29 जनवरी, 2008

बिहार और बिहारी अच्छे लगने लगेंगे...

बिहारी सिर्फ़ वही हैं जो बिहार में रह गए हैं या बिहार से बाहर निकलकर भी ग़रीब हैं या फिर जिनकी बोली चुगली कर देती है, बाक़ी लोगों का बिहारी होना या न होना स्वैच्छिक है. जिन्होंने पद पा लिया है, पैसा कमा लिया है, अँगरेज़ी साध ली है... उन्हें बिहारी कौन बुलाता है? उनसे कहा जाता है, 'तो आप बिहार से हैं.'

बिहारी होना और बिहारी बुलाया जाना दो अलग-अलग बातें हैं. बिहारी कहा जाना भौगोलिक-सांस्कृतिक-भाषायी पहचान से बढ़कर एक सामाजिक-आर्थिक टिप्पणी है. दिल्ली में छत्तीसगढ़ का मज़दूर, बंगाल का कारीगर, उड़ीसा का मूंगफलीवाला, बंदायूँ का गुब्बारेवाला... सब बिहारी हैं. बिहारी होने का फ़ैसला अक्सर व्यक्ति के पहनावे, रोज़गार और हुलिए से होता है, पूछने की ज़रूरत नहीं पड़ती कि व्यक्ति कहाँ का रहने वाला है.

कुछ लोग अपना 'श' दुरुस्त करके, बस और रेल को 'चल रहा है' की जगह यत्नपूर्वक 'चल रही है' कहकर बिहारी बिरादरी से तुरत-फुरत नाम कटाना चाहते हैं (झारखंड बनने से ढेर सारे लोगों को स्वतः आंशिक मुक्ति मिल गई). दुसरी ओर लाखों-लाख लोग ऐसे हैं जो बिहारी न होकर भी बिहारी होने के 'आरोप' को ग़लत नहीं ठहरा सकते, उसके लिए उन्हें अपनी क़िस्मत बदलनी होगी.

बिहार में जन्मे-पले-बढ़े ज्यादातर लोगों पर उनका प्रांत किसी और राज्य के लोगों के मुक़ाबले कुछ ज्यादा ही सवार रहता है. वजह बहुत साफ़ है, बिहारी होने के साथ जिस सामाजिक-आर्थिक कलंक का भाव जुड़ा है उससे कौन पीछा नहीं छुड़ाना चाहेगा? जो किसी वजह से छुड़ा नहीं पाएगा वह ज़रूर झल्लाएगा और यह झल्लाहट कभी बिहारी होने के उदघोष में, कभी दूसरे राज्यों के लोगों की बुराई करने में और कभी बिहार को ही बढ़-चढ़कर कोसने में प्रकट होती है.

जैसे माँ-बाप की हैसियत से तय होता है कि रिश्तेदार उनके बच्चों से कैसा व्यवहार करेंगे उसी तरह राज्यों की आर्थिक हैसियत से तय होता है कि उसके बाशिंदों से दूसरे राज्य के लोग कैसा व्यवहार करेंगे. ग्लोबल स्तर पर यही सिद्धांत लागू होता है. ग़रीब का कुछ भी अनुकरणीय नहीं होता, न उसकी भाषा, न उसका खान-पान. आग में भुनी हुई नाइजीरियाई मछली को देखकर लोग मुँह बिचकाते हैं और जापान की कच्ची मछली वाली सुशी खाते ही लोगों को जापानी सिंपलिसिटी की ब्यूटी समझ में आ जाती है. लोग फ्रेंच सीखते हैं, स्वाहिली नहीं.

बिहार भारत के लिए वैसा ही है जैसा भारत बाक़ी दुनिया के लिए, बड़ी आबादी, पिछड़ापन, जात-पात, क्षेत्रवाद, भ्रष्टाचार वगैरह. मैं जानता हूँ कि जिन्हें भारत पर गर्व है लेकिन बिहार को कलंक मानने का आसान रास्ता अपनाते हैं, उन्हें यह वाक्य पसंद नहीं आएगा. राष्ट्रवाद जैसी अमानवीय और सत्तापोषित अवधारणा का ही विकृत रूप है प्रांतवाद या क्षेत्रवाद, इसकी सबसे बड़ी बुराई यही है कि यह व्यक्ति के ऊपर प्रांत और राष्ट्र को जबरन लाद देती है, जन्म के आधार पर, ठीक जाति की तरह.

बिहारी होना एक लांछन है, यह हर बिहारी जानता है, अलग-अलग लोग इससे अपने-अपने तरीक़े से निबटते हैं. बिहारी होने की अपनी कुंठाएँ भी हैं, हीनभावना भी है. इसका ये मतलब नहीं है कि बिहार के लोग अपनी करनी के लिए जवाबदेह नहीं हैं, उन्हें बिहारी होने के लिए जवाबदेह नहीं ठहराया जा सकता लेकिन बिहार की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक अनीति-कुनीति का जवाब तो उन्हें नागरिक और मतदाता के रुप में देना ही होगा, उसे स्वीकार करना होगा, उसे ठीक करना होगा.

पंजाब की दरियादिली पाँच नदियों की देन और हरित क्रांति की उपज है तो बिहार का संयम और संघर्ष सूखे और सामंतवाद की पैदाइश. सबका अपना इतिहास, भूगोल, समाज, अर्थतंत्र और संस्कृति है और उसे पूर्णता में समझना चाहिए. बिहार की तरह सारे ऐब कमोबेश देश के सारे राज्यों में हैं लेकिन वे उनकी बेहतर आर्थिक स्थिति, कम आबादी वग़ैरह के कारण छिप जाते हैं.

बिहार का संकट सिर्फ़ छवि का नहीं बल्कि एक जटिल संकट है, क्या भारत का संकट पिछले दशक तक जटिल नहीं था. अब लोगों को लगने लगा है कि सारे संकट टल गए हैं और देश प्रगति के स्वर्णिम पथ पर अग्रसर है. इसकी वजह सिर्फ़ मध्यवर्ग का जीवनस्तर सुधरना है जिससे दुनिया में भारत की छवि पर लगा ग्रहण छँटता दिखने लगा है हालांकि वास्तविक समस्याएं अपनी जगह बनी हुई हैं.

बिहार की समस्या भी वैसे ही सुझलेगी और उतनी ही सुलझेगी जैसे भारत की सुलझ रही है. पूंजीनिवेश, उद्योग, बाज़ार और रोज़गार के अवसर उपलब्ध होंगे, मित्तल, जिंदल, अंबानियों को करोड़ों की ख़रीदार आबादी दिखेगी तो छोटे-मोटे सियासी लुच्चों की ज़मीन अपने-आप खिसक जाएगी. करोड़ो की पूंजी का खेल छवि की समस्याएँ दूर कर देगा.यह सब कब और कैसे होगा, देखना काफ़ी दिलचस्प होगा, लेकिन यह होगा ज़रूर.

यह निष्कर्ष भी उतना ही सिंपलिस्टिक है जितना भारत में विकास की अवधारणा. जहाँ से विकास का आइडिया आया है वहीं से एक मिसाल भी लीजिए. अठारहवीं सदी में किसने सोचा था कि अमरीका में मरुस्थल का मारा-हारा बेचारा 'नेवाडा वाला' होना शर्मनाक नहीं रह जाएगा, इज़्ज़त जुआ खिलवाने से भी मिल सकती है. बिहार के लिए विकल्पों की क्या कमी हो सकती है.

जब देश के दूसरे हिस्सों के लोग मोटी तनख्वाह पर कार्पोरेट नौकरी के लिए बिहार जाएँगे तो सच मानिए, बिहार और बिहारी उतने बुरे नहीं लगेंगे. ऐसा होने में जिन्हें शक है क्या उन्होंने सोचा था कि भारत में अंगरेज़ और अमरीकी वर्क परमिट लेकर नौकरी करने आएँगे, उनसे पूछिए भारत और भारतीय कितने अच्छे लग रहे हैं आजकल.

19 जनवरी, 2008

उम्रेदराज़ के चारों दिन कटे

महीने भर की छुट्टी का महीनों से इंतज़ार था. बहुत सारे वादे-इरादे थे, अपनों से और अपने-आप से भी. दस साल से हर बार यही होता है, मंसूबे बनाए जाते हैं, कुछ पूरे होते हैं और ज्यादातर धरे रह जाते हैं.

भारत से जाते हुए हर बार अजब सी कसक होती है, ये सोचकर कि इसी तरह एक दिन दुनिया से चेक-आउट करने का वक़्त आ जाएगा और 'विशलिस्ट' में कई चीज़ों के आगे 'डन' नहीं लिख सकूँगा.

वक़्त की ही तो बात है न, थोड़ा ज़्यादा या कम. एक महीना या एक जीवन. मुझे पता है कि काफ़ी कुछ रह जाएगा, जो कुछ पूरा होगा उसे गिनने कब बैठूँगा. जो रह जाएगा, वही सताएगा.

बड़े-बड़े काम तो हो जाते हैं, करने ही पड़ते हैं. छोटे-छोटे रह जाते हैं जो चैन की नींद के बीच अचानक चुभ जाते हैं.

भोपाल जाकर रम पीने का वादा, किसी के लिए एमपी3 प्लेयर ख़रीदने का इरादा, अम्मा के दाँतों का इलाज...पुरानी दिल्ली के कबाब...एनएसडी में नाटक..पुराना ऑफ़िस, मुंबई-चेन्नई...आई टेस्ट...सब रह गए. बीसियों ऐसी मुलाक़ातें जो नहीं हो सकीं.

ढेर सारी माफ़ियाँ जो फ़ोन पर माँगी गईं, वहाँ भी और यहाँ से भी. तरह-तरह के शिकवे-गिले सुने, कुछ झूठे-कुछ सच्चे. सच्चा वाला--'आपकी राह देखते रहे, आप आए नहीं.' झूठा वाला--'भारत आकर एक फ़ोन तक नहीं किया.'

सारी यात्राएँ ख़त्म हो जाती हैं, इब्न बतूता-मार्को पोलो-कोलंबस-कैप्टन कुक जैसों की यात्राएँ समाप्त हो गईं. पता नहीं उन्हें कितनी बातों का अफ़सोस रह गया होगा, लंबी यात्रा में अधूरी आकांक्षाओं की सूची भी तो लंबी होती होगी. पता नहीं, मेरी यात्रा कितनी लंबी होगी, कितना कुछ पाकर पीछे छोड़ दूँगा, कितना कुछ अधूरा रह जाएगा.

लंदन-दिल्ली-लंदन की 14वीं यात्रा पूरी हुई, बुरी नहीं थी, ज़्यादातर मामलों में बेहतरीन थी. डिब्बाबंद रसगुल्ले, हल्दीराम के नमकीन, ढेर सारी किताबें, सैकड़ों हँसती-मुस्कुराती डिजिटल तस्वीरें, जीवन में हरियाली भर देने वाले केरल के अनुभव, आठ-दस किताबें, नए-नए कपड़े, सीडी-वीसीडी-डीवीडी...सर्दी में अपनत्व की सेंक से भरे दिन, कुछ दोस्तों से मुलाक़ात के सुखद क्षण साथ आए हैं.

जो छूट गए हैं उनसे फिर मिलने का वादा. ढेर सारे नाम हैं जिनसे मिलने के बाद उनके नाम के आगे सही का निशान लगाना है, उसके लिए फिर आना होगा, अतृप्त आत्माएँ दोबारा यूँ ही जन्म लेने की तकलीफ़ नहीं उठातीं.

13 नवंबर, 2007

उदासी के भूरे चुभते कंबल में लिपटे दिन-रात

हरे पेड़ नंगे हो गए हैं, दो महीने पहले तक अधनंगे घूम रहे लोग लबादे लादे डोल रहे हैं. लाल, पीले, गुलाबी फूलों और हरियाली पर धूसर पेंट की बाल्टी उलट दी है किसी ने. यूरोप में सर्दी सांकल खड़का रही है.

सड़क पर डाल से बिछड़े पत्तों का अंबार है जो ठंडी हवा में उड़कर मुँह पर आते हैं, जूतों के नीचे उदास-सी आवाज़ करते हैं. कहीं कोई रंग नहीं, बस मुँह से भाप छोड़ती भूरी-काली आकृतियाँ हैं.

धूप, मूंगफली, गन्ने और रंग-बिरंगे स्वेटर नहीं हैं. दिन भर सूरज की सेंक और शाम को अलाव, सिगड़ी या हीटर...मकर संक्रांति तक की बात है उसके बाद तो सर्दी अपने मामा के घर चली जाती है. यूरोप की सर्दी का कोई मामा नहीं है जहाँ वह चली जाए, वह छह महीने तक बेघर भटकती है.

यूरोप में आसमान पर कंबल तन गया है, सब धुंधला-सा है कंबल के अंदर, सर्द हवा हड्डियाँ छेदती है कंबल के अंदर भी. सारे पुराने चोट-दर्द और घाव याद आते हैं. आँख बहती है, नाक जम जाती है, कान सुन्न हो जाते हैं...पाँचों ज्ञानेंद्रियों को पाला मार जाता है.

ये शुरुआत है जिसे विंटर कहलाने का गौरव हासिल नहीं है, यह पतझड़ है यानी ऑटम. गहरी उदासी का मौसम, सारी ख़ुशियों और उल्लास के स्थगन का मौसम. सर्दियों में फूल नहीं खिलेंगे, अंडों से बच्चे नहीं निकलेंगे, गिलहरी नहीं फुदकेगी, सब इंतज़ार करेंगे कंबल के हटने का, कोहरे के छंटने का. अप्रैल यानी स्प्रिंग तक कठजीव इंसानों के अलावा कुछ भी जीता-जागता नहीं दिखेगा.

इस बर्फ़ानी ठंड का प्रतिकार करने की एक कोशिश होगी क्रिसमस. ब्रांडी, जगमगाती बत्तियाँ और तोहफ़े थोड़ी गर्मी देने की कोशिश करेंगे लेकिन उस आख़िरी कोशिश के बाद सिर्फ़ वसंत की राह देखकर ही दिन-रात काटे जा सकेंगे. काली-डरावनी सर्दी क्रिसमस के जश्न के बाद थककर चूर यूरोप पर घात लगाकर हमला करेगी और कोई बच न पाएगा.

अगले छह महीने यूरोप एक मटमैली ब्लैक एंड व्हाइट फ़िल्म की तरह दिखेगा, लोग ठंड की वजह से वैसे ही चलेंगे जैसी बहुत पुरानी फ़िल्मों में गाँधी जी चलते दिखते हैं. सड़क पर कोई बेवजह एक पल नहीं बिताना चाहेगा, कहीं ऐसी जगह पहुँचने की जल्दी होगी जहाँ ख़ून दोबारा पिघलकर धमनियों में बहने लगे.

सुनहरी धूप वाले मौसम में पार्क, बीच और गार्डन की तरफ़ भागने वाले लोगों को अब गुनगुने घर में लौट आने का सुख महसूस होगा. गर्म पानी, गर्म रज़ाई, गर्म चाय और घर में बसने वालों की उष्मा, इन सबका मोल फिर से समझ में आने लगेगा.

कुछ ही महीने में हम सब कुछ कैसे भूल जाते हैं. लगता है, धूप खिली रहेगी, तितलियाँ उड़ती रहेगी, हम रंग-बिरंगे टी-शर्ट पहनकर यूँ ही फहराते रहेंगे अनंतकाल तक डरावनी सर्दी अब कभी नहीं आएगी. लेकिन हर बार की तरह वह आ रही है, यूरोप भूरा, भयभीत और मलिन-सा होता जा रहा है.

30 अक्टूबर, 2007

पहला नशा, उम्र भर का ख़ुमार

मौसम यही था, बस उमर कुछ और थी. दीवाली से पहले की हल्की ठंड, बारिश की टिपिर-टिपिर से राहत. अच्छी-सी धूप, मीठा-मीठा गन्ना बिकने लगा था.

बारिश में जमी काई धूप से सूखकर झड़ गई और सारे काले-भूरे भुए तितलियाँ बनकर उड़ गए, बरसों बाद हासिल ज्ञान से पता चला कि उस एकरंगे मटमैले फड़फड़ाते जीव को तितली कहलाने का गौरव हासिल नहीं, उसे मॉथ कहते हैं.

ऐसे मौसम में 14 साल की उम्र में छत पर पी गई चाय का मज़ा लंदन के किसी बेहतरीन पब की बियर से बेहतर है, उम्र का अपना नशा होता है जिस पर बियर की बोतल की तरह एल्कोहल का परसेंट नहीं लिखा होता.

उम्र का नशा ईरान-सऊदी अरब और वेटिकन में भी होता है जहाँ ज्यादातर ऐसी चीज़ों की मनाही होती है जो अच्छी लगती हैं. मगर भारत के एक क़स्बे में निम्न मध्यवर्गीय परिवेश में जहाँ आपका परिवार दो-तीन पीढ़ियों से रहता है वहाँ या तो दीदियाँ होती हैं या आप भइया होते हैं.

ऐसे ही एक अच्छे से मुहल्ले में, अच्छे से मौसम में एक अच्छी सी लड़की आई, कहीं बाहर से यानी उसके दीदी होने या मेरे भइया होने का कोई अंदेशा नहीं था.

दसवीं क्लास में पढ़ने वाले लड़के ने उसे बालकनी पर खड़े देखा, ख़ुद को देखते हुए देखा, वह अपनी छत पर गया, दोनों ने एक-दूसरे को देखा, बस देखा, खूब देखा. लड़की तो याद है लेकिन उसका चेहरा नहीं.

लड़के ने पहली बार किसी लड़की को लड़की की तरह देखा और शायद लड़की ने भी जाने-अनजाने ऐसा ही किया, दो-तीन सौ फुट की दूरी से.

उसके बाद ब्रश, चाय, नाश्ता, पढ़ाई सब छत पर. सुबह से लेकर सूरज ढलने तक. आँखों-आँखों में भी नहीं, सब दो आकृतियों में. काफ़ी कुछ इंटरनेट के आभासी रोमांस की तरह, बस कोई चैट या ईमेल नहीं, बाक़ी सब वैसा ही, दूर से कल्पना का प्यार.

अपनी सबसे अच्छी कमीज़ पहनकर, किताबें लिए धूप खिलते ही छत पर पहुँचना, उसका बालकनी में आना, मुझे थोड़ी देर देखना, फिर अचानक चले जाना, वापस आना, सूरज ढलने तक बार-बार.

पंद्रह दिन हो गए, घर में पढ़ाई के प्रति मेरे लगन की तारीफ़ हुई, मुझे मैट्रिक पास करने की चिंता हुई. सीढ़ियों पर आहट होते ही मैं किताबों में खो जाता और वह दूसरी ओर देखने लगती.

अफ़सोस कि उसे 'लड़की' लिखना पड़ रहा है जो बीस दिनों तक मेरे लिए सब कुछ थी और आज भी मैं उसे भूल नहीं सकता, बस नाम नहीं जानता.

दीवाली की अगली सुबह घर के सामने से रिक्शा गुज़रा, क्रिकेट का बल्ला हाथ से छूट गया, गेंद का होश नहीं रहा, वह जा रही थी, रिक्शे पर सूटकेस लदे थे, मतलब साफ़ था, उसने मुझे मुड़कर देखा, मैंने उसे पहली बार इतने क़रीब से देखा.

वह कहाँ से आई थी, पता नहीं, कहाँ जा रही थी, मालूम नहीं. फिर कभी नहीं दिखेगी इसका अहसास था. वह सुंदर थी या नहीं, मालूम नहीं. उसका चेहरा याद नहीं, लेकिन एक आकृति याद है जो मेरे मन पर उम्र ने खींची थी.

मैं बहुत रोया लेकिन सिर्फ़ थोड़ी देर के लिए जब तक भाई ने क्रिकेट खेलने के लिए बुला नहीं लिया.
एक लड़की, जो मेरी ज़िंदगी में न आई थी, न कभी मेरी ज़िंदगी से गई.

19 अक्टूबर, 2007

नवरात्र में शेर और स्कूटर पर सवार माताएँ

नवरात्र चल रहा पुण्यभूमि भारत में. नारी शक्ति की अराधना उत्कर्ष पर है. एक ऐसे देश में जहाँ शाम ढलने के बाद बाहर निकलने में महिलाओं को डर लगता है.

भारत विडंबनाओं और विरोधाभासों का देश है, इसकी सबसे अच्छी मिसाल नवरात्र में देखने को मिलती है जब लोग हाथ जोड़कर माता की प्रतिमा को प्रणाम करते हैं और हाथ खुलते ही पूजा पंडाल की भीड़ का फ़ायदा उठाने में व्यस्त हो जाते हैं.

भारत का कमाल हमेशा से यही रहा है कि संदर्भ, आदर्श, दर्शन, विचार, संस्कार सब भुला दो लेकिन प्रतीकों को कभी मत भुलाओ.

जिस देश की अधिसंख्य जनता नारीशक्ति की इतनी भक्तिभाव से अर्चना करती है उसी देश में कन्या संतान को पैदा होने से पहले ही दोबारा भगवान के पास बैरंग वापस भेज दिया जाता है, 'हमें नहीं चाहिए यह लड़की, कोई गोपाल भेजो, कन्हैया भेजो, ठुमक चलने वाले रामचंद्र भेजो, लक्ष्मी जी को अपने पास ही रखो'.

अदभुत देश है जहाँ 'जय माता की' और 'तेरी माँ की'...एक जैसे उत्साह के साथ उच्चारे जाते हैं. माता का यूनिवर्सल सम्मान भी है, यूनिवर्सल अपमान भी.

नौ दिन तक जगराते होंगे, पूजा होगी, हवन होंगे, मदिरापान-माँसभक्षण तज दिया जाएगा और देवी प्रतिमा की भक्ति होगी, मगर साक्षात नारी के सामने आते ही प्रौढ़ देवीभक्त की आँखें भी वहीं टिक जाएँगी जहाँ पैदा होते ही टिकी थीं.

भारत में पूजा करने का अर्थ यही होता है कि रोज़मर्रा के जीवन से उस देवी-देवता का कोई वास्ता नहीं है, हमारे यहाँ सरस्वती पूजा में वही नौजवान सबसे उत्साह से चंदा उगाहते रहे हैं जिनका विद्यार्जन से कोई रिश्ता नहीं होता.

स्त्रीस्वरूप की पूजा तभी हो सकती है जब वह शेर पर सवार हो, उसके हाथों में तलवार-कृपाण-धनुष-वाण हो या फिर उसे जीते-जी जलाकर सती कर दिया गया हो, दफ़्तर जाने वाली, घर चलाने वाली, बच्चे पालने वाली, मोपेड चलाने वाली औरतें तो बस सीटी सुनने या कुहनी खाने के योग्य हैं.

भक्तिभाव से नवरात्र की पूजा में संलग्न कितने लाख लोग हैं जिन्होंने अपनी पत्नी को पीटा है, अपनी बेटी और बहन को जकड़ा है, अपनी माँ को अपने बाप की जागीर माना है. वे लोग न जाने किस देवी की पूजा कर रहे हैं.

भवानी प्रकृति हैं और शिव पुरूष हैं, यह हिंदू धर्म की आधारभूत अवधारणा है. दोनों बराबर के साझीदार हैं इस सृष्टि को रचने और चलाने में. मगर पुरुष का अहंकार पशुपतिनाथ को पशु बनाए रखता है इसका ध्यान कितने भक्तों को है.

जिस दिन पंडाल में बैठी प्रतिमा का नहीं, दफ़्तर में बैठी साँस लेती औरत का सच्चा सम्मान होगा, जिस दिन शेर पर बैठी दुर्गा को नहीं, साइकिल पर जा रही मोहल्ले की लड़की को भविष्य की गरिमामयी माँ के रूप में देखा जाएगा, उस दिन भारत में नवरात्र के उत्सव में भक्ति के अलावा सार्थकता भी रंग होगा.

फ़िलहाल यह उत्सव है जो नारी शक्ति की आराधना के नाम पर पुरुष मना रहे हैं.

06 अक्टूबर, 2007

भारत की नैतिकता गई तेल लेने

किसी भी देश की विदेश नीति में कोई नैतिकता नहीं होती, कुछ ज़्यादा नंगे होते हैं, कुछ कम नंगे. नग्नता एक सांस्कृतिक प्रश्न है. अमरीका वाले जितने नंगई कर सकते हैं ब्रितानी उतना नहीं करते, लेकिन हैं सब एक ही थैले के चट्टे-बट्टे.

भारत चट्टा है या बट्टा आप तय कर लीजिए, मगर है तो उसी थैली में.


सबको अगर अपना फ़ायदा देखना है तो नैतिकता कौन देखे?

'मेरे पिया गए रंगून' पर भारत आज भी थिरक रहा है, रीमिक्स के साथ. कितने लोगों को इसका ख़याल है कि बर्मा दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का हमसाया है. वहाँ सैनिक शासक लोकतंत्र की धज्जियाँ उड़ा रहे हैं, इंटरनेट सहित हर संचार माध्यम पर रोक लगाकर, बौद्ध भिक्षुओं के सिर में गोली मारकर.....

भारत चुप है.

संयुक्त राष्ट्र से लेकर चीन तक के बोलने के बावजूद भारत चुप है क्योंकि उसके मुताबिक़ यह बर्मा का आंतरिक मामला है, आंतरिक मामला इसलिए है क्योंकि बर्मा के पास प्राकृतिक गैस का प्रचुर भंडार है जिस पर अमरीका, फ्रांस के अलावा भारत की भी नज़र है. पड़ोसी है इसलिए पाइपलाइन आ सकती है.

पाइपलाइन राष्ट्रहित में है. किसकी नैतिकता कब उसके अपने हित में हुई है?

जब से दुनिया ग्लोबलाइज़ हुई है, भारत सहित सबको समझ में आता है कि अमरीका ही रोल मॉडल है जिसने कंबोडिया, सऊदी अरब, चिली, इराक़ से लेकर बर्मा तक में तानाशाहियों को पाला-पोसा और भरपूर दुहा है. भारत भी उसी राह पर चल रहा है.

नैतिकता की परीक्षा हमेशा लालच के परिप्रेक्ष्य में होती है, भिखारी के कटोरे से उछली चवन्नी वापस दे देना ईमानदारी नहीं है. ईमानदारी नोटों का बंडल लौटाने पर होती है.

अमरीका की विदेश नीति के नैतिकता-निरपेक्ष होने पर भारत के लोगों ने वक़्तन-फवक़्तन शोर मचाया लेकिन अपने देश की विदेश नीति के बारे में उनका रवैया आम अमरीकी से कहाँ अलग है?

क्या यह भी याद दिलाना होगा कि नैतिकता एक उच्च मानवीय आदर्श है जिसकी वजह से दुनिया अब भी कुछ हद तक रहने लायक़ है.

अगर सिर्फ़ फ़ायदा ही देखना है तो 'अल क़ायदा' और 'अल फ़ायदा' में से कौन कम बुरा है, तय करना मुश्किल है.

01 अक्टूबर, 2007

कृषि प्रधान देश की सेवा प्रधान संस्कृति

मैं एक क़स्बाई आदमी हूँ. मेरे शहरी दोस्तों को मुझसे देहाती बू आती है, वे बू के साथ 'बद' उपसर्ग नहीं लगाते मगर 'खुश' भी नहीं. देहाती सहकर्मी भी पूरी तरह नहीं अपनाते क्योंकि उन्हें मुझसे शहरी बू आती है.

मैं शहरियों की बुनावट में छिपी बनावट देखता हूँ, देहातियों की सादगी से उपजी नाकामी की कुंठाएँ भी. मैं कहीं फिट नहीं होता, मगर इसका कोई मलाल नहीं है क्योंकि 'ऑब्ज़र्वर स्टेटस' का मज़ा ही कुछ और है.

भारत के जो भी रस-रूप-गंध-सुर-स्वाद मैंने जाने हैं (बॉलीवुड को छोड़कर) उनकी जड़ें हमारे खेतों में हैं. 'भारत एक कृषि प्रधान देश है,' इस बेहद घिसे हुए वाक्य में नई किताब के अनुसार व्याकरण की एक गंभीर भूल है. 'भारत एक कृषि प्रधान देश था,' या ज्यादा सही वाक्य है--'भारत एक सेवा प्रधान देश है.'

सर्विस सेक्टर के उभार के दौर में जब खेत श्मशान बन रहे हैं तो उनसे उपजी संस्कृति की गत क्या होगी? मैं पूरी निर्ममता के साथ विकासवादियों की बात मान सकता हूँ कि भारत में तेज़ी से विकास हुआ और वह इंडिया बन गया है, मॉल-मल्टीप्लेक्स हैं, फ्लाइओवर हैं, होम डिलिवरी सर्विस है, पित्ज़ा हट है, क्या नहीं है?

डोरहारे नहीं हैं, डफाली नहीं हैं, बहरुपिए नहीं हैं, नट नहीं, मदारी नहीं हैं, चाकू पर सान देने वाले नहीं हैं, सिल पर छेनी से रेखाएँ खींचने वाले नहीं हैं, कलई करने वाले नहीं हैं... जाने दीजिए, इन गंदे-मंदे लोगों के लिए ज्यादा भावुक होने की ज़रूरत नहीं है. टीवी पर एंकर हैं, कॉरपोरेट सेक्टर में एमबीए हैं, बोर्डरूम में सीईओ हैं, मैनेजिंग बोर्ड में स्ट्रेटिजिस्ट हैं, सरकार के पास टेक्नोक्रैट्स हैं...ये पहले तो नहीं थे. संस्कृति कोई ठहरा हुआ तालाब नहीं है, वह तो बहता हुआ दरिया है, परिवर्तन ही स्थायी है.

मेरी आँखों को सामने असंख्य अवसान हुए लेकिन श्राद्ध-तर्पण-तेरहवीं नहीं. जितने नए पैदा हुए उनकी छट्ठी और सोहर के गीत तो बहुत गाए गए लेकिन जो गुज़र गए उनके नाम पर आँसू बहाने का मतलब है विकासविरोधी होने का बिल्ला पहनना. जो कृषि प्रधान समाज में फ़सल कटने के मौसम में दराँती पर सान देते थे, जो होली-दीवाली पर नाप लेकर कपड़े सिलते थे, जो मकर-संक्राति पर तिलकुट बनाते थे, जो हर मेले में सिंदूर-टिकुली बेचते थे वो अब कहाँ हैं, क्या करते हैं? यह सांस्कृतिक सवाल से ज़्यादा एक मानवीय प्रश्न है. लाखों लाख लोग गुमशुदा हैं, जब आप गाज़ियाबाद में रिक्शे पर बैठें तो इन लोगों के बारे में पूछिएगा.

जिन लोगों ने भारत की संस्कृति बनाई, बचाई और चलाई वे कभी मध्यवर्गीय शहरी लोग नहीं रहे. बुनकर मुसलमान थे, चर्मकार दलित, काष्ठकार, ठठेरे, लुहार और ज्यादातर शिल्पकार पिछड़े. गीत-संगीत को चलाए रखने में हरिप्रसाद चौरसिया, बिसमिल्लाह ख़ान से लेकर तीजन बाई, लोकसंगीत में बलेसर यादव जैसों का हाथ ज्यादा रहा, नाम के आगे लगे पंडित या उस्ताद पर मत जाइएगा. गली-गली में रामलीला कौन करता है, होलिका दहन के लिए लकड़ियाँ कौन जुटाता है? ज़रा ग़ौर से देखेंगे तो पता चलेगा कि शहरी मध्य वर्ग हमेशा से एक ही संस्कृति जीता रहा है, उच्च वर्ग में दाख़िल होने की योग्यता हासिल करने का रिहर्सल.

बस बात इतनी है कि देहाती, ग़रीब, अँगरेज़ी शिक्षा से वंचित व्यक्ति इस बुरी तरह से तिरस्कृत-बहिष्कृत,दीन-हीन-मलिन पहले शायद कभी नहीं रहा इसलिए जो उसकी संस्कृति है वह किस तरह बचेगी, क्योंकि सवाल यही है कि उसका तबक़ा किस तरह बचेगा?

'ज़माना बहुत बदल गया है,' यह हर ज़माने का सबसे प्रिय डॉयलॉग रहा है. मगर जाते हुए ज़माने की विदाई इतनी बेरुख़ी से पहले कभी नहीं हुई. किसी ने भर्राए गले से इतना तो कहा होता--जाओ शिकंजी-लस्सी-आमरस तुमने बहुत साथ दिया फ़िलहाल पेप्सी पीने दो, या जाओ मोचीराम तुमने बहुत जूते गाँठें लेकिन अब रीबॉक-एडिडैस-नाइके ही जमते है या जाओ टेलर मास्टर अब तो हम पीटर इंग्लैंड पहनते हैं...इंडिया के इस विकास में कितने लोगों को फोन सुनने का काम मिला और कितनों की आख़िरी पुकार अनसुनी रह गई, यह एक गंभीर बहस का मुद्दा है.

दस-पंद्रह वर्षों में मेलों का देश मॉलों का देश, कारीगरों का देश एसईज़ेड का देश, किसानों का देश कॉलसेंटर का देश बन गया. इस पूरे प्रक्रिया का जो हिस्सा नहीं है, वह कहीं नहीं है. इस प्रक्रिया ने एक झटके में महानगरों की विकासोन्मुख परिधि से बाहर जो कुछ भी है सबको निंदनीय, शर्मनाक और डाउनमार्केट बना दिया.

डाउनमार्केट समाज के खान-पान, तीज-त्योहार, बोली-बचन, गीत-संगीत, रीति-रिवाज़ सब ऐसे हो गए कि उससे किसी तरह का रिश्ता रखना अपमानजनक-सा हो गया है. किसान से किसी तरह का संबंध ग्लोबल हाइट्स से गिराकर कीचड़ में लथेड़ देता है. किसान को व्यवस्थित तरीक़े से मिटाया जा रहा है. खाद और ट्रैक्टर के विज्ञापन के अलावा आपने टीवी पर आख़िरी बार किसान कब देखा है? अगर देखा होगा तो प्रधानमंत्री के दौरे की वजह से विदर्भ का किसान देखा होगा जिसका भाई आत्महत्या कर चुका है.

संस्कृति, वह भी भारतीय संस्कृति के बारे में कुछ भी दावे से कहने की हिम्मत मुझमें नहीं है. मगर इतना तो तर्जुबे से समझ में आता है कि जो हेय, तिरस्कृत, पिछड़ा हो वह 'कल्चर्ड' नहीं होता, उसकी कोई संस्कृति होती होगी लेकिन वह अपनाने लायक़ नहीं होती, सीखने-समझने-सराहने लायक़ नहीं होती. अगर ऐसा नहीं होता तो लोगों को सोमालियाई, भूटानी, लात्वियाई या चिलियन संस्कृति के बारे में कुछ पता होता. संस्कृति सिर्फ़ सफलता की होती है.

देश 'सफलता की राह' पर है इसलिए इंडियन कल्चर पहले से कहीं ज्यादा वाइब्रेंट है क्योंकि वह उन तीस करोड़ लोगों का कल्चर है जो फादर्स डे, मदर्स डे, वेलेन्टाइंस डे, फ्रेंडशिप डे, परंपरागत हर्षोल्लास के साथ मनाते हैं. हैप्पी होली, हैप्पी दीपावली, हैप्पी दशहरा, हैप्पी राखी के एसएमएस और कार्ड भेजते हैं. अगर अगले कुछ वर्षों में भारत में हैलोवीन और थैंक्सगिविंग डे नहीं मनाए गए तो मुझे आश्चर्य अधिक होगा और थोड़ी खुशी भी.

संस्कृति के बारे में कोई वैल्यू जजमेंट कभी नहीं हो सकता, ऐसा नहीं है कि जो कुछ देहाती है वह सब अदभुत और अनुकरणीय है और जो महानगरीय है वह निकृष्ट है. मिलने से पहले फ़ोन करके सुविधा पूछ लेना, सॉरी-थैंक यू, एक्सयूज़ मी बोलना, मुँह खोलकर डकार न लेना, जम्हाई लेते समय मुँह पर हाथ रखना, नाक में ऊंगली न घुसेड़ना, इधर-उधर न खुजाना...ये तो अच्छी बाते हैं. मुद्दे की बात सिर्फ़ इतनी है कि क्या ग्रामीण-खेतिहर परिवेश से आने वाले व्यक्ति को तमाम गुणों के बावजूद वह सम्मान मिलेगा जो उससे कम योग्य-कुशल-ज्ञानी-सक्षम शहरी व्यक्ति को मिलता है.

हमारे समाज में जातिवाद, रुढ़िवादिता, अंधविश्वास कुछ ऐसी चीज़ें हैं जो आधुनिक मानवीय मूल्यों के ख़िलाफ़ हैं और हर तरह से निंदनीय हैं. मगर और भी बहुत है जो इस देश को भारत बनाता है, सबसे जुदा, सबसे ख़ास. हमारी दार्शनिक अदा (भोग के दर्शन के अलावा भी), हमारी श्रृंगारिक रुमानियत (बॉलीवुड के परे भी), आत्मा को छूने वाली वास्तु-मूर्ति-चित्र कला, हृदय को झंकृत करने वाला संगीत, नदियों-पेड़ों-जानवरों को पूजनीय बना लेने वाली हमारी सबके प्रति कृतज्ञता, काटने वाली चींटियों को भी आटा खिलाने वाली सह-अस्तित्व की संस्कृति. यह सब पूरी तरह से ख़तरे में है क्योंकि ये ग्लोबल कल्चर में कहीं फिट नहीं होता.

फिट तो वही होगा जो मशीन के नाप का हो. फैक्ट्री और एसेंबलीलाइन वाले सिस्टम में अलग होना किसी काम नहीं, बहुत बड़ी मुसीबत है. मैकडॉनल्डस पित्ज़ा हट और बर्गर किंग को शेफ की ज़रूरत नहीं होती क्योंकि हर बर्गर एक ही स्पेसिफ़िकेशन का होता है, किसी दिन ज़रा करारा बर्गर माँगकर देखिए.

बहरहाल, मैं कोई अलबेला आदमी नहीं हूँ, रेडीमेड कपड़े पहनता हूँ, कोक-पेप्सी पीता हूँ, देहाती लोग कहीं टकरा जाएँ तो इज़्ज़त से पेश आता हूँ लेकिन गाँव-देहात से कोई सीधा सरोकार नहीं है. मगर मन में एक टीस है, दर्द है, बेचैनी है, भारत के 60 करोड़ से ज्यादा लोगों के बारे में सोचकर दिल दुखता है. उनके बारे में टीवी से नहीं, पत्रिकाओं से नहीं, अख़बारों से नहीं बल्कि उन लोगों से पता चलता है जो नई सेवा प्रधान वर्ण व्यवस्था के शूद्र हैं. ड्राइवर, अपार्टमेंट के सिक्युरिटी गार्ड, सुबह-सुबह बालकनी में अख़बार फेंकने वाले...वे बताते हैं कि गाँव में क्या हो रहा है, वे बताते हैं कि तीन भाई झुग्गी में रहते हैं, माँ-बाप सूखे खेत अगोरते हैं. आपको हो न हो, मुझे तो दुख होता है.

लोगों के मन में कल-कल बहती विकास की इस धारा के प्रति अपार श्रद्धा है लेकिन वह जिन तटबंधों को तोड़ आई है, जिन लोगों को बहा ले गई है उनके प्रति कोई संवेदना नहीं है. यह मेरे दुख को दोहरा कर देता है, ग्लोबलाइज़ेशन के हर सुंदर फल का आस्वादन मैं करता हूँ लेकिन वह मुझे आह्लाद के बदले अवसाद से भर देता है. क्या ये मेरी व्यक्तिगत समस्या है?

09 सितंबर, 2007

संस्कृति यानी कल्चर, कल्चर यानी संस्कृति?

अनुवाद तक तो ठीक है, लेकिन अपने देश के संदर्भ में दोनों पर्यायवाची शब्द नहीं हैं. भारत में संस्कृति और कल्चर दोनों के अलग-अलग मतलब हैं क्योंकि भारत और इंडिया अलग-अलग हैं. जिसे भारत की रंग-बिरंगी बहुविध संस्कृति कहते हैं, वह इंडिया का वाइब्रेंट कल्चर नहीं है.

इंडिया के कल्चर का परफ़ेक्ट विजुअल आपको घड़ियों, परफ़्यूमों, सूटकेसों और बाइकों के विज्ञापन में देखने को मिलता है. एक परिवार है जिसमें सब सुंदर से लोग हैं, सब हँसते-मुस्कुराते हैं, रोने पर एक-दूसरे के आँसू पोंछ देते हैं, मोज़ार्ट की धुन पर छिपाकर प्यारा-सा गिफ़्ट देते हैं, कोई बाइक, कोई सूटकेस, कोई चॉकलेट या मारूति की चाभी...ओह ब्यूटीफुल इंडियन कल्चर...कितने विभोर हो जाते हैं हम लोग अपना कल्चर देखकर और प्यार जताने के लिए दुकान की ओर भागते हैं--'ए गिफ़्ट फॉर समवन यू लव'.

पिछली सदी में भारत का एक और स्नैपशॉट यूरोपियों-अमरीकियों ने बनाया था. जादूगरों, हठयोगियों, साँप-भालू-बंदर नचाने वालों का देश. अंधविश्वासी-अशिक्षित लोगों का देश, कौतूहल जगाने वाला देश. सारे स्नैपशॉट, टैगलाइन, पंचलाइन बेचने के लिए बनाए जाते हैं. इंडिया का नया पंचलाइन पिछले दस वर्षों से लिखा जा रहा है, 'फास्टेस्ट ग्रोइंग इकॉनॉमी', 'राइजिंग पावर', 'सुपरपावर इन मेकिंग'..

भारत का स्नैपशॉट तो वही है, इंडिया वाले से ताज़ा पेंट की बू आ रही है.

भारत अब भी गुड़ी पड़वा, घोंघा नवमी, गंगा दशहरा, मकर संक्राति और बैसाखी मनाने वालों का देश है, शादियाँ कुंडलियाँ मिलाकर होती हैं, खरमास में कोई शुभ काम नहीं होता, कुएँ पूजे जाते हैं, तुलसी-बरगद-आँवला की पूजा होती है. गाय लक्ष्मी है, कुत्ता भैरव है, लंगूर हनुमान है, हाथी गणेश हैं, साँप शेषनाग हैं...एक बहुत ही असभ्य क़िस्म का सहअस्तित्व है. आपने लंदन या न्यूयॉर्क की सड़क पर गाय देखी है, कभी पेरिस में बंदर ने आपका बर्गर छीना है?

भारत आस्था का, कृतज्ञता का, सहज विश्वास का देश है जहाँ पानी देने वाली नदी माता है, जहाँ रोग हरने वाली तुलसी पूजनीय है, वहीं गणेश जी दूध पीते हैं, समंदर का पानी मीठा हो जाता है और ज़िंदा मछली निगलने से दमा ठीक होता है...

इंडिया में ग्रोथ, प्रॉस्पेरिटी, स्टाइल और सबसे बढ़कर आर्थिक सत्ता पूजनीय है. इंडिया का क्लचर वहाँ से आता है जहाँ से उसकी प्रेरणा नहीं, बल्कि एस्पीरेशन आता है. बेस्वाद कॉन्टीनेंटल खाना हेल्थी है, बाक़ी सारे उच्चारण ग़लत हों लेकिन शेड्यूल नहीं एस्केड्यूल होता है...

एक ओर मंदिरों-मठों-मज़ारों-आश्रमों का देश है और कॉल सेंटर-बीपीओ-प्रॉसेंगिंग यूनिट-ब्लॉटलिंग प्लांट की कंट्री है.

नो फुल स्टॉप्स इन इंडिया, कंट्री ऑफ़ आयरनीज़, ए मिलियन गॉड्स एंड पैराडॉक्स...अनेकता में एकता, रंगीन गुलदस्ता वगैरह. एक अरब की आबादी, पाँच हज़ार वर्ष पुरानी सभ्यता, ऐसे में कोई निष्कर्ष निकाल कर मुझे अपना गला नहीं फँसाना. मगर मामला सिर्फ़ धर्म, अंधविश्वास, विकास या पच्छिम-परस्ती का नहीं है, घालमेल बहुत गहरा है.

गाँव में ज़मींदारी चलाने वाले दादाजी के दुलारे, अमरीका में पढ़े, सात्विक लेकिन मद्यपायी, विदेशी पत्नी के स्वामी, बच्चों को हिंदी सिखाने में नाकाम लेकिन हर महीने सत्यनारायण कथा कराने वाले लाखों लोग हैं, मल्टीनेशनल कंपनी के दफ़्तर के लिए जाते समय जयगणेश-राधास्वामी-नमो भगवते वासुदेवाय से लेकर झक्कड़ बाबा की जय तक बोलने वाले करोड़ों हैं, बिल्ली रास्ता काटे तो रूक जाते हैं, मंगलवार को हनुमान मंदिर जाते हैं और मन ललचाने पर चिकेन नहीं खाते, शुक्रवार-शनिवार (वीकेंड) को दिन-दिन में संतोषी माता और शनि मंदिर, रात को पब और डिस्को.

यह घालमेल मामूली नहीं है बल्कि हम सबकी ज़िंदगी ही सांस्कृतिक दृष्टि से एक विचित्र पहेली है.

भारत और इंडिया के बीच में अब भी ख़ासा इंटरेक्शन है लेकिन दोनों अलग-अलग ही हैं. भारत की संस्कृति भारत के लोगों के हाथों में हैं. न्यू इंडियावाले हर शुक्रवार को संतोषी माता को भी आर्चीज़ का कार्ड पोस्ट करने से बाज़ नहीं आएँगे और भारत वाले भी बिल क्लिंटन और बिल गेट्स को टीका लगाकर मंगलाचरण गाते रहेंगे.

कल्चर या संस्कृति का मतलब समझाना बड़े-बड़े विद्वानों के बूते के बात नहीं है, लेकिन समाजशास्त्रीय और अकादमिक दृष्टि से थोड़ा ग़लत होने की छूट दी जाए तो सारा सवाल जीवनशैली का है. भारत और इंडिया की जीवनशैली इसलिए अलग है क्योंकि दोनों के जीने का आधार अलग है.

उत्तम खेती, मध्यम बान, अधम चाकरी... का जाप करने वाले जानते हैं कि खेती कितनी उत्तम है,चाकरी के मौज क्या हैं. खेतिहरों की दूसरी-तीसरी पीढ़ी ऐसे बात करती है मानो उनके पुरखे जरायमपेशा हों. तीन-चार पीढ़ी से शहरी रहे लोग भारतीय देश की आबादी में दो-चार फ़ीसदी भी नहीं हैं.

जितनी ते़ज़ी से अपना देश पिछले दस वर्षों में बदला है उतनी तेज़ी से बदलाव के दशक शायद पहले कभी इक्का-दुक्का ही आए होंगे. इस बदलाव ने शहरी मध्यवर्ग को बहुत काफ़ी कुछ मुहैया कराया है लेकिन उसकी क़ीमत भी हमने चुकाई है. अच्छे-बुरे का वैल्यू जजमेंट करने के बदले इरादा यही है कि बदलते भारत की संस्कृति और राइजिंग इंडिया के कल्चर पर एक गहरी नज़र डाली जाए, आप सबकी मदद से.

यह एक प्रस्तावना है, भारत की संस्कृति के ध्वजवाहकों पर अगली बार.इंडियावालों पर उसके बाद...और फिर क़स्बे वालों की बात भी...आप साथ बने रहिए तो सफ़र का मज़ा आएगा.

30 अगस्त, 2007

मन रे तू काहे न धीर धरे

असमंजस, उधेड़बुन, किंकर्तव्यविमूढ़ता, उलझन, सशोपंज, कश्मकश, अंतर्द्वंद्व, डाइलेमा....कितने सारे शब्द हैं एक मनोभाव को प्रकट करने के लिए. शायद इसीलिए कि हम सब अक्सर जीवन के दोराहे, तिराहे या चौराहे पर खड़े सोचते हैं किधर जाएँ.

ये दोराहा, तिराहा और चौराहा भविष्य और वर्तमान का हो सकता है, अतीत का भी. यूँ हो तो क्या हो, यूँ हो रहा है तो क्यों हो रहा है, यूँ हुआ होता क्या होता.

मन का द्वंद्व है जो इस संसार का सारा साहित्य रचता है, यही द्वंद्व है जो हमें पतन और उत्कर्ष के अंनत में जाने से रोकता है, इस संसार के संतुलन में बनाए रखता है. अगर अर्जुन के मन में कोई द्वंद्व नहीं होता तो गीता क्योंकर होती?

मन में सवाल उठते हैं तो द्वंद्व होता है, मन में संवेदना होती है तो द्वंद्व होता है, मन में भावनाएँ होती हैं तो द्वंद्व होता है, हमारी सीमाएँ हैं इसलिए द्वंद्व हैं, समाज-नियम, रीति-रिवाज़, आशा-अपेक्षा है इसलिए द्वंद्व हैं, ज़रूरत-फ़ितरत, अपने-सपने हैं इसलिए द्वंद्व हैं. एक होता है तो दूसरा नहीं हो सकता इसलिए द्वंद्व है, दोनों हो तों भी द्वंद्व है.

द्वंद्व एक अदभुत मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया है, जो हमें पागल होने से बचा लेती है और बहुत बढ़ जाए तो पागल बना देती है. द्वंद्व एक अदभुत खगोलीय प्रक्रिया है जो अपने अपने-अपने दायरे घूमते लोगों की धुरी तय करती है, तरह-तरह के खिंचाव का काउंटर बैलेंस.

द्वंद्व अच्छी चीज़ है या बुरी इसको लेकर मेरे मन में कोई द्वंद्व नहीं है. द्वंद्व अच्छा-बुरा नहीं होता वह हमारे सॉफ़्टवेयर का हिस्सा है. वही हमें बनाता है जो हम होते हैं, कुछ लोग निर्द्वंद्व होते हैं. उन्हें पता होता है कि वो जो कर रहे हैं सब सही कर रहे हैं, जो वो नहीं कर रहे हैं सब ग़लत है. द्वंद्व दुख देता है, लेकिन क्या आपने कोई संवेदनशील व्यक्ति देखा है जो निर्द्वंद्व हो? अगर आप जानते हों तो ज़रूर बताइगा.

27 अगस्त, 2007

जादू का खिलौना है, मिल जाए तो भी सोना है

कई दिनों से रैटल मेरे दिमाग़ में बज रहा है. वैसे तो वह झुनझुना है जिससे खेलना तीन साल के बच्चे को ख़ास शोभा नहीं देता लेकिन मेरे बेटे ने उसे अपने वजूद से जोड़ लिया है जैसे चर्चिल की सिगार, शरलक होम्स का पाइप, करुणानिधि का काला चश्मा, गाँधी जी की छड़ी या प्रभु के हाथों में घूमता सुदर्शन चक्र.

हरी वाली गेंद टॉम है, नारंगी वाली जेरी, दोनों गोल गोल घूमकर तेज़ी से एक दूसरे का पीछा करते हैं. यही कभी चश्मा है, कभी पिस्तौल और कभी मोबाइल फ़ोन. कभी गाना गाते समय यही माइक बन जाता है और कभी कुछ और.

शायद यही मोह की शुरूआत है, यह बहुत चकित और मोहित करने वाला मोह है. टीवी देखने वाले, नर्सरी जाने वाले, बीसियों कार्टून कैरेक्टरों को अपना दोस्त समझने वाले इस बच्चे को इस रैटल से क्या मिलता है? सारे चीनी-जापानी बैटरी वाले खिलौनों, सारे नरम-मुलायम टेडी-डॉगी को छोड़कर उसे रैटल जैसे खट-खट करने वाले प्लास्टिक इस खिलौने से प्यार हो गया है.

सोते समय, खाते समय, रेल में, बस में, बिस्तर पर, यहाँ तक कि नहाते समय और पॉटी में भी रैटल उसके हाथ में रहता है, साधु के चिमटे की तरह. उसका पास होना एक बहुत बड़ा आश्वासन है मानो वह भयानक युद्ध में अचूक अस्त्र हो या विदेश यात्रा में पासपोर्ट. वह उसे आँख से ओझल नहीं होने देता.

दो दिन पहले की बात है, कमोड पर बैठे सुपुत्र के हाथ से छूटकर रैटल सीधा अंदर गिरा जहाँ पहले से छिःछिः तैर रही थी. बहुत डाँट पड़ी, फिर मैंने निर्णय सुनाया कि फ्लश चला दिया जाएगा, रैटल का अंत हो चुका है. वह इस तरह शायद ही कभी रोता है, रोने में शोर मचाना ज़्यादा होता है, लेकिन इस बार उसकी आँखें भरीं थीं और होंठ नीचे लटक गए थे. नैपी बदलते-बदलते प्रैक्टिस तो हो गई है लेकिन कमोड में हाथ डालकर रैटल निकालना फिर भी बड़ी चुनौती थी. आख़िरकार मैंने चुनौती स्वीकार की और रैटल का भरपूर शुद्धिकरण करके उसे उसके मालिक के हवाले किया.

सोकर उठने के बाद पहला सवाल होता है, "ह्वेयर इज़ माइ रैटल?" रैटल की रट तब तक जारी रहती है जब तक प्लास्टिक की दो गेंदों वाली टिकटिकी उसे वापस न मिल जाए. रैटल के बरामद होने में जितनी देरी होती है वैसे-वैसे उसका सुर बदलता है, पहले उसे खोज देने का अनुरोध, फिर झल्लाहट, फिर विवशता, फिर गहरी बेचैनी और आख़िर में रुआँसापन. रैटल मिल जाने पर उसे जैसी खुशी होती है वैसी ख़ुशी अपनी याद्दाश्त में मुझे कभी नहीं हुई. क्या आगे कभी होगी?

घर-गृहस्थी की कई वाजिब चिंताओं पर इस समय रैटल की चिंता भारी है. है तो खिलौना, टूट जाएगा, गुम जाएगा, उसके बाद क्या होगा? यह कोई मामूली चिंता नहीं है. यह रैटल उसे किसी जन्मदिन की पार्टी में तोहफ़े के तौर पर मिला था. हम चाहते हैं कि घर की डुप्लीकेट चाभी तरह एक ऐसा ही रैटल ख़रीदकर रख लें वर्ना अनहोनी हो गई तो बच्चे का दुख भी हमसे देखा नहीं जाएगा. हम किस-किस दुख से उसे बचाने के लिए कब तक ऐसे बैकअप तैयार करेंगे?

कई बार उसने बहुत ग़लत वक़्त पर 'रैटल खोज अभियान' शुरू करने की माँग की है, लेकिन हर बार मैंने उसकी माँग पूरी की है चाहे दफ़्तर के लिए देरी हो रही हो या खाना ठंडा हो रहा हो...क्योंकि रैटल उसके लिए सिर्फ़ एक खिलौना नहीं है, वह अपने रैटल को उतना महत्व ज़रूर देता है जितना मैं अपने दफ़्तर की किसी फ़ाइल को. उसे संभालकर रखता है, उसे किसी को हाथ नहीं लगाने देता और उसे सीने से लगाकर सोता है, इससे ज्यादा प्यार कोई और क्या कर सकता है?

निदा फ़ाज़ली बहुत गहरा शेर है--"दुनिया जिसे कहते हैं, जादू का खिलौना है, मिल जाए तो मिट्टी है, खो जाए तो सोना है". मगर इस गहराई से भी गहरा है बचपन का फ़लसफ़ा जहाँ मिट्टी के खिलौने मिल जाने के बाद भी सोने से ज़्यादा क़ीमती होते हैं. जैसे ही हम उसे सोने का मतलब समझा देंगे यह जादू ख़त्म हो जाएगा.

मुझे अपने बचपन की एक धुंधली-सी याद है जब मैं चार-पाँच साल का रहा होऊँगा, गहरे हरे रंग की प्लास्टिक की चकई (यो-यो) हमारे हाथ आई जिसे धागे से बांधकर ऊपर-नीचे चलाया जाता था, मैं किसी ऊँची जगह पर खड़े होकर उसे नचाता था क्योंकि उसका धागा लंबा था. एक बार उसका धागा बुरी तरह उलझ गया, तब वही मेरे जीवन की सबसे बड़ी उलझन थी. अम्मा ने कहा- "पापा को आने दो", पापा बहुत देर से आए उस दिन. आते ही हमने अपनी माँग रखी, उन्होंने कहा- "चलो सो जाओ, कल सुबह ठीक कर देंगे." सूरज के उगने का, मुर्गे के बोलने का, कुएँ पर बाल्टी के खनकने का, पापा के अलार्म के बजने का इंतज़ार करता रहा, ऐसा इंतज़ार कि पूरी रात आँखों में काट दी. उतनी बेसब्री से सुबह का आसरा कभी नहीं देखा.

कई बार रैटल की रट पर झल्ला जाता हूँ लेकिन जल्दी ही अपनी चकई याद आ जाती है, उसके उलझे धागे याद आते हैं तो मौजूदा उलझनों को कुछ देर के लिए भूल जाता हूँ.

17 अगस्त, 2007

होनहार विरवान के होत चिकने पात

स्थानः षष्ठ 'घ' की कक्षा
वर्षः 1980
समयः प्रात: 9.30
अवसरः नामांकन के बाद पहला दिन

गुरू-शिष्य संवाद
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सरः नाम बोले रे सब अपना-अपना
छात्र एकः अकट राय
सरः पिताजी का नाम?
छात्रः सुराज राय
सरः तुम रे? (दूसरे से)
दूसरा छात्रः विकट राय
सरः बाप का नाम?
दूसरा छात्र- रामराज राय
सर--वाह-वाह, अकट-विकट, सुराज-रामराज, ऐं, भाई है का?
पहला छात्र- हाँ सर जी, चचेरा भाई है
सर--पिताजी का करते हैं
पहला छात्र--दुहते हैं
सर--(दूसरे वाले से) और तुम्हारे?
दूसरा छात्र- जी, चराते हैं


" अउर पानी कउन मिलाता है....हैं हैं हैं हैं... क्लास खुलते ही अहीर से पाला पड़ा... हा हा हा, " क्लास-टीचर चौबे सर तोंद छलका-छलका कर हँसे, उनके साथ हम भी हँसे. सिर्फ़ वो दो लड़के नहीं हँसे जो छठी क्लास में पहली बार अपने ख़ानदान का प्रतिनिधित्व कर रहे थे.

हमारा राजकीय उच्च माध्यमिक बालक विद्यालय विविधताओं से भरा था, सिर्फ़ दुहने-चराने वाले ही नहीं, सवर्ण सरकारी बाबुओं से लेकर इज़्ज़तदार विधवाओं तक के बच्चे वहाँ पढ़ते थे. हमारा स्कूल भविष्य के भारत की सच्ची झाँकी प्रस्तुत करता था. इंडिया उस वक़्त भी था लेकिन उसके अस्तित्व का कोई ठोस आभास हमें नहीं था.

सेंट नाम वाले पास के स्कूलों में भी बच्चे पढ़ते थे जिनके लिए उनके माँ-बाप मोटी फ़ीस भरते थे. हम ये नहीं जानते थे कि उन्हें क्या-क्या आता है लेकिन हम बहुत अच्छी तरह जानते थे कि उन्हें क्या-क्या नहीं आता. मसलन, मार-पीट करने, पेड़ पर चढ़ने, तालाब से मछलियाँ पकड़ने, कीचड़ में फुटबॉल खेलने, ट्रक से उतरती बोरियों में से मूंगफली और इमली निकालने, उल्लू बनाने, गालियाँ बकने और क्लास से भागकर फ़िल्म देखने में हमारी उनसे कोई होड़ नहीं थी, वे क़ाबिलेरहम थे.

इन क़ाबिलेरहम बच्चों ने अपनी हीन भावना को छिपाने के लिए हमें बताया था कि उनके स्कूल में प्रार्थना नहीं, बल्कि प्रेयर होती है. आसमानी कमीज़ और नीले हाफ पैंट वाले मेरे आधे सहपाठी कभी प्रार्थना के समय पर स्कूल ही नहीं आए, जो आए उनमें से अनेक जन-गण-मन की धुन पर सिर्फ़ होंठ हिलाते थे मगर आवाज़ नहीं निकलती थी, ढेर सारे ऐसे भी थे जो जन-गण-मन की धुन पर 'जानेमन जानेमन '... गाते.

जानेमन गाने की वजह पड़ोस की हरियाली थी, आधे से ज़्यादा लड़के सावन के अंधे बने घूमते थे क्योंकि उन्हें बालिका विद्यालय की हरी-हरी पोशाक के सिवा कुछ नज़र नहीं आता. बालक विद्यालय के होनहार पूरे वक़्त रामानारायण कन्या पाठशाला के बारे में बातें करते. कुछ निर्द्वंद्व थे और कुछ के भीतर गहरे द्वंद्व थे, दो ही श्रेणियाँ थीं. कुछ की बहनें वहाँ पढ़ती थीं और कुछ की नहीं. वैसे स्कूल आने-जाने के लिए ज़्यादातर लड़के 'हरियाली वाला रास्ता' ही चुनते थे.

हमारा स्कूल सर्वधर्म समभाव के सिद्धांत के ठीक विपरीत था. अंदर आने का रास्ता एक ही था लेकिन वहाँ से निकलने के रास्ते अनेक थे. घर की तरफ़, बाज़ार की तरफ़, अप्सरा टॉकीज़ की तरफ़, कन्या पाठशाला की तरफ़.... हर ओर जाने के शॉर्टकट स्कूल की बाउंड्रीवाल में मौजूद थे जिनका भरपूर लाभ सभी उठाते थे.

हमारा अपने समाज में घुलना-मिलना और उससे जीवन जीने का ढंग सीखना हमारे कई शिक्षकों को नहीं भाता था. लंचब्रेक के बाद बड़ी तादाद में आसमानी कमीज़ और नीली हाफ़पैंटें अलग-अलग शॉर्टकटों से निकलकर शहर में तैरने लगती थीं. इसे रोकने की नाकाम कोशिश में हमारे कुछ विध्नसंतोषी शिक्षकों ने लंच के बाद भी हाज़िरी का प्रावधान शुरू किया, जो ग़ायब पाया गया उसे जुर्माने के तौर पर अठन्नी भरनी पड़ेगी.

डार्विन के सिद्धांत को सच साबित करते हुए लड़के हमेशा मास्टरों से एक क़दम आगे चलते. जिन्होंने नून शो की योजना बनाई होती वे सुबह की हाज़िरी के बाद ही क्लास रूम का रुख़ करते या वहाँ बैठकर भी चुप रहते. कई बार ऐसा होता कि क्लास में चालीस लड़के हैं और टीचर ने सिर्फ़ तीस नामों के आगे निशान लगाया, फिर गिनती की और झल्लाकर बोले, " यस सर बोलने में नानी मरती है?" लड़कों ने मन ही मन कहा, "अठन्नी लगती है."

दूसरा परिणाम ये हुआ कि लंच के बाद की हाज़िरी के समय कई लड़के बेहतरीन मिमिकरी आर्टिस्ट बन जाते और मास्साब निशान तीस नामों के आगे लगा देते. जब गिनती करते तो पता चलता कि दोस्ती का फ़र्ज़ निभाने लिए फ़र्ज़ी हाज़िरी यानी प्रॉक्सी हो रही है, आख़िर सबको अपनी अठन्नी बचानी थी. मगर कई बार किसी दोस्त की अठन्नी बचाने के लिए बेंत खानी पड़ती लेकिन वह लेन-देन का सौदा था.

लेन में सर का सोंटा तो देन में फिलिम की कहानी. "एक ग़रीब लड़का बना है जीतेंद्र और अमीर लड़की है रेखा"....टाइप कहानी सुनकर हमारे कई साथी बेंत की मार को सार्थक मान लेते. तीन सिनेमाघर स्कूल से सौ क़दम की दूरी पर थे, लंच के बाद भागकर फिलिम देखने का फ़ायदा ये था कि ठीक स्कूल की छुट्टी के समय बेचारा बच्चा थका-हारा घर पहुँच जाता.

स्कूल से भागकर फिलिम देखने के अलावा कई ऐसे काम राजकीय बालक उच्च विद्यालय के बालकों ने किए हैं जिनसे पता चलता है कि वे अपने वक़्त से आगे चल रहे थे. इसकी बड़ी रेंज थी, नज़र बचाकर सिगरेट पीने, टेक्स्टबुक के बीच में फँसाकर पीली किताब पढ़ने से लेकर चक्कू-कट्टा लेकर आने तक. अपने गिजर-गुर्दे के हिसाब जितना बन पड़ा उतना मैंने किया, लेकिन मैं किसी मामले में ऐसा नहीं रहा कि कोई मुझ पर ग़ौर करे, न पढ़ने में और न ही इन एक्स्ट्रा करिकुलर कामों में.

हाँ गवाह ज़रूर रहा बहुत सारे दिलचस्प वाक़यों का, जिन्हें कलमबंद करने की सलाहियत उन्हें अंज़ाम देने वालों में नहीं रही इसलिए यह भार मेरे कंधों पर आ पड़ा. एक छोटी सी मिसाल, प्रिसिंपल सर के कमरे में बम का ज़ोरदार धमाका, मास्टरों की मीटिंग के दौरान.

वाक़या कुछ यूँ है कि बम विस्फोट के दो दिन पहले हमारे मार्गदर्शक अज्जू भइया की कारसेवा प्रिसिंपल सर ने अपने कर कमलों से की थी क्योंकि वे नौवीं की गणित की क्लास में ट्रांजिस्टर सुनकर क्रिकेट के स्कोर का हिसाब लगाते पकड़े गए थे. अज्जू भइया अपना खोया हुआ आत्मसम्मान और गौरव पाना चाहते थे और प्रेरणा शायद उन्हें भगत सिंह से मिली थी. लेकिन उन्होंने भगत सिंह की तरह बम फोड़ने के बाद आत्मसमर्पण करने की जगह स्क्रिप्ट में थोड़ा बदलाव किया.

अज्जू भइया ने आत्मसमर्पण पहले किया. प्रिसिंपल सर के कमरे में बाअदब गए, क्लास में कमेंटरी सुनने के लिए माफ़ी माँगी. देवी सरस्वती की मूर्ति को झुककर प्रणाम किया, सर के पैर छुए और बाहर आ गए. कोई सात मिनट बाद प्रिसिंपल सर के ऊँची सीलिंग वाले विशाल कमरे में ज़ोरदार धमाका हुआ, ऐन उसी वक़्त जब वे बाकी टीचरों को समझा रहे थे कि उनकी कारसेवा की बदौलत एक बिगड़ैल लड़का सुधर गया. मैं गवाह हूँ कि अज्जू भइया 'सरस्वती वंदना' के बहाने जलती हुई अगरबत्ती के आख़िरी सिरे पर बाज़ार में उपलब्ध सबसे बड़ा 'आलू बम' रख आए थे.

ऐसा नहीं था कि हमारा स्कूल अज्जू भइया जैसे स्वाधीनता के सेनानियों का गढ़ था, दीपू भइया जैसे भी थे जो बोर्ड परीक्षा में स्टेट भर में थर्ड आए थे. हम आधा तीतर आधा बटेर होकर रह गए क्योंकि दोनों को हमने प्रेरणास्रोत बना लिया इसलिए कहीं के नहीं रहे, अनामदास बन गए.

अज्जू भइया की अब शादी हो गई है तीन बच्चे हैं. उनके रोबदाब का इतना सिला मिला कि कचहरी चौक पर उनकी चाय की दुकान है जिसका किराया नहीं देना पड़ता और दीपू भइया आईएएस बनना चाहते थे लेकिन एलायड सर्विस में रेलवे में हैं.

13 अगस्त, 2007

बलिहारी गुरू आपकी, कोर्स कम्प्लीट दियो कराए

जब पढ़ाई की महत्ता समझ में आई उससे काफ़ी पहले गुरुओं का पढ़ाने से मोहभंग हो चुका था. वे उतनी ही रुचि से पढ़ाते थे जितनी रुचि से खादी ग्रामोद्योग भंडार का सेल्समैन कपड़े दिखाता है.

वर्षों के अनुभव से हमारे सारे शिक्षक जान गए थे कि जिसे पढ़ना होगा अपने-आप पढ़ लेगा, जिसे नहीं पढ़ना है वह कितना भी पढ़ाने पर नहीं पढ़ेगा. विद्यार्थियों के माँ-बाप और शिक्षकों में वैचारिक समानता थी--पढ़ना होगा तो हर हाल में पढ़ लेगा. बलभद्र पांडे सर मानो सबकी भावनाओं को स्वर देते थे--पढ़त सो भी मरतन, ना पढ़तन सो भी मरतन, तो दाँत खटाखट काहे को करतन...यह उनका व्यंग्य था शायद लेकिन सब कुछ इतना बड़ा व्यंग्य था कि यही सबसे बड़ा सच लगता था. छठी क्लास से वैराग्य का पाठ जीवन में आगे बड़ा काम आया.

इतिहास, भूगोल, हिंदी, अँगरेज़ी, समाजशास्त्र कुछ ऐसे विषय थे जिनकी पढ़ाई का मतलब था कि सब किताब खोल लें, जैसे ही पैराग्राफ़ ख़त्म हो बोल-बोलकर पढ़ने वाला छात्र बदल जाए, इस तरह पाठ समाप्त हो जाता था और जल्दी ही 'कोर्स कम्प्लीट'. विज्ञान और गणित जैसे विषयों में ब्लैकबोर्ड
साइन-कॉस-बीटा-थीटा के रहस्यों से भर जाता, फिर मास्साब कहते, कुछ न समझ आया हो तो पूछ लो. आठवीं क्लास के किसी लड़के ने कभी नहीं पूछा कि ग्रीस के पाइथोगोरस के नियम का हमें क्या करना, छठी कक्षा में किसी ने नहीं पूछा कि बंदर खंभे पर चढ़कर-फिसलकर-चढ़कर आख़िरकार कितनी देर में ऊपर पहुँचेगा या नहीं पहुँचेगा इससे हमें क्या लेना-देना. बंदर है, नहीं मन करेगा तो बीच में ही कूद जाएगा. ऐसी बात किसी छात्र ने नहीं पूछी और 'कोर्स कम्प्लीट' मान लिया गया.

सातवीं में एक विषय था जिसका 'कोर्स कम्प्लीट' घोषित नहीं किया जा सका क्योंकि उसकी कोई क्लास ही नहीं लगी थी, पता नहीं ऐसा कैसे हुआ लेकिन बहुत देर से पता चला कि "अरे, भूगोल तो रह ही गया." रघुवर प्रसाद सिंह शर्मा 'निष्कलंक' ने उस दिन पान के बीड़े के बदले एक दिन में भूगोल का
'कोर्स कम्प्लीट' कराने का बीड़ा उठाया. 'निष्कलंक' सर के कलंकों के बारे में हम छात्रों को ज्यादा पता नहीं था, उनका चोला-बाना कवियों वाला था और तीन जातिसूचक नामों के साथ एक अदद उपनाम भी था. जब बीसियों साल में एक बार विद्यालय पत्रिका का प्रकाशन हुआ था तो उन्होंने संपादक का
पद सुशोभित किया था, हम इतना ही जानते थे.

जब उन्होंने अचानक हमारे क्लास को सुशोभित किया तो हम सब चकरा गए. पान की पीक निगलकर, आँख बंद करके उन्होंने कहा, "बच्चों, भूगोल दुनिया का सबसे आसान विषय है क्योंकि यह भू- गोल है इसलिए हम चाहे कहीं से भी चलना शुरू करें, वहीं पहुँच जाएँगे. यह इसलिए भी आसान है क्योंकि हम इसी भू पर रहते हैं इसलिए सब कुछ जानना कोई कठिन बात नहीं है. इस धरती पर पहाड़, झील, झरने, जंगल हैं और सात समंदर हैं, सैकड़ों देश हैं... भारत के उत्तर में हिमालय है और दक्षिण में समुंदर... सबसे घने जगल असम और मध्य प्रदेश में हैं...आदि आदि...कोर्स कम्पलीट."

निष्कलंक सर के बारे में एक ही बात विचित्र लगती थी कि वे पान वाले की दुकान से पान के पत्ते का पेस्ट मँगवाते थे. सखुए के पत्ते में लिपटा हरे रंग का गीला गोला, इसे निगलने के बाद वे सुपारी-चूना-कत्था-ज़र्दा वाला पान भी खाते थे, यही बात हमारी समझ में नहीं आती थी. पान खाने से पहले पान की चटनी क्यों खाए कोई? कई साल बाद एक देहाती दोस्त ने बताया कि "अबे मूरख, ई तो बाबूजी भी खाते हैं, इसको भाँग कहते हैं." अब समझ में आता है कि किस तरह सर ने आँखें बंद करके सात समंदर, हिमालय और सैकड़ों देश आधे घंटे में लाँघ दिए थे. वे पूरी तरह आश्वस्त थे कि उन्होंने भूगोल का कोर्स अच्छी तरह कम्प्लीट करा दिया था.

इसी तरह विज्ञान का कोर्स कम्प्लीट कराने की ज़िम्मेदारी भोगेंद्र झा सर के ऊपर थी. वे सबसे पहले पता लगाते थे कि किसका बाप क्या करता है, इस सूचना का बहुत ही विज्ञान सम्मत प्रयोग भी करते थे. जिन्हें लगता था कि कोर्स कम्प्लीट नहीं हुआ है वे उनसे ट्यूशन भी पढ़ते थे. मेरा सहपाठी रामेंद्र
राय साइकिल पर एक झोला लटकाए चला जा रहा था, हमने पूछ लिया कि कहाँ जा रहे हो? उसने बताया, "फादर मिलिटरी में हैं न, इसलिए सर ने कैंटीन से रम मँगवाया है." मैं उसके साथ सर के दर्शनार्थ हो लिया. भोंगेद्र सर ने सफ़ाई दी कि भोग वे नहीं लगाएँगे. बोले, "घर में कोई-कोई मेहमान आता-जाता है ने, तो हम्मै खरीदने जाएं, अच्छा नै लगता है नै, हें हें हें..." उनके घर मनीप्लांट बहुत लहलहा रहा था, चलते-चलते हमने देखा काँच के गोल-गोल मटकों में उनकी जड़ें डूबी हैं. किताब में पढ़ा था कि इसी को बीकर कहते हैं.

हमारा स्कूल कहने भर को हिंदी मीडियम था, लेकिन असल में स्कूल की पढ़ाई अनेक भाषाओं में होती थी. मसलन, भोजपुरी, मगही, मैथिल, अंगिका... छपरा के चौबे सर हिंदी पढ़ाते थे. पूछते थे, "ताई कहानी का मूख पात्र का नाम बताओ बउआ." नहीं बताने पर उनकी प्रिय सज़ा थी पेट की चमड़ी खींचना या ज़्यादा नाराज़ हों तो दुखहरन गोंसाईं का प्रसाद. लेकिन सज़ा देने से पहले वे ज़रूर पूछते थे, "घर कहवाँ बा बउआ..." आरा, छपरा, सिवान, गोपालगंज, सासाराम जैसा जवाब मिला तो हल्के से गाल खींचते थे, अगर पटना, गया, जहानाबाद हुआ तो पेट की चमड़ी खींची जाती और अगर मिथिलांचल का कोई ज़िला हुआ तो दुखहरन गोंसाईं काम आते. दुखहरन गोंसाई उनकी प्रिय बेंत का नाम था.

कुछ शिक्षक थे जो मारते नहीं थे लेकिन धमकियाँ एक से एक बढ़कर देते थे. बुद्धिनाथ सर कन्या विद्यालय से ट्रांसफर होकर आए थे, तबीयत से मुलायम थे, लड़कों को पढ़ाते-पढ़ाते आदतन पूछते थे, "समझ गई न रे." नाराज़ होने पर कहते, "अतना न मारबउ के बाप नै चिन्हतो." बंगाली मोशाय
दास सर कहते थे, "बोदमाश, बोरा, बंडल शोब, कोबाड़ी में किलो के भाव बेचके तोमारा बाप को पाँच टाका देगा तो वो भी खुब खुश होगा कि कूछ तो मीला." सबसे दुबले-पतले मोहंती सर हमेशा नाराज़गी में दाँत किटकिटाते थे, कहते थे, "येहाँ हार्टअटैक होगा मेरा, मोरेगा सिर खपाके लेकिन तूम बूझेगा नेई." ऐसा लगता उन्हें सचमुच हार्ट अटैक आने वाला है.

हमारे ज़्यादातर टीचर बहुत अच्छे भविष्यवक्ता थे, वे क्लास में बता देते थे कि कौन लड़का नींबू बेचेगा, कौन भीख माँगेगा, कौन जेबकतरा बनेगा. मोटे चश्मे वाले, काले, ठिगने श्यामा सर भी वर्षों से छात्रों का भविष्य बता रहे थे, रिटायरमेंट के करीब पहुँच रहे थे. एक दिन स्कूल ख़त्म होने के बाद घर जाने से पहले सब्ज़ी ख़रीदने के लिए रुके. नींबू रुपए के चार या छह, इस पर दुकानदार से उलझ पड़े. दुकानदार ने बहुत विनम्रता से कहा, "सर, हम जो भी हैं आपकी ही की बदौलत हैं, चार-छह की क्या बात है, आप आठ नींबू ले लीजिए, आप तो आठ साल पहले बता दिये थे कि हम नींबू बेचेंगे."

'कैम्पस सब कागद करो, गुरू महिमा बरनि न जाई.' यहाँ सिर्फ़ तीन-चार का ज़िक्र हुआ, कुल 33 थे. तीन-चार को छोड़कर यहाँ सब क़ाबिले ज़िक्र हैं लेकिन लग रहा है कि हम ही कौन से दूध के धुले थे, वे भी तो बेचारे हमारे जैसे छात्रों के बनाए हुए शिक्षक थे. हमारे अपने कारनामे अगली बार... अगर आप पढ़ना चाहें.

11 अगस्त, 2007

विद्या धन उद्यम बिना कहो जो पावे कौन

मेरे स्कूल का नाम ही पर्याप्त प्रेरणादायी था--राजकीय उच्च माध्यमिक बालक विद्यालय. सरकारी स्कूल होने की वजह से फ़ीस का कोई सवाल नहीं था, सबके लिए शिक्षा सुलभ थी. भारत में 'सुलभ' शब्द के साथ जैसी छवि उभरती है वैसा ही हमारा विद्यालय था.

वह जीवन की सच्ची पाठशाला थी, कोई किताबी स्कूल नहीं था. आदर्श, नीति, नियम आदि बनाए थे बेचारे मास्टरों ने, लेकिन बच्चे सीखते थे कई एकड़ फैले मैदान में चलने वाले प्रैक्टिकल क्लासों में.

प्रैक्टिकल के टीचरों में मुख्य थे 'संजै भइया' जिनका बड़ा सम्मान था, स्कूल के कैम्पस के बाहर भी उनकी धाक बताई जाती थी. उनके चलने में गजब का बांकपन था और उनके चक्कू चलाने के फ़न के बारे कई तरह के क़िस्से मशहूर थे लेकिन निष्पक्ष सूत्रों से उनकी पुष्टि नहीं हो सकी थी, वे अक्सर स्कूल के परिसर में छींटदार कमीज़ पहनकर आते थे और नौंवी-दसवीं के कुछ महत्वाकांक्षी लड़के उनके चारों तरफ़ मँडराने लगते थे.

बरगद के पेड़ के नीचे उनकी क्लास लगती थी, लड़के दौड़-दौड़कर पान-सिगरेट लाते थे संजै भइया के लिए. संजै भइया बोली बचन से ज्यादा पढ़े-लिखे नहीं लगते थे लेकिन उनका स्टाइल अनुकरणीय था. यह शायद उनकी ज्ञानपिपासा ही थी जो नौकरी की उम्र में भी उन्हें स्कूल के परिसर में खींच लाती थी. लड़के अक्सर उनके कान में फुसफुसाते कि आज मनोजवा चक्कू खोंस के आया है या आज पंकजवा कट्टा लाया है, संजै भइया धीरे से मुस्कुराते.

लंचटाइम में प्यार से दो लप्पड़ लगाके लड़के का निशस्त्रीकरण कर देते, उनके पास ज़खीरा जमा होता जाता, क्या पता आगे बेच देते थे या सिर्फ़ परोपकारवश लड़कों को बिगड़ने से बचाने के लिए ऐसा करते थे. वे अक्सर उसी तोड़े हुए बाउंड्रीवाल से स्कूल में दाख़िल होते थे जहाँ से ढेर सारे लड़के लंच के बाद फिलिम देखने भाग जाते थे. हमारा स्कूल प्रधान डाकघर, तीन सिनेमाघरों, टेलीफ़ोन एक्सचेंज, मेन रोड, कोतवाली थाने और मारवाड़ी मुहल्ले से घिरा था, यह एक निहायत दिलचस्प सराउंडिंग थी.

प्रैक्टिकल की दूसरी टीचर थीं 'लंगड़ी मैडम'. उनकी क्लास में बच्चे दूर से ही और अंदाज़े से शामिल होते थे, ये वाली मैडम रंग-बिरंगी साड़ी पहनती थीं, पान खाती थीं और पूरे स्कूल परिसर में प्रिसिंपल से भी ज्यादा रोब से घूमती थीं. स्कूल के मैदान के झाड़ी वाले कोने उन्हें ख़ास पसंद थे, वे अक्सर या तो तड़के दिखाई देती थीं या देर शाम को. मॉर्निंग क्लास के लिए जाते समय हमें पता होता था उनकी नाइट क्लास खत्म हो गई है, वे स्कूल के हैंडपंप पर हाथ-मुँह धोती थीं और उनका छात्र हरी घास पर, पेड़ के नीचे खर्राटे ले रहा होता.

स्कूल के कुछ अध्यापकों ने उनके अनधिकृत पाठ्यक्रम को स्कूल से बाहर ऱखने की कोशिश की लेकिन ऐसा नहीं हो सका. इसलिए कि वे अक्सर कोतवाली वाली दीवार की तरफ़ से सुबह स्कूल के हैंडपंप की तरफ़ जाती देखी जाती थीं, जैसे संजै भइया सिनेमाहाल वाली साइड से आते थे. संस्कृत के हमारे अति संस्कारवान अध्यापक श्रीनारायण मिश्र के सरकारी आवास के पास ही लंगड़ी मैडम का एकड़ों में फैला फार्महाउस था.

तीसरे मास्टर 'तीन पत्ती वाले सर' थे. वे सुविधा, मौसम और माहौल के मुताबिक़ कभी स्कूल के अंदर और कभी ऐन बाहर अपनी क्लास लगाते थे. वे कभी कैरम के तीन स्ट्राइकरों में से दो पर स्टिकर चिपका कर या फिर कभी ताश के पत्तों से प्रशिक्षण देते थे. वे बहुत तेज़ी से पत्ती या स्ट्राइकर घुमाते थे, ताश या स्ट्राइकर को इज़्ज़त बख़्शने के लिए वे लाल रूमाल जरूर बिछाते थे. शुरू में कोतवाली के तोंदवाले प्राणियों ने हमारे इस शिक्षक के साथ अपमानजनक बर्ताव किया लेकिन बाद में क्लास निर्बाध रूप से चलने लगी, प्राथमिक शिक्षा के महत्व को समझते हुए उनका सम्मान शुरू हो गया था.

इनके अलावा हमारे कुछ 'विजिटिंग प्रैक्टिकल टीचर' थे जो स्कूल की टूटी दीवार के पार कोतवाली में आते थे, हम दीवार में बनी फाँक से होकर ज्ञान अर्जन के लिए कभी-कभी उनके पास चले जाते थे. इनकी क्लास की दिलचस्प बात ये थी कि इसमें आप मर्ज़ी से आते और जाते थे, टीचर का कोई कंट्रोल नहीं था. इनमें से एक सर ने मुझे बताया था कि "बेटा, किसी से डरना मत, डरने वाले को सब डराते हैं. अगर नहीं डरोगे तो काम सही करो या ग़लत, सब ठीक रहेगा." ये सीख मैं कभी नहीं भूल पाया, न ही कभी ग़लत साबित हुई.

मेरे जीवन में जो कुछ छोटे-मोटे अपराध बोध हैं उनमें से एक ऐसे ही शिक्षक के साथ किए विश्वासघात को लेकर है. अच्छा बच्चा बनने के दबाव में किसी बड़े अपराध बोध की लज़्ज़त अपने हिस्से में नहीं आई. हुआ यूँ कि हम दो साथी दीवार फाँद कर नए 'विजिटिंग प्रैक्टिकल टीचर' से मिलने की उत्सुकता में अंदर गए. थानेदार साहब के मुंशी जी हमेशा की तरह बुड़बुड़ाए थे, "पढ़ना-लिखना साढ़े बाइस.. फेन आ गया इस्कुलिया छौंडा सब..." थोड़ी इधर-उधर की बातचीत के बाद रात भर हुई सेवा के परिणामस्वरूप चेहरे पर आई सूजन की जगह नरमी लाते हुए उन्होंने पाँच का नोट दिया, "बेटा, एक पैकेट नंबरटेन ला दो." हमने एक बेबस आदमी के पैसे से पहले फ़िल्म देखी जिसका नाम था 'कालिया' और मूंगफली खाई. बताइए अपराध बोध होना चाहिए कि नहीं?

जैसा कि बेहतरीन शिक्षण संस्थानों में होता है, सीनियर छात्र भी जूनियर छात्रों को पढ़ाते हैं. ऐसे कई प्रैक्टिकल टीचर भी थे, अजै भइया, विजै भइया और दिप्पु भइया इनमें प्रमुख थे. इन्हीं के एक्स्ट्रा करिकुलर एक्टिविटी की क्लासों में अनेकानेक बालकों ने अपनी पहली सिगरेट पी, पहली पीली किताब पढ़ी और पहली बार हरे रंग के सलवार सूट वाली बालिका विद्यालय की लड़कियों को चिट्ठी पकड़ाई.

ये तो बात हुई हमारे अवैतनिक प्रैक्टिकल टीचरों की, वेतनभोगी पूर्णकालिक सैद्धांतिक टीचरों की चर्चा अगले अंक में. अगर आप पढ़ना चाहें तो कुछ सहपाठियों के बारे में उसके बाद...

06 अगस्त, 2007

हमारी अपनी ज़बान की साठवीं बरसी

हमारी हिंदी, जिसे हम इतना प्यार करते हैं अपंग है, वह जन्म से विकलांग नहीं थी लेकिन उसका अंग-भंग कर दिया गया. वह बहुत बड़ी सियासत का शिकार हुई, अभी वह बड़ी हो ही रही थी कि 1947 में उसके हाथ-पैर काटके उसे भीख माँगने के लिए बिठा दिया गया.

करोड़ों लोगों की भाषा क्या हो, कैसी हो, उसमें काम किस तरह किया जाए, इसका फ़ैसला रातोरात दफ़्तरों में होने लगा. राजभाषा विभाग बना और लोग उस अपंग की कमाई खाने लगे जिसका नाम हिंदी है. ऐसा दुनिया में कहीं और नहीं हुआ.

ठीक ऐसा ही ताज़ा-ताज़ा पैदा हुए पड़ोसी देश पाकिस्तान में भी हुआ, वे जिस्म के कुछ हिस्से काट लाए थे बाक़ी सब अरबी-फ़ारसी वाले भाइयों से माँगने थे, उन्हें किसी तरह जोड़ा जाना था. पाकिस्तान जहाँ कोई उर्दू बोलने वाला नहीं था वहाँ उर्दू राष्ट्रभाषा बनी. पंजाबी, सिंधी, बलोच, पठान सबको उर्दू सीखना पड़ा. ऊपर से तुर्रा ये कि उर्दू का देहली, लखनऊ या भोपाल से कोई ताल्लुक नहीं है, वह तो जैसे पंजाब में पैदा हुई थी.

इधर भारत में मानो 'सुजला सुफला भूमि पर किसी यवन के अपने पैर कभी रखे ही नहीं, इस पावन भूमि की भाषा तो देवभाषा संस्कृत है. यहाँ सब कुछ पवित्र-पावन-वैदिक है, विदेशी आक्रमणकारी आए थे, कुछ सौ साल बाद मुसलमान और क्रिस्तान दोनों चले गए, अपनी भाषा भी वापस ले गए, हम वहीं आ गए जहाँ इनके आक्रमण से पहले थे, इन्हें बुरा सपना समझकर भूल जाओ'...ऐसा कम-से-कम भाषा और संस्कृति में मामले में कभी नहीं हुआ. न हो सकता है.

भारत में सदियों से जो ज़बान बोली जा रही थी उसका नाम हिंदुस्तानी था, लेकिन मुसलमान चूँकि 'अपनी उर्दू' पाकिस्तान ले गए थे इसलिए ज़रूरी था कि जल्द-से-जल्द बिना उर्दू हिंदुस्तानी यानी हिंदी के लिए जयपुर फुट तैयार हो जाए और वह चल पड़े, इसके लिए सबके आसान काम था पलटकर संस्कृत की तरफ़ देखना. वही हुआ, ऐसे-ऐसे भयानक प्रयोग हुए कि बेचारी अपंग हिंदी दोफाड़ हो गई. एक हिंदी जो लोग बोलते हैं, एक हिंदी जो दफ़्तरों में शब्दकोशों से देखकर लिखी जाती है.

नेहरू की भाषा कभी सुनिए जो ख़ालिस हिंदुस्तानी थी लेकिन उन पर भी शायद अँगरेज़ी का जुनून इस क़दर सवार था कि उन्हें अपनी हिंदुस्तानी की फिक्र नहीं रही. देश का धर्म के आधार पर विभाजन होने के बाद समझदारी दिखाते हुए उसे धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र घोषित किया गया, वहीं भाषा के मामले में ऐसा बचपना क्योंकर हुआ, समझ में नहीं आता.

भारत के विभाजन को साठ वर्ष पूरे होने वाले हैं. दुनिया का हर भाषाशास्त्री मानता है कि किसी भाषा को जड़ें जमाने में कई सौ वर्ष लगते हैं. ब्रज, अवधी, भोजपुरी के साथ अमीर खुसरो फ़ारसी मिला रहे थे, रसखान कृष्णभक्ति का माधुर्य घोल रहे थे, इनके बीच शेरशाह सूरी जैसे तुर्क-अफ़गान भी अपनी भाषा ले आए थे. इन सबसे मिलकर एक जादुई ज़बान बनने लगी जिसमें मीर-ग़ालिब-मोमिन-ज़ौक लिखने लगे, भारतेंदु-प्रेमचंद-रतननाथ सरसार-देवकीनंदन खत्री से लेकर मंटो, कृशनचंदर तक आए. एक सिलसिला बना था जो अचानक झटके से टूट गया.

एक ही रात में कई अपने शायर-कवि पराये हो गए, इधर भी-उधर भी. कई नए अंखुए उग आए जिन्होंने दावा किया कि वे सीधे जड़ से जुड़े हैं यानी संस्कृत या फ़ारसी से लेकिन उस भाषा का होश किसी को नहीं रहा जिसने उत्तर भारत में तीन-चार सौ साल में अपनी जगह बना ली थी और खूब परवान चढ़ रही थी. वह सबकी भाषा थी, जन-जन की भाषा थी, वह सहज पनपी थी, उसमें कोई बनावट नहीं थी, उसमें हिंदी-संस्कृत के शब्द थे, बोलियाँ-मुहावरे, ताने-मनुहार, दादरा, ठुमरी थी, अदालती ज़बान थी, जौजे-मौजे साक़िन, वल्द, रक़ीब, रक़बा था...क्या नहीं था.

एक ऐसी ज़बान जो मुग़लिया दौर में सारी ज़रूरतें पूरी कर रही थी और ठहर नहीं गई थी बल्कि आगे बढ़ रही थी, जिसने ज़रूरत भर अँगरेज़ी को भी अपनाया. उसमें अभी और बदलाव हो सकते थे, जो स्वाभाविक तरीक़े से होते जिनमें बनावट के कंकड़ न दिखते शायद. मगर दुर्भाग्य ये है कि देश के बँटने के साथ ही भाषा भी बँट गई और लोग एक नई भाषा गढ़ने में लग गए जो किसी की भाषा नहीं थी, नहीं रही है. यह एक बहुत बड़ी वजह है कि लोग हिंदी को मुश्किल मानकर त्याग देने में सुविधा महसूस करते हैं.

सच बात ये है कि अगर हिंदी को वाक़ई आम ज़बान बनाना है, सबकी बोली बनाना है तो उसे लोगों से दूर नहीं, नज़दीक ले जाना होगा. हिंदू हों या मुसलमान, जब कोई शिकायत होती है तो लोग यही कहते हैं कि हमें शिकायत है, फिर दिल्ली में बसों पर क्यों लिखा होता है कि "प्रतिवाद करने के लिए संपर्क करें"...

उर्दू और हिंदी से पहले एक भाषा है जिसने सारी ज़रूरतें पूरी कीं हिंदुस्तानी के रूप में, जो आज भी उत्तर भारत के रग-रग में बहती है. यह चिट्ठा उसी हिंदुस्तानी में लिखा गया है, उस हिंदी में नहीं जो 1947 में अपंग हुई उसके बाद दिन-ब-दिन इतनी बनावटी होती चली गई कि हिंदी बोलने वाला भी, लिखी हुई हिंदी को अपनी भाषा के तौर पर नहीं पहचानता.

जब पंद्रह अगस्त धूमधाम से मनाइएगा तो याद रखिएगा कि यह हिंदुस्तानी की साठवीं बरसी भी है. साझे की सदियों की विरासत के लिए अगर सिर झुकाने का जज़्बा दिल में आए तो ऐसी भाषा बरतिए जो हिंदुस्तान की है, हिंदुस्तानी है.

04 अगस्त, 2007

उम्मीद सिर्फ़ अँगरेज़ी न जानने वालों से है

भाषा भावुकता से नहीं, ताक़त से चलती है. जिस तरह सिक्के चलाए जाते हैं वैसे ही भाषा भी चलाई जाती है.

भाषा का ईंधन सत्ता से उसकी निकटता है. अगर वह शक्ति की कुंजी नहीं है तो कुछ सिरफिरों का शौक़ भर बन सकती है, कामयाब लोगों की ज़बान और उनकी कलम से फूटने वाली धारा नहीं.

दुनिया की चार बड़ी भाषाएँ अँगरेज़ी, फ्रेंच, स्पैनिश और अरबी विशुद्ध रूप से सत्ता की वजह से प्रसार पाने वाली भाषाएँ हैं, उनका गहरा औपनिवेशिक अतीत है, अगर इन भाषाओं को बोलने वाले लोग कोलोनाइज़र नहीं होते तो तमिल, गेलिक, स्वीडिश या हिब्रू से अधिक इन भाषाओं का क्या महत्व होता?

भाषा चला देने से चल जाती है, अगर कोई भाषा सबके लिए ज़रूरी हो जाए तो लोग रातोंरात उसे सीख जाते हैं. भारत शायद दुनिया का अकेला देश है जहाँ अपनी भाषा हिंदी, तमिल, कन्नड़, मराठी, मलयालम... जाने बिना काम चल जाता है, बाइज़्ज़त चल जाता है. वैसे काम तो अँगरेज़ी जाने बिना भी चल जाता है लेकिन बेइज़्ज़त होकर चलता है. अँगरेज़ी जाने बिना तरक्की नहीं हो सकती, अपनी भाषा जाने बिना जितनी चाहें उतनी तरक्की हो सकती है.

भारत में ग्लोबलाइज़ेशन की जो चकाचौंध दिख रही है उसके पीछे भारतीय कामगारों के अँगरेज़ी ज्ञान की भारी भूमिका है. जहाँ चीनी भाई अँगरेज़ी सीखने के लिए बेहाल हैं वहीं भारत में अँगरेज़ी बच्चों को ही नहीं, बल्कि पिल्लों को भी सिखाई जाती है.

ठीक है कि अँगरेज़ी जानने की वजह से शहरी मध्यवर्ग को कुछ हज़ार नई नौकरियाँ मिल गई हैं लेकिन प्रतापगढ़, सिवान, झाँसी-झूँसी के करोड़ों लौंडे बेरोज़गार घूम रहे हैं, ज़्यादा से ज़्यादा 'सिकोरटी गारड' बन सकते हैं. वैसे एक से एक बढ़कर 'इंटलीजेंट' हैं लेकिन "इंगलिस में मार खा जाते हैं."

जॉर्ज बुश भारत आते हैं और बेहिचक कह जाते हैं कि जितनी आबादी अमरीका की है, उतने तो भारत में उपभोक्ता हैं इसलिए वे भारत को इतना महत्व दे रहे हैं. यहाँ बात तकरीबन 30 करोड़ शहरी लोगों की हो रही है जिनके लिए किसी अमरीकी प्रोडक्ट के ऊपर हिंदी में नाम लिखने की भी मशक्कत नहीं करनी है. लेकिन बाकी बचे 70 करोड़ लोगों का क्या?

चीन में ऐसा नहीं हो सकता, बिना चीनी के काम नहीं चल सकता. अब ज़रा ठहरकर सोचिए, यह चीन की ताक़त है या कमज़ोरी?

चीनी अँगरेज़ी सीखने के लिए बेताब हैं वहीं यूरोपीय-अमरीकी लोग भी चीनी भाषा सीख रहे हैं, हिंदी नहीं. माइक्रोसॉफ़्ट ने सबसे पहले चीनी और उसके बाद आइसलैंडिक से हौसा तक पचासों भाषाओं में अपने ऑपरेटिंग सिस्टम लॉन्च किए लेकिन हिंदी की ज़रूरत नहीं समझी, ऐसे देश के लिए जहाँ उसके ग्राहक लाखों में नहीं बल्कि करोड़ो में हैं.

मुझे कई बार लगता है कि भारत की असली ताक़त अँगरेज़ी न जानने वाली बिरादरी है जिनकी वजह से शायद बाज़ार को होश आए. एक मिसाल लीजिए-- ट्रैक्टर, खाद और कीटनाशक बनाने वाली विदेशी कंपनियों के विज्ञापन कभी अँगरेज़ी में नहीं होते. धीरे-धीरे, देर-सबेर जब देश के बहुसंख्यक लोगों के बीच माल बेचने की बात आएगी तब हिंदी, तमिल, गुजराती, असमिया और ओड़िया के बारे में भी कंपनियों को सोचना होगा.

लेकिन यहाँ एक बहुत बड़ा प्रश्नचिन्ह है, वो ये कि अँगरेज़ी जाने बिना कुछ ज़मींदारों-रंगदारों-ठेकेदारों को छोड़कर बाक़ी लोगों के पास पैसा कब तक आएगा, वे दमदार ग्राहक कैसे बन पाएँगे, क्योंकर बन पाएँगे, किसी को नहीं पता. देश में सत्ता की संरचना कुछ ऐसी बन चुकी है कि उसमें अँगरेज़ी के बिना सेंध लगाना असंभव दिखता है.

भारत में हिंदी या अन्य क्षेत्रीय भाषाओं को वही लोग बचा सकते हैं जो अँगरेज़ी की अग्निजिह्वा से बचे हुए हैं. शायद किसी समानांतर-वैकल्पिक तरीक़े से वे इतनी क्रयशक्ति हासिल कर लें कि उनके बीच माल बेचने के लिए हिंदी, तमिल, गुजराती, असमिया या ओड़िया जैसी भारतीय भाषा अनिवार्य हो जाए. लेकिन क्या उसके पहले सब लोग अँगरेज़ी ही नहीं सीख जाएँगे?

अँगरेज़ी नहीं भी सीखेंगे तो इतना आत्मविश्वास कहाँ से आएगा कि कहें, "हमें नहीं पता क्या लिखा है, हम नहीं ख़रीदते." किसी अधपढ़े से पढ़वा लेंगे और अपनी क़िस्मत को कोस लेंगे लेकिन माल तो वही बिकेगा जो जिसके ख़रीदने में शान हो, वही शान जो शहर में अँगरेज़ी बोलने वाले की है. रामलाल-कुंदनलाल एंड कंपनी की वो इज़्ज़त कैसे हो सकती है जो जॉनसन एंड निकल्सन की होती है.

कुचक्र है कि क्रयशक्ति बिना अँगरेज़ी के सिर्फ़ गुंडागर्दी से आती है. यह कुचक्र कब और कैसे टूट सकता है इसके बारे कुछ सोचिए, बोलिए और बताइए.