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28 फ़रवरी, 2011

बियाह बिहार में

एलबम पार्ट वन

फोटो 1-- घर जगमग, हेलोजेन के लाइट, गाँछ पर लड़ी, चेहरों पर खुशी, साज सिंगार, जाड़ा में शिफॉन के साड़ी पर कत्थई कार्डिगन, लीला बुआ, अल्पना दीदी और चंपाकली छमक छल्लो

फोटो 2-- जिनगी के अरमान पूरा होए के खुशी से दमकत चेहरा, नारंगी साड़ी पियर सेनूर (मे बी अदर वे राउंड), भर-भर आँख काजर, केहुनी तक लहठी, गुलाबी टोकरी में चुनरी से ढाँकल पूजा के सामान, डेराइल दुल्हिन के पीछे खड़ा इस्माट भउजी

फोटो 3-- बुढ़िया नानी, टूटल चस्मा, दाँत में फाँक, मचकल मचिया, केयरिंग भतीज-पतोह, पिलेट में अकेला उदास लड्डू

फोटो 4-- लाल पियर पंडाल, दवाई वाला टुन्नू, नौकरी खोजे वाला लल्लन, गोपेसरा एन्ने काहे झांक रहा है...टोकरी ले जा रहा फगुनी, टेंट हाउस वाला जइसा बोला था, सोभ रहा है, डंडी न मारिस है...

फोटो 5-- तीन आदमी, ई कोट वाला, दिल्ली से आए हैं, फुलेसर जी के दमाद आईसीआईसीआई बैंक दिल्ली में हैं, दुसरका बुल्लु कमीज वाला आईएस का तय्यारी में है और कोना में नीलेश भइया हैं सीसीटीवी में हैं

फोटो 6-- राज दरबार टाइप का बनाया है, फूल कलकत्ता से लाया है, का जाने झूठ बोल रहा होगा लेकिन एकदम सेंट आ रहा था, दुल्हा-दुल्हिन का कुर्सी है, एके दिन का बात है लेकिन सबका अपना अरमान होता है, है कि नहीं?

फोटो 7-- खाना लग गया है, तरबूज्जा के सारस बनाया है अलबत्त, पिलेट काँच का नहीं है, "जगदंबा बाबू के बेटवा के बियाह में तो दस-बीस गो तो धोनही में टूट गया था, मेलामाइन है, टूटता नहीं है, टेंटहाउस वाला चालू है, एजी धक्का मत दीजिए, ढेर भुखाइल हैं तो आप ही जाइए पहिले...

फ़ोटो 8-- बरदी वाला बेटर लगइले हैं, अरे, इ तो रेकसा वाला फेकुआ के बेटा है, पिलेटवा लेके कहवाँ बइठे जी, बड़ा शहर में सब काम खड़े खड़े होता है का? , जब से इनका बेटवा बंबई गया है तब से रंग ढंग बदल गया है

फोटो 9-- एगो कट्टल बाल वाली है, तीन आदमी कनखी से देख रहा है, उसकी सहेली मुँह तोपके हँस रही है, दूर में दिल्ली जाने की तैयारी कर रहा लड़का है जो कनखी से नहीं, सीधे देख रहा है, वह इस फोटो में नहीं है

फोटो 10-- रात के शामियाना में काला चश्मा, लोकल रजनीकांत, पीला धारीवाली पैंट और नीला कोट, अंदर से झाँकती बैंगनी टी-शर्ट, हम किसी से कम नहीं वाली अदा, दबंग हिट होने के बाद आया नया कॉन्फिडेंस, दो-तीन लोकल फ़ैन भी

फोटो 11-- आटा चक्की वाला का बेटवा बीडियो कैमरा लेके आया था, रिकार्डिंग के लिए तो टुन्नुवा को कान्ट्रेक्ट देल्ले था पहिले से, अरे कैमरे देखाने लाया था, अरे नहीं, मुन्ना का दोस्त है इसलिए, पइसा बहुत है लेकिन देखाता नहीं है जादा....

फोटो 12-- मरकरी के नीचे बइठे थे, चेहरा साफ़ नहीं लउक रहा है, ढेर लाइट हो गया, दया मास्टर जी, कन्हाई चच्चा, शिवबचन जी और के जाने कउन है...

फोटो 13-- कोई बोला नहीं, रोसड़ा वाले फुफ्फा बियाहो के दिन बिना दाढ़ी बइनले घूम रहे हैं, जनमासा में तो फिरी का नउआ बइठल था ऐँ, इन्हीं को एतना ठंडा लग रहा था और कौन सकरात के बाद मफलर बाँध के घूमता है... दरोगा जी ओने का देख रहे हैं??

फोटो 14-- लाल टोपी वाला लइका शायद कंचनवा का है, पता नहीं कौन गोदी में लेले है, रील बरबाद करते हैं, केकर केकर फोटो खींच लिया है....

फोटो 15-- ले, दुल्हिन के फोटो के पता नहीं, खाना का डोंगा में कैमरा गोत के फोटो खींचा है, ई का है जी??, नवरतन कोरमा, ऐं? सलाद नहीं सैलेड कह रहा था कोई बरियाती...

फोटो 16-- पाँच आदमी खड़े हैं, एक तन के, एक भौंचक, एक उदास, एक सजग, एक उदासीन....

फोटो 17---पाँचों उँगली में अँगुठी पहिने बिधायकी के उम्मीदवार जी, चारों तरफ़ सूरजमुखी की तरह मुँह उठाए लोग, एक चश्मे पर चमका फ्लैश, "लगन के टाइम बहुत शादी अटेंड करनी पड़ती है" वाला भाव, गुलाबजामुन का दोना लिए कोई, "आप आए, हम धन्य हुए" वाली मुद्रा में...

फोटो 18-- गपुआ को देखिए जरा, जर रहा है, बियाह नहीं न हुआ अबहीं ले, हाँ, हर जगहे मनहूस मुँह बनाके खड़ा हो जाता है, ई पीला धारी वाला दुर्गा चचा के बेटा है, ई साल आईआईटी में नहीं हुआ, लेकिन डोनेशन वाला में सौथ इंडिया जाने वाला है...

फोटो 19-- भोला चाचा, रिटायर हो गए हैं लेकिन अफसरी रुआब अबइहों ले है, गंभीर आदमी हैं, पीछे तिनकौड़ी साहू, बड़ा बाबू, बुच्चन जी और उनके साढू जो लल्लन जी के मउसेरा भाई भी हैं...

फोटो 20-- शिवगंगा बैंड, माथे पर लैट उठाए औरतें, गुलाब से सजी गाड़ी, गले में गेंदे का हार पहने बराती, तनकर चलते मउसा जी, लाइट में हाइलाइट होता बीबीजे कोचिंग सेंटर का विज्ञापन

फोटो 21-- अरे, पाँच-छौ गो नाती-पोता के साथ आए थे फुलेसर महराज, नहीं सुधरेंगे, एकवायन रूपया असूल करने के चक्कर में होंगे, देखिए कुरसिए के नीचे कचरा बिग रहा है, कोई दोसरा के भी तो हो सकता है ऊ कचरा...

फोटो 22-- अपनी पम्मी कितनी सुंदर दिख रही है, अगर यही फोटो भेज दिया जाए तो तुरंत बियाह ठीक हो जाएगा, लल्लनवा पाकेट में हाथ रखके खड़ा है, लगता है बहुत पइसा है पाकिट में....

फोटो 23-- वही हम कहें, जैमाल वाला फोटो कहाँ गया, ई रहा, लैट कम है, चेहरा पर नहीं हैॉ, ठीक-ठीक है, नेचुरल है, दिख तो रहा है....

फोटो 24-- क्लोज अप, एक दम्मे रवीना टंडन टाइप, दुर. आपको कोई और नहीं मिला था...

कच्ची और विदाई वाला दूसरा एलबम में है, दुल्हा तो ई एलबम में हइये नई है...

10 नवंबर, 2008

दिल्ली में रात-दिन की ऑडियो डायरी

चौकीदार की लाठी की ठक-ठक और सीटी की गूँज. बेमतलब की वफ़ादारी निभाते आवारा कुत्तों का कोरस. चर्र चूँ...ऊपर की मंज़िल पर खुला या बंद हुआ दरवाज़ा. बहुत रात हो गई अब सो जाना चाहिए.

गाड़ी रुकी है मेन गेट पर, कोई कॉल सेंटर वाला आ या जा रहा होगा. पीएसपीओ वाला पंखा घूमता है किर्र-किर्र की आवाज़ के साथ, टॉयलेट में पानी टपकता है...टिप टुप, टिप टुप...फेंगशुई वाले कहते हैं कि पानी टपकना शुभ नहीं होता.

'यार कमाल हो गया, पांडे भी साला ग़ज़ब आदमी है...' रात के डेढ़ बजे भी पांडे जी की चिंता, पता नहीं किसे सता रही है. बोलने वाला चल रहा था इसलिए आवाज़ भी चली गई. 'चटाक', लगता है गुडनाइट ठीक से काम नहीं कर रहा है.

उफ़, अक्तूबर में इतनी गर्मी, क्लाइमेट चेंज नहीं तो और क्या है. गरदन पर चमड़ी की सिलवटों में जमा होता पसीना. जेनरेटर की भट-भट-भड़-भड़ के तीस सेंकेड बाद पंखे की किर्र-किर्र सुहाने लगी. पावरबैकअप कितना ज़रूरी है.

'कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन'...किस चैनल पर आ रहा होगा ये गाना इस वक़्त, कोई कैसेट घूम रहा होगा या रेडियो बज रहा है. ये गाना कौन, कहाँ, कैसे और क्यों बजा रहा होगा. सोना चाहिए, वर्ना बीता हुआ दिन कोई नहीं लौटाएगा और आने वाला दिन ख़राब हो जाएगा.

सुबह

शूँशूँशूँशूँशूँशूँ...बगल वाले फ्लैट का कुकर बोला. शर्मा जी के यहाँ शायद या फिर जसबीर सिंह के घर, हद् है, रात को खाना पकाकर फ्रिज में नहीं रख सकते? कुछ और सो लूँ नहीं तो दिन भर ऊँघता रहूँगा. यही तो सोने का टाइम है और लोग हैं कि...

'मम्मी, मिन्नी मेरी बुक नहीं दे रही है,' 'चलो-चलो, बस मिस करनी है क्या', 'मैम को बता देना'...'ओह हो, मम्मी आप भी हद करते हो'... हमारे स्कूल जाने या न जाने पर कभी इतना हंगामा नहीं हुआ.

'मंगल भवन अमंगल हारीईईईई'... पता नहीं, लाउडस्पीकर बजाने पर लगी क़ानूनी रोक रात से लेकर सुबह कितने बजे तक है. नाइट ड्यूटी करने वाले तो सिर्फ़ इस बाजे की वजह से नास्तिक हो जाएँगे. ख़ैर, अपार्टमेंट से दूर है मंदिर, लेकिन इतना ज़ोर से बजाने की क्या ज़रूरत है.

'ढम्म'. लगता है, अख़बार की लैंडिंग हुई है बालकनी में. थोड़ी देर में देखता हूँ, ज़रा एक और झपकी मार लूँ. ऐसा क्या होगा अख़बारों में, रात को टीवी की ख़बरें और वेबसाइट देखकर सोया हूँ.

'टिंग टू'...'अरे, दूध का बर्तन धुला नहीं है क्या, दूधवाला आया होगा.' 'ढांग, ठन्न, टनननन...' 'भइया, आपको बोला था न कि मंडे से एक्स्ट्रा चाहिए...' 'ठीक है कल से ले आएँगे...' मदर डेयरी है, अमूल ताज़ा है, नानक डेयरी है, सुबह-सुबह तंग करने वालों से दूध लेना पता नहीं क्यों जरूरी है.

'घर्र,घर्र,घर्र,तड़,तड़,तड़,घर्र,घर्र,घर्र..घूँsss...', स्कूटर को तिरछा करके स्टार्ट करने वाले भी हैं इस अपार्टमेंट में, चारों तरफ़ तो सिर्फ़ कारें नज़र आती हैं, शायद ट्रैफ़िक जाम से बचने के लिए. मैं तो फसूँगा ही जाम में ख़ैर...

'डिंग,डां डिंग डू, डैंग डैंग,' मेरा अपना ही अलार्म है अब तो. साढ़े आठ बज गए, उठना ही पड़ेगा. अलार्म सुनकर किसी और की नींद खुलने के आसार नहीं हैं, सब पहले से उठे हुए हैं.

ये आवाज़ें बहुत याद आ रही हैं, चारों ओर सन्नाटा है. महीने भर की छुट्टी के बाद लंदन आ गया हूँ.

15 सितंबर, 2008

गाय खाने वाले हिंदू, सूअर खाने वाले मुसलमान

ब्रैंडिंग बी स्कूलों की उपज नहीं है, सबसे पहले आदमी की ही ब्रैंडिंग हुई. वह हिंदू बना, मुसलमान बना, ईसाई बना, यहूदी बना...फिर सब-ब्रांडिंग हुई, शिया-सुन्नी, कैथोलिक-प्रोटेस्टेंट...

धर्म के नियमों का पालन करना ज़रूरी नहीं, पहला धर्म यही कि आदमी जल्द से जल्द किसी न किसी खाँचे में फिट हो जाए ताकि कम सोचने वालों को अधिक असुविधा न हो.

हम सब उस दुकानदार की तरह हैं जो सिर्फ़ ब्रैंड जानता है. वह साबुन माँगने पर साबुन नहीं दे सकता, उसे निरमा, सनलाइट, उजाला या रिन जैसा कुछ सुनना होता है तभी उसका हाथ अपने-आप एक ख़ास शेल्फ़ की तरफ़ जाता है.

"आप कौन हैं?"

"मैं आदमी हूँ."

इस तरह का संवाद कई सदियों से संभव नहीं है क्योंकि आदमी अपनी ब्रैंडिग 'महापरिनिर्वाण' से काफ़ी पहले कर चुका था.

जिसकी ब्रैंडिग होश संभालने के सदियों पहले हो चुकी हो वह भला कैसे समझ सकता है कि इस दुनिया के पाँच अरब लोगों को 12 राशियों में बाँटकर जितनी सही भविष्यवाणी की जा सकती है, उतने ही सटीक तरीके से दूसरे ब्रैंड के लोगों को समझा जा सकता है.

गोमांस का ज़ायका कोई हिंदू नहीं बता सकता, क्रिस्पी बेकन की लज्ज़त मुसलमान को क्या पता, सरदारों को विल्स नेवीकट की क्या कद्र...ऐसे जेनरलाइजेशन अक्सर ग़लत साबित होते हैं लेकिन फ़ितरतन हम बाज़ नहीं आते.

लाइब्रेरी, कैटलॉग, सुपरस्टोर...हर जगह चीज़ें इसी तरह रखी होती हैं कि जो आदमी के खाँचेदार दिमाग़ में फौरन अँट जाए.

हमारे लिए कितना श्रमसाध्य है खाँचे से बाहर देखना, मैनेजमेंट गुरू की ज़रूरत होती है हमें बताने के लिए--थिंक आउट ऑफ़ बॉक्स.

सबसे आसान है यह मान लेना कि--गाँव में रहने वालों को कुछ पता नहीं होता, सभी सिंधी व्यापारी होते हैं, हरेक बंगाली मछली खाता है, महाराष्ट्र के नीचे रहने वाले सभी मद्रासी हैं...

आदमी के ऊपर पता नहीं कितनी चीज़ें सवार हैं--उसकी जाति, क्षेत्र, धर्म, हैसियत लेकिन वह बार-बार अपनी ब्रैंडिंग को ग़लत साबित करता रहता है, नई सबब्रैंडिग बनाता रहता है...उसे भी झुठलाता रहता है. कभी सैकड़ों की तादाद में आईएएस बनकर बिहारियों के पिछड़े होने की ब्रैंडिंग को, कभी बंगलौर में सबसे अधिक पब खोलकर दक्षिण भारतीयों के परंपरागत होने की ब्रैंडिंग को.

दिल्ली के कोई जैन साहब घनघोर माँसाहारी बन जाते हैं, सीरिया के कोई अबू हलीम घोर शाकाहारी हैं जो दूध-शहद से भी परहेज़ करते हैं... मगर हज़ारों-लाखों अपवादों के बावजूद एक-दूसरे को खाँचे में डालना ही नियम है, क्योंकि सबसे प्रभावी नियम, सुविधा का नियम होता है.

एक लाठी से समूची रेवड़ को हाँकना, एक कूची से सबको रंगना, एक सुर में सबको कोसना, एक गाली में पूरी जमात को लपेटना, एक सोच में पूरे देश को समेटना, एक कलंक पूरे मज़हब पर लगाना... आसान होता है, सही नहीं.

ख़ास तौर पर तब, जब हर तरफ़ बम फट रहे हों.

26 अगस्त, 2008

सावन सुहाना, भादो भद्दा, आख़िर क्यों?

सावन चला गया. पूरे महीने 'बरसन लागी सावन बूंदियाँ' से लेकर 'बदरा घिरे घिरे आए सवनवा में' जैसे बीसियों गीत मन में गूंजते रहे.

राखी के अगले दिन से भादो आ गया है, भादो भी बारिश का मौसम है लेकिन ऐसा कोई गीत याद नहीं आ रहा जिसमें भादो हो.

भादो के साथ भेदभाव क्यों?

क्या इसलिए कि भादो की बूंदें रिमझिम करके नहीं, भद भद करके बरसती हैं? या इसलिए कि वह सावन जैसा सुहाना नहीं बल्कि भादो जैसा भद्दा सुनाई देता है? या फिर इसलिए कि भादो का तुक कादो से मिलता है?

भादो के किसी गीत को याद करने की कोशिश में सिर्फ़ एक देहाती दोहा याद आया, जो गली से गुज़रते हाथी को छेड़ने के लिए हम बचपन में गाते थे- 'आम के लकड़ी कादो में, हथिया पादे भादो में.'

हाथी अपनी नैसर्गिक शारीरिक क्रिया का निष्-पादन सावन के सुहाने मौसम में रोके रखता था या नहीं, कोई जानकार महावत ही ऐसी गोपनीय बात बता सकता है. सावन में मोर के नाचने, दादुर-पपीहा के गाने के आख्यान तो मिलते हैं, हाथी या किसी दूसरे जंतु के घोर अनरोमांटिक काम करने का कोई उदाहरण नहीं मिलता.

हाथी को भी भादो ही मिला था.

सावन जैसे मौसमों का सवर्ण और भादो दलित है.

बारिश के दो महीनों में से एक इतना रूमानी और दूसरा इतना गलीज़ कैसे हो गया?

जेठ-बैसाख की गर्मी से उकताए लोग आषाढ़-सावन तक शायद अघा जाते हैं फिर उन्हें भादो कैसे भाए?

भादो मुझे बहुत पसंद है क्योंकि उसकी बूंदे बड़ी-बड़ी होती हैं, उसकी बारिश बोर नहीं करती, एक पल बरसी, अगले पल छँटी, अक्सर ऐसी जादुई बारिश दिखती है जो सड़क के इस तरफ़ हो रही होती है, दूसरी तरफ़ नहीं.

कभी भादो में हमारे आंगन के अमरूद पकते थे, रात भर कुएँ में टपकते थे. किसी ताल की तरह, बारिश की टिप-टिप के बीच सम पर कुएँ में गिरा अमरूद. टिप टिप टिप टिप टुप टुप टुप...गुड़ुप.

सावन की बारिश कई दिनों तक लगातार फिस्स-फिस्स करके बरसती है. न भादो की तरह जल्दी से बंद होने वाली, न आषाढ़ की तरह तुरंत प्यास बुझाने वाली.

मगर मेरी बात कौन मानेगा, मेरा मुक़ाबला भारत के कई सौ साल के अनेक महाकवियों से है. भादो को सावन पर भारी करने का कोई उपाय हो तो बताइए.

29 मार्च, 2008

अजित भाई, हिम्मत जवाब दे रही है

आपका बकलमख़ुद सरकलमख़ुद जैसा ही है. कई लोग हिम्मत जुटा लेते हैं, एक हफ़्ते से चिंता में घुला जा रहा हूँ कि आत्मकथानुमा क्या लिखूँ. आपका रिमाइंडर आने ही वाला होगा, दुनिया में शायद आप ही हैं जिसे मेरे सरकलमख़ुद न करने पर मलाल होगा.

सच मैं लिख नहीं सकता, झूठ भी लिखा नहीं जाएगा, तो फिर बचा क्या लिखने को. क्या आप मुझे इतना मूर्ख समझते हैं कि सब सच-सच लिख दूँ और कहीं मुँह दिखाने के काबिल न रहूँ. ऐसी बातें सबकी ज़िंदगी में होती हैं. जिसके जीवन में नहीं हैं वो झूठ बोल रहा है या फिर उसने जीवन बहुत संभालकर ख़र्च किया है, मानो किसी से माँगकर लाया हो, ज्यों की त्यों लौटानी हो, कबीर की चदरिया की तरह.

एक जीवन जिसे मैंने अपने जीवन की तरह जिया है, किसी और के जीवन की तरह बेलाग होकर उसके बारे में सच-सच कैसे लिख दूँ. इस बात के कोई आसार नहीं हैं कि मैं ये ग़ैर-मामूली काम कर पाऊँ. जो अपने जीवन को किसी और का समझकर जीते हैं वो अगर आत्मकथा लिख दें तो कमाल हो जाता है, माइ कन्फ़ेशंस इसकी सबसे अच्छी मिसाल है.

एक मध्यवर्गीय, सवर्ण, नौकरीपेशा, भीरू क़िस्म का पारिवारिक आदमी क्या खाकर पठनीय आत्मकथा लिख देगा. कुछ देखा हो, कुछ झेला हो, कुछ गुल खिलाए हों तब तो बताए. सोचता हूँ कि मैं कायर नहीं हूँ, कि मैं ईर्ष्यालु नहीं हूँ, कि मैं दंभी नहीं हूँ, कि मैं ढोंगी नहीं हूँ, कि मैं हिपोक्रेट नहीं हूँ...टाइप बातें लिख दूँ लेकिन फिर लगता है कि मैं अगर ये सब नहीं हूँ तो फिर क्या हूँ.

जो किया वो अच्छा नहीं लगा, जो नहीं किया वही अच्छा लगता है. काम में मन नहीं लगा, मन का काम नहीं किया. ऐसा जीवन हो और कोई प्यार से कहे कि बकलमख़ुद लिखिए तो जी घबराने लगता है.

कई बार लगता है-जिंदगी कुछ भी नहीं, फिर भी जिए जाते हैं, ऐ वक़्त तुझ पे एहसान किए जाते हैं...फिर लगता है- नहीं-नहीं ऐसा नहीं है, जीवन में इज़्ज़त की नौकरी (?) है, अपना घर है, अच्छी सी बीवी है, प्यारा सा बच्चा है, सब तो है. अगर नौकरी, घर, बीवी, बच्चे से आत्मकथा बनती तो पाँच अरब लोग बना चुके होते.

ख़ूबियाँ तो हैं नहीं, खोज-खोजकर अपने सारे ऐब गिना दूँ तो भी नहीं बनेगी पढ़ने लायक आत्मकथा. 37 साल क्या करने में गुज़ार दिए कि एक अदद आत्मकथा लिखने लायक़ नहीं हुए. इस उम्र में करने वाले क्या-क्या कर गुज़रते हैं, हम नौकरी करते रह गए. हर साल कम से कम दो-तीन बार ज़रूर सोचा कि नौकरी छोड़कर दुनिया घूम लें, कुछ लिखने लायक़ अनुभव जुटा लें फिर कुछ ऐसा तगड़ा सा लिखेंगे कि आग लग जाए हिंदी के बाज़ार में. नौकरी तो हम छोड़ने से रहे, अब नौकरी हमें छोड़ दे तो कुछ बात आगे बढ़े.

पता नहीं कितनी पचासों बातें हैं जो मैं ख़ुद से छिपाता रहा हूँ अगर मैं उन्हें लिखूँ तो पढ़ने वालों को बहुत मज़ा आएगा मगर वो बातें मन के अंधेरे कोनों में दफ़न होती हैं जहाँ ख़ुद जाने की हिम्मत नहीं होती है. कभी कोई घटना, कोई सपना बता देता है कि अंधेरे कोने में क्या-क्या दबा है, हमारा मन ढेर सारी इच्छाओं-कुंठाओं और वेदनाओं की कब्र है. शायद इसीलिए हम इतना कठिन जीवन फिर भी जी लेते हैं.

अजित भाई, आप नहीं कह रहे हैं कि जो लिखूँ वह सच ही हो, आप कह रहे हैं जो अच्छा लगे लिखिए, जैसे अच्छा लगे लिखिए...बस अपने बारे में लिखिए. लेकिन बकलमख़ुद इतना डरावना नाम है कि मेरी हिम्मत पस्त हो रही है. रोचक संस्मरण, यादगार पल, प्रेरक प्रसंग टाइप कोई नाम नहीं सोच सकते थे आप. आपके प्रस्ताव पर बहुत विचार किया लेकिन डरा-सहमा सा हूँ, क्या लिखूँ, क्यों लिखूँ, कोई क्यों पढ़ेगा? ब्लॉग पर तो कुछ भी अल्लम-गल्लम लिखते रहते हैं, बकलमख़ुद में कैसे लिखेंगे?

अपने ढेर सारे ऐबों में एक ये भी है कि बहुत इमेज कॉन्शस हैं, इसी इमेज के भूत से बचने के लिए अनामदास नाम रखा, अब आप लोगों ने अनामदास की भी इमेज बना दी है इसलिए डर लग रहा है. कुछ बचपन की फुटकर मज़ेदार बातें लिखने का इरादा है, चलेगा क्या? फिर भी आप उसे बकलमखुद कहने का इसरार करेंगे?

11 मार्च, 2008

खिलौना बंदूक और असली ख़ौफ़

हिंसा का पारसी थिएटर हमने आपने ही नहीं, मेरे साढ़े तीन साल के बेटे ने भी खूब देखा है. मगर हिंसा का परिणाम किसने, कहाँ और कितनी बार देखा है.

एक्सीडेंट एंड इमरजेंसी के डॉक्टरों, पुलिसवालों और कुछ दूसरे बदक़िस्मत लोगों को पता है कि गोली लगने पर ख़ून कैसे बलबल करके निकलता है, छुरा जब अँतड़ियाँ बाहर निकाल देता है तो आदमी कैसे हिचकियाँ लेता है. एक विधवा, एक असहाय माँ, एक अनाथ बच्चा...वे अपनी ज़िंदगी में कैसे घिसटते हैं, उसकी फ़िल्में कौन बनाता है, कौन देखता है?

मेरा बेटा पिछले तीन महीने से खिलौना बंदूक यानी गन खरीदने के लिए बेहाल है. गन चाहिए उसे ताकि वह फिश्श फिश्श कर सके, फ़ायर शब्द उसे बताने की ज़रूरत नहीं समझी गई इसलिए उसने ख़ुद ही फिश्श फिश्श गढ़ लिया है. बंदूक न सही, वह चम्मच, पेंसिल या टीवी के रिमोट को गन बनाकर कूद-कूदकर गोलियाँ दाग़ने लगा है.

उसे पुलिसमैन बहुत अच्छे लगते हैं क्योंकि उनके पास गन होती है जिससे वे फिश्श फिश्श कर सकते हैं. वह बड़ा होकर पुलिसमैन बनना चाहता है ताकि वह भी फिश्श फिश्श कर सके. बंदूक के घोड़े के पीछे की ताक़त उसे समझ में आ गई है जबकि उसे कई बुनियादी काम अभी नहीं आते.

टीवी पर हमने उसे बालजगत टाइप कार्यक्रम दिखाना शुरू किया है और हिंदी फ़िल्मों की डोज़ कम से कम कर दी गई है लेकिन बंदूक के प्रति उसका आकर्षण कम नहीं हुआ है. ख़ून-ख़राबा, मार-पीट के सीन देखने पर वह हमारे रटाए हुए जुमले को दोहराता है, 'दैट्स नॉट वेरी नाइस,' लेकिन साढ़े तीन साल का बच्चा भी शक्ति संतुलन समझता है, उसे सिखाने की ज़रूरत नहीं पड़ी कि उसे बंदूक के किस तरफ़ रहना चाहिए, पीछे या सामने.

भारत यात्रा से लौटने के बाद बच्चे को हिंदू परंपरा से अवगत कराने के उद्देश्य से बालगणेश और रामायण की वीडियो सीडी ख़रीदी गई थी. बालगणेश के शुरूआती दस मिनट बीतने से पहले ही शिवजी ने बालगणेश का सिर धड़ से अलग कर दिया...रामायण में भी राम जी तीर से, हनुमान जी गदा से और दूसरे योद्धा तलवार से खून बहाते दिखे...

यानी जिस मुसीबत से बचने की कोशिश कर रहे थे उससे पीछा नहीं छूटा. बताना पड़ा कि पुलिसवाले,गणेशजी, हनुमान जी सिर्फ़ बुरे लोगों को मारते हैं, बात फ़ौरन उसकी समझ में आ गई. उसे खेल-खेल में जिसको भी फिश्श फिश्श करना होता है उसे बुरा आदमी बना लेता है. दुनिया भर में बंदूक के पीछे बैठे जितने लोग ख़ुद को अच्छा आदमी बताते हैं उनका खेल अब समझ में आ रहा है.

हिंसा से मुझे डर लगता है, हिंसा का निशाना बनने की कल्पना से ज्यादा भयावह कुछ नहीं है मेरे लिए, क्योंकि मैं शारीरिक-मानसिक तौर पर हिंसा से निबटने में ख़ुद को अक्षम पाता हूँ, जो ख़ुद को सक्षम पाते हैं वे मूर्ख हैं क्योंकि वे सोचते हैं कि वे दो-तीन लोगों को पीट देंगे, मार देंगे लेकिन हिंसा कितनी बड़ी और कितनी घातक हो सकती है, इसे वे भूल जाते हैं.

हिंसा से हर हाल में डरना चाहिए, बचना चाहिए, वैसे इसके लिए काफ़ी कोशिश करनी पड़ती है, करना या न करना आपकी मर्ज़ी.

मुझे तो बच्चे की बंदूक से भी डर लगता है. सोमालिया, सिएरा लियोन, श्रीलंका, इराक़-फ़लस्तीन और पाकिस्तान के बच्चे आज खिलौना बंदूक से खेल रहे हैं लेकिन उनके लिए एके-47 कोई अप्राप्य खिलौना नहीं है. सामने खड़े साँस लेते आदमी को फिश्श फिश्श कर देना उनके लिए बहुत बड़ी बात नहीं है.

हम अपने बच्चे को स्क्रीन पर हिंसा देखने से रोकना चाहते हैं, उसे बताते हैं कि यह अच्छी बात नहीं है लेकिन जब उन बच्चों का खयाल आता है जिन्होंने टीवी और सिनेमा के स्क्रीन पर नहीं, अपनी ज़िंदगी में ये सब देखा है तो सिर पकड़कर-आँखें मूँदकर सोफ़े पर धम्म से बैठने के अलावा हमसे कुछ और नहीं हो पाता.

09 मार्च, 2008

क्या करें, कहाँ जाएँ, क्या बन जाएँ?

मैं एक भूरा आदमी हूँ. गोरों के देश में कुछ लोग मुझसे नफ़रत करते हैं, मुझे अल क़ायदा वाला समझते हैं, पाकिस्तानी मान लेते हैं, जबकि मैं भारत का हूँ.

किसी ने कहा परदेस जाकर क्यों बसे, अपने देश में रहते तो अच्छा था. कहाँ रहता, आप ही बताइए, बिहारी हूँ, मुंबई जाकर रहूँ कि असम जाऊँ? हिंदू हूँ, कश्मीर चला जाऊँ?

एक संघी संगी कहते हैं हिंदू होना ही भारी समस्या है, मैंने कहा कि बौद्ध होने में बड़ा आराम है लेकिन वो आप बनने नहीं देते.

मुसलमान बनकर शायद अरब दुनिया में अमन-चैन से गुज़ारा हो जाए लेकिन उसके लिए वहीं पैदा होना पड़ेगा वर्ना शेख़ ताउम्र बेगार ही कराते रहेंगे, लेकिन अगर अरब दुनिया में फ़लस्तीन में पैदा हो गए तो?

काला बनने की तो ख़ैर सोच भी नहीं सकते, गोरे भी मारते हैं और भूरे भी.

शायद सबसे अच्छा गोरा बनना है. मिस्टर व्हाइट ने बताया कि मैं मुग़ालते में हूँ, ब्रिटेन और अमरीका की ट्रेवल एडवाइज़री देखी तो समझ में आया कि वे सूडान से लेकर अफ़ग़ानिस्तान तक कहीं सुरक्षित नहीं हैं.

उर्दू में चमड़ी के लिए एक बेहतरीन शब्द है, ज़िल्द. ज़िल्द के रंग से ही लोग किताब का हिसाब कर देते हैं.

लेकिन जैसा आप देख ही रहे हैं मसला सिर्फ़ ज़िल्द का नहीं है, कहीं ज़बान का है, कहीं कुरआन का, कहीं जीसस का, कहीं भगवान का. कहीं कुछ और...

मुंबई में मराठी, गुजरात में गुजराती हिंदू, पाकिस्तान में पंजाबी सुन्नी टाइप जीने के अलावा... अगर दुनिया में कहीं आदमी की तरह जीना हो तो कहाँ जाया जाए, ज़रा मार्गदर्शन करिए.

31 जनवरी, 2008

दुख ने दुख से बात की बिन चिट्ठी बिन तार

गरम-गरम ख़बरों को साफ़-सुथरा करके आगे बढ़ाने में अब हथेलियाँ नहीं जलतीं, सालों हो गए, आदत पड़ गई है. धमाका, धुआँ, लाशें, आँसू, बिलखते बच्चे... सब होते हैं लेकिन वे अब बेचैन नहीं करते.

इराक़, अफ़ग़ानिस्तान और इसराइल की ख़बरों ने नहीं, अफ्रीकी देश आइवरी कोस्ट की एक 'सॉफ्ट' ख़बर मेरे लिए अचानक बहुत 'हार्ड' हो गई है. इस ख़बर में चिपचिपा ख़ून नहीं है, बारूद की गंध नहीं है लेकिन मन परेशान है.

लड़ाइयाँ बार-बार हमें रौंदती हैं. कौन जीता-कौन हारा, किसने किसकी कितनी ज़मीन छीन ली, जहाँ लड़ाई हुई उस जगह का सामरिक महत्व क्या है, किस देश का कूटनीतिक रवैया क्या है, और हाँ, इस सब में कुल कितनी जानें गईं, ये सब हम जान जाते हैं. जो जानना रह जाता है वही हमारे लिए बार-बार लड़ाइयाँ रचता है.

जानना रह जाता है कि कितने आँसू बहे, कितने बच्चे ख़ाली पेट सोए, कितने अरमानों के चिथड़े उड़े, कितनी प्रेम कहानियाँ हवा में तैरती रहीं अतृप्त-विक्षत आत्माओं के साथ. कितने प्रेमपत्र, कितने शोक संदेश जो नहीं पहुँचे अपने पते तक.

आइवरी कोस्ट में यही सब हुआ, कुछ आंकड़े आए जो इराक़-अफ़ग़ानिस्तान के मुक़ाबले फीके थे, ऊपर से एक अफ्रीकी देश जहाँ बनमानुस-हब्शी-नीग्रो रहते हैं. वहीं से एक ख़बर आई है कि पाँच साल बाद वहाँ डाक की छँटाई का काम शुरू हुआ है क्योंकि किसी तरह शांति समझौता हो गया है.

आँखें बंद करिए और सोचिए! पाँच साल की डाक!

डेढ़ दिन से इंटरनेट कनेक्शन दुबई, रियाद और दिल्ली में ठीक नहीं चल रहा है, कितने परेशान हैं हम सब.

जहाँ न फ़ोन है, न नेट, वहाँ की डाक कैसी होगी, उसकी पाँच साल की कुल जमा बेबसी-बेचारगी-बेचैनी को मापने का पैमाना क्या होगा? किसी ने माँ को अपने ठीक-ठाक होने का हाल लिखा होगा जो कुछ दिन-महीनों बाद मारा गया होगा, अम्मा तक न ठीक होने की ख़बर पहुँची, न ही न होने की.

कैसी-कैसी चिट्ठियाँ होंगी, किसी में प्यार का इज़हार होगा, किसी बच्चे के जन्मदिन का निमंत्रण, किसी की टाँगे टूटने, किसी की नौकरी छूटने से लेकर न जाने क्या-क्या...सब बेकार हो चुका है अब तक. कहीं भेजने वाला बारूदी सुरंग की चपेट में आ गया होगा तो कहीं पाने वाला मशीनगन के दायरे में.

बँटी हुई सरहदों, ख़ूनी लड़ाइयों के बीच इंसान का इंसानियत से ही नहीं, इंसानों से भी रिश्ता टूट जाता है. लड़ाइयों का हिसाब करते वक़्त अगर आइवरी कोस्ट की चिट्ठियों का हिसाब नहीं हुआ तो अगली लड़ाइयों के प्रतिकार का कोई ठोस तर्क इंसानियत के पास नहीं होगा.

06 अक्टूबर, 2007

भारत की नैतिकता गई तेल लेने

किसी भी देश की विदेश नीति में कोई नैतिकता नहीं होती, कुछ ज़्यादा नंगे होते हैं, कुछ कम नंगे. नग्नता एक सांस्कृतिक प्रश्न है. अमरीका वाले जितने नंगई कर सकते हैं ब्रितानी उतना नहीं करते, लेकिन हैं सब एक ही थैले के चट्टे-बट्टे.

भारत चट्टा है या बट्टा आप तय कर लीजिए, मगर है तो उसी थैली में.


सबको अगर अपना फ़ायदा देखना है तो नैतिकता कौन देखे?

'मेरे पिया गए रंगून' पर भारत आज भी थिरक रहा है, रीमिक्स के साथ. कितने लोगों को इसका ख़याल है कि बर्मा दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का हमसाया है. वहाँ सैनिक शासक लोकतंत्र की धज्जियाँ उड़ा रहे हैं, इंटरनेट सहित हर संचार माध्यम पर रोक लगाकर, बौद्ध भिक्षुओं के सिर में गोली मारकर.....

भारत चुप है.

संयुक्त राष्ट्र से लेकर चीन तक के बोलने के बावजूद भारत चुप है क्योंकि उसके मुताबिक़ यह बर्मा का आंतरिक मामला है, आंतरिक मामला इसलिए है क्योंकि बर्मा के पास प्राकृतिक गैस का प्रचुर भंडार है जिस पर अमरीका, फ्रांस के अलावा भारत की भी नज़र है. पड़ोसी है इसलिए पाइपलाइन आ सकती है.

पाइपलाइन राष्ट्रहित में है. किसकी नैतिकता कब उसके अपने हित में हुई है?

जब से दुनिया ग्लोबलाइज़ हुई है, भारत सहित सबको समझ में आता है कि अमरीका ही रोल मॉडल है जिसने कंबोडिया, सऊदी अरब, चिली, इराक़ से लेकर बर्मा तक में तानाशाहियों को पाला-पोसा और भरपूर दुहा है. भारत भी उसी राह पर चल रहा है.

नैतिकता की परीक्षा हमेशा लालच के परिप्रेक्ष्य में होती है, भिखारी के कटोरे से उछली चवन्नी वापस दे देना ईमानदारी नहीं है. ईमानदारी नोटों का बंडल लौटाने पर होती है.

अमरीका की विदेश नीति के नैतिकता-निरपेक्ष होने पर भारत के लोगों ने वक़्तन-फवक़्तन शोर मचाया लेकिन अपने देश की विदेश नीति के बारे में उनका रवैया आम अमरीकी से कहाँ अलग है?

क्या यह भी याद दिलाना होगा कि नैतिकता एक उच्च मानवीय आदर्श है जिसकी वजह से दुनिया अब भी कुछ हद तक रहने लायक़ है.

अगर सिर्फ़ फ़ायदा ही देखना है तो 'अल क़ायदा' और 'अल फ़ायदा' में से कौन कम बुरा है, तय करना मुश्किल है.

01 अक्टूबर, 2007

कृषि प्रधान देश की सेवा प्रधान संस्कृति

मैं एक क़स्बाई आदमी हूँ. मेरे शहरी दोस्तों को मुझसे देहाती बू आती है, वे बू के साथ 'बद' उपसर्ग नहीं लगाते मगर 'खुश' भी नहीं. देहाती सहकर्मी भी पूरी तरह नहीं अपनाते क्योंकि उन्हें मुझसे शहरी बू आती है.

मैं शहरियों की बुनावट में छिपी बनावट देखता हूँ, देहातियों की सादगी से उपजी नाकामी की कुंठाएँ भी. मैं कहीं फिट नहीं होता, मगर इसका कोई मलाल नहीं है क्योंकि 'ऑब्ज़र्वर स्टेटस' का मज़ा ही कुछ और है.

भारत के जो भी रस-रूप-गंध-सुर-स्वाद मैंने जाने हैं (बॉलीवुड को छोड़कर) उनकी जड़ें हमारे खेतों में हैं. 'भारत एक कृषि प्रधान देश है,' इस बेहद घिसे हुए वाक्य में नई किताब के अनुसार व्याकरण की एक गंभीर भूल है. 'भारत एक कृषि प्रधान देश था,' या ज्यादा सही वाक्य है--'भारत एक सेवा प्रधान देश है.'

सर्विस सेक्टर के उभार के दौर में जब खेत श्मशान बन रहे हैं तो उनसे उपजी संस्कृति की गत क्या होगी? मैं पूरी निर्ममता के साथ विकासवादियों की बात मान सकता हूँ कि भारत में तेज़ी से विकास हुआ और वह इंडिया बन गया है, मॉल-मल्टीप्लेक्स हैं, फ्लाइओवर हैं, होम डिलिवरी सर्विस है, पित्ज़ा हट है, क्या नहीं है?

डोरहारे नहीं हैं, डफाली नहीं हैं, बहरुपिए नहीं हैं, नट नहीं, मदारी नहीं हैं, चाकू पर सान देने वाले नहीं हैं, सिल पर छेनी से रेखाएँ खींचने वाले नहीं हैं, कलई करने वाले नहीं हैं... जाने दीजिए, इन गंदे-मंदे लोगों के लिए ज्यादा भावुक होने की ज़रूरत नहीं है. टीवी पर एंकर हैं, कॉरपोरेट सेक्टर में एमबीए हैं, बोर्डरूम में सीईओ हैं, मैनेजिंग बोर्ड में स्ट्रेटिजिस्ट हैं, सरकार के पास टेक्नोक्रैट्स हैं...ये पहले तो नहीं थे. संस्कृति कोई ठहरा हुआ तालाब नहीं है, वह तो बहता हुआ दरिया है, परिवर्तन ही स्थायी है.

मेरी आँखों को सामने असंख्य अवसान हुए लेकिन श्राद्ध-तर्पण-तेरहवीं नहीं. जितने नए पैदा हुए उनकी छट्ठी और सोहर के गीत तो बहुत गाए गए लेकिन जो गुज़र गए उनके नाम पर आँसू बहाने का मतलब है विकासविरोधी होने का बिल्ला पहनना. जो कृषि प्रधान समाज में फ़सल कटने के मौसम में दराँती पर सान देते थे, जो होली-दीवाली पर नाप लेकर कपड़े सिलते थे, जो मकर-संक्राति पर तिलकुट बनाते थे, जो हर मेले में सिंदूर-टिकुली बेचते थे वो अब कहाँ हैं, क्या करते हैं? यह सांस्कृतिक सवाल से ज़्यादा एक मानवीय प्रश्न है. लाखों लाख लोग गुमशुदा हैं, जब आप गाज़ियाबाद में रिक्शे पर बैठें तो इन लोगों के बारे में पूछिएगा.

जिन लोगों ने भारत की संस्कृति बनाई, बचाई और चलाई वे कभी मध्यवर्गीय शहरी लोग नहीं रहे. बुनकर मुसलमान थे, चर्मकार दलित, काष्ठकार, ठठेरे, लुहार और ज्यादातर शिल्पकार पिछड़े. गीत-संगीत को चलाए रखने में हरिप्रसाद चौरसिया, बिसमिल्लाह ख़ान से लेकर तीजन बाई, लोकसंगीत में बलेसर यादव जैसों का हाथ ज्यादा रहा, नाम के आगे लगे पंडित या उस्ताद पर मत जाइएगा. गली-गली में रामलीला कौन करता है, होलिका दहन के लिए लकड़ियाँ कौन जुटाता है? ज़रा ग़ौर से देखेंगे तो पता चलेगा कि शहरी मध्य वर्ग हमेशा से एक ही संस्कृति जीता रहा है, उच्च वर्ग में दाख़िल होने की योग्यता हासिल करने का रिहर्सल.

बस बात इतनी है कि देहाती, ग़रीब, अँगरेज़ी शिक्षा से वंचित व्यक्ति इस बुरी तरह से तिरस्कृत-बहिष्कृत,दीन-हीन-मलिन पहले शायद कभी नहीं रहा इसलिए जो उसकी संस्कृति है वह किस तरह बचेगी, क्योंकि सवाल यही है कि उसका तबक़ा किस तरह बचेगा?

'ज़माना बहुत बदल गया है,' यह हर ज़माने का सबसे प्रिय डॉयलॉग रहा है. मगर जाते हुए ज़माने की विदाई इतनी बेरुख़ी से पहले कभी नहीं हुई. किसी ने भर्राए गले से इतना तो कहा होता--जाओ शिकंजी-लस्सी-आमरस तुमने बहुत साथ दिया फ़िलहाल पेप्सी पीने दो, या जाओ मोचीराम तुमने बहुत जूते गाँठें लेकिन अब रीबॉक-एडिडैस-नाइके ही जमते है या जाओ टेलर मास्टर अब तो हम पीटर इंग्लैंड पहनते हैं...इंडिया के इस विकास में कितने लोगों को फोन सुनने का काम मिला और कितनों की आख़िरी पुकार अनसुनी रह गई, यह एक गंभीर बहस का मुद्दा है.

दस-पंद्रह वर्षों में मेलों का देश मॉलों का देश, कारीगरों का देश एसईज़ेड का देश, किसानों का देश कॉलसेंटर का देश बन गया. इस पूरे प्रक्रिया का जो हिस्सा नहीं है, वह कहीं नहीं है. इस प्रक्रिया ने एक झटके में महानगरों की विकासोन्मुख परिधि से बाहर जो कुछ भी है सबको निंदनीय, शर्मनाक और डाउनमार्केट बना दिया.

डाउनमार्केट समाज के खान-पान, तीज-त्योहार, बोली-बचन, गीत-संगीत, रीति-रिवाज़ सब ऐसे हो गए कि उससे किसी तरह का रिश्ता रखना अपमानजनक-सा हो गया है. किसान से किसी तरह का संबंध ग्लोबल हाइट्स से गिराकर कीचड़ में लथेड़ देता है. किसान को व्यवस्थित तरीक़े से मिटाया जा रहा है. खाद और ट्रैक्टर के विज्ञापन के अलावा आपने टीवी पर आख़िरी बार किसान कब देखा है? अगर देखा होगा तो प्रधानमंत्री के दौरे की वजह से विदर्भ का किसान देखा होगा जिसका भाई आत्महत्या कर चुका है.

संस्कृति, वह भी भारतीय संस्कृति के बारे में कुछ भी दावे से कहने की हिम्मत मुझमें नहीं है. मगर इतना तो तर्जुबे से समझ में आता है कि जो हेय, तिरस्कृत, पिछड़ा हो वह 'कल्चर्ड' नहीं होता, उसकी कोई संस्कृति होती होगी लेकिन वह अपनाने लायक़ नहीं होती, सीखने-समझने-सराहने लायक़ नहीं होती. अगर ऐसा नहीं होता तो लोगों को सोमालियाई, भूटानी, लात्वियाई या चिलियन संस्कृति के बारे में कुछ पता होता. संस्कृति सिर्फ़ सफलता की होती है.

देश 'सफलता की राह' पर है इसलिए इंडियन कल्चर पहले से कहीं ज्यादा वाइब्रेंट है क्योंकि वह उन तीस करोड़ लोगों का कल्चर है जो फादर्स डे, मदर्स डे, वेलेन्टाइंस डे, फ्रेंडशिप डे, परंपरागत हर्षोल्लास के साथ मनाते हैं. हैप्पी होली, हैप्पी दीपावली, हैप्पी दशहरा, हैप्पी राखी के एसएमएस और कार्ड भेजते हैं. अगर अगले कुछ वर्षों में भारत में हैलोवीन और थैंक्सगिविंग डे नहीं मनाए गए तो मुझे आश्चर्य अधिक होगा और थोड़ी खुशी भी.

संस्कृति के बारे में कोई वैल्यू जजमेंट कभी नहीं हो सकता, ऐसा नहीं है कि जो कुछ देहाती है वह सब अदभुत और अनुकरणीय है और जो महानगरीय है वह निकृष्ट है. मिलने से पहले फ़ोन करके सुविधा पूछ लेना, सॉरी-थैंक यू, एक्सयूज़ मी बोलना, मुँह खोलकर डकार न लेना, जम्हाई लेते समय मुँह पर हाथ रखना, नाक में ऊंगली न घुसेड़ना, इधर-उधर न खुजाना...ये तो अच्छी बाते हैं. मुद्दे की बात सिर्फ़ इतनी है कि क्या ग्रामीण-खेतिहर परिवेश से आने वाले व्यक्ति को तमाम गुणों के बावजूद वह सम्मान मिलेगा जो उससे कम योग्य-कुशल-ज्ञानी-सक्षम शहरी व्यक्ति को मिलता है.

हमारे समाज में जातिवाद, रुढ़िवादिता, अंधविश्वास कुछ ऐसी चीज़ें हैं जो आधुनिक मानवीय मूल्यों के ख़िलाफ़ हैं और हर तरह से निंदनीय हैं. मगर और भी बहुत है जो इस देश को भारत बनाता है, सबसे जुदा, सबसे ख़ास. हमारी दार्शनिक अदा (भोग के दर्शन के अलावा भी), हमारी श्रृंगारिक रुमानियत (बॉलीवुड के परे भी), आत्मा को छूने वाली वास्तु-मूर्ति-चित्र कला, हृदय को झंकृत करने वाला संगीत, नदियों-पेड़ों-जानवरों को पूजनीय बना लेने वाली हमारी सबके प्रति कृतज्ञता, काटने वाली चींटियों को भी आटा खिलाने वाली सह-अस्तित्व की संस्कृति. यह सब पूरी तरह से ख़तरे में है क्योंकि ये ग्लोबल कल्चर में कहीं फिट नहीं होता.

फिट तो वही होगा जो मशीन के नाप का हो. फैक्ट्री और एसेंबलीलाइन वाले सिस्टम में अलग होना किसी काम नहीं, बहुत बड़ी मुसीबत है. मैकडॉनल्डस पित्ज़ा हट और बर्गर किंग को शेफ की ज़रूरत नहीं होती क्योंकि हर बर्गर एक ही स्पेसिफ़िकेशन का होता है, किसी दिन ज़रा करारा बर्गर माँगकर देखिए.

बहरहाल, मैं कोई अलबेला आदमी नहीं हूँ, रेडीमेड कपड़े पहनता हूँ, कोक-पेप्सी पीता हूँ, देहाती लोग कहीं टकरा जाएँ तो इज़्ज़त से पेश आता हूँ लेकिन गाँव-देहात से कोई सीधा सरोकार नहीं है. मगर मन में एक टीस है, दर्द है, बेचैनी है, भारत के 60 करोड़ से ज्यादा लोगों के बारे में सोचकर दिल दुखता है. उनके बारे में टीवी से नहीं, पत्रिकाओं से नहीं, अख़बारों से नहीं बल्कि उन लोगों से पता चलता है जो नई सेवा प्रधान वर्ण व्यवस्था के शूद्र हैं. ड्राइवर, अपार्टमेंट के सिक्युरिटी गार्ड, सुबह-सुबह बालकनी में अख़बार फेंकने वाले...वे बताते हैं कि गाँव में क्या हो रहा है, वे बताते हैं कि तीन भाई झुग्गी में रहते हैं, माँ-बाप सूखे खेत अगोरते हैं. आपको हो न हो, मुझे तो दुख होता है.

लोगों के मन में कल-कल बहती विकास की इस धारा के प्रति अपार श्रद्धा है लेकिन वह जिन तटबंधों को तोड़ आई है, जिन लोगों को बहा ले गई है उनके प्रति कोई संवेदना नहीं है. यह मेरे दुख को दोहरा कर देता है, ग्लोबलाइज़ेशन के हर सुंदर फल का आस्वादन मैं करता हूँ लेकिन वह मुझे आह्लाद के बदले अवसाद से भर देता है. क्या ये मेरी व्यक्तिगत समस्या है?