22 जून, 2007

मुहल्ले, क़स्बे और महानगर में भटकता अनामदास

अचानक वो सब अच्छा लगने लगा है जो पीछे छूट गया, मैंने कुछ भी रौंदा नहीं मगर पीछे छूट गई चीज़ों को न उठा पाने का अफ़सोस सालता है. रेला आगे जा रहा है जहाँ छूट गई चीज़ को पलटकर उठाना मुमकिन नहीं है.

मैंने नहीं उठाया इसीलिए सब रौंदे गए, हाथ से गिरे गली, मुहल्ले, आँगन, कुएँ, आम-अमरूद, गिल्ली डंडे, लट्टू, पतंग, कंचे... वक़्त के क़दमों तले. अपराध बोध है जो जाता ही नहीं.

नॉस्टेलजिया एक रोमैंटिक चीज़ हुआ करती थी, आजकल स्क्रित्ज़ोफिनिया की तरह एक मनोविकार है, कम से कम बुढ़ा रहे आदमी का प्रलाप तो ज़रूर.

क़स्बे में निम्न-मध्यमवर्गीय परिवार पैदा होकर पहले भारत और उसके बाद दुनिया के महानगरों को देखने वाले चालीस के करीब पहुँच रहे आदमी की त्रासदी बड़ी विचित्र है, न बताते बनती है, न छिपाते. वह पूरी तरह वस्तुहारा है, न इधर का न उधर का. उसकी प्यास कहीं नहीं बुझती, उसकी बेचैनी कभी नहीं मिटती.

सैटेलाइट टीवी के सैकड़ों चैनल मिलकर घुर्र-घुर्र करने वाले आकाशवाणी जैसा सुकून नहीं दे रहे, महँगे से महँगे रेस्तराँ नंदू की कचौड़ी-जिलेबी का सुख नहीं दे रहे, फ्रिज की आइसकोल्ड बियर से वह तरावट नहीं मिल रही जो सौंफ या बेल के शर्बत से मिलती थी...

गर्मी की दुपहरी में दाल-भात-सब्ज़ी के ऊपर से आम खाकर सफ़ेद गंजी-पजामा पहनकर छह नंबर पर पंखा चलाकर डेढ़ घंटे सोने का स्वर्गतुल्य सुख अब कहाँ है. उसके लिए वही घर चाहिए, अपने पेड़ का आम चाहिए और शायद वही उम्र चाहिए...और किसी तरह की नौकरी कतई नहीं चाहिए.

घर था, फ्लैट नहीं, आँगन था, बालकनी नहीं, मालती, हेना, गुलाब सब पसरे थे, आँगन में आम-अमरूद तो थे ही ओल (सूरन,जिमीकंद) न जाने कैसे अपने-आप ज़मीन के नीचे आ बैठता था. नालियों में छछूंदर रेंगते थे, दीवारों पर काई जमती थी, पूरी बारिश भुए रेंगते थे जो धूप निकलने पर भूरी-धूसर-काली तितलियाँ बनकर उड़ने लगते थे, चार-पाँच तरह के मेढ़क, पाँच-सात तरह के फतिंगे, दस-बीस तरह के कीड़े सब अपने-अपने चक्र के अनुरूप दर्शन देते. जिसे आजकल इकॉलॉजी कहा जाता है वह सब हमारे घर में था.

बारिश की बूंदे पूरी रात छप्पर से स्विस घड़ी की तरह सेंकेंड-दर-सेकेंड गिरती थीं, मुंडेर पर बिल्लियाँ और चौराहे पर कुत्ते लड़ते थे, चौकी के नीचे चूहे दौड़ लगाते थे और मोड़ पर शराबी एक-दूसरे को पहले गालियाँ देते और बाद मे गले मिलते थे. सुबह हम गन्ना चूसते थे, दोपहर में झेंगरी (हरा चना) और शाम को फुचका (गोलगप्पा). लकड़ी के चूल्हे पर खाना पकता जिसमें शामिल थी अधगिरी छप्पर पर उगी तुरई की तरकारी.

यह गया वक़्त है जो लौटकर आ नहीं सकता. क़स्बे तो कुओं को पाट चुके हैं, आम-अमरूदों को काट चुके हैं, वे उन लड़कों की तरह हैं जो जवान होने की जल्दी में उगने से पहले ही दाढ़ी बनाने लगते हैं. मैं जिस क़स्बे को याद करके आँखें गीली करता हूँ आज का गाँव वहाँ आ पहुँचा होगा.

मैं सोचता हूँ मेरे पिता कितने निर्द्वंद्व थे कि ख़ानदानी घर है, बच्चे यहीं रहेंगे, सब कुछ ऐसा ही रहेगा आम-अमरूद, आँगन-कुआँ...जैसा उनकी जवानी में था लेकिन कुछ भी नहीं रहा. मैं सोचकर डरता हूँ और दावे से नहीं कह सकता कि मेरा बेटा चाँद पर नहीं रहेगा.

ऐसे में कोई खवनई की बात करे, कोई आकाशवाणी ट्यून करे, कोई कोंहडौरी की याद दिलाए, कोई पेटकुनिए लेटने की मुद्रा बताए, कोई बिल्लू के बचपन का ज़िक्र छेड़ दे, कोई घर में पहली बार रखे गए दर्शनीय फ्रिज की तस्वीर पेश करे, कोई दरंभगा के माटसाब की तस्वीर खींचे, कोई बनारस के क़िस्से छेड़े दे (कई और हैं...) तो ऐसा लगता है कि किसी ने ज़ख़्मों पर नरम फाहा रख दिया हो.

हम बदलते वक़्त के शरणार्थी हैं. कश्मीरी पंडित से चिनार और गुश्ताबा की बात दिल्ली में करो या न्यूयॉर्क में, आहें भरने के अलावा उसके पास चारा क्या है. वह कश्मीर नहीं लौट सकता, हम भी प्री-ग्लोबलाइज़ेशन दौर में नहीं जा सकते, बस आहें भर सकते हैं.

एक नया भरम है, आभासी दुनिया में अपने जैसे लोगों की खोज में भटक सकते हैं. ऐसे लोग जिनका अतीत हो, जो उन्हें याद हो, और भविष्य के सुनहरे सपनों से उनकी मेमरी चिप फुल न हो गई हो. उनसे गले मिल लें, हँस लें, रो लें, झूठ-मूठ ही एक बार फिर उस दौर को जी लें.

20 जून, 2007

जो न हो सका उसकी तलाश है मुझे

आभासी लोक में विचर रहे दो जीवों ( प्र1 प्र2) ने सवाल सामने रखा कि कोई यहाँ क्यों आया, क्या चाहता है. ठीक वैसे ही जैसे लोग पूछते हैं--'आपके जीवन का उद्देश्य क्या है?'

जवाब तो नहीं है, बस एक सवाल है, अरे भाई जब पैदा होने का उद्देश्य नहीं था, मरने का कोई उद्देश्य नहीं है तो वक़्फ़े का उद्देश्य क्यों होना चाहिए? अगर होगा तो वही जाने जिसने हमारी इच्छा के बिना हमें बनाया और हमारी इच्छा के बग़ैर मार डालेगा.

कुछ लोग दावा करते हैं कि उन्हें उनके जीवन का उद्देश्य मिल गया है--देशसेवा, गौसेवा, जनसेवा, हिंदीसेवा से लेकर कारसेवा और अब नेटसेवा तक. मुझे कोई उद्देश्य नहीं मिला है, जिस तरह जीता हूँ उसे उद्देश्य कहने का हौसला मुझमें नहीं है.


मुझे जीवन का उद्देश्य तो नहीं पता लेकिन जिसे आभासी दुनिया कहा जाता है वहाँ मैंने स्वेच्छा से जन्म लिया. स्वयंभू हूँ, हर्मोफ़र्डाइट हूँ--एककोशीय जीव, जो ख़ुद से टूटकर बना है.

आभासी दुनिया का उल्टा क्या हो सकता है, सोचता रहा मगर कोई ठीक शब्द नहीं मिला-स्पर्शी दुनिया? जीवन इहलोक है तो आप जिसे आभासी दुनिया कह रहे हैं वह शायद उहलोक. आभासी दुनिया में उतरने का सादा सा लेकिन बहुत बड़ा सा आकर्षण है, इहलोक में रहते हुए उहलोक में विचरण करना.

मैं वह सब कुछ चाहता हूँ जो इहलोक में नहीं मिल पाया, इहलोक में नौकरी है तो उहलोक में आज़ादी, इहलोक में सीमाएँ हैं तो उहलोक में स्वच्छंदता. उहलोक में जीने का आनंद उठाने के लिए सबसे ज़रूरी था नाम, काम, दाम आदि का त्याग इसलिए अनामदास का चोला पहना और निकल लिए ऐसा जीवन जीने जिसकी सीमाएँ नहीं मालूम, इहलोक वाले बंदे की सब सीमाएँ समय रहते मालूम हो गईं इसलिए चाकरी खोजी और लग गए नून तेल लकड़ी में.

जो उहलोक वाला था हमेशा से कसमसाता था, एक और जीवन जीने के लिए. उसके लिए एक और जन्म तक इंतज़ार करना पड़ता और इस जन्म को इतने बोरिंग तरीक़े से गुज़ारना पड़ता कि अगले जन्म में भी मनुष्य बनना नसीब हो. तभी अचानक 'सेंकेड लाइफ़' जैसा आइडिया आया, हमने कहा जो कुछ तनख़्वाह देने वाले ने नहीं ख़रीदा है वह उहलोक वाले के नाम. अनामदास गरियाता है कि साले ने कुछ नहीं दिया, एक-सवा घंटा देता है हफ़्ते में एकाध बार एहसान करके...

क्या-क्या बिक गया है ठीक-ठीक नहीं पता, क्या-क्या बचा है, नहीं मालूम. शायद यही पता लगाने की कोशिश है आभासी दुनिया की मटरगश्ती. जब तक यही पता न हो कि खींसे में क्या है तब कैसे पता चलेगा कि झोले में क्या आएगा. आभासी दुनिया में कई जीव भटकते हैं अपनी तरह के, दूसरी तरह के भी, वही बता पाएँगे कि मेरे पास कुछ खरा है या बाउंस होने वाला चेक लिए घूम रहा हूँ.

बात ये है कि इहलोक में रहते हुए उहलोक की रेकी कर रहे हैं, देख रहे हैं कि अगर इधर से निकलकर उधर गए तो कोई आसन-पाटी मिलेगी या लतिया दिए जाएँगे.

हर आदमी के अंदर कई-कई जीव रहते हैं, अभी तक दो का सस्ता-मद्दा इंतज़ाम हो पाया है, बाक़ियों को टरका दिया गया है.

समानांतर जीवन जीने की इस युक्ति से मुझे सचमुच निर्मल आनंद मिल रहा है लेकिन कई लोग हैं जो लगातार धमकाते रहते हैं कि पोल खोल देंगे. जो भाई इहलोक वाले को किसी भी तरह से जानते हैं उनसे अनुरोध है कि उहलोक वाले के असमय अवसान के पाप का भागी न बनें.

उहलोक में क्योंकर विचरण हो रहा है यह बताने की कोशिश की है, आगे सोचकर बताता हूँ कि धूप-छाँव, शहर-गाँव, ध्वनि-प्रतिध्वनि, आलाप-विलाप-प्रलाप क्या सुनना चाहता हूँ, क्या सुनकर मन खुश होता है और क्यों... फूड फॉर थॉट के लिए आप दोनों का आभार...

18 जून, 2007

नारद के सभी ईस्वामियों के समर्थन में

शीतल छाँव है, कलियाँ खिली हैं, खुशियाँ बिखरी हैं, भ्रमर गुंजन कर रहे हैं, गीत-संगीत का माहौल है, सब कुशल-मंगल है, शांति-शांति है, छेड़छाड़ थोड़ी-सी है जैसे शादियों में गालियाँ गाई जाती हैं. समधी मिलन जैसा समाँ है, सब एक-दूसरे को बधाई दे रहे हैं. अहा! कितना सुंदर आयोजन है, आप धन्य हैं, अरे आप भी धन्य हैं.

दिन भर के थके-हारे योद्धा यहाँ कहानियों, कविताओं और चुटकुलों के चंदोवे में विश्राम करते हैं. भोमियो, जावा, ड्रीमवीवर, विस्टा जैसे-जैसे अग्रगामी पात्र हैं जो पूरी दुनिया के दुख-दर्द मिटाकर आनंदवर्षा कर रहे हैं. पूरी दुनिया एक दूसरे से जुड़ी है, जो नहीं जुड़े हैं वे चूहड़े हैं, पहले भी थे आगे भी रहेंगे.

हम इस हरी-हरी वसुंधरा की स्वस्थ-समृद्ध संतानें हैं, हमने अपना भाग्य अपनी मेहनत से रचा है, जो नीचे से कराहते हैं उनकी बात करने के लिए नेता लोग हैं, टुटपुंजिए पत्रकार हैं.

यह हमारी दुनिया है, हमने बनाई है, यहाँ हमारी प्रगति की ललक है, यहाँ हमारी समझ की चमक है, यहाँ हमारी शक्ति की दमक है, हमारे पास इसका पासवर्ड है. यहाँ उन लोगों की बात क्यों करते हो जो किसी कैम्प-वैम्प में अपनी करनी का फल भोग रहे हैं.

हवाई बातों के पवनपुत्र हमारी इस अ-शोक वाटिका में उत्पात मचाने आ गए हैं, हँसते-खेलते सरल परिवार में गरल लेकर 'विषराज' आ गए हैं, लेकिन सुन लो अब कलियामर्दन के लिए बाल-गोपाल तैयार हैं. अधरों पर मीठी-मीठी वंशी है लेकिन सुदर्शन चक्र को न भूलो, वह भी है हमारे पास.

प्रगति हो रही है, शेयर बाज़ार आसमान छू रहा है, अमरीका-यूरोप लोहा मान रहे हैं, जीडीपी उठान पर है...यह सब आपके दलित-गलित, वामपंथी-दामपंथी विचारों की वजह से नहीं हो रहा है, यह हमारी प्रतिभा है, योग्यता है...विचारों से न कुछ हुआ है, न होगा, ज़रूरत है मेहनत, लगन और सबसे बढ़कर बहसबाज़ी में समय बर्बाद न करने की.

पसीना बहाकर, सॉफ्टवेयर उड़ाकर, लिंक लगाकर, रातों की नींद गँवाकर...हमने एक कुनबा बनाया जिसमें सब समानधर्मा लोग थे, सबको विश्वास था कि--लेकर हाथों में हाथ, हम चलेंगे साथ-साथ, हम होंगे कामयाब एक दिन...सबसे बड़ी पंगत-संगत-रंगत अपनी होगी, सब लोग एक क़तार में बैठकर भंडारा खाएँगे और जयकारे लगाएँगे.

हमने सपनों की कोमल दुनिया बसाई थी लेकिन यहाँ भी रुखे-सूखे-भूखे लोगों की बात करने वाले आ धमके. अकाल पीड़ित-बाढ़ पीड़ित और तो और दंगा पीड़ितों की बात करने वाले आ पहुँचे. इसके कहते हैं रंग में भंग करना.

जो गुजर चुका है वह गुजरात इनके लिए गुजरता ही नहीं है...चलता ही जा रहा है. गांधी के राज्य को जिस मोदी ने गौरव दिलाया उसे ये लोग रौरव बता रहे हैं, हद होती है नासमझी की. यहाँ आने से पहले तक इन्हें कोई पूछता न था और अब रंग देखिए कि एक बदज़बान आदमी की ज़बान काटे जाने पर छोड़कर जाने की धमकियाँ दे रहे हैं. जहाँ नौकरी करते हो वहाँ दो न ये धमकी, अगर हिम्मत है तो...

हम रात-दिन एक करते हैं, गैजेट्स, सॉफ़्टवेयर्स, एप्लिकेशंस के बारे में पढ़ते हैं ताकि देश का विकास हो, हिंदी फले-फूले...और लोग हैं कि चले आते हैं दो चार उलजलूल वाद-प्रतिवाद-संवाद-चर्चा-परिचर्चा वाली किताबें पढ़कर वही घिसापिटा राग लिए... लोकतंत्र, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, सांप्रदायिकता, अल्पसंख्यक और साम्राज्यवाद का रोना लेकर, एक ही सॉफ्टवेयर है जिसका पिछले दो जेनरेशन से कोई अपग्रेड नहीं आया है.

राजनीति से हमारा क्या लेना-देना, हम तो शांतिप्रिय-प्रतिभाशाली लोग हैं जो देश, भाषा, संस्कृति और सबसे बढ़कर इंटरनेट क्रांति में योगदान दे रहे हैं. हाय! क्या वक़्त आ गया है, हमारी बिल्ली हमीं से म्याऊँ कर रही है, एक बार कोड का एक कैरेक्टर बदल दिया तो जीवन भर एरर में गुज़रेगा.

(इसे कृपया व्यंग्य न समझें, यह पिछले कुछ दिनों में नारद पर लिखे गए सच्चे पोस्टों और टिप्पणियों पर आधारित है. यह एक शांतिप्रिय कुनबे का घोषणापत्र है इसे उसी तरह देखने में सबकी भलाई निहित है. नारद के सभी इलेक्ट्रॉनिक स्वामियों को सादर समर्पित. )

17 जून, 2007

नारद पर ज़बानदराज़ी चल सकती है ज़बानतराशी नहीं

मुश्किल तब और बढ़ जाती है जब एक ग़लती को दूसरी बड़ी ग़लती से ठीक करने की कोशिश की जाती है.

जिस वाद-विवाद की वजह से बात यहाँ तक पहुँची उसकी क्रमबद्ध 'आपराधिक जाँच' (क्रिमिनल इन्वेस्टीगेशन) का कोई मतलब नहीं है क्योंकि मुद्दा अब वह नहीं रह गया है.

नारद के प्रबंधकों ने जो 'कड़ी कार्रवाई' की और उसके बाद जिस हर्षोल्लास के साथ उसका स्वागत किया गया उससे एक लकीर खिंच गई है. अब हर किसी पर यह बताने का दबाव-सा बन गया है कि वह लकीर के किस तरफ़ है.

ऐसी लकीरें हमेशा वही खींचते हैं जिनकी चर्चा-बहस-संवाद की परंपरा में कोई आस्था नहीं है, यह परंपरा सिर्फ़ लोकतांत्रिक नहीं बल्कि 'आर्गुमेंटेटिव इंडियन' वाली भारतीय परंपरा है. ख़ैर, जाने दीजिए...अनेक विवादों के संदर्भ में यह बात-बात कई बार कही जा चुकी है.

बहकता-चहकता पोस्ट 'शाबास नारद' आया जिसमें गिरिराज जोशी ने रणभेरी बजाते हुए कहा, "नारद से ऐसे सभी चिट्ठों को निकाल फैंको जो इसका विरोध करते हैं..."

इस हिसाब से मैं निकाले जाने का पात्र बन चुका हूँ. मैंने अपनी पात्रता का प्रमाणपत्र फ़ौरन ही गिरिराज जी को भेज दिया था. मुझे लगा कि अब चुप रहना ग़लत होगा, मैंने लिखा-- "आपके विचारों का विरोध न करना और उसे ग़लत न कहना अधर्म होगा, पाप होगा."

लकीर खींचने वाले साहब वही कर गुज़रे जो श्रीमान बुश ने किया था, "या तो आप हमारे साथ हैं या फिर हमारे ख़िलाफ़"..

मुझे बताना पड़ा कि मैं लकीर के दूसरी तरफ़ हूँ, उनकी तरफ़ नहीं. इसका ये मतलब क़तई नहीं है कि मैं ओसामा के साथ था, लेकिन लकीर खींचकर आपने मुझे दूसरी तरफ़ धकिया दिया है.

मुझे अगर बदज़बानी करने वाले और ज़बान काटने का फ़रमान सुनाने वाले में से एक को चुनना ही पड़ेगा तो मैं राजा के ख़िलाफ़ हूँ.

दुखद बात ये है कि नारद को अपने सक्रिय सहयोग से चलाने वाले भाई श्री संजय जी बेंगाणी को गिरिराज जोशी की पोस्ट का मतलब समझ में नहीं आया, उनकी प्रतिक्रिया थी-- "क्या लय में लिखा है, खुब. मुझे तो लगा था आज नारद केवल गालियाँ ही खाने वाला है. शाबास."

संजय जी और अन्य कई चिट्ठाकार दोस्त इस बात से परेशान रहते हैं कि सांप्रदायिकता, हिंदू-मुसलमान, आरक्षण, दलित आदि विषयों पर चर्चा करके कुछ लोग चिट्ठाकारों में फूट डाल रहे हैं. संजय जी की नज़र उस दरार पर नहीं गई जो गिरिराज जी और कुछ अन्य साथियों ने डाली है.

महाशक्ति जी की शक्तिशाली टिप्पणियाँ भी कम विचारणीय नहीं हैं जिनमें 'मक्‍कार पत्रकारों', 'हिन्‍दू‍ विरोधी तालीबानी लेखों', 'दीमकों' और 'विषराजों' का फन कुचलने के साथ-साथ 'मुहल्‍ले को भी सर्वाजनिक रूप से निष्‍क‍ासित एवं बहिष्‍कृत' करने की अनुशंसा की गई है.

अंत में एक निर्णायक उदघोष--"आज समय आ गया है कि इन सॉंपों की पूरी नस्‍ल को कुचल दिया जाना चाहिए." वाक़ई बहुत ज़हर है.

इस पर भी बेंगाणी जी की 'बहुत खुब' वाली टिप्पणी दर्ज है, ढेर सारे साथी हैं जिन्होंने महाशक्ति जी के विचारपरक लेखन का करतल ध्वनि से स्वागत किया है.

विचार, सरोकार, हिंदुत्व, इस्लाम, न्याय, उदारता, लोकतंत्र, सांप्रदायिकता, आरक्षण, गुजरात, मोदी... जैसे कुल दस-पंद्रह शब्द हैं जिनका ज़िक्र आते ही कुछ दोस्तों को सचमुच तकलीफ़ होने लगती है. ये शब्द मुझे भी बहुत तकलीफ़ देते हैं इसलिए उन पर चर्चा ज़रूरी लगती है वह चाहे मुहल्ले वाले अविनाश करें या समाजवादी जन परिषद वाले अफ़लातून जी.

बेंगाणी जी को गालियाँ देने वाले राहुल के कृत्य के ख़िलाफ़ कोई निंदा प्रस्ताव लाया जाता तो अफ़लातून, धुरविरोधी, मसिजीवी, अभय तिवारी, प्रमोद सिंह जैसे अनेक लोग उसका समर्थन करते जो आज नारद के फ़ैसले के विरोध में खड़े हैं. सीधी सी वजह है कि आपने लकीर खींच दी है.

'कड़ी कार्रवाई' और उसके बाद के जश्न में गाए गए विजयगान और प्रयाणगीत से स्पष्ट हो गया है कि अब भीष्म और द्रोण भी तटस्थ नहीं हो सकते, उन्हें बताना होगा कि वे किधर हैं.

यह पोस्ट व्यक्तियों के विरोध या समर्थन में नहीं बल्कि प्रवृत्तियों के बारे में है. विचारहीनता और असहिष्णुता भी व्यक्तिगत स्वतंत्रता है जिसका सम्मान करते हुए इससे ज़्यादा कुछ लिखना ठीक नहीं होगा.

14 जून, 2007

मन का काम, मन ही जाने

अपने मन का काम, इससे बढ़कर कोई और माँग आप ख़ुद से नहीं कर सकते.

अपने मन का काम वही होता है जो आप इस समय नहीं कर रहे या करने की स्थिति में नहीं हैं. इससे ज़्यादा रूमानी ख़याल कोई और होता भी नहीं.

जब तक मौत की आहट सुनाई न देने लगे ज़्यादातर लोग ऐसे ही ख़यालों में जीते हैं, कुछ लोग पक्की कोशिश करते हैं और कुछ लोग कसमसा कर रह जाते हैं. अपना अभी तय होना है कि किस खाँचे में फिट होंगे.

अपनी नज़र में सफल आदमी वही है जो अपने मन की करता है. यह सफलता कई बार भगीरथ प्रयत्न से मिलती है और कई बार सहज प्रारब्ध से.

मेरी नज़र में जंगीलाल चौधरी सबसे सफल आदमी था जो हमारे मुहल्ले में कोयले की टाल चलाता था. सफ़ेद धोती और नीले कुर्ते में गद्दी पर बैठकर सौंफ-सुपारी खाता था, उसके आदिवासी मज़दूर कोयला तौलते थे, ग्राहक को दो-चार किलो ज़्यादा भी दे दें तो टन-मन के हिसाब में कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता था जंगीलाल को. उसने जीवन भर कोयला बेचने के अलावा कभी कुछ और करने की कुलबुलाहट नहीं पाली.

कोयला बेचकर या काग़ज़ काला करके, थोड़ा ऐसे या वैसे, घर सबका चलता है लेकिन ज़्यादातर लोग फेंस के उधर जाने के लिए छटपटाते हैं. जो पत्रकार नहीं हैं वे पत्रकार बनना चाहते हैं, जो पत्रकार हैं वे कार्यकर्ता बनना चाहते हैं या फिर लेखक, जो दुकानदार हैं वे कलमकार बनना चाहते हैं और कलमकार चाहते हैं कि दुकान चल निकले.

मेरे एक पुराने परिचित के पिता कम्युनिस्ट पार्टी के पोलित ब्यूरो में थे, बेटा बाप से बढ़कर निकला, माले का पर्ची काटने वाला कार्यकर्ता बन गया. जब मूँछे पकने लगीं तब घर बसाने का ख़याल आया तो पत्रकार बना, मगर संयोगवश एक संघी संपादक की अर्दल में. संपादक जी मकान मालिकों से तंग आए तो भाजपाई मुख्यमंत्री की कृपा से कोऑपरेटिव हाउसिंग सोसाइटी बनी जिसके कोषाध्यक्ष बने माले वाले भाई. अपार्टमेंट बना और माले वाले भाई मालामाल हुए, उसके बाद पूरे प्रॉपर्टी डीलर बन गए.

माले वाले इस मालदार परिचित को मैं सचमुच सफल आदमी मानता हूँ क्योंकि उन्होंने हर दौर में अपने मन का काम किया, जब मन किया तब सर्वहारा के संगी बने और जब मन किया तो ज़ार के संगी बनकर चौथेपन में नवाबी आनंद लिया. जंगीलाग और माले वाले मालामाल, दोनों सफल हैं, एक प्रारब्ध से और दूसरा प्रयत्न से.

एक दोस्त हैं जो एम्स की नौकरी छोड़कर असम में ग़रीब लोगों का मुफ़्त इलाज कर रहे हैं, दूसरे हैं जो बिहार पुलिस की राह में बारूद बिछाने जैसा दिलेरी भरा काम बरसों करने के बाद अब पटना में पीसीओ चला रहे हैं. तरह-तरह के लोग हैं, सबकी अपनी-अपनी पिनक है, मेरी भी पिनक है लेकिन कई बार लगता है कि मन की करने के लिए जो मनमानी करनी पड़ती है उसके लायक़ कलेजा नहीं है अपने पास.

जब आप अपने मन की करते हैं तो बाक़ी लोगों के लिए मनमानी ही कर रहे होते हैं. ख़ानदानी नौकरीपेशा परिवार में पैदा हुए नाचीज़ ने जब ऐलान किया कि सरकारी नौकरी नहीं करूँगा तो घर में स्यापा पसर गया, ये नहीं कहा था कि नौकरी नहीं करूँगा. मन का काम तब यही था कि बाप जो कहें वह नहीं करना है. बस यहीं तक मन का काम किया.

मन करता है किताब लिख मारूँ जो मास्टरपीस हो जाए, मन करता है फ़िल्म बनाऊँ जो कुरोसावा और फेलिनी की श्रेणी में रखी जाए, मन करता है कोलंबस और कैप्टन कुक की तरह पूरी दुनिया छान मारूँ, मन करता है कि घूम-घूमकर दुनिया भर के जनसंघर्षों का गवाह बनूँ, मन करता है कि सिर्फ़ मन की करूँ. लेकिन करता क्या हूँ, सिर्फ़ नौकरी.

मकान की किस्त भरनी है, बुढ़ापा आरामदेह बनाना है, बच्चे की सही परवरिश करनी है. कई बार दिल में आया कि नौकरी छोड़ दूँ और करूँ अपने मन की. किसी तरह जुगाड़ हो जाएगा रोज़ी-रोटी का, सिर्फ़ नौकरी करना भी कोई जीवन है, ज़रा पढूँ-लिखूँ, दुनिया देखूँ. बीवी ने एक सादा सा सवाल पूछा, 'बेटे से जब स्कूल में लोग पूछेंगे कि तुम्हारे पापा क्या करते हैं तो वह क्या जवाब देगा.'

मैं सोचता हूँ क्या वह यह नहीं कह सकता 'जो मन करता है, करते हैं.' क्या आपको मेरा यह परिचय स्वीकार्य है कि मैं वही करता हूँ जो मेरा मन कहता है.

माँ-बाप, बीवी-बच्चे, दफ़्तर-समाज, दीन-दुनिया के हिसाब से काम न करके अपने मन से चलूँगा तो क्या मुझे एक 'अच्छा आदमी' माना जाएगा? लेकिन अपने मन से नहीं चलूँगा तो क्या अपनी नज़र में सफल आदमी बन पाऊँगा? एक साथ 'अच्छा और सफल आदमी' बनने की उधेड़बुन है सारी ज़िंदगी.

कहिए उधेड़ूँ या बुनूँ?

(प्रमोद सिंह और अभय तिवारी के परस्पर संवाद की प्रेरणा से लिखे गए इस चिट्ठे पर अपनी राय देकर इसे सफल बनाएँ.)

07 जून, 2007

माले मॉल दिले बेरहम

जिनके पास माल है उनके लिए मॉल है, मॉल वो जगह है जहाँ सुख और सुविधा का एक साथ वास है.

ग़रीब पहले भी थे, आज भी हैं, वे पहले भी दुखी थे, आज भी हैं और आगे भी रहेंगे. फिर इतना मॉल-विरोधी-माहौल क्यों बना रहे हैं कुछ लोग?

इस सवाल पर विचार करना उतना ही ज़रूरी है जितना मॉल से माल ख़रीदना. मॉल से सुख मिल रहा है लोगों को. ऐसे में उस पर सवाल उठाने को सुखी व्यक्ति को कठघरे में लाने जैसा माना जाता है. मगर मेरी राय में सुखी आदमी कठघरे में खड़ा किए जाने का पहला पात्र है, न कि सूखा आदमी.

नुक़्ते की बात ये है कि किसानों के खेत उजाड़कर उद्योगों के रमण के लिए सेज़ बिछाई जा रही है, अच्छा नाम दिया है सेज़ यानी एसईज़ेड (स्पेशल इकॉनॉमिक ज़ोन). मॉल भी सेज़ है, सोशल एक्सक्लूज़न ज़ोन यानी समाज के एक हिस्से को बाहर रखने वाला ज़ोन.

हर मॉल के बाहर वर्दी डाटकर कुछ गार्ड खड़े होते हैं जिन्हें पता होता है कि उन्हें ख़ुद से थोड़ा कमतर दिखने वाले आदमी से कैसे पेश आना है. कोई बेचारा अच्छी तेल-कंघी-इस्तरी की मदद से घुस भी गया तो ग़लत अँगरेज़ी बोलकर डराने वाले सेल्समैन मौजूद हैं. वह ज़्यादा से ज़्यादा रौनक़ देखकर लौट आता है. समझ जाता है कि यह जगह उसके लिए नहीं बनाई गई है.

ज़्यादातर लोग इतने भोले हैं कि उन्हें पता भी नहीं चलता कि उन्हें मॉल से शॉपिंग में अधिक आनंद क्यों आता है. इसलिए कि वहाँ सिर्फ़ उनके जैसे लोग शॉपिंग करते हैं या फिर वे जिनके जैसा बनने की वे तमन्ना रखते हैं. मॉल ने शॉपिंग को एक शानदार एक्सपिरियंस बनाने के लिए उन लोगों को पूरी तरह एलिमिनेट कर दिया है जो आपको देश की दशा की याद दिलाकर दुखी करते हैं.

बाज़ार में जाओ तो साला हर ऐरा-ग़ैरा चला आ रहा है, मैनर्स तो हैं ही नहीं. आप माल पसंद कर रहे हैं कि कोई भिखमंगा आ गया, क़ीमती सामान लेकर चले हैं कि किसी ने साँड़ की पूँछ उमेठ दी...नालियों-गड्ढों से तो किसी तरह बच जाएँगे लेकिन शोर-धूल-धुआँ वग़ैरह-वग़ैरह... यू नो शॉपिंग हैज़ टू बी फ़न.

आपके इस अँगरेज़ी के फ़न को रूपए में बदलने का उर्दू वाला फ़न जिनके पास है उन्हें और भी कई बातें पता हैं. वे घाटा उठाने की योजना बनाकर आपसे मोहब्बत साध रहे हैं, वे जानते हैं कि आपका प्यार अटूट है. 'बाई वन गेट वन फ्री' ज़रा गुप्ता जी से लेकर दिखाइए, रीजेंसी मॉल वाले देते हैं और वजह भी बताते हैं-....बीकॉज़ वी केयर फॉर यू.

गुड़गाँव के एक पाँच मंज़िला शॉपिंग सेंटर में घुसा तो लोगों के चीख़ने की आवाज़ आई, मैं घबराया, ऊपर नज़र गई तो नौजवान पाँचवी मंज़िल पर बने प्लेटफॉर्म से कमर में रस्सी बाँधकर बंजी जंपिग कर रहे थे, फुल सेफ़्टी किट और इंस्ट्रक्टर के साथ, मुफ़्त में. लाइव बैंड था और बच्चों के लिए घूमता-फिरता मिकी माउस भी. चाट-पकौड़ी की दुकानें और अमरीकन बेगल भी. अब शॉपिंग करने यहाँ नहीं आएँगे तो क्या दरीबा और चावड़ी बाज़ार जाएँगे.

ग्लोबलाइज़ेशन का सबसे सुंदर प्रतीक है मॉल, जब आप मॉल के अंदर जाते हैं तो बिना टिकट-पासपोर्ट-वीज़ा के फौरन फॉरेन पहुँच जाते हैं. जैसे ही घुसते हैं मैनहट्टन में मछरहट्टा बाहर रह जाता है, शॉपिंग न भी करनी हो तो बीच-बीच में फॉरेन टूर का आनंद लेते रहना चाहिए, ट्रेंड्स पता रहते हैं. नाली-गंदगी-झोड़पपट्टी-ग़रीबी-बीमारी-भिखारी सबसे दूर जो आपके जीवन को स्थायी तौर पर मैनहट्टन नहीं बनने दे रहे.

मॉल वाले इतना कुछ कर रहे हैं आपके लिए, मज़ा भी आ रहा है, फिर क्यों पूछना कि 'क्यों कर रहे हो', 'कैसे कर रहे हो', 'किसके ख़र्चे पर कर रहे हो', 'क्या ज़रूरी है यह सब करना'? सवाल तो तब करना चाहिए जब आपको कोई तकलीफ़ हो, आनंद में क्या सवाल करना?

अच्छे माहौल में, अच्छा माल, अच्छी क़ीमत पर मिल रहा है तो फिर बाक़ी बातें फिज़ूल हैं. ये सब कैसे हो रहा है, आगे कैसे होगा, ये किसकी क़ीमत पर हो रहा है, सबके लिए क्यों नहीं हो रहा, यह एक अकादमिक बहस है जिसका ग्राहक से कोई सरोकार नहीं है.

ग्राहक देखता है कि उसने कितने पैसे दिए, पैसे के अलावा क़ीमतें और भी चुकाई जाती हैं. वो दूसरे लोग हैं जो अपनी अलग करेंसी में यह क़ीमत चुकाते हैं, मॉल के माल को पैक करने वाले, चढ़ाने-उतारने वाले, उगाने-धोने वाले से लेकर न जाने कौन-कौन...चीन में बैठे मज़दूर तक...जो बेहद दयनीय हालत में जीते हैं अगर उनको ज्यादा पैसा मिलेगा तो आपको सस्ता माल मिल चुका, भूलिए मत- बीकॉज़ वी केयर फ़ॉर यू (नॉट फॉर देम.)

लोकतंत्र में ख़रीदने-बेचने पर कोई रोकटोक नहीं है, साथ ही, सोचने-समझने से रोकने की साज़िशों पर भी पाबंदी नहीं है. सोचने-विचारने की भी स्वतंत्रता है मगर मॉल जैसी सुविधाजनक चीज़ या ग़रीबी जैसी दुविधाजनक चीज़ के बारे क्या सोचना. लेकिन आप मेरी तरह अड़ियल हैं तो ईपीडब्ल्यू (इकॉनॉमिक एंड पॉलिटिकल वीकली) में छपा यह शोधपत्र पढ़ सकते हैं, उसके बाद जब मॉल में जाएँ तो मेरी तरह आपके दिल में भी थोड़ा अपराध-बोध हो.

31 मई, 2007

लेखक हमेशा अकेला होता है, संघी नहीं

यह पक्की बात है कि लेखन खेलन नहीं है.

लेखन क्या है और लेखक कौन है यह एक अहम सवाल है, इसके बाद का सवाल ये है कि लेखक की भूमिका क्या है, लेखक का दायित्व क्या है, वह किसके प्रति उत्तरदायी है, वगैरह.

लेखन एक समानांतर सत्ता है. मेरे लेखक मेरे दिमाग़ पर राज करते हैं. रेणु, निराला, कबीर, मार्केज़, नेरूदा, कामू...

लेखक मालिक है विचारों-शब्दों-पात्रों-घटनाओं-स्थितियों का, शासक है, राजा है, सबसे बढ़कर स्वयंभू है, काफ़ी हद तक ईश्वर की तरह, अपना संसार रचता है. मानो तो देव, नहीं तो पत्थर.

छोटे-मोटे लेखक भी होते हैं जो कुछ-कुछ लिखते रहे हैं, बीच-बीच में मार्के की कोई बात कह देते हैं लेकिन जो लोग राज करते हैं वे दूसरे होते हैं, अपनी तरह से गुलशन नंदा भी हैं जिनकी सत्ता रही है लेकिन कमल कुमार, विमल कुमार, अनिल कुमार जैसे लोग जो अपने-आपको कवि-लेखक (आम काल्पनिक नाम हैं,कोई भाई बुरा न माने) समझते हैं वे भारी मुग़ालते में हैं.

मैं लिखता हूँ लेकिन ख़ुद को लेखक मानने की गुस्ताख़ी नहीं कर सकता, बात अगर शाब्दिक अर्थ की है तो जितने लोग साक्षर हैं सब लेखक हैं. मेरी नज़र में लेखक वह है जिसे लोग लेखक मानते हैं. नारद पर मैं लिखता हूँ और दूसरे लिखने वाले मुझे पढ़ते हैं इससे मैं लेखक नहीं बन जाता. बड़ा या छोटा लेकिन एक ऐसा वर्ग होना ज़रूरी है जो सचमुच आपके लिखे को पढ़ना चाहता हो, वैसे नहीं जैसे नारद पर हम एक-दूसरे को पढ़ते हैं और टिप्पणी करते हैं.

तरह-तरह के प्रगतिशील, अप्रगतिशील, तुक्कड़-मुक्कतड़, जनवादी-मनवादी आदि-आदि लेखक संघों का वर्चुअल कन्फ़ेडरेशन है नारद. इसके बाद आप कुछ रियल बना लीजिए, पर्चे छापिए, नए लोगों को प्रोत्साहन दीजिए, वाह-वाह करिए, बीस-तीस लोगों को आप लेखक कहिए, बीस-तीस लोग पढ़कर या बिना पढ़े आपको लेखक होने का सर्टिफ़िकेट दे देंगे, हो गया काम.

साम्राज्यवाद का मैं प्रबल विरोधी हूँ, साम्राज्यवाद विरोधी मोर्चों में चीख़-चीख़कर नारा लगाऊँगा लेकिन एक आम आदमी के तौर पर. दो-चार परस्पर मित्र जिन्होंने पहले अपने-आपको लेखक घोषित करके 'साम्राज्यवाद विरोधी लेखक मोर्चा' बना लिया हो, उनके बारे सिर्फ़ इतना कह सकता हूँ कि वे साम्राज्यवाद के विरोधी कम, अपने आपको लेखक साबित करने की मुहिम में ज़्यादा सक्रिय हैं.

जहाँ-जहाँ साम्राज्यवाद का विरोध हो रहा है वहाँ जाइए, नारे लगाइए. इसके लिए लेखक संघ की कोई ज़रूरत नहीं है, 'लेखक संघ' की सदस्यता से आपको तो लेखक का दर्जा मिलता है, सोचकर बताइए इससे साम्राज्यवाद का क्या बनता-बिगड़ता है.

पुरस्कार, सम्मान, प्रोत्साहन, सभा-गोष्ठी, सेमिनार-तकरार ये सब आयोजन हैं, लेखन नहीं. लेखक का काम लेखन है, आयोजन नहीं. यह निज- महिमामंडन है कि संघ बनाकर क्रांति ला देंगे, नए लेखकों को प्रोत्साहित करके मशाल में तेल डाल देंगे...इन लेखक संघों ने उनका नुक़सान किया है जो उनके सदस्य रहे हैं और उनका भी जो उनसे बाहर रहे हैं.

जो लिखता है और पढ़ा जाना चाहता है, वह साम्राज्यवाद का समर्थक और जनता का विरोधी हो ही नहीं सकता. मगर जो सचमुच का लेखक है वह अपने लेखन के ऊपर किसी संघ की सत्ता कैसे स्वीकार कर सकता है, कोई रचनाकार यह कैसे स्वीकार कर सकता है कि चार लोगों की बैठक में तय हो कि वह क्या लिखेगा और क्या नहीं? एक जैसा सोचने वाले लोग स्वाभाविक तौर पर एक-दूसरे से जुड़ जाते हैं और विचार-विमर्श करते हैं लेकिन संघ बनाकर लेखन नहीं हो सकता, वह नितांत निजी और वैयक्तिक कार्य है जिसमें कोई दख़ल नहीं दे सकता.

जैसे ही आप संघ-वंघ बनाते हैं वह एक औपचारिक व्यवस्था होती है जिसके नियम-क़ानून होते हैं, नियम-क़ानून होंगे तो उनका पालन करना होगा, आपके न चाहते हुए भी एक सत्ता संरचना तैयार हो जाएगी, जैसा मैंने पहले कहा कि हर लेखक स्वयंभू होता है वह किसी और की सत्ता क्यों स्वीकार करेगा, और करेगा तो क्या ख़ाक लिखेगा?

इस मामले में सरकारी प्रश्रय वाली अकादमियों से जुड़े लेखकों की खिल्ली तो उड़ाई जाती है लेकिन पार्टी लाइन पर लिखने वालों की नहीं, यह कोई न्यायसंगत बात नहीं है.

मिसाल के तौर पर, कबीर 'मैं कूता राम का, मोतिया मेरो नाम...' और '...चक्की भली पीस खाए संसार' दोनों लिखते हैं. अगर वे किसी जनवादी लेखक संघ के सदस्य होते तो सगे कॉमरेड उन्हें 'कूता' बना देते और किसी भक्ति आंदोलन से जुड़े होते तो भगत उन्हें ही पीस खाते. यह उनकी लेखकीय स्वतंत्रता है कि धर्म और आडंबर की अपनी व्याख्या करते हैं.

सच बात तो ये है कि जिसने जो देखा, भोगा है, सीखा है, संजोया है, वही लिखेगा. कोई ग़रीब का दर्द लिखेगा, कोई अमीर का अभिमान लिखेगा, कोई दोनों का विरोधाभास लिखेगा...कोई महान लेखक तीसरी-चौथी-पाँचवी परत भी ढूँढ निकालेगा जो अब तक नहीं दिख रही...लेकिन यह कोई और तय नहीं करेगा.

पाठक अपने लेखक चुनता है और लेखक भी अपने पाठक. जैसे आप दोस्त, प्रेमिका और पत्नी को चुनते हैं वैसे ही आपको अपने लेखक को ख़ूबियों-ख़ामियों के साथ स्वीकार करना पड़ता है, वह पैकेज में आता है. ऐसा नहीं हो सकता कि आप कहें कि टॉलस्टॉय का समता वाला पक्ष सही है लेकिन उनका संत वाला पक्ष हटा दो या फिर तुर्गनेव के सामंतवाद विरोधी विचार तो अच्छे हैं लेकिन इतना रंगीन मिजाज़ आदमी ठीक नहीं.

डीएच लॉरेंस, नोबोकोव को पढ़े बिना कोई जवान नहीं हो सकता (मस्तराम भी) और चेखव-तुर्गनेव को पढ़े बिना परिपक्व नहीं...देवकीनंदन खत्री और अगाथा क्रिस्टी से लेकर जेके रॉलिंग तक सबकी अपनी भूमिका है, उसी के हिसाब से उनकी जगह है. डैनियल स्टील और जॉन ग्रीशैम वह जगह नहीं पा सकते जो एन रैंड या मिलान कुंदेरा की है, इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता कि वे किस ख़ेमे में हैं.

ख़ेमे-वेमे के चक्कर में खुदरा लोग रहते हैं, ठीक से पढ़ने और ठीक से लिखने वालों को सार्थकता से सरोकार है. हर आदमी क्रांतियों का पोलापन और शोषण-दमन की पुख़्तगी को अच्छी तरह जानता है, उसके लिए लेखक नहीं चाहिए, और लेखक संघ तो बिल्कुल नहीं.

'अमल धवल गिरि के शिखरों पर बादल को घिरते देखा है...' एक महान कविता है लेकिन इसलिए नहीं कि क्रांतिकारी कवि बाबा नागार्जुन ने लिखी है (वैसे इसमें क्रांति की कोई बात नहीं है), अगर इसे कांग्रेसी सांसद रहे श्रीकांत वर्मा ने भी लिखा होता तो ये महान कविता ही होती.

साम्राज्यवाद के ख़िलाफ़ लेखकों की भूमिका पर चर्चा आगे फिर कभी.

28 मई, 2007

मायावती का हाथी और डोमटोली के सूअर

मेरे ख़ानदानी घर के संडास का मुँह जहाँ खुलता था वहाँ से एक बस्ती शुरू होती थी-डोमटोली. नाम यही था लेकिन वह बैनरों और तख़्तियों पर शोभता नहीं था इसलिए उसे हरिजन कॉलोनी या वाल्मीकि नगर लिखा जाता था. यह वैसा ही नाम था जैसे आजकल यौनकर्मी, जो सिर्फ़ लिखे हुए शब्दों में होता है, बोले हुए शब्दों में नहीं.

उस बस्ती के बोले हुए शब्द ऐसे थे जो लिखे नहीं जा सकते, जो लिखे हुए शब्द होते हैं उन्हें बोलने के लिए स्कूल जाना होता है. उस बस्ती के सौ में से पाँच लड़के स्कूल जाते थे जिन्हें 'अ' से अनार पढ़ाया जाता था जो उन्होंने कभी नहीं खाया, उनके लिए 'स' से सूअर होता था, हमारे लिए सरौता.

कोस-कोस पर पानी और बानी बदलने का मुहावरा ग़लत लगता है क्योंकि गज़ भर में मैंने उसे पूरी तरह बदलते देखा था. उनकी भाषा उन्हीं की तरह नंगी थी. उनका एक एक-एक शब्द हमारे घर में अछूत था. आज़ादलोक उनकी लड़ाइयों पर कुर्बान क्योंकि लिखे हुए शब्दों का सबसे अश्लील साहित्य उसके पासंग में नहीं. लेकिन उनकी गालियाँ उनके जीवन के मुक़ाबले बहुत शालीन थीं.

उनकी औरतें सबकी आँखों के सामने रगड़-रगड़कर नहाती थीं फिर भी उनसे गंदा कोई न था. वे किसी से बात नहीं करते थे लेकिन सबसे बदतमीज़ वही थे.

चंपक-बालभारती-मधुमुस्कान की उम्र में उनकी संतति को संतानोत्पत्ति की बारीकियाँ मालूम थीं लेकिन उन्हें किसी ने समझदार नहीं माना.

एक हज़ार लोगों के लिए कोई स्कूल और दवाख़ाना नहीं था लेकिन सरकार के दुलारे वही थे. भगवान की उन पर असीम कृपा थी इसलिए उन्होंने अपना एक अलग मंदिर बनाया था, उनका भगवान से सीधा नाता था क्योंकि वहाँ कोई पुजारी नहीं था.

सारे शहर की चोरियाँ वही करते थे क्योंकि हर दूसरे दिन डोमटोली में हवलदार आता था लेकिन चोरी कभी इतनी बड़ी नहीं होती थी कि थानेदार साहब आएँ.

उनमें से इक्का-दुक्का लोग बाइज़्ज़त सरकारी नौकरी करते थे, मुनसिपालटी की. सारे शहर की गंदगी के लिए वही ज़िम्मेदार थे क्योंकि झाड़ू लगाने के लिए उन्हें रिश्वत कोई नहीं देता था.

उनका अपना एक वोट था और एक नेता भी, जो हर चुनाव में वह खड़ा होता, नारे लगते, उसके पोस्टर सिर्फ़ डोमटोली में चिपकते और नामांकन वापस लेने के अंतिम दिन वह बैठ जाता ऐसे व्यक्ति के समर्थन में जो उन्हें उनका हक़ दिला देता, भुना सूअर और टंच ठर्रा.

दादी ने हमेशा माना कि इनरा गान्ही ने शह दी है वर्ना वे इतने बुरे नहीं थे. दादी अब नहीं हैं, डोमटोली वहीं है और मायावती लखनऊ में हैं. ताज़ा हाल देखने के लिए वहाँ जाना होगा, पता नहीं मायावती ने उन्हें और कितना बिगाड़ दिया होगा.

22 मई, 2007

दुनिया के सबसे ताज़ा आम मैंने खाए हैं

आम की ख़ास यादें हैं. हमारे पुराने पुश्तैनी घर में आम के दो पेड़ थे एक मालदा और एक बीजू. मालदा बड़ा था और बीजू छोटा.

मालदा पकने पर भी हरा रहता था, बीजू को बाल्टी में डुबोकर रख दिया जाता था और शाम को चूसा जाता था. जिन्होंने बीजू का रस नहीं लिया है उन्हें बता दें कि वह मैंगो फ्रूटी से बेहतर होता है और बिना स्ट्रॉ के ही चूसा जाता है.

मैं उन चंद ख़ुशक़िस्मत लोगों में हूँ जिन्होंने दुनिया के सबसे ताज़ा आम खाए हैं, इस मामले में हमारा मुक़ाबले सिर्फ़ तोतों से होता था. हम स्कूल का बस्ता फेंककर सीधे पेड़ पर चढ़ते थे. आम को पेड़ की डाल से अलग किए बिना खाते थे, पूरी तरह से ऑर्गेनिक आम, धोने का सवाल कहाँ था?

आँधी में गिरे आमों को गुड़ के साथ पकाकर अम्मा गुड़म्बा बनाती थीं. पड़ोस के लोग भी टिकोले माँगने पहुँच जाते.

घर में आम का पेड़ होने की मुसीबत यह थी कि जिसके यहाँ पूजा होती थी वही पत्ते तोड़ने पहुँच जाता, कई दुकानदार तो दीवाली पर पूरी दुकान सजाने के लिए आम के पत्ते माँगते, हमें लगता इस तरह तो हमारा पेड़ नंगा हो जाएगा.

आम के पेड़ पर कौव्वों के घोंसले थे जो लोहे और अल्युमिनियम के मज़बूत तारों से बने थे, जिनमें चम्मच, जीभी और साइकल के स्पोक भी शामिल थे. कौव्वे पेड़ को अपने बाप का समझते थे, जब उनके घोंसलों में अंडे होते थे तो हमारा पेड़ पर चढ़ना असंभव कर देते थे.पेड़ को अपने बाप का समझकर वे कोई ग़लती नहीं करते थे क्योंकि उस पेड़ पर उनकी कई पुश्तें रहती थीं.

कभी-कभार ऐसे आम भी मिलते थे जो न कच्चे होते, न ही पके हुए. उनमें एक दरार सी पड़ जाती थी और वे सख़्त लेकिन काफ़ी मीठे होते थे, बड़े लोगों ने बताया कि उन्हें कोयलपादा आम कहा जाता है क्योंकि गाते-गाते हर बार आवाज़ कोयल की चोंच से ही नहीं निकलती.

हमारी दादी घर के सामने ठेला लगाने वाले को बचे हुए आम बेचने के लिए दे देती थीं. अपने घर के आमों को सड़क बिकते देखना अजीब अनुभव था, कई बार लगता कि हम क़ितने ख़ुशक़िस्मत हैं और कई बार लगता कि हमारे आम कोई और क्यों खाए.

घर में आम के दो पेड़ हों, दोनों पर मीठे फल लगते हों, ऐसे में किसो को भला क्या शिकायत हो सकती थी? हमारी बुआ को थी, कहती थीं दोनों पेड़ बेकार हैं, ख़ामख्वाह मीठे फल लगते हैं, अचार नहीं बन सकते, उसके लिए बाज़ार से आम लाना पड़ता है.

हम आम खाकर गुठलियाँ लापरवाही से आँगन में फेंक देते थे, मानसून के आने पर पूरे आँगन में 'आम की फ़सल' लहलहाने लगती क्योंकि गुठलियों से अंखुए फूट आते, एक दिन उन सबको बेरहमी से उखाड़कर फेंक दिया जाता, एक आँगन में आम के कितने पेड़ हो सकते थे?

जो कच्चे आम टपक जाते थे उन्हें टपका कहा जाता, उन्हें भूसे में लपेटकर बोरियों की कई तहों के नीचे रख दिया जाता, इस तरह गर्मी से आम दो-तीन दिन में पक जाते थे. यह इंतज़ाम अक्सर दादी की खटिया के नीचे होता था, जब दोपहर में वे सो रही होती थीं तो हम कच्चे-पक्के आम निकालकर आधा खाते-आधा फेंकते. पाँच-सात दिन में जब वे बोरियाँ खुलवातीं तो उन्हें पके हुए लेकिन चंद बचे हुए आम ही मिलते.

शहर के बीचो-बीच मकान और उसके अहाते में आम के दो पेड़, यह ऐसा कॉम्बिनेशन है जो ज़्यादा दिन तक नहीं चल सकता था. कई दशक तक चला. वह जितने दिन रहा सरकार की लापरवाही से. सड़क चौड़ी करने के मास्टर प्लान की चपेट में आम जनता भी आई और आम के पेड़ भी लेकिन मास्टर प्लान की घोषणा होने के तीस वर्ष बाद.

आम के एक फलदार पेड़ का मुआवज़ा मिला दो सौ रूपया जिसमें उसे कटवाने की मजदूरी भी शामिल थी. हमारे आँखों के सामने आम के पेड़ को ढेर कर दिया गया, जब उन्हें काटा गया बस उन पर मंजर लगने ही वाले थे. बात 16 साल पुरानी है लेकिन आज भी आँखें भर आती हैं.

कटे हुए आम के पेड़ से हरे पत्तों के बीच से कौव्वों के पाँच घोंसले निकाले गए, किसी चतुरसुजान ने कहा कि इसे कबाड़ी के यहाँ बेच दो, ख़ालिस लोहा है, हमने कौव्वों की बरसों की चोरी और अनूठे शिल्प को 23 रुपए में बेच दिया. उस पैसे से हमने मद्रास कॉफ़ी हाउस में डोसा खाया.

पेड़ कटने के बाद से ख़रीदकर आम खाने का मन कभी नहीं हुआ, जब कहीं मालदा दिखता है अपना दर्द हरा हो जाता है.

21 मई, 2007

भाइयों यह असहिष्णुता सही नहीं जाती

पंजाब में भड़के हुए सिखों की भीड़ एक पंथ को 27 तारीख़ तक बंद करा देना चाहती है. मानो वह कोई पंथ नहीं, गली के नुक्कड़ पर चलने वाली चाय की दुकान है.

लोकतंत्र में इससे शर्मनाक कोई बात नहीं हो सकती कि एक धर्म के मानने वाले कहें कि दूसरे अपना धर्म मानना बंद कर दें. इसके बाद उस राज्य के मुख्यमंत्री कहते हैं कि 'डेरा सच्चा सौदा' के लोगों को माफ़ी माँगनी चाहिए.

'डेरा सच्चा सौदा' ने भी वही किया है जो हुसैन, चंद्रमोहन और दूसरे लोगों ने किया है यानी भावनाओं को आहत किया है. लोगों को शरबत पिलाकर या कोई ख़ास पोशाक पहनकर बाबा गुरमीत रामरहीम सिंह ने सही किया या ग़लत यहाँ वह मुद्दा ही नहीं है, जैसे कि पहले के सारे मामलों में भी नहीं था.

यहाँ मुद्दा ये है कि जिसके पास ताक़त है, सत्ता की ताक़त, जनसंख्या की ताक़त, उग्रता की ताक़त...वही तय करेगा कि दूसरे क्या बोलें, क्या खाएँ, क्या पिएँ और क्या करें.

फ्रांस में स्कूलों में पगड़ी पहनने पर रोक लगा दी गई है, वहाँ ताक़त नहीं है तो सारी बहादुरी गुम हो गई है, सरकार से अनुमति लेकर लाइन लगाकर शराफ़त से सारे विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं जहाँ आबादी अधिक है वहाँ तलवारें खनक रही हैं.

यह बात सिखों की नहीं है, सबकी है. हिंदू-मुस्लिम-सिख-ईसाई इस मामले में सब भाई-भाई हैं. पंजाब में सिख बहुसंख्यक हैं लेकिन क्या वे कश्मीर या गोवा में ऐसी ही धौंस में रहना पसंद करेंगे जहाँ वे अल्पसंख्यक हैं.

यहाँ थोड़ा सामान्यीकरण हो रहा है, किसी भी धर्म के सभी लोग एक तरह से नहीं सोचते लेकिन मुखर उग्र अभिव्यक्ति ही सामने आती है इसलिए यहाँ उसी की बात हो रही है.

गुजरात के मोदी समर्थक एक हिंदू दोस्त लंदन आए और अँगरेज़ों के नस्लवादी रवैए की जमकर आलोचना की लेकिन यहाँ उनके सारे तर्क नए थे जो गुजरात में उनके काम नहीं आते.

धर्म और लोकतंत्र एक साथ नहीं चल सकते अगर दोनों तरफ़ से बराबर की सहिष्णुता न हो. यहाँ दोनों ओर से सीमाएँ टूटती दिख रही हैं. भारतीय जटिलता की परंपरा का निर्वाह यहाँ भी हो रहा है क्योंकि कई बार यही पता लगाना मुश्किल हो जाता है कि धर्म कौन चला रहा है और लोकतंत्र कौन.

अकाली दल या भाजपा के मुख्यमंत्री होते हैं राज्यों की जनता के नहीं, कांग्रेसी हवा का रुख़ देखकर किधर भी जा सकते हैं, कोई किसी से कम नहीं है. उदाहरण अंतहीन हैं.

नेताओं से सबने उम्मीद छोड़ दी है लेकिन जनता भी नाउम्मीद कर रही है. अकालियों और भाजपाइयों को तो अपनी राजनीति चमकानी है लेकिन भीड़ में जो तलवार-त्रिशूल चमकाते हैं वो तो नेता नहीं हैं, किसी भी स्तर पर असहिष्णुता को बढ़ावा देने के ख़तरे से जो आगाह नहीं हैं वे ही सच्चे देशद्रोही हैं.

असहिष्णुता सिर्फ़ धर्म के मामले में नहीं है. जाति-भाषा-क्षेत्र-प्रांत सबको लेकर असहिष्णुता है. महाराष्ट्र हो या असम, मु्द्दा एक ही है कि बिहार-उत्तर प्रदेश से रोज़ी कमाने आए लोगों को कैसे भगाया जाए. मराठी हों या असमिया कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता, मूल बात है कि वे बहुसंख्यक हैं और उन्हें पता है कि लोकतंत्र के इस भारतीय संस्करण में उन्हीं की चलेगी.

बात यहीं ख़त्म नहीं होती, अब तो लोगों की साहित्यिक भावनाएँ भी आहत होने लगी हैं. नामवर सिंह ने पंत जी के अधिकांश साहित्य को कूड़ा बता दिया है इस पर राजनीति शास्त्र के एक अध्यापक की साहित्यिक भावनाएँ आहत हो गई हैं और उन्होंने अदालत का दरवाज़ा खटखटाया है. इसके पहले शिल्पा के चुंबन की वजह से रोमांटिक भावनाएँ आहत हुई थीं.

बहस यह है ही नहीं कि पंत जी का साहित्य कूड़ा था या नहीं, बहस तो ये है कि अगर नामवर सिंह को ऐसा लगता है तो इसमें अदालत का क्या काम है. बात सिर्फ़ ये है कि किसी को थोड़ा परेशान करके नाम भी हो जाएगा और साहित्य-संस्कृति-धर्म के रक्षक भी बन जाएँगे, इससे आसान सौदा क्या हो सकता है.

दूसरी ओर, जज साहब साहित्य-चित्रकला-चुंबन सबके ज्ञाता हैं. उनके पास ढेर सारी फ़ुर्सत है, सिर्फ़ डेढ़ करोड़ मुक़दमे पेंडिंग हैं, सिर्फ़ कुछ लाख लोग हैं जो लौकी या मुर्गी चुराने के जुर्म में 20 साल से जेल में बंद हैं. उनकी बारी जब आएगी तब आएगी, लेकिन उससे पहले धर्म-संस्कृति-साहित्य को नष्ट-भ्रष्ट होने से बचाना ज़रूरी है. सीधे शब्दों में अदालतें ऐसे मुक़दमे शुरू करके असहिष्णुता को न्याय पर तरजीह दे रही हैं.

हर तरह की असहिष्णुता बाक़ी देश की तरह नारद पर भी दिखती है, विचारहीनता से उपजी असहिष्णुता और वैचारिक प्रतिबद्धता के थोथे अहंकार से पैदा हुई असहिष्णुता भी. ब्लॉग लिखने वाले आम नागरिकों से ज़्यादा समझदारी दिखाएँगे, यह उम्मीद कुछ ज़्यादा तो नहीं.

18 मई, 2007

अजब आनंद है अज्ञान में

ज्ञानी कहते हैं कि अज्ञान अंधकार है जिसे ज्ञान का प्रकाश ही दूर कर सकता है, यह वाक्य अधूरा है. उन्होंने यह नहीं बताया कि ज्ञान आनंद का परम शत्रु है.

ठीक उसी तरह जैसे शोर मचाने वाले कहते हैं कि उन्होंने शांति की ऊब को ख़त्म कर दिया है.

यह ज्ञान का घमंड है कि उसने अज्ञान को ओछा समझा.

अज्ञानी सब समझते हैं, आप उन्हें ज्ञान से खिजा दें तो वे सिर्फ़ इतना कहते हैं--"अपने-आपको बड़ा ज्ञानी समझता है."

ज्ञान की रोशनी में मुझ जैसे लोग मुँह लटकाए बैठे हैं (प्रोफ़ाइल वाला फ़ोटो देखिए)जबकि सारी मस्ती अज्ञान के अंधकार में होती है.

'इग्नोरेंस इज़ ब्लिस' सुना था लेकिन इस छोटी सी बात में कितना गहन ज्ञान छिपा है यह मैं ज्ञान की चकाचौंध में समझ ही नहीं पाया.

मैंने अपने जीवन में जितने लोगों को अज्ञानी समझकर हिकारत की नज़रों से देखा है, वे सब शर्तिया तौर पर मुझसे ज्यादा आनंदित हैं.

ज्ञानी शहर के अंदेशे में दुबले होते हैं जबकि अज्ञानी आनंद के सागर में गोते लगाते हैं.

बचपन से आज तक आपने देखा है, जैसे-जैसे ज्ञान बढ़ता है, आनंद कम होता जाता है.

गौतम बुद्ध ने वर्षों तक घर-परिवार और राजसी आनंद का त्याग करने के बाद जो प्राप्त किया था उसे ज्ञान कहते हैं.

अब सुनिए कि वह ज्ञान क्या था--संसार में दुख ही दुख है, दुखों का कारण तृष्णा है, तृष्णा का कारण अभिलाषा है, तृष्णा की आग बुझाने से और भड़कती है, तृष्णा कम करो तभी दुखों से छुटकारा होगा...

अब इस ज्ञान के साथ क्या ख़ाक आनंद मिलेगा, ज्ञान यही है कि कुछ भी न चाहो, आप कुछ नहीं चाहेंगे तो कुछ मिलेगा नहीं, कुछ मिलेगा नहीं तो आनंद कहाँ से आएगा.

ज्ञानियों ने ही समझाया है कि आनंद अंदर से फूटता है, उसके लिए बाहर से कुछ नहीं चाहिए, यह भी ज्ञानियों की आनंद-विरोधी चाल है. उन्होंने यह नहीं बताया कि जब तक ज्ञान भीतर है आनंद बाहर नहीं फूट सकता.

ज्ञानी कहते हैं कि इस संसार में एक ही सत्य है, मृत्यु. अब अगर आप जानते हैं कि सत्य क्या है तो आप मरते दम तक मरघट वाले माहौल में रहेंगे क्योंकि सत्य से आप टरेंगे नहीं.

मुझे हमेशा तो नहीं लेकिन बीच-बीच में आनंद आता है, इसका सीधा मतलब है कि मुझे अभी आधा-अधूरा ज्ञान प्राप्त हुआ है.

आप ही बताइए पूरा ज्ञान प्राप्त करूँ या रहने दूँ, वापस अज्ञान की उत्तम अवस्था में लौटने का विकल्प बचपन की ग़लतियों के कारण बंद हो चुका है.

13 मई, 2007

तब तो सारे ब्लॉग थानेदारजी चेक करेंगे

नाम से लग रहा है कि चंद्रमोहन हिंदू हैं, अगर मुसलमान या ईसाई होते तब तो भावनाएँ और ज़्यादा आहत हो जातीं. यह बार-बार आहत होने वाली धार्मिक भावना ही अश्लील हो चली है.

कलम और कूची चलाने वालों का फ़ैसला डंडा चलाने वालों के हाथ में सौंपने से ज़्यादा ख़तरनाक बात किसी भी सभ्य समाज के लिए कोई और नहीं हो सकती. चंद्रमोहन के चित्र अश्लील हैं या नहीं, यह अलग मुद्दा है. इस पर वैचारिक बहस हो सकती है लेकिन फौजदारी नहीं.

जिस रफ़्तार से लोगों की धार्मिक भावनाएँ आहत हो रही हैं वह निश्चित रूप से चिंता की बात है. जिनकी भावनाएँ आहत हो रही हैं उन्हें पता लगाने की ज़रूरत है, उनकी भावनाओं में कहीं कोई गड़बड़ी तो नहीं है.

हिंदू पौराणिक ग्रंथों को पलटते ही पता चलता है कि उनमें काम और कामुकता को लेकर कोई झेंप नहीं है, देवताओं और देवियों का पर्याप्त सेनसुअल चित्रण किया गया है, अगर आप उसी वर्णन को पेंटिंग के रूप में उकेरना चाहेंगे तो 'धर्म के रक्षक' आपको बख़्शेंगे नहीं.

विस्तार में जाने का कोई मतलब नहीं है लेकिन देवराज इंद्र से लेकर प्रभु विष्णु तक की कामक्रीड़ाओं का ग्राफ़िक वर्णन उन ग्रंथों में है जिन पर अक्षत-फूल चढ़ाए जाते हैं. देवी लक्ष्मी की कमनीय कटि और विपुल वक्षों का विशद वर्णन श्रीसूक्त में है जो एक वैदिक स्तुति है.

शिव लिंग की पूजा करने वाले हिंदू समाज में लैंगिकता, नग्नता को लेकर ऐसी वर्जना समझ में नहीं आती है. वैसे भी, नग्नता हमेशा अश्लीलता नहीं होती, मंदिर में माँ काली की नग्न मूर्ति अश्लील नहीं लगती, दिगंबर जैन मुनि किसी को अश्लील नहीं लगते लेकिन एक कलाकार की कल्पना अचनाक अश्लील हो जाती है. बहरहाल, यहाँ मुद्दा कुछ और है.

हिंदू संस्कृति में काम को लेकर जो उन्मुक्तता रही है वह शर्माने या झेंपने की नहीं, समझने और सम्मान करने की चीज़ है. जो कुछ आपके पुण्य ग्रंथों में लिखा है अगर वह किसी रूप में सामने आता है तो उसमें घबराने या आहत होने की क्या बात है?

देवी और देवताओं का हमारी संस्कृति ने मानवीकरण किया, सखाभाव और प्रेमभाव से भक्ति की, अब अगर ऐसा होगा तो भक्त अपनी काम भावनाओं को कूड़ेदान में नहीं फेंक देगा, बल्कि जिस ईश्वर को उसने इतना सुंदर-मोहक-आकर्षक बनाया है उसमें काम का दिखना एकदम स्वाभाविक बात है.

सुनील गंगोपाध्याय विवाद भी कुछ ऐसा ही था. मैंने देवियों की मूर्तियाँ बनते देखी हैं, उन्हें निरावरण देखा है, वे निश्चित तौर पर बेहद आकर्षक होती हैं और किसी किशोर का उन्हें सुंदर देह की तरह देखना सहज संभव है. श्रद्धा, सम्मान, प्रेम और कामुकता सब एक ही दिमाग़ में उपजते हैं और एक-दूसरे में
घुलमिल जाते हैं, कौन कहाँ शुरू होता है, कहाँ ख़त्म, यह कहना मुश्किल है. कलाकार उसे ज़ाहिर करने की कोशिश करता है, हिम्मत करता है. हम-आप दबाकर बैठ जाते हैं. उस पर डंडे चलाने के बदले उसे समझने की कोशिश करिए.

सुनील गंगोपाध्याय जैसे रचनाकार की इस हिम्मत को मानसिक विकृति या सनसनी फैलाने का हथकंडा कह देना बहुत आसान है. उसे समझने के लिए थोड़ी बुद्धि, थोड़ी संवेदना और रटी-रटाई बातों से परे देखने का साहस चाहिए. हर मामले में हर कलाकार सही है और विरोध करने वाले ग़लत हैं, ऐसा नहीं हो सकता. मगर सत्ता और क़ानून का कला के क्षेत्र में कोई दख़ल नहीं हो सकता. कलाकारों और कला के पारखियों को देखने-परखने दीजिए, आपको अच्छा लगता है तो देखिए, नहीं लगता है तो मत देखिए.

जो लोग धार्मिक भावनाओं के आहत होने की दुहाई देते हैं उनका पहला तर्क होता है, 'मुसलमानों का बनाकर दिखाओ'...जो लोग चाहते हैं कि इस्लाम की तरह सारे कलाकार हिंदू धर्म के सिपाहियों से भी डरने लगें और उनके प्रतीकों से दूर रहें, वे एक अधोगामी प्रतियोगिता में पड़ रहे हैं जो उन्हें वहीं ले
जाएगी जहाँ उन्मादी मुसलमान ही नहीं, हर धर्म के जाहिल लोग हैं.

सहिष्णु होने का दावा करने वाले हिंदु आज मुसलमानों के उन्मादी तबक़े से लगातार प्रेरणा ले रहे हैं. वे अक्सर मिसाल देते हैं कि कार्टून विवाद में मुसलमानों ने दुनिया को हिला दिया, हिंदू ऐसा नहीं कर पाते क्योंकि वे एकजुट नहीं हैं, अपने धर्म की अस्मिता को लेकर आक्रामक नहीं हैं... वगैरह-वगैरह. ऐसा लगता है मानो आहत होने और बुरी तरह आहत होने की होड़ सी लगी है.

अलग-अलग धर्मों की तुलना नहीं करनी चाहिए, इसका कोई सकारात्मक नतीजा शायद ही कभी निकला हो. हिंदु धर्म की तुलना वैसे भी दूसरे धर्मों से नहीं हो सकती क्योंकि अन्य धर्मों की तरह उसमें न तो एक किताब है, न एक या कुछेक पैगंबर. उसके कोई तय मानदंड नहीं हैं, उसने मंदिरों की दीवारों
पर यौनशिक्षा दी...कामसूत्र और ब्रह्मचर्य का एक जैसा सम्मान रहा. ऐसा इसलिए हुआ कि हज़ारों वर्षों से विचारों का निर्बाध संप्रेषण होता रहा, समय के साथ सीमाएँ टूटती रहीं, कला-संगीत-साहित्य-विचारों पर ताले नहीं जड़े गए.

मेरी भी धार्मिक भावनाएँ हैं और उन्हें भी ठेस पहुँचती है जब मेरे धर्म की सीमा तय करने की कोशिश कोई जाहिल करता है.

09 मई, 2007

अनामदास की पोलपट्टी सब सच्ची-सच्ची

हर आदमी पूछता है, आई कार्ड दिखाओ, बैज दिखाओ, किधर खड़े हो, जल्दी बताओ. किस खाँचे में फिट होते हो?

आज मैं सिर्फ़ अपनी बात करूँगा. एक-एक शब्द सच है. मुझे ख़ुद ही पता नहीं है, मैं कहाँ खड़ा हूँ, जो सही लगता है करता हूँ, अपना तर्क ख़ुद बुनता हूँ...उधेड़ता हूँ...बुनता हूँ.

हिंदू हूँ लेकिन बीफ़ बर्गर पसंद है.

थोड़ा वामपंथी हूँ लेकिन माओ-स्टालिन का निंदक हूँ.

थोड़ा साम्यवादी हूँ लेकिन पूंजी जुटा रहा हूँ.

थोड़ा गाँधीवादी हूँ लेकिन माँसाहारी और मदिराप्रेमी हूँ.

थोड़ा समाजवादी हूँ लेकिन लोहिया-जेपी के बाद लालू जँचे नहीं.

पूरा लोकतंत्रवादी हूँ लेकिन अमरीकी स्टाइल कबूल नहीं है.

पक्का अमरीका विरोधी हूँ लेकिन सद्दाम मंज़ूर नहीं था.

ईरान समर्थक हूँ लेकिन मुल्लों से चिढ़ है.

देशप्रेमी हूँ लेकिन विदेश में रहता हूँ.

राष्ट्रवाद का आलोचक हूँ लेकिन ग्लोबलाइज़ेशन से डर लगता है.

आधुनिक हूँ लेकिन वेद-उपनिषद पढ़ना चाहता हूँ.

सवर्ण हूँ लेकिन आरक्षण को ग़लत नहीं मानता.

व्यवस्था विरोधी हूँ लेकिन नौकरी करता हूँ.

जान साहित्य-इतिहास में बसती है लेकिन रोज़गार समाचार है.

सृजनशील हूँ लेकिन अनुवाद करता हूँ.

सारे कर्म-उद्यम करता हूँ लेकिन नियति को मानता हूँ.

परिवर्तन चाहता हूँ लेकिन उससे डरता हूँ.

मानवतावादी हूँ लेकिन उसके लिए कुछ नहीं करता.

आप ही बताइए, कौन है जो मुझे अपनाएगा, मैंने सबको ठुकराया है. मैं ग़लत हूँ लेकिन सबसे ग़लत यही मानना है कि कोई भी, कुछ भी पूरी तरह सही है. बाक़ी निर्णय आप ख़ुद करें.

07 मई, 2007

नारद पर हिंदू-मुसलमान टंटा यानी 'माइ हेड'

तर्क-वितर्क, सुतर्क-कुतर्क का चक्र-कुचक्र जारी है. हिंदू, हिंदुत्व, मुसलमान,इस्लाम, धर्मांधता, सांप्रदायिकता, धर्मनिरपेक्षता जैसे सारे शब्द ज़रूरत से ज़्यादा ख़र्च हो चुके हैं.

सबकी राय पढ़ी, अपनी राय दी लेकिन बहस है कि चलती जाती है, साथी हैं कि ईंधन झोंके जाते हैं.

समझने वाले समझ गए हैं, जो नहीं समझे हैं वो भी नासमझ नहीं हैं उन्होंने तय कर लिया है कि हम नहीं समझेंगे.

ट्विंकल नाम की पत्रिका में बचपन में पढ़ी हुई कहानी बरबस याद आ रही है, बार-बार याद आ रही है. जो कुछ इस तरह है--

मास्टर साहब पढ़ा रहे थे--'माइ हेड यानी मेरा सिर.'

पढ़ाई करने के बाद शाम को घर पहुँचे टिल्लू से उसके पापा ने पूछा, 'बेटा आज स्कूल में क्या पढ़ा?' टिल्लू ने कहा, 'माइ हेड यानी मास्टर साहब का सिर.'

पापा पहले हँसे, फिर बोले, 'नहीं बेटे, माइ हेड यानी मेरा सिर.' टिल्लू ने कहा, 'माइ हेड यानी आपका सिर.' पापा ने दोहराया, 'बेटे, माइ हेड यानी मेरा सिर.'

टिल्लू अगले दिन स्कूल पहुँचा, मास्टर साहब ने कहा, 'बच्चों, कल का सबक दुहराओ. टिल्लू तुम बताओ, माइ हेड यानी?'

टिल्लू उछलकर खड़ा हुआ, 'मास्टर साहब, माइ हेड मतलब पापा का सिर.' मास्टर साहब ने उसके कान उमेठे और कहा, 'बेवकूफ़, माइ हेड का मतलब पापा का सिर नहीं, मेरा सिर.' टिल्लू ने कहा, 'मेरे पापा ने तो कहा था, माइ हेड मतलब मेरा सिर.'मास्टर साहब बहुत नाराज़ हुए, टिल्लू को एक चपत लगाई और कहा, 'हमेशा के लिए याद कर लो, माइ हेड का मतलब मेरा सिर.'

टिल्लू घर पहुँचा, पापा ने स्कूल की पढ़ाई के बारे में पूछा, टिल्लू ने कहा, 'आपने तो ग़लत बता दिया था, माइ हेड का मतलब आपका सिर थोड़े ही होता है, माइ हेड का मतलब मास्टर साहब का सिर होता है.' पापा बहुत नाराज़ हुए उन्होंने थप्पड़ रसीद करने के बाद टिल्लू को सबक़ एक बार फिर पढ़ाया, 'माइ हेड यानी मेराsss सिर...मेराsss सिर....मेराsss सिर...'

टिल्लू का सिर अब तक माइ हेड का मतलब सुन-सुनकर पक चुका था, दोनों तरफ़ से कान उमेठे जा रहे थे. उसने गहन चिंतन किया और सही निष्कर्ष पर पहुँच गया---माइ हेड यानी स्कूल में मास्टर साहब का सिर, माइ हेड यानी घर में पापा का सिर.

टिल्लू ने जीवन के अनुभव से सीखा है कि माइ हेड का मतलब क्या होता है. न तो उसके पापा के पास इतना अनुभव है, न ही मास्टर साहब के पास जो वे उसे माइ हेड का 'हेड एंड टेल' समझा सकें.

अब आप प्यार से समझाने की कोशिश करें या कान उमेठें, टिल्लू अपने निष्कर्ष पर पहुँच चुका है.

अगर आप ख़ुद को या किसी और को टिल्लू समझ रहे हों तो निम्नलिखित सूचना अवश्य पढ़ लें.

विशेष सूचनाः (इस कथा के सभी पात्र काल्पनिक हैं, किसी भी जागृत या सुप्त चिट्ठाकर की लेखनी या करनी से इसका कोई संबंध नहीं है, अगर कोई संबंध हो तो वह महज एक संयोग है.)

बेहतर यही है कि कोई नया अध्याय शुरू किया जाए, मिसाल के तौर पर 'माइ लेग' यानी नारद की टाँग.

04 मई, 2007

कहीं आप देशभक्त तो नहीं हैं?

मैं देशभक्त नहीं हूँ. न होना चाहता हूँ, मैं देशभक्ति से डरता हूँ क्योंकि दुनिया की हर लड़ाई की वजह वही रही है.

मैं देशप्रेमी हूँ. दुनिया भर में जितनी तरक़्की हुई है उसके पीछे लोभ-लाभ के अलावा कहीं न कहीं देशप्रेम ज़रूर रहा है.

देशप्रेम में भावना की ताक़त है तो देशभक्ति में अंधश्रद्धा की दासता. प्रेम दोतरफ़ा रिश्ता है जबकि भक्ति एकतरफ़ा.

सबसे ख़तरनाक बात जो देशभक्त बार-बार कहते हैं-"देश इंसान से बड़ा है".

यह सरासर ग़लत बात है कि देश इंसान से बड़ा है, कोई भी व्यवस्था किसी जीवित इंसान बड़ी नहीं हो सकती. देश एक व्यवस्था है जिसे इंसान ने ही बनाया है, इसमें व्यापक हित दिखता है कि व्यवस्था बनी रहे इसलिए कोई भी व्यवस्थावादी यही कहेगा कि देश बड़ा है लेकिन कोई सच्चा मानवतावादी इसे स्वीकार नहीं कर सकता. मैं तो नहीं करता. दुनिया में सब कुछ इंसान के लिए है, इंसान से बढ़कर कुछ नहीं.

देश की एकता और अखंडता कोरी राजनीतिक नारेबाज़ी है, दुनिया भर के देशों का नक़्शा बीसियों बार बदला है, आगे भी बदलेगा. लेकिन देशभक्ति के नाम पर हज़ारों-लाखों बेकसूर लोगों की जान लेने के बाद. टोबा टेक सिंह भारत में हो या पाकिस्तान में इससे आदमी को कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता, देशभक्ति या हुब्बुलवतनी के दुकानदारों और उनके भोले ग्राहकों को फ़र्क़ पड़ता है.

देशप्रेम अपने परिवार-परिवेश के प्रति प्रेम का विस्तार है. मैं देशप्रेमी हूँ, इसलिए नहीं कि भारत एक बेहतरीन देश है, मैं देशप्रेमी इसलिए हूँ कि मेरे जीने का ढंग हिंदुस्तानी है जो एक विशु्द्ध संयोग है, मेरे पूरे अस्तित्व से मेरी संस्कृति को अलग नहीं किया जा सकता, मेरा भारत-प्रेम एक सांस्कृतिक प्रेम है. एक स्वाभाविक प्रेम है जिस पर किसी का नियंत्रण नहीं है, जिसके लिए किसी ने मुझे पट्टी नहीं पढ़ाई है.

देशभक्ति एक थोपा हुआ राजनीतिक विचार है जो इनडॉक्ट्रिनेशन यानी घुट्टी पिलाने से पैदा होता है, देशभक्ति को हर देश में सर्वोच्च आदर्श के रूप में स्थापित किया गया है. दुनिया के ज़्यादातर देशों के नेताओं ने जितने भी घृणित कार्य किए हैं देशभक्त जनता ने उसके गुण-दोष पर विचार किए बिना देशभक्ति के नाम पर मानवता के ख़िलाफ़ किए गए सभी अन्यायों का समर्थन किया है.

देशभक्त अमरीकी जनता ने हिरोशिमा और नागासाकी पर बम गिराए जाने को ग़लत कहना ग़लत समझा. देशप्रेमी जनता ने हिरोशिमा और नागासाकी में दोबारा जान फूँकने का चमत्कार कर दिखाया. उदाहरण हज़ारों हैं लेकिन उनमें जाने से बहस भटक जाती है.

देशभक्त पाकिस्तानी नहीं मानते कि तालेबान को समर्थन देकर पाकिस्तान ने अपने फ़ायदे के लिए अफ़ग़ानिस्तान के लिए इतनी बड़ी मुसीबत पैदा कर दी, देशभक्त भारतीयों ने कब माना कि तमिल विद्रोहियों को प्रशिक्षण और हथियार देकर भारत ने श्रीलंका की आम जनता का अहित किया. दोनों देशों के देशभक्त तो यही नहीं मानेंगे कि ऐसा कुछ हुआ भी था.

दुनिया में सबसे आसान है देशभक्त होने का तमगा ख़ुद पहन लेना और देशद्रोही होने का किसी और को पहना देना. अगर किसी ने देश की बहुसंख्य जनता का अहित किया है तो वह यूँ ही मानवता का अपराधी है लेकिन जिसे देशद्रोह कहा जाता है वह हमेशा राजसत्ता के हितों पर चोट होती है, न कि जनता के हितों पर. जनता के हितों पर सबसे अधिक चोट वही कर सकता है जो सत्तासीन हो, लेकिन वह कभी देशद्रोही नहीं होता.
सवाल उठ सकता है कि इस तरह तो भगवान की भक्ति में भी बुराई है. ईश्वरभक्ति और देशभक्ति में एक बुनियादी फ़र्क़ है. ईश्वर राजनीतिक सत्ता के केंद्र में नहीं बल्कि अध्यात्मिक सत्ता के केंद्र में है. देश या राष्ट्र नाम की व्यवस्था राजनीति और कूटनीति की धुरी है.

बहस बहुत लंबी हो गई है. बहरहाल, हर देशभक्त यही तो चाहता है कि देश श्रेष्ठ बने लेकिन भक्ति श्रेष्ठ बनाने का नहीं बल्कि आँख मूँदकर अराध्य को सर्वश्रेष्ठ मान लेने का नाम है, किसी को आपने यह सोचकर पूजा करते देखा है कि इससे शायद रामजी या कृष्णजी और बेहतर हो जाएँ.

प्रेम हो तो आपको ग़ुस्सा भी आएगा, खीझ भी होगी और ये चाहत भी सुलगती रहेगी कि आप जिससे प्रेम करते हैं वह कैसे बेहतर बनेगा.