13 अप्रैल, 2007

हिंदू होने पर गर्व करना क्यों ग़लत है?

हिंदू होने पर गर्व करना ग़लत है. ठीक उसी तरह जैसे अमीर बाप का बेटा होने पर गर्व करना.

सीधा मतलब ये है कि जो आपका निर्णय नहीं है उस पर न तो आपको गर्व करने का अधिकार है और न ही उसके लिए आपको हीन माना जाना चाहिए. हिंदू होने के लिए आपने क्या किया है? आपके पुरखे मुसलमान, ईसाई, जैन या बौद्ध नहीं बने. इस पर आप क्यों इतराएँ? यह बात हर धर्म, जाति, वर्ग, देश के लोगों पर लागू होती है.

अगर आपने पैदा होने से पहले एक फॉर्म भरकर कहा होता तो मुझे फलाँ देश में, फलाँ धर्म में, फलाँ जाति में, फलाँ परिवार में पैदा होना है... तो शायद आपके गर्व करने की बात कुछ समझ में आती. एक जैविक घटना और एक संयोग पर गर्व करना कैसे ठीक हो सकता है?

जब आप अनचाहे किसी जाति, धर्म और देश का हिस्सा बन जाते हैं तो उसके सही-ग़लत अभियानों में काम आने के लिए, उससे आपको जोड़े रखने के लिए गर्व की घुट्टी पिलाई जाती है, पूरी दुनिया में ऐसा ही होता है. विवेक का तकाज़ा है कि आप इस राजनीति को समझें उसके परे देख सकें.

इसी गर्व के रास्ते गोरों ने बेहतरीन नस्ल बनने का सफ़र तय किया, एक घटिया अमरीकी के आगे एक बेहतरीन सोमालियाई हीन हो गया. यहीं से जातिवाद, क्षेत्रवाद, नस्लवाद और राष्ट्रवाद की अवधारणाएँ पैदा हुईं. गर्व की पतली गली से ही जातीय श्रेष्ठता, विद्वेष, हिंसा और युद्ध तक के रास्ते खुलते हैं.

भारत प्राचीन सभ्यता का केंद्र है, ज्ञान-विज्ञान-दर्शन,वेद-पुराण सब यहाँ रचे गए हैं. ये सब बातें बिल्कुल दुरुस्त है. मगर यह गर्व करने की बात नहीं है, समझने-गहने-सराहने की बात है, उसकी पूर्णता में. भारत ने दुनिया को बहुत कुछ दिया लेकिन सुमेरियन, असरीयन,चीनी, ग्रीक और मिस्री सभ्यताओं से बहुत कुछ लिया भी.

पाँच हज़ार साल की सभ्यता में सब कुछ गर्व करने लायक़ हो यह मानने की बात नहीं. धर्मवीर भारती का एक लेख पढ़ा था बचपन में धर्मयुग में, जो आज तक नहीं भूला. शब्दशः तो याद नहीं लेकिन भावार्थ ये है--यह वही सभ्यता है जो पौधों के प्रति भी इतनी संवेदनशील है कि शाम को पत्ते तोड़ने से मना करती है, यही वह सभ्यता है जो ज़िंदा औरत को आग में झोंक देती है. भारतीय सभ्यता न तो हीन है और न ही महान, वह विराट ज़रूर है.

मैं उसी विराट भारतीय सभ्यता का हिस्सा हूँ, हिंदू हूँ (गंगू भी), सिर्फ़ हिंदू घर में पैदा नहीं हुआ बल्कि पूजा-पाठ, संस्कार, कर्मकांड के बारे में भी थोड़ा-बहुत जानता हूँ, अनेक मंत्र याद हैं, हनुमान चालीसा कंठस्थ है. हिंदू की परिभाषा की दिलचस्प चर्चा में फिर किसी दिन पडूँगा लेकिन आज सिर्फ़ इतना कहना है कि हिंदु होने पर गर्व नहीं है क्योंकि यह गर्व करने की बात ही नहीं है.

हिंदू होना एक संयोग है जिसे सार्थक और सुखद बनाया जा सकता है, धर्म-सभ्यता-संस्कृति-समाज को समझकर और अच्छाइयों-बुराइयों दोनों से सीखकर. गर्व करके आप उसे ठीक से समझने का रास्ता बंद कर रहे हैं.

हिंदू होने का सुख यही है कि कोई शर्त नहीं है, गर्व करने की शर्त है शर्मिंदा होना.

13 टिप्‍पणियां:

Raman Kaul ने कहा…

बहुत अच्छे लगे आप के विचार, अनामदास जी। हाँ गर्व कहने के स्थान पर लोग यह कह सकते हैं कि - शुक्र है मैं मुसलमान हूँ, या हिन्दू हूँ, या भारतीय हूँ, या बांगलादेशी हूँ। कम ही लोग ऐसे होते हैं जो यह कहते हैं कि काश मैं मुसलमान होता, या हिन्दू होता। हर किसी को यही घुट्टी पिलाई जाती है कि उसी का धर्म, उसी का राष्ट्र सब से उत्तम है - चाहे वह सोमालियाई हो या अमरीकी।

ज्ञानदत्त पाण्डेय Gyandutt Pandey ने कहा…

अब यह तो कुछ ऐसा हो गया कि "गर्व" शब्द ही अश्लील है या किसी भी गर्व की स्थिति में छिद्र ढूंढे जा सकते हैं.

आप यह भी पोस्ट बनायें - "इस्लाम पर क्या इतराना" या "जिहाद कितनी वाहियात चीज है". तब तो आप की निष्प्क्षता दिखेगी. अन्यथा "हिन्दू" को लतियाने का काम तो सारे ही कर रहे हैं.

शैलेश भारतवासी ने कहा…

हिन्दू होने का यह मतलब कदापि नहीं है कि हम उसकी अच्छाइयों के साथ बुराइयों को भी अंगीकार करें। सम्पूर्ण हिन्दू जीवन-दर्शन और समाज में उसके व्यव्हृत रूपों की आधुनिक, आद्यकालिक समीक्षा होनी चाहिए। जो श्रेष्ठ है, उसे हिन्दुस्तानी होने के नाते स्वीकार करना चाहिए और जो भी भ्रष्ट है, उसका बहिष्कार होना चाहिए। चलते आये ढर्रे की चुगली तो कायर करते हैं। गर्व करने से काम नहीं बनेगा, आपके अंदर थोड़ा-बहुत जीवित भी हो, तो वो भी दूसरों के गर्व का कारण बनेगा।

संजय बेंगाणी ने कहा…

आपकी बात कुछ जम रही है.
न तो मैने अपने देश को चुना, न भाषा को. न माँ बाप को, न धर्म को. मनुष्य होने के पीछे भी खुद का निर्णय नहीं था. फिर गर्व किस बात का?

जगदीश भाटिया ने कहा…

थोड़े में बहुत कुछ कह जाते हैं आप।
उलझी से उलझी बात को सपाट करके साधारण भाषा में लिख देते हैं। बिना किसी उत्तेजना या सनसनी के।

अभय तिवारी ने कहा…

भाई विचारों को सफ़ाई से रखना तो कोई आप से सीखे.. बाकी तो सही है ही..

Jitendra Chaudhary ने कहा…

किसी भी सभ्यता और संस्कृति मे सभी बातें अच्छी हो ये कोई शर्त नही है। धर्म और संस्कृति बदलते परिवेश मे भी प्रासंगिक रहे, यही व्यवहारिकता का तकाजा है। मैने कई धर्मों को पढा और समझा है, मै किसी भी धर्म के खिलाफ़ नही हूँ और ना ही हिन्दू धर्म का वकील, अलबत्ता इतना जरुर कहूंगा कि हिन्दू धर्म सहिष्णुता की भावना है, वसुधैव कुटुम्बकम की भावना, अतिथि देवो भव: की भावना। हम प्रकृति को हर रुप मे पूजते है।

आपके ब्लॉग पर लिखी एक बात "भारतीय सभ्यता न तो हीन है और न ही महान, वह विराट ज़रूर है."
दिल को छू गयी। बहुत अच्छा लेख।

Srijan Shilpi ने कहा…

आपने बिल्कुल सत्य कहा कि किसी भी धर्म में जन्म लेना अपना चुनाव नहीं है, इसलिए उसमें गर्व करने जैसी कोई बात भी नहीं है। व्यक्ति चाहे जिस धर्म में पैदा हुआ हो, यदि वह पवित्र और जिज्ञासु मन का हो तो परमात्मा को जान सकता है, उसे प्राप्त कर सकता है। जहां तक सांसारिक जीवन में अपने कर्तव्य निभाने की बात है, व्यक्ति केवल अपने फर्ज़ और ईमान पर कायम रहे, उतना ही उसके लिए काफी है।

परमात्मा ने हर धर्म में अपने फरिश्ते भेजे हैं और सभी रास्ते उसी परमात्मा तक ले जाते हैं। हमें ये सब बातें महज समन्वयवादी बौद्धिक दृष्टिकोण भले लगती हों, लेकिन आधुनिक युग में रामकृष्ण परमहंस के रूप में एक ऐसे निरक्षर महाज्ञानी संत हुए जिन्होंने अपने जीवन में ईश्वर के तमाम स्वरूपों और विभिन्न धर्मों की एकता को साक्षात सिद्ध करके दिखाया। वर्ष 1866 में वह बकायदा इस्लाम में दीक्षित हुए और पक्के मुसलमान के तौर पर तब तक रोजाना पांचों वक्त नमाज पढ़ना जारी रखा और कहा जाता है कि मोहम्मद साहब एक दिन साक्षात प्रकट हो गए। इसी तरह 1874 में उन्होंने ईसाई धर्म को अपनाया और सच्चे ईसाई की तरह रोजाना चर्च में जाकर प्रार्थना करते रहे और एक दिन ईसा मसीह का साक्षात्कार उन्हें हासिल हुआ। परमहंस ने काली, कृष्ण, राम सहित हिन्दू धर्म के कई देवी-देवताओं के भी साक्षात दर्शन किए। अद्वैत की साधना भी उन्होंने की और निर्विकार निर्गुण ब्रह्म के भाव में भी स्थिर रहे।

भक्ति, श्रद्धा, सहजता और पवित्रता भरे अपने पारदर्शी जीवन से उन्होंने मानव जाति को यह दिखलाया कि धर्म कोई मानव की कपोल कल्पना या वास्तविक जीवन के दु:खों से बचने की अफीम नहीं है, जैसा कि उन्हीं के समकालीन कार्ल मार्क्स कहा करते थे, बल्कि एक शाश्वत सत्य है और विभिन्न धर्मों के केवल रास्ते अलग-अलग हैं लेकिन सबके गंतव्य एक ही हैं। जैसा कि ऋगवेद में कहा गया है, "एकम् सत् विप्राः बहुधा वदन्ति"।

आपके मन की स्वैच्छिक 'भ्रमित' अवस्था के वितर्क बालवत सहजता और मासूमियत भरी जिज्ञासा से युक्त होते हैं और उन्हें पढ़-सुनकर अत्यंत आनंद आता है। आपके लेखन में अक्सर मैथिली साहित्य के हरिमोहन झा और हिन्दी साहित्य के आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के लेखन की झलक मिलती है।

अनूप शुक्ला ने कहा…

हिंदू होना एक संयोग है जिसे सार्थक और सुखद बनाया जा सकता है, धर्म-सभ्यता-संस्कृति-समाज को समझकर और अच्छाइयों-बुराइयों दोनों से सीखकर. गर्व करके आप उसे ठीक से समझने का रास्ता बंद कर रहे हैं.
यह सही कहा!

Pramod Singh ने कहा…

एक बात बताइयेगा, 'प्रभावी लेखन कैसे करें', 'घटिया लेखन से कैसे बचें' आदि-इत्‍यादि जैसा कोई ट्यूशन-स्‍यूशन करते हैं आप? फीस क्‍या है? प्रायवेटली एक कोचिंग इंस्टिट्यूट शुरू करने का विचार है, शामिल होइयेगा तो कृपया संपर्क करें?

ravish ने कहा…

भई आपने तो आंखे खोल दी । प्रमोद जी ने सही सवाल किया है । पर नाम क्यों नहीं रखते । चलिए अनाम होकर ही सही कईनाम वालों को रास्ता दिखा दिया आपने । आपकी बात दिल में उतर गई

प्रियंकर ने कहा…

स्वच्छ,निर्मल जल के प्रवाह की तरह बहता उज्ज्वल चिंतन और धारोष्ण लेखन. क्या बात है भाई अनामदास !

SHASHI SINGH ने कहा…

प्रमोद भाई के साथ जो कोचिंग इंस्टिट्यूट शुरू करें तो मेरा दाखिला सबसे पहिले होना चाहिये। फीस की चिंता न करें... चंदा करके जुटा लूंगा।

सही बात कही आपने।

आपके बातों पर अर्ज़ किया है...

झगड़ने को जमाने में
क्या कमी है वजुहात की
हम तो अक्सर धरे जाते हैं
यारी के बहाने बनाते
-शशि सिंह