीचे से ऊपर क्यों नहीं.
क्या यही वह जेनेटिक कोडिंग है जो हर अगली पीढ़ी को सींचती जाती है ताकि मानवीय जीवन धरती पर क़ायम रहे. क्या पलटकर उस प्यार को आत्मसात करने और महसूस करने का कोई गुणसूत्र हममें नहीं हैं, अगर हैं तो इतने क्षीण क्यों हैं?
सत्तर पार कर चुके बाबा मानसून के मौसम में कितने सरोवरों से गुज़रकर, पता नहीं कहाँ गए होंगे ग्रीटिंग कार्ड ख़रीदने. अम्मा-बाबा ने टिप-टिप करती दुपहरी पोते के लिए संदेश लिखने में ख़र्च की होगी. घर के पास कोई पोस्ट बॉक्स भी नहीं है, वे रिक्शे से जीपीओ गए होंगे, लाइन में लगकर लिफ़ाफ़ा रवाना किया होगा, इस आस के साथ कि मिल जाए और वक़्त पर मिल जाए. पिछले पाँच दिन से जब फ़ोन करो, एक ही सवाल होता है--"कार्ड मिला कि नहीं".
रुपए के नींबू तीन कि चार, इसी पर दस मिनट तक बहस करने वाले रिटायर्ड बाबा ने एक पल नहीं सोचा कि इस कार्ड के तीस रूपए क्यों. पोता ख़ुश होगा, कार्ड पर फुटबॉल बना है और दो गोरे लड़के खुश दिख रहे हैं, पोता उनके साथ आइडेंटिफाई कर सकता है. अपने इलाक़े के बच्चे भी फुटबॉल खेलते हैं लेकिन उनके फोटो वाला कार्ड थोड़े न छपता और बिकता है.
अम्मा-बाबा आपकी मेहनत सफल हो गई है, पोते का 'हैप्पी बर्थडे कार्ड' मिल गया है, जन्मदिन से तीन दिन पहले. पोते को कार्ड पढ़कर सुना दिया गया है. सुविधा के लिए बाबा ने अँगरेज़ी में लिखा है, प्यार से अम्मा ने हिंदी में. मज़मून एक ही है.
अनुवाद अम्मा ने कर दिया है, या फिर बाबा ने अम्मा वाले का अनुवाद अँगरेज़ी में किया है. वैसे तो बहुत फ़र्क़ पड़ता है कि अनुवाद अँगरेज़ी से हिंदी में किया गया है या हिंदी से अँगरेज़ी में. मगर इस मामले में कोई ख़ास फ़र्क़ नहीं पड़ता.
बाबा-अम्मा का पत्र शब्दशः
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ऊँ नमः शिवाय
दिनाँक 26-06-2008
परम प्रिय चिरंजीव कृष्णाजी,
अम्मा-बाबा की ओर से ढेर सारा प्यार और शुभ आशीर्वाद, जन्मदिन मुबारक. तुम्हारा चौथा दिन है, तुम खूब खुश रहो, पूर्ण स्वस्थ और निरोग रहो. अपने पापा मम्मी की सब बातें मानना और उनको खुश रखना. पढ़ाई में मन लगाना. तुम जब लिखना सीख जाओगे तब हमें चिट्ठी लिखना. ईश्वर तुम्हें सारी प्रसन्नता और दीर्घायु प्रदान करें. जीवन में खूब उन्नति करो.
ढेर सारे प्यार के साथ
तुम्हारे अम्मा-बाबा
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पूरी चिट्ठी सुनने और कार्ड उलट-पलटकर देखने के बाद अनपढ़ पोते ने कहा है--थैंक यू.
बाबा को ठीक-ठीक पता नहीं है, उनका जन्मदिन मकरसंक्राति के एक दिन पहले होता है या एक दिन बाद. कार्ड भेजने, केक काटने का सिलसिला उनके लिए कभी नहीं हुआ, हमारा जन्मदिन मनाया गया और अब पोते का.
मैं कुछ ज्यादा भावुक हो रहा हूँ. रहने दीजिए, इतना बता दीजिए कि पीढ़ियों का यह प्यार ऊपर से नीचे ही क्यों चलता है, नीचे से ऊपर क्यों नहीं.
क्या यही वह जेनेटिक कोडिंग है जो हर अगली पीढ़ी को सींचती जाती है ताकि मानवीय जीवन धरती पर क़ायम रहे. क्या पलटकर उस प्यार को आत्मसात करने और महसूस करने का कोई गुणसूत्र हममें नहीं हैं, अगर हैं तो इतने क्षीण क्यों हैं?
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