09 मार्च, 2008

क्या करें, कहाँ जाएँ, क्या बन जाएँ?

मैं एक भूरा आदमी हूँ. गोरों के देश में कुछ लोग मुझसे नफ़रत करते हैं, मुझे अल क़ायदा वाला समझते हैं, पाकिस्तानी मान लेते हैं, जबकि मैं भारत का हूँ.

किसी ने कहा परदेस जाकर क्यों बसे, अपने देश में रहते तो अच्छा था. कहाँ रहता, आप ही बताइए, बिहारी हूँ, मुंबई जाकर रहूँ कि असम जाऊँ? हिंदू हूँ, कश्मीर चला जाऊँ?

एक संघी संगी कहते हैं हिंदू होना ही भारी समस्या है, मैंने कहा कि बौद्ध होने में बड़ा आराम है लेकिन वो आप बनने नहीं देते.

मुसलमान बनकर शायद अरब दुनिया में अमन-चैन से गुज़ारा हो जाए लेकिन उसके लिए वहीं पैदा होना पड़ेगा वर्ना शेख़ ताउम्र बेगार ही कराते रहेंगे, लेकिन अगर अरब दुनिया में फ़लस्तीन में पैदा हो गए तो?

काला बनने की तो ख़ैर सोच भी नहीं सकते, गोरे भी मारते हैं और भूरे भी.

शायद सबसे अच्छा गोरा बनना है. मिस्टर व्हाइट ने बताया कि मैं मुग़ालते में हूँ, ब्रिटेन और अमरीका की ट्रेवल एडवाइज़री देखी तो समझ में आया कि वे सूडान से लेकर अफ़ग़ानिस्तान तक कहीं सुरक्षित नहीं हैं.

उर्दू में चमड़ी के लिए एक बेहतरीन शब्द है, ज़िल्द. ज़िल्द के रंग से ही लोग किताब का हिसाब कर देते हैं.

लेकिन जैसा आप देख ही रहे हैं मसला सिर्फ़ ज़िल्द का नहीं है, कहीं ज़बान का है, कहीं कुरआन का, कहीं जीसस का, कहीं भगवान का. कहीं कुछ और...

मुंबई में मराठी, गुजरात में गुजराती हिंदू, पाकिस्तान में पंजाबी सुन्नी टाइप जीने के अलावा... अगर दुनिया में कहीं आदमी की तरह जीना हो तो कहाँ जाया जाए, ज़रा मार्गदर्शन करिए.

12 टिप्‍पणियां:

azdak ने कहा…

बहुत अच्‍छे.. इसीलिए अमोस ओज़ ने आदमी की जगह किताब की शक्‍ल में पैदा होने की ख्‍वाहिश ज़ाहिर की थी..

अभय तिवारी ने कहा…

A-1

दिवाकर प्रताप सिंह ने कहा…

भैय्या जी!यहाँ जब जन्म-दिवस पर आयु एक वर्ष कम होती है तब सब कहते है " हैप्पी ..." यह मृत्यु-लोक है और आप जीना चाहते है,पूँछते हैं कि जीने के लिये दुनिया में कहाँ जाए ?
वैसे लिखा बहुत अच्छा है !

अनूप शुक्ल ने कहा…

दुविधा है। फिलहाल तो हैं वही बने रहें।

अनाम ने कहा…

यही बात है दरअसल...

Unknown ने कहा…

अजीब बात है ना....कि पहले लोग नई नई जगह ढूँढ़ते थे जाने के लिये....फिर अपनी संस्कृति, धारणायें, विचार और धर्म लेकर उस जगह अपना घर बसा लेते थे। कुछ नई जगह के अनुसार, कुछ अपने जन्म के अनुसार...पर जी लेते थे। पता नहीं तब भी अपना अस्तित्व का विस्तार करने और नया कुछ ग्रहण करने में कितनी अड़चने आती थी।
पर आज के संदर्भ में दो बातें तय हैं....
हर किसी को अपने अस्तित्व के खोने का डर है और सभी उसी डर से औपरेट कर रहे हैं।
दूसरा हम सब बने बनाये स्वर्ग में पहुँचना चाहते हैं। अपनी ऊर्जा लगाकर दिलों या ज़मीं की सीमायें लाँघने में हिचकिचाते हैं।

अनाम ने कहा…

हिंदी प्रदेशों में सारे साउथ इंडियन्स मद्रासी कहाते हैं और साउथ में सारे उत्तरभारतीय पंजाबी !!!

Udan Tashtari ने कहा…

मानसिक द्वन्द का बेहतरीन चित्रण..सोचने को मजबूर कतरा है. बहुत बढ़िया.

Gyan Dutt Pandey ने कहा…

कहीं जाने/बनने का सवाल यों आता है? मुझे तो विक्तोर फ्रेंकल की बात पसन्द आती है। नात्सी कंसंट्रेशन कैम्प में भी वे अपने को उन्मुक्त महसूस कर सकते हैं तो यात्रा तो इण्टर्नलाइज्ड होनी चाहिये।

अजित वडनेरकर ने कहा…

अफ़सोसनाक है कि ज़िल्द जो खुदाई कारीगरी का नमूना है , खुदा के बंदों के लिए जिल्लत की बायस बनी है। बढ़िया पोस्ट ।

Pratyaksha ने कहा…

अपने भीतर जायें और इसी भीतर से बाहर का रास्ता मिलेगा। लेकिन ऐसा शायद हर समय में रहा होगा ..अपने आप को बचाना कभी भी आसान नहीं रहा होगा। तभी शायद हम हर वक्त तलाशते हैं अपने जैसे लोग ? सुरक्षा के लिये ..मानसिक भावनात्मक सुरक्षा ..सबसे ज़्यादा।

नगर राजभाषा कार्यान्वयन समिति मण्डी (हिमाचल प्रदेश) ने कहा…

आपका विचारात्मक लेखन हमें बहुत ही अच्छा लगा।